वरिष्ठ पत्रकार अनेहस शाश्वत का नया वेंचर- TheGoldenTalk.com

वरिष्ठ पत्रकार और कई बड़े अखबारों में काम कर चुके अनेहस शाश्वत ने अपनी वेबसाइट लांच की है. नाम है- The Golden Talk dot com द गोल्डन टॉक डॉट कॉम. ख़बरों और तात्कालिक विषयों पर लेखन के आजकल के माहौल में ख़ास तौर से हिंदी में दिलचस्प और विविध विषयों पर शोधपूर्ण लेखन कम हो रहा है. शाश्वत ने उसी कमी को पूरा करने का प्रयास किया है. हमारे आज के समय में जो कुछ भी घट रहा है उसके पीछे कालक्रम और समय का जटिल योगदान है. उस जटिलता की पड़ताल शाश्वत के लेखों में देखी जा सकती है. Continue reading

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नाकारा सरकारें और आत्महन्ता किसान

अनेहस शाश्वत

लाख दावों प्रति दावों के बावजूद आज भी भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती ही है। आधुनिक अर्थव्यस्था में इस स्थिति को पिछड़ेपन का द्योतक मानते हैं। बावजूद इसके अपने देश के किसानों ने देश के अनाज कोठार इस हदतक भर दिये हैं कि अगर तीन साल लगातार देश की खेती बरबाद हो जाये तो भी अनाज की कमी नहीं होगी। गौर करें यह तब जब भारत की आबादी लिखत-पढ़त में 125 करोड़ है यानी वास्तविक आबादी इससे ज्यादा ही होगी।

साथ ही गौरतलब यह भी है कि ऐसा करने वाला भारत का किसान लगभग रोजाना स्वतंत्र भारत में आत्महत्या करने के लिए मजबूर है। यही दोनों आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सदियों पुराने खेतिहर संस्कारों की वजह से किसान आज भी तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भरपूर मात्रा में अनाज पैदा कर रहा है। लेकिन नाकारा सरकारें किसान को मानवोचित गरिमा के अनुरूप जीवन देने में लगातार असमर्थ हो रही हैं जो कि सरकारों का संवैधानिक दायित्व है।

इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं लेकिन अफसोस की बात यह है कि देश के स्वतंत्र होने के बावजूद देश की खेती-किसानी पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था। वह तो भला हो 1965-66-67 में पड़े अकाल, का जिसने सरकारों को खेती-किसानी पर थोड़ा बहुत ध्यान देने पर मजबूर किया। उस थोड़ी बहुत सरकारी कृपा और अपने सदियों पुराने संस्कारों की मदद से किसानों ने न केवल विशाल आबादी का पेट भरा बल्कि आपातकाल के लिए भी कोठारों में अनाज भर दिया। यह अवधि भी हालांकि थोड़े दिन ही रही, कुल करीब ड़ेढ दशक तक यानी 1965 से 1980 तक।

1980 का साल भारत में निर्याणक परिवर्तन का साल रहा। इंदिरा गांधी काफी धूम-धड़ाम के साथ फिर से प्रधानमंत्री बनीं। साथ ही उनके नहीं चाहने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था पर पूंजीपतियों व वर्ल्ड बैंक का शिकंजा मजबूत होने लगा। इनकी प्रमुख मांग उद्योगों और उद्योगपतियों को अधिक से अधिक सुविधा देने की थी। दूसरी तरफ आकार ले रहा देश का विशाल मध्यम वर्ग था जिसकी जरूरतों को पूरा करने की सरकार की मजबूरी थी। क्योंकि उस समय सबसे बड़ा और संगठित वोट बैंक वहीं था। जाहिर सी बात है गाज खेती और किसानों पर गिरनी थी और गिरी। बाजार ने किसान को कभी भी उसकी उपज का लाभप्रद मूल्य नहीं दिया। उसकी भरपाई के लिए कृषि उपज को सरकारों ने खरीदना शुरू किया लेकिन इतना ध्यान रखा कि सरकारी खरीद की वजह से मूल्य इतना नहीं हो जाय कि मध्यम वर्ग की रसोई का खर्च उसको खटकने लगे।

आज भी आप चाहे तो खुद ही गणना करके देख लें, एक सामान्य मध्यम वर्ग परिवार की रसोई का खर्च माहवारी 8-10 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होता जबकि आमदनी 60 हजार से एक लाख रुपये प्रति माह होती है। बहरहाल किसान इस समस्या से जूझ ही रहा था कि देश में उदारीकरण का दौर शुरू हो गया। इसने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी। आमदनी बढ़ाने के चक्कर में देश का किसान परम्परागत खेती के साथ ही तमाम नई तकनीकों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा शुरू की गई नई योजनायें अपनाने लगा। जैसा कि अपने देश का रिवाज है, किसानों को नये सिरे से प्रशिक्षित करने के लिए न तो सरकारी एजेंसियां थीं और न ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों  ने प्रशिक्षण में कोई दिलचस्पी ली। वे केवल अपना माल और तकनीक बेचने में व्यस्त रहीं। फलस्वरूप बाजार की विवशताओं और बैंकों के कर्जों की वजह से कई बार किसान को फसल का लागत मूल्य मिलना भी दूभर हो गया। नतीजे में अब आत्महत्या के सिवाय किसान के पास कोई चारा भी नहीं रहा।

यह सब तो हुआ ही, यह भी हुआ कि भारतीय उद्योगपतियों और सरकारी अमले की  अयोग्यता और धूर्तता के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था उद्योगों और सेवा क्षेत्रों में इतने रोजगार पैदा नहीं कर पाई जिसमें बढ़ी हुई कृषि आबादी को समायोजित किया जा सके। इस वजह ने भी खेती पर अतिरिक्त बोझ डाला जो किसानों की आत्महत्या का कारण बना। ऐसा नहीं है कि सरकारे इस वजह को जानती नही है लेकिन जान बूझकर आंखे मूंद रखी हैं क्योंकि उदारीकरण के इस दौर में प्रभुवर्ग के स्वार्थ और अधिकारो में किसी तरह की कटौती नही कर सकतीं। मध्यम वर्ग से सबसे ज्यादा वसूली के बाद अगर इस वर्ग की रसोई का खर्च भी बढ़ गया तो जीत के 30-35 फीसदी वोटों के सहारे सरकार बना पाना किसी भी राजनैतिक दल के लिए मुश्किल होगा।

अब रह गयी विशाल निर्धन आबादी तो वह तो पहले से ही मनरेगा के हवाले है और वैसे भी यह आबादी फिलहाल राजनैतिक जागरूकता के लिहाज इस हद तक बिखरी हुई है कि कोई भी राजनैतिक दल जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सरकार बनानी है इस आबादी पर जोखिम मोल नहीं लेगा। इस आबादी का एक पहलू और भी है, इसके तहत वे अकुशल मजदूर और खेतिहर मजदूर आते है जिनकी समाज में कोई हैसियत नहीं है। यह तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूरी है कि उनका न्यूनतम ध्यान रखा जाये, वही हो रहा है। ऐसे में यह कड़वा सच है कि भारतीय किसान की त्रासदी अभी रुकने वाली नहीं, बल्कि बढ़ने की आशंका ज्यादा है। साथ ही भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था अब ऐसी जगह जाकर फंस गयी है, जहां उद्योग-धन्धे हैं नहीं, खेती नष्ट हो रही है और सेवा क्षेत्र भी बेहतर नहीं कहा जा सकता। नतीजे में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अकुशल मजदूरों और डिग्रीधारी अप्रशिक्षित बेरोजगारों की भरमार है। ऐसे में सरकारें मर रहे किसानों पर ध्यान देगी, ऐसा लगता तो नहीं, खासतौर से तब जब इस विकराल समस्या से निपटने की कोई इच्छाशक्ति और योजनाएं भी सरकारों के पास नहीं हैं।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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इतिहास में पाकिस्तान जोड़ेंगे, तभी बदलेगा भूगोल

-अनेहस शाश्वत-

अपने देश में किसी भी आदमी से पूछिए, मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने जामा मस्जिद कहाँ बनवाई? तत्काल जवाब मिलेगा दिल्ली में। शाहजहाँ ने एक और भव्य जामा मस्जिद सिंध के थट्टा इलाके में भी बनवाई। ध्यान रहे, शाहजहाँ के राज्य में न केवल आज का पाकिस्तान और बांग्लादेश वरन अफगानिस्तान का भी एक बड़ा हिस्सा शामिल था। ग्यारह सौ किलो सोने और सैकड़ों किलो जवाहरात से बने मयूर सिंहासन पर बैठने वाला शाहजहाँ तत्कालीन दुनिया का सबसे धनी और शक्तिशाली सम्राट था, जिसकी पगड़ी पर अमूल्य कोहिनूर हीरा झिलमिलाता रहता था।

शाहजहाँ रत्नों को पसंद करनेवाला उनका पारखी सम्राट भी था। दुनिया भर के जौहरियों के लिए उसका स्थाई आदेश था कि पहले रत्न उसे दिखाए जाएँ, जो रत्न उसके खरीदने से बच जाएँ, उन्हें बाज़ार में भेजा जाए। ऐसे व्यक्तित्व का स्वामी शाहजहाँ मुगलों की वंशावली का सबसे भव्य निर्माता भी था। आगरा का ताज महल, दिल्ली का लाल किला और जामा मस्जिद तो उसने बनवाए ही, पहले से बनी इमारतों और किलों मे भी शाहजहाँ ने नई और भव्य इमारतें जोड़ीं। मुग़ल इमारतों में बहुतायत से संगमरमर और संगमूसा का प्रयोग शाहजहाँ ने ही किया। इसी क्रम मे सिंध के थट्टा इलाके में भी शाहजहाँ ने एक बड़ी और भव्य जामा मस्जिद बनवाई जो उस इलाके में शाहजहाँ के वैभव और ताकत का प्रतीक है।

मुग़लों के और भी तमाम निर्माण आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान मे हैं, जिनके बारे मे आज-कल न तो अपने देश में बताया जाता है और न ही लोगों को मालूम है।
भारत शुरू से ऐसा देश रहा है, जिसकी समृद्धि से आकर्षित होकर तमाम विदेशी यहाँ आए और फिर यहीं के होकर रह गए। महमूद गजनवी, नादिर शाह और अब्दाली जैसे लुटेरे भी आए लेकिन वे अपवाद थे। जो यहाँ बस गए उन्होंने अगर इस देश से लिया तो इसे दिया भी बहुत कुछ। बात यूनान के लोगों से ही करें, मूर्तिशिल्प की गांधार शैली उन्हीं की देन है। इसी शैली में सबसे पहले भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ बनीं। यह सिलसिला जारी रहा और यहाँ आकर बस गए विदेशियों ने भारत की संस्कृति और समाज में बहुत कुछ जोड़ा।

अंग्रेज़ जरूर इस प्रवृत्ति के अपवाद रहे, हालांकि उन्होंने भी हिंदुस्तान को काफी कुछ दिया, लेकिन जितना दिया उससे कहीं ज्यादा ले लिया, साथ ही पाकिस्तान के रूप में एक नासूर भी दे गए। उस समय फैली अफरा-तफरी और घृणा के बावजूद एक बहुत ही छोटा तबका ऐसे लोगों का भी रहा, दोनों ही देशों में, जो यह मानता था कि दोनों देशों की साझी संस्कृति को भुलाया न जाए। हालांकि विभाजन के तुरंत बाद के दिनों मे यह तबका दोनों ही देशों मे अप्रासंगिक था। उन दिनों पाकिस्तान ने अपना मनगढ़ंत इतिहास तैयार किया और हिंदुस्तान में भी उन चीजों पर चुप्पी साध ली गई, जो पाकिस्तान चली गईं। हमारे इतिहास मे पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान पर चुप्पी साध ली गई, और लाहौर, जो अविभाजित भारत में दुनिया के सुंदरतम शहरों में से एक था, वो स्वतंत्र भारत में भुला दिया गया।

लेकिन कहावत है कि समय बड़े से बड़ा घाव भर देता है। अब भी ये जमात हालांकि छोटी सी ही है, लेकिन है दोनों तरफ, जो साझी विरासत को लेकर गंभीर है। इसी के तहत पाकिस्तान में बहुत प्राचीन और प्रसिद्ध कटासराज मंदिर की मरम्मत की गई। यह उस इलाके में भगवान शिव का मंदिर है। राज कपूर और दिलीप कुमार के पैतृक आवास को संग्रहालय बनाया जा रहा है और लाहौर में एक चौक का नाम शहीद भगत सिंह के नाम पर रखा जाना प्रस्तावित है। ऐसे ही और भी बहुत से काम वहाँ हो रहे हैं।

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हमे भी कम से कम अपने इतिहास मे बच्चों को वो सब पढ़ाना चाहिए जो कुछ भी एकीकृत भारत में हुआ। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान वगैरह में जो कुछ भी हुआ, उसका विस्तार से इतिहास आज भी पढ़ाना चाहिए। जो हिस्सा हमारा था, अगर हम ही उस पर चर्चा नहीं करेंगे तो कौन करेगा? पाकिस्तान को चित्त से मत उतरने दीजिये। भविष्य किसी ने नहीं देखा। उस समय अगर कुछ सकारात्मक हुआ तो चित्त में बसे होने की वजह से दोनों तरफ से मेल-मिलाप आसान और तेज़ होगा। आपसी घृणा और लड़ाई-झगड़े के बावजूद कहीं न कहीं कुछ ऐसा है कि तिरंगे झंडे को सलामी मुग़लों के लाल किले से दी जाती है और करोड़ों रूपए खर्च कर भगवान शिव के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जाता है।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों लखनऊ में रहने वाले अनेहस शाश्वत से संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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‘बोकरादी’ से ‘पेलपालदास’ तक!

अनेहस शाश्वत
बुढ़ापे को लोग बुरा कहते हैं, लेकिन दरअसल ऐसा है नहीं. इस अवस्था के बहुत लाभ भी हैं, खास तौर से हिंदुस्तान में. यहाँ कोई बुड्ढा आदमी कितनी भी बेवकूफी की बात करे, लोग उसका प्रतिवाद नहीं करते बल्कि हाँ में हाँ मिलाते हैं. इधर थोड़ा बदलाव आया है, देश से प्रेम करने का पेशा करनेवाले कुछ युवा जरूर, उनकी बात नहीं मानने वाले बुड्ढों को भी धमका देते हैं, लेकिन ख़ुदा का शुक्र है ऐसे लोग बहुत कम हैं. बुढ़ापे का एक दूसरा बड़ा लाभ ये भी है कि जीवन की संध्यावेला के पर्याप्त ख़ाली टाइम में पीछे छूट गई मूर्खताओं और मनोरंजक घटनाओं का काफी मज़ा नए सिरे से लिया जा सकता है. इस लेख में भी वही किया जा रहा है.

पढाई-लिखाई के बाद जब कुछ नहीं मिला, तो एक अच्छा-खासा अरसा अपने घर पर रह कर काटा. कसबे में मेरे जैसे खलिहर काफी थे सो सुबह-शाम बैठकी लगने लगी जिसमे एक से एक ज्ञानीजन भी शिरकत करते थे, जिनको अपने ज्ञान पर अगाध भरोसा था लेकिन इस बात का मलाल भी की इस कसबे में उनके ज्ञान की कोई कदर नहीं है. उनके ज्ञान की एक-दो बानगी देखना गैरमुनासिब नहीं होगा. राजीव गाँधी की हत्या हो चुकी थी लेकिन उन ज्ञानियों का मानना था कि उनको अगवा कर लिया गया है और उचित समय पर वे फिर से प्रकट होकर देश का कल्याण करेंगे. ऐसे ज्ञानिओं से मिलने के बाद एकाएक मुझे बचपन के वे ज्ञानी याद आ गए जो निक्सन और इंदिरा गाँधी की बात-चीत का आखों देखा हाल चौराहों, पान की दुकानों या दूसरी सार्वजनिक जगहों पर बेधड़क सुनाया करते थे. उनकी शुरुआत आम तौर से पुष्पक विमान से होते हुए सी.आई.ए के कार्यकलापों तक आती थी और उनका बतकही का अंदाज़ इतना रसभरा होता था,मानो ज्यादातर घटनाओं के वे चश्मदीद गवाह हों.

लेकिन कहीं न कहीं वे भले लोग थे. ऐसी बतकही के दौरान अगर कोई सच में पढ़ा-लिखा आदमी आ जाता था तो वे टॉपिक बदल देते थे या दायें-बाएं हो जाते थे, लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि उनको अपने ज्ञान पर संदेह था वे सिर्फ व्यर्थ की टकराहट से बचते थे. बहरहाल बेरोजगारी के दिनों की बैठकों में भी जब अंदाज़े बयां वही बचपन वाला ही दिखा तो बैठकी में शामिल एक ज्ञानी से मैंने इस ख़ास अंदाज़े बयां का राज़ पूछा. उन्होंने हंसते हुए बताया इस अंदाज़े बयां को बोकरादी बोलते हैं.

उन्होंने पूरा भाष्य किया कि बोकरादी शब्द, प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से निकला है. सुकरात तथ्यपूर्ण बातें करते थे लेकिन बोकराद अनर्गल बात करने में माहिर होते हैं और बात-चीत के इसी अंदाज़ को बोकरादी कहते हैं. उन्होंने ये भी कहा कि बेकारी के दिन काटने के लिए बोकरादी से ज्यादा मनोरंजक दूसरा और कोई उपाय नहीं है क्योंकि इसमे सिवाए कुछ प्याले या गिलास चाय के खर्चा भी कुछ नहीं है.बात पते की थी और उसी कसबे में रहकर ताजिंदगी बोकरादी का मज़ा लेने का अवसर भी था लेकिन मूर्खता के आवेग में मै अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए निकल पड़ा,लेकिन अच्छा ये रहा कि मूर्खता के उस दौर में भी खासे दिलचस्प अनुभव हुए जो शायद कभी काम आयें.

एक अनुभव बताता हूँ, बनारस का है. वहां के पत्रकारिता जगत में कई साथी आपसी बात-चीत में कभी-कभी किन्हीं-किन्हीं सज्जन को पेलपालदास कह कर बुलाते थे. जब मुझे पता चला तो मैंने बनारस के एक स्थानीय ज्ञानी से इसका मतलब पूछा तब उन्होंने एक कथा सुनाई. किसी समय वाराणसी नगरी में ब्रिजपालदास नाम के एक रईस रहते थे, वो तो पुश्तैनी रईस थे ही सो ठाठ से रहते थे, लेकिन उनकी नक़ल ऐसे भी तमाम लोग करते थे जो रईस नहीं थे, ऐसे ही लोगों को तब के बनारस में पेलपालदास कहने की परंपरा चल पड़ी. उन्होंने ही बताया कि बनारस के पुराने और नए पेलपालदासों में फर्क है.पुराने पेलपालदास जानते थे कि वे क्या हैं लेकिन नए पेलपालदास, ब्रिजपालदास सरीखी अकड़ दिखाते हैं, इसलिए ज्यादा हास्य के पात्र हैं.

अब जरा इस पूरी कथा को एक रूपक मान कर आज के भारत को इस रूपक के सापेक्ष देखें.मुझे अच्छी तरीके से याद है, मेरे बचपन में इंदिरा गाँधी प्रगतिशील विचारों और नीतियों की प्रतीक थीं और तत्कालीन जनसंघ पुराने विचारों का समर्थक. अड्डेबाज़ी उस समय खूब होती थी, जिसमे इंदिरा गाँधी के समर्थक उनके कामों मसलन बैंक के राष्ट्रीयकारण, परमाणु विस्फोट और बांग्लादेश के निर्माण की चर्चा कर उनकी तारीफ़ करते थे. तो जनसंघ समर्थक उन्हें किसी बात का श्रेय नहीं देते थे. उनका कहना था की पुष्पक विमान बनाने वाले हमारे देश में पहले ही सब कुछ किया जा चुका है और इंदिरा गाँधी जो कुछ भी कर रही हैं, उसका कोई मतलब ही नहीं है.

बावजूद ऐसी बहसों के कम से कम एक मुद्दे पर मतैक्य रहता था की देश में गरीबी बहुत है और आम आदमी का जीना दुश्वार है. बहरहाल समय बदला और देश में थोड़ा पैसा दिखा. फिर से दो तरह के लोग सामने आए. एक वे जो आपे में रहे दूसरे वो जो बेकाबू हो गए. बेकाबू लोगों का मानना है देश सुपर पॉवर बन चुका है और पाकिस्तान की औकात नहीं जो भारत को आँखें दिखाए. ऐसे लोग ही पेलपालदास हैं. भारत पहले के मुक़ाबले शक्तिशाली जरूर हुआ है लेकिन सुपर पॉवर नहीं. इसीलिए ऐसे पेलपालदास तब कुछ नहीं कर पाते,जब पाकिस्तान अक्सर दो –चार भारतीय जवानों को मार डालता है. ऐसे में भारत के हुक्मरानों को असली ब्रिजपालदास यानि अमेरिका से गुहार लगानी पड़ती है.

पेलपालदास जो पाकिस्तान को चीर डालने को उतावले रहते हैं, चीन का प्रसंग आते ही चुप्पी साध जाते हैं. और भी ऐसे तमाम प्रसंग हैं जो पेलपालदासों की कलई गाहे-बगाहे खोलते रहते हैं, लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी. लेकिन दाद तो पेलपालदासों को देनी ही पड़ेगी जो जानते हैं कि वे ब्रिजपालदास नहीं हैं, लेकिन वैसा दिखने का नाटक करते हैं और हंसी के पात्र बनते हैं.

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों लखनऊ में रहने वाले अनेहस शाश्वत से संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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सहूर है नहीं, कराएंगे पर्यटन!

काफी दिन हुए बीबीसी पर एक प्रोग्राम देखा था. उसमे उन्होंने यूरोप के कुछ फेमस किलों को इस तरह से सजाया था कि वे तीन – चार सौ साल पहले के जीवंत किले दिख रहे थे. ज़ाहिर सी बात है वो प्रोग्राम काफी सफल रहा. पर्यटन के प्रति लोगों का रुझान बढे इसके लिए नए – नए विचारों की जरूरत पड़ती है. लेकिन कम से कम अपने उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं है. यहाँ तो कुछ पेशेवर लोगों का झुण्ड है जो इस काम को अंजाम देता है और पर्यटन का सत्यानाश करने पर उतारू है.

इसे समझने के लिए किसी बड़े शोध की जरूरत नहीं, अपने लखनऊ में ही बेशुमार उदाहरण हैं. लखनऊ ऐतिहासिक शहर है और इसका समृद्ध अतीत है. लेकिन एक कमी भी है, जो इस अतीत को सामने लाने में सबसे बड़ी बाधा है. लार्ड डलहौजी ने एकदम से अवध पर कब्ज़ा कर लिया और नवाब को कलकत्ता भेज दिया. इसके तत्काल बाद अवध में विद्रोह फैल गया. उस अफरा – तफरी में लखनऊ में जो कुछ भी देखने लायक था उसका अधिकतर हिस्सा नष्ट हो गया.

तो भी जो बचा वो इतना सुन्दर था कि तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग जब लखनऊ आए तो उनकी पत्नी ने लिखा कि अगर मै खुद न देखती तो यह मानने से इंकार कर देती कि कोई शहर इतना सुन्दर हो सकता है. यह शहर नहीं वरन एक बहुत ही सुन्दर कलाकृति है. लगभग उसी समय १८५७ का विद्रोह कवर करने आए टाइम्स के संवाददाता विलियम हॉवर्ड रसेल ने लिखा न रोम न कोंस्तान्तिने और न ही मेसोपोटामिया कोई भी शहर इतना सुन्दर नहीं है जितना मैंने लखनऊ को पाया. इस ऐतिहासिक विवरण से तय है कि लखनऊ बहुत ही सुन्दर शहर रहा होगा.

लेकिन आज उस कालखंड की सुन्दरता पर्यटकों को दिखाने के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं है. बड़े इमामबाड़े को एक हद तक छोड़ दें तो पर्यटकों को हम केवल खंडहर इमारतें दिखाते हैं. इसीलिये लाख कोशिश के बावजूद पर्यटक लखनऊ नहीं आते. मज़े की बात लखनऊ में फोटोग्राफर १८४५-४६ के आस -पास ही आ गए थे और नवाबी ख़तम हुई है १८५६ में. उस समय का पूरा लखनऊ अपनी पूरी भव्यता के साथ फोटोग्राफ्स में मौजूद है.

लेकिन पर्यटन का बाजा बजानेवाले किसी भी ओहदेदार ने ये न किया कि एक आकर्षक इमारत बनाकर ये सारे फोटोग्राफ्स वहां डिस्प्ले कर दें उनके प्रामाणिक और दिलचस्प विवरण के साथ. ऐसा हो तो पर्यटक अभी भी पुराने लखनऊ को उसकी पूरी भव्यता में देख सकता है. लेकिन ये नहीं होगा उसके बजाए हो ये रहा है कि मुजफ्फर अली जैसे फ्लॉप फिल्म बनाने वाले से नवाबी एरा पर बेहूदे प्रोग्राम बनवा कर अफसरों और नेताओं को दिखाए जाते हैं. बेहूदगी और फूहड़पन के और भी उदाहरण लखनऊ में हैं जिन्हें अली जैसे ही और कॉकस के लोग  पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर अंजाम दे रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि लखनऊ में लोग नहीं हैं, रोशन तकी और योगेश प्रवीन सरीखे कई जानकार शहर में हैं जो लखनऊ के आधिकारिक विद्वान हैं और जो मुझे लगता है पर्यटन को बढ़ावा देने के नायाब तरीके बता सकते होंगे लेकिन उनतक कोई नहीं जायेगा. पूरे पर्यटन को लेकर ओहदेदारों का यही रवैय्या है कि पर्यटन को लेकर कुछ फूहड़ लोगों को कमाने-खाने का मौका दिया जाए, ऐसा ही होता रहा तो और चाहे जो कुछ हो जाए पर्यटन को बढ़ावा नहीं मिलेगा, हाँ कुछ लोगों की मौज का इंतजाम तो हो ही जाएगा.

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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आडवाणी पर राम का कोप हुआ, और कुछ नहीं….!

अनेहस शाश्वत (वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ)


हो सकता है आर एस एस बहुत ही देशभक्त और काबिल लोगों का संगठन हो, लेकिन इतना तय है यह एक बंद सा संगठन है, जिसके बारे में जानकारी बहुत स्पष्ट नहीं है. जो लोग इससे जुड़े हैं वे ही इसके बारे में कायदे से जानते हैं. आडवाणी लम्बे समय तक संगठन के शीर्ष पर रहे इसलिए मानना चाहिए कि संगठन के उद्देश्यों से वे पूरी तरह वाकिफ़ रहे होंगे.

आडवाणीजी के बारे में जितनी जानकारी सार्वजनिक है उसके मुताबिक वो खासे पढ़े-लिखे सज्जन हैं और भाजपा को शासक दल बनाने में उनका सबसे ज्यादा योगदान है, अटल बिहारी वाजपाई से भी ज्यादा. इस पृष्ठभूमि के हिसाब से कहा जा सकता है कि राम मंदिर आन्दोलन के लिए संघ और भाजपा की जो भी योजना रही होगी आडवाणीजी को मालूम रही होगी.         

राजीव गाँधी प्रधान मंत्री थे और राम मंदिर आन्दोलन जोर पकड़ने लगा था, राजनीति के कई जानकारों का कहना है मूलतः ये आन्दोलन कांग्रेस का था, जिसे भाजपा ने झपट लिया. बहरहाल सच जो भी रहा हो लेकिन भाजपा के हाथों में राम मंदिर आन्दोलन की कमान पूरी तरह से आ गई और इसके मुख्य शिल्पी बनकर उभरे लाल कृष्ण आडवाणी. उन्होंने आन्दोलन सफल हो इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ी,रथयात्रा निकाली और वी पी सिंह की सरकार भी कुर्बान कर दी.

आख़िरकार नरसिंह राव के ज़माने में मस्जिद गिरा दी गई और अस्थाई राम मंदिर बनने के साथ राम मंदिर आन्दोलन का एक चरण पूरा हुआ. इस पूरे आन्दोलन में दो बातें हुईं एक तो भ्रम का घटाटोप बना दूसरे यह बात सामने आई कि राम मंदिर आन्दोलन भाजपा को राष्ट्रव्यापी दल बनाने में असफल रहा. यह बात सामने आते ही भाजपा और उसके तत्कालीन शिल्पी आडवाणी ने राम मंदिर को उसके हाल पर छोड़ा और भाजपा को फैलाने के दूसरे आजमूदा उपायों पर अमल शुरू किया.

नतीजे में अटलजी के प्रधानमंत्रित्व में पहली गठबंधन सरकार बनी. यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि राम मंदिर आन्दोलन के बारे में आम जनता की चाहे जो धारणा रही हो, संघ के शिल्पी होने के नाते आडवाणी तो जानते ही रहे होंगे कि भगवान राम भाजपा के सत्ता संधान के प्रयोग में निमित्त मात्र थे, उनके मंदिर के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं थी. बहरहाल लगता है, इसी समय से धीर – गंभीर भगवान राम, मंदिर आन्दोलन के मुख्य शिल्पी आडवाणी से कुपित हो गए.

नतीजे में उन आडवाणी, को जिन्होंने भाजपा को राष्ट्रव्यापी शासक दल बनाया, उनकी पार्टी ने ही कौड़ी का तीन कर दिया. वैसे भी यह तो होना ही था. शासक पार्टी भावनाएं नहीं देखती. वह सत्ता में बने रहने के लिए ही काम करती है. ऐसे में राष्ट्रपति पद के लिए  आडवाणी के बजाये दलित राम नाथ कोविंद आज के दौर में बेहतर प्रत्याशी हैं. यह सब जो हुआ सो हुआ लेकिन यह भी होगा कि संघ, भाजपा और नरेन्द्र मोदी की कृतघ्नता इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी, राष्ट्रहित की आड़ में ये तीनो चाहे जो भी दुहाई दें.   

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है. शाश्वतजी का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

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कन्फेशन ऑफ ए ठग

मेरे ऊपर अक्सर मित्रगण यह आरोप लगाकर हंसते हैं कि मैं हर घटना को इतिहास से जोड़ देता हूँ| लेकिन अब मै क्या करूं कि इतिहास में मिलती हुई घटनाएँ याद आ जाती हैं| बुलंदशहर के जेवर के नजदीक हुई हत्या, लूट और बलात्कार की घटना  के बाद एकाएक कॉन्फेशन ऑफ ए ठग नामक किताब की याद आ गई| उन्नीसवीं सदी में भारत में कई तरह के ठग गिरोह सक्रिय थे| लूट-पाट और हत्या- बलात्कार उनका पेशा था| देश पर उस समय कई ताकतें काबिज़ थीं लेकिन कोई भी इतनी शक्तिशाली नहीं थी कि उन ठगों को ख़त्म कर सकें| साथ ही तमाम तरह के सामजिक बदलावों से ऐसे लोग सामने आ गए थे जो जीवित रहने को कुछ भी कर डालते थे| ठग ऐसे ही लोग होते थे|

1835 में लार्ड विलियम बेंटिक भारत के गवर्नर जनरल बने तो उन्हें भारत में शांति बनाये रखने को नए कानूनों कि जरूरत महसूस हुई| बेंटिक ने कर्नल स्लीमन को ठगों को ख़त्म करने का जिम्मा दिया| साथ ही कहा कि ठगों को मारने के पहले उनसे बात करो | बातचीत से पता चलेगा किन वजहों से लोग ठग बने| ठगों की उसी बातचीत से बनी किताब का नाम है कॉन्फेशन ऑफ ए ठग| यही किताब कालान्तर में इंडियन पेनल कोड 1861 का आधार बनी साथ ही कई दूसरे प्रशासनिक सुधारों का भी आधार बनी, जिससे देश में लम्बे समय तक शांति रही| याद रहे तब से गंगा-यमुना में बहुत पानी बह गया लेकिन आज भी हमारी क़ानून-व्यवस्था का आधार 1861 का पीनल कोड ही है|

1947 में भारत आज़ाद हुआ और 1990 तक कमोबेश देश का सामजिक-आर्थिक पहले सरीखा ही स्थिर रहा | 1990 के बाद से एकाएक भारत को अमेरिका बनाने में सरकारें जुट गईं| अब अपना देश अमेरिका बना या नहीं ये तो नहीं मालूम क्योंकि मै अमेरिका नहीं गया लेकिन जो दिख रहा है वह चिंताजनक है| ऐसे विरोधाभास सामने आ रहे हैं जो पहले कभी नहीं थे| अनाज के भंडार अकूत हैं लेकिन किसान मर रहे हैं| अरबपतियों की संख्या जिस तेज़ी से बढ़ रही है ग़रीबी उससे कई गुना अधिक तेज़ी से बढ रही है| शिक्षा का प्रसार जितनी तेज़ी से हो रहा है बौद्धिक अनपढों की जमात उससे अधिक तेज़ी से बढ़ रही है| खुद सरकार का कहना है ये युवा किसी काम के नहीं| जब भारत ग़रीब था सरकारें लोगों को पेंशन देती थीं| अब अमेरिका बन चुका भारत अपने नागरिकों को पेंशन नहीं देता| पक्की नौकरियों की जगह संविदा कर्मियों से काम चल रहा है| कारों और मोटर बाइक की संख्या इतनी बढ़ गई है की सड़कें कम पड़ रही हैं| दूसरी तरफ सडकों पर पूड़ी के ठेलों की भरमार है जो एक बड़ी आबादी की भूख मिटाने का आधार है|

जाहिर है जिस देश में इतनी तेज़ी से सामाजिक-आर्थिक बदलाव हो रहे हों वहां बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी होंगे जो जीवन की दौड़ में पीछे हो जाएँ| ऐसे लोग कुछ भी कर सकते हैं| इनसे निपटने को एक अलग अपराध संहिता तो चाहिए ही, नए सामजिक-प्रशासनिक सुधार भी चाहिए, जो होते नहीं दिख रहे| राम-राम का जयकारा लगाने वालों के बस का ये है भी नहीं, साथ ही कुनबे और जाति की राजनीति करनेवालों के बस का भी नहीं| ऐसे में यह कड़वी सचाई है कि अभी और कई जेवर सामने आयेंगे| अंग्रेजों ने तो ये भी किया था कई अपराधी जातियों पर लगातार निगरानी रखी जाती थी| उससे भी अपराध घटाने में मदद मिलती थी| अब शायद ये काम राम-राम जपने से हो जाए|

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अनेहस शाश्वत की रिपोर्ट.


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कांग्रेस के मनसबदार

अनेहस शाश्वत, लखनऊ

कांग्रेस का फिलहाल का पराभव देख दिमाग में अनायास मुगलों की मनसबदारी प्रथा की याद कौंध गयी। यह मनसबदार ही थे जिन्होंने मुगलों को दुनिया की अतुलनीय और चकाचौंध वाली ताकत बनाया और मनसबदारों के ही चलते आखिरी मुगल बादशाहों की ताकत लाल किले के भीतर तक ही सीमित होकर रह गयी। आज के माहौल में भी मनसबदार हालांकि एक जाना-माना और चलता हुआ शब्द है लेकिन मनसबदार और मनसबदारी दरअसल होती क्या थी, यह बहुत कम लोग जानते हैं। इसके विश्लेषण से शायद कांग्रेस के पराभव पर भी कुछ रोशनी पड़ सके इसलिए इसे जानना अप्रासंगिक नहीं होगा।

मुगल साम्राज्य को ताकतवर बनाने के लिए सम्राट अकबर ने कई नई मौलिक संस्थाओं की स्थापना की। मनसबदारी भी ऐसी ही एक संस्था थी। यह संस्था साम्राज्य के लिए प्रशासन, कर वसूली और सैन्य संचालन हेतु योग्य व कुशल व्यक्ति तैयार करती थी। संस्था के भीतर चेक और बैलेंस सिस्टम का भी अनोखा इंतजाम किया गया था। मनसबदारी की सबसे छोटी इकाई थे जात और सवार।

जात का मतलब पैदल सैनिक और सवार का मतलब घुड़सवार। सबसे छोटी मनसबदारी में दो सौ सवार और दो सौ जात होते थे। उनके नेतृत्व के लिए एक मनसबदार होता था। इस को एक छोटी जागीर दी जाती थी जिसकी आमदनी से वह खुद को और अपने जात-सवारों को तनख्वाह देता था। और बचा लगान सरकारी कोष में जमा करा देता था। उस जागीर में लगान वसूली और शुरूआती कानून व्यवस्था कायम रखने का काम भी उसी मनसबदार का था। यह अपने से ऊंचे मनसबदार से संबद्व होता था जो पांच सौ सवार-जात का मनसबदार होता था।

मनसबदारों का यह क्रम सात हजारी तक जाता था, यानि सात हजार सवार और सात हजार जात पर एक सात हजारी मनसबदार होता था, जो आमतौर पर मुगल साम्राज्य के इक्कीस सूबों में से किसी एक सूबेदार के प्रति जवाबदेह होता था, और यह इक्कीस सूबेदार सीधे मुगल सम्राट को रिपोर्ट करते थे। भिन्न स्तर के मनसबदारों को उनकी हैसियत से जागीरें दी जाती थीं जो उनके खर्च के लिए होती थीं, बची रकम सरकारी कोष में जमा कर दी जाती थीं।

मुगलों के साम्राज्य में सारे प्रशासनिक और सैन्य पदों पर नियुक्ति इसी संस्था में से होती थी और मुगलों के गौरवशाली समय में अक्सर यह होता था कि दो सौ सवार-जात का मनसबदार अपनी योग्यता और कार्यकुशलता से सात हजारी मनसबदार बनने में सफल रहता था। इन मनसबदारों का बाकायदा तबादला भी होता था ताकि किसी एक जगह शक्ति संचय कर वे बादशाह को चुनौती न दे सकें।

मनसबदारी का यह ढांचा जहांगीर के शासनकाल तक जैसे का तैसा बना रहा जहां उन्नति के लिए योग्यता एक मात्र शर्त थी। शाहजहां का समय आते-आते इसमें वंशानुगत होने के चिन्ह प्रगट होने लगे थे। तब बड़ा और ठहरा हुआ साम्राज्य था, इसमें योग्यता से अधिक इतर गुणों की आवश्यकता थी। आरंगजेब के समय में यह ढांचा पूरी तरह भ्रष्ट और वंशानुगत हो गया। अब मनसबदारों की पहली प्राथमिकता साम्राज्य और बादशाह का नहीं वरन अपना कल्याण करने की थी।

कई बार ऐसा हुआ कि दिल्ली में बैठे शाहजहां या औरंगजेब ने दक्षिण के उपद्रवियों से निपटने के लिए वहां के स्थानीय मनसबदारों को आदेश दिया लेकिन आदेश का पालन करने के बजाय वे विद्रोहियों से मिलकर चैन की वंशी बजाते रहे। बहरहाल प्रतापी औरंगजेब के चलते उसके समय तक मनसबदारी प्रथा काफी कुछ सफलतापूर्वक कार्य करती रही लेकिन उसके बाद के बादशाहों के समय मनसबदार खुदमुख्तार होते गये और इनमें जो सूबेदार थे उन्होंने अपने-अपने सूबों में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली, जिसमें वे बादशाह के लिए नाममात्र के लिए जिम्मेदार थे। नतीजे में आखिरी मुगल बादशाह लालकिले तक सीमित होकर रह गये।

याददाश्त पर जोर डालें तो याद आयेगा कि कांग्रेस का ढांचा भी ऐसा था कि शुरुआत चवन्निहा मेंबरशिप से करके कांग्रेस का अदना सा कार्यकर्ता मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा था। कांग्रेस के शुरुआती समय में चवन्नी देकर कांग्रेस की मेंबरशिप ली जाती थी। यह साधारण कांग्रेसी स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में सक्रिय कार्यकर्ता थे जो अपने कार्यों और योग्यता के बल पर वरिष्ठ पदाधिकारी बन जाते थे। स्वतंत्रता के बाद ये ही सत्ता के विभिन्न स्तरों पर काबिज हो गये।

यह सिलसिला इंदिरा गांधी के समय तक कमोबेश बदस्तूर चला। अगर जवाहरलाल नेहरू को वंशानुगत शासन की मानसिकता का मान भी लिया जाये तो यह कांग्रेस के कामराज सरीखे मनसबदार ही थे जो नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री के पक्ष में लामबन्द हुये। हालांकि इंदिरा गांधी के करिश्माई नेतृत्व के तले कांग्रेस संगठन का काफी कुछ क्षरण भी हुआ लेकिन काफी हद तक नीचे से ऊपर जाने की परंपरा बनी रही।

राजीव गांधी के साथ ही कांग्रेस पूरी तरह से और घोषित तौर पर शीर्ष से निम्न स्तर तक वंशानुगत संगठन के सहारे चलने लगी, इसमें निष्ठा, नेतृत्व के प्रति कम अपने प्रति ज्यादा होती है। ऐसे संगठन बहुत दिन नहीं चलते। कांग्रेस भी नरसिंह राव के बाद लड़खड़ाई, लेकिन सहानुभूति से उपजे सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व में उसे फिर संजीवनी मिली। लेकिन इस लंबी अवधि का उपयोग संगठन और सत्ता के वंशानुगत मनसबदारों ने केवल स्वार्थ सिद्धि में किया।

नतीजे में कांग्रेस का ढांचा पूरी तरह बिखर गया और फिलहाल महारानी दस जनपथ तक सीमित होकर रह गयी हैं। दुखद यह भी है कि भयानक हार के बावजूद कांग्रेस के इस वंशानुगत मनसबदारी से निकलने के कोई संकेत नहीं हैं। भारत के लोकतंत्र को सामंती लोकतंत्र भी कहा जाता है। हो सकता है ‘समय‘ भारतीय लोकतंत्र को इस अवस्था से गुजारने के बाद अमेरिका और इंग्लैंड सरीखा आधुनिक लोकतंत्र बनाने की ओर अग्रसर करे।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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हिन्दू और मुसलमान दोनों पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव आज तक सहला रहे हैं

किसी व्यक्ति परिवार या समाज में कुछ घटनाएं ऐसी हो जाती हैं कि वे सब कई पीढियों तक उस घटना से प्रभावित होते रहते हैं। ये प्रभाव अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। ऐसी ही एक घटना है सन १७६१ में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। इस लड़ाई के बारे में जानने से पहले लड़ाई क्यों हुई, यह जानना दिलचस्प होगा। इतिहास की एक धारा के मुताबिक उत्तर भारत में अंतिम महान हिन्दू सम्राट हर्ष वर्धन और दक्षिण भारत में रायरायान कृष्णदेव राय थे। मुस्लिम आक्रांताओं के हमले भारत पर आठवीं-नवीं शताब्दी से ही शुरू हो गए थे। लेकिन ११वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक के साथ ही भारत में उनके साम्राज्य की शुरूआत हो गई।

मुस्लिम राजा जब आए तो निरूसन्देह उन्होंने हिन्दुओं पर अत्याचार किए। लेकिन ऐबक के दामाद और दूसरे सम्राट इल्तुतमिश के साथ ही मुस्लिम आक्रमणकारी राजाओं ने यहां की हिन्दू बाहुल प्रजा के साथ मेल मिलाप शुरू कर दिया और कोशिश की कि हिन्दुओं की भावनाएं आहत नही हों। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही गई और १८वीं-१९वीं शताब्दी तक हिन्दू-मुसलमान खिचड़ी के दानों की तरह आपस में मिल गए।

लेकिन इस प्रवृत्ति के अपवाद भी रहे और वर्चस्व की लड़ाई में कई बार धर्म को भी हथियार बनाया गया। साथ ही यह भी हुआ शासक मुस्लिम वर्ग के विरुद्ध एक स्वाभाविक नाराजगी यहां के पुराने प्रभुवर्ग हिन्दुओं में बनी रही। यही नाराजगी औरंगजेब के शासन के बाद बहुविध तरीके से सामने आई। मुगलों के जमाने तक भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार मुख्यतरू खेती ही था। कई वजहों से, जिनको गिनाना यहां अप्रासंगिक है, शाहजहां के अंतिम दिनों में खेती के संकट के दिन शुरू हो गए। कोढ़ में खाज यह भी हुआ कि औरंगजेब ने अपनी साम्राज्य लिप्सा में इस संकट को न केवल उत्तर भारत वरन दक्षिण भारत में भी बढ़ा दिया।

परिणाम स्वरूप पहला विद्रोह खेतिहर जाट बिरादरी ने किया। जिसका नेतृत्व गोकुल जाट ने किया। विद्रोही भविष्य में भी सिर न उठा पाएं इसलिए औरंगजेब ने गोकुल जाट को बड़ी कठोर पीड़ादायी सार्वजनिक मौत दी। लेकिन जब जीवन का आधार ही नष्टड्ढ हो रहा हो तो मौत का खौफ नहीं रह जाता। परिणाम स्वरूप ज्यादातर खेतिहर जातियां देश भर में मुगल शासन के खिलाफ उठ खड़ी हुईं। जिनमें सबसे ज्यादा सफल रहे जाट और मराठे। इस बगावत के तार्किक परिणाम स्वरूप मराठा क्षत्रपति शिवाजी और राजा सूरजमल जाट शासकों के रूप में सामने आए। महाराजा रणजीत सिंह को भी एक हद तक इसी श्रेणी में रख सकते हैं।

इन सबमें भी सबसे पहले व सबसे अधिक सफलता मराठों को मिली। हालाकि इसके लिए उन्होंने बड़ी कीमत भी चुकाई। शिवाजी जिन्दगी भी औरंगजेब से लड़े। उनके पुत्र सम्भाजी को भी औरंगजेब ने मार डाला और पौत्र साहू को अपने यहां नजरबंद कर लिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने साहू को सशर्त रिहा कर दिया और उन्होंने पूना पहुंचकर क्षिन्न भिन्न और विखंडित मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। शिवाजी के बाद किसी केन्द्रित नेतृत्व के अभाव में मराठा साम्राज्य एक ढीला ढाला सा संगठन था। जिसमें सिंधिया, होलकर और गायकवाड़ समेत पांच बड़े घराने थे जो लगभग स्वतंत्र थे।

इन सब को एकत्रित कर अपने प्रधानमंत्री पेशवा, जो ब्राह्मण थे, की मदद से साहू ने मराठा साम्राज्य को मुगलों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश शुरू की। मुगलों के खिलाफ अपने संघर्ष को न्यायोचित, प्रभावी और व्यापक बनाने के लिए जब ब्राह्मड्ढण पेशवा बाजीराव ने हिन्दू स्वराज की बात की तो उसका जनमानस पर खासा असर पड़ा। बाजीराव बड़े योद्धा थे, उन्होंने मराठा साम्राज्य को लगभग आधे हिन्दुस्तान में प्रभावी बना दिया। लेकिन मराठा शासक एक काम नहीं कर पाए। जो जगहें उन्होंने जीती वहां पर प्रभावी शासनतंत्र स्थापित कर वे जनता के प्रिय नहीं बन सके। दूसरे उस समय मराठों से इतर जो दूसरी ताकतें सक्रिय थीं उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाकर भारत सम्राट मुगल ही बने रहे।

इन्हीं सब परिस्थितियों में अपने अंतकाल में साहू जी ने घोषणा की कि उनके बाद मराठा साम्राज्य के अधिपति पेशवा ही होंगे। और मराठा क्षत्रप पेशवा के अधीन मराठा शासन को विस्तार देकर मुगलों को अपदस्थ करेंगे। इस तरह साहू राजा की मृत्यु के बाद खेतिहर जाति मराठों के साम्राज्य के अधिपति ब्राह्मड्ढण पेशवा हो गए। मुगल साम्राज्य भी उस समय लग रहा था कि अस्त होने वाला ही है, बस एक सांघातिक धक्के की जरूरत है। साथ ही उस समय की अराजकता से फायदा उठाकर साहसी और लूटमार करने वाले शासक और लुटेरे भी सिर उठाने लगे थे।

ऐसा ही एक शासक था अफगानिस्तान का अहमद शाह अब्दाली। वह लूटमार के इरादे से कई बार भारत आ चुका था। लेकिन ऐसा नहीं था कि वह महमूद गजनवी की तरह केवल लुटेरा ही था। वह एक कूटनीतिक शासक भी था। ऐसे में कई हिन्दू-मुस्लिम शासकों के साथ उसके मित्रता के संबंध थे। ऐसी स्थिति में १७६१ में जब एक बार फिर अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया तो उसका सामना न ही भारत सम्राट मुगलों ने किया और न ही किसी और क्षत्रप ने। पेशवा के अधीन मराठों ने रणनीति बनाई कि अगर अब्दाली का सामना कर उसे हरा देते हैं तो फिर स्वाभाविक रूप से जो परिस्थितियां बनेंगी उनमें मुगलों को सांघातिक धक्का देने में पेशवा सफल रहेंगे। साथ ही हिन्दू स्वराज का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा।

इस सोच के तहत पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली और पेशवा की सेनाओं ने युद्ध का फैसला किया। मराठों ने निरूसन्देह बहुत अच्छी सेना सजाई और वह जीत के प्रति इतने अधिक अश्वस्त थे कि इस लड़ाई में पहली बार मराठा सरदारों की पत्नियां और परिवारीजन भी उनके साथ आए कि लड़ाई जीतने के बाद उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा करने के बाद तब पूना वापस जाएंगे। लेकिन मराठों के शत्रुओं ने भी इस लड़ाई में अवसर देखा। उन्होंने अब्दाली की सहायता की। उनमें से कई आमने-सामने मराठों से संघर्ष का सामर्थ्य नहीं रखते थे। इसलिए सोचा कि अब्दाली जीता तो अफगानिस्तान लौट जाएगा और मराठों को नष्ट कर देगा साथ ही वे स्थानीय राजा मराठों के प्रकट शत्रु भी नहीं बनेंगे। इसी पृष्ठड्ढभूमि में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई और अपराजेय मराठा सेना बुरी तरह हारी, इस हद तक कि लड़ाई में तत्कालीन पेशवा के भाई व बेटे भी मारे गए।

अब परिदृश्य बदल गया था। सांघातिक धक्का मुगलों के बजाय मराठों को लग चुका था। साथ ही प्लासी और बक्सर की लड़ाईयां जीतकर अब अंग्रेज भारत के अधिपति बनने की ओर अग्रसर थे। मुगलों का गौरव और पेशवा का हिन्दू स्वराज का सपना चकनाचूर हो चुका था। अब शासन अंग्रेजों को करना था और जाहिर है कि उनकी अपनी प्राथमिकताएं थी। गौर से देखें तो तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू और मुसलमान दोनों आज तक पानीपत की तीसरी लड़ाई के घाव सहला रहे हैं। लेकिन काल की गति निराली है। कई बार मनुष्य की सोच काल की गति के सामने धराशायी हो जाती है। फिर भी दोनों अपनी फितरत से बाज नहीं आते।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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अनेहस शाश्वत

आज यशवंत सिंह के इस भड़ास बक्से में आप सबके लिए कुछ हास्य का आइटम पेश करूंगा। पेशेवर पत्रकारिता को जब एक तरह से तिलांजलि दी थी तो सोचा था कि इस बाबत कभी कुछ लिखूं पढ़ूंगा नहीं, और न ही इस बाबत किसी से कुछ शिकायत करूंगा। क्योंकि इस पेशे में आने का निर्णय और फिर इसे छोड़ने का निर्णय भी मेरा ही था। इस पेश से जुड़े किसी भी आदमी ने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि आओ और न ही यह कहा कि इसे छोड़ दो, लेकिन बीस वर्ष की अवधि कम नहीं होती और इस अवधि में मुझे भी कुछ मजेदार अनुभव हुए। कई साथियों ने कहा कि इस बाबत भी कुछ लिख दो। कड़वे अनुभवों का जिक्र बेकार है क्योंकि वे निरर्थक हैं और एकाध कमीने सम्पादकों के सम्पादनकाल में ही हुए। मजेदार अनुभव काफी हैं जिनमें से कुछ का जिक्र मैं करूंगा।

तो साहब मास्टर की औलाद हूं, और परिवार में पुश्तों से लोगों ने या तो वकालत की या फिर सरकारी नौकरी। इसलिए हिन्दी पत्रकारिता के बारे में मेरा ज्ञान शून्य था। उस जमाने में हिन्दी पत्रकारिता एक बंद सा पेशा था। जिसके बारे में आमजन को कुछ खास अनुभव नहीं था, इसलिए फीडबैक लेना सम्भव भी नहीं था। बाहर की दुनिया में जो छनकर आता था वह ये कि सम्पादकगण बहुत विद्वान होते हैं और जुझारू पत्रकार जनहित में जान देने पर आमादा रहते हैं। हालांकि बाद में अनुभव से पता चला कि पत्रकारों-सम्पादकों की दीनदशा आमजन से छिपाने के लिए उनके सामने सायास यह गढ़ी हुई छवि पेश की जाती थी। कम से कम हिंदी पत्रकारिता का यही सच है।

बहरहाल इसी फीडबैक के साथ दैनिक जागरण लखनऊ में तीन चार महीने के अपरेन्टिसशिप के बाद अमर उजाला मेरठ में पक्की नौकरी मिल गयी। जहां तनख्वाह जागरण के 700/-रूपये महीने से कहीं ज्यादा थी। सो लखनऊ का मोह छोड़ मेरठ चला गया। अब नौकरी भी चल रही थी और चीजों को आब्जर्व भी कर रहा था। मुझे लगता था कि अमर उजाला कुल मिलाकर एक ठीक अखबार था। उस पिछड़े इलाके में सामान्य पढ़े लिखे पत्रकारों की मदद से एक अच्छा अखबार निकल रहा था। लेकिन वहां पर भी एक मजेदार प्रहसन रोज होता था। सबसे पहले जब डाक एडीशन का फर्स्ट पेज छपकर बाहर आता था तो डाक इन्चार्ज और सिटी इन्चार्ज कहते थे कि प्रथम पृष्ठ का इन्चार्ज मूर्ख है और उसकी मूर्खता को मालिक पता नहीं क्यों झेल रहे हैं। इसने प्रथम पृष्ठ का सत्यानाश कर दिया। 

इसी तरह डाक एडीशन के लिए प्रथम पृष्ठ प्रभारी और सिटी इन्चार्ज कहते थे कि डाक इन्चार्ज अज्ञानी हैं और मालिक दयावश इसके अज्ञान को बर्दाश्त कर रहे हैं। वर्ना डाक एडीशन को तो इसने कूड़ाघर बना ही रखा है। सिटी एडीशन के लिए डाक और प्रथम पृष्ठ प्रभारी का मानना था कि अल्पज्ञानी और बड़बोले सिटी इन्चार्ज ने सिटी पेजेज को नष्ट कर दिया है। जो मालिक को दिखाई नहीं दे रहा है। अब मैं सोचूं कि यार अखबार तो कुल मिलाकर ठीक ही ठाक है और अगर ये तीनों इसे नष्ट कर रहे हैं तो मालिक कोई एक्शन क्यों नहीं लेता है। वह तो कालांतर में बाद में समझ में आया कि सभी पत्रकारों का मानना होता है कि उनके अलावा बाकी पत्रकार मूर्ख हैं और यह उनका दुर्भाग्य है कि मूर्ख ही अच्छे पदों पर बैठकर संस्थान का सत्यानाश कर रहे हैं।

ऐसे ही मजेदार अनुभवों के बीच दिन कट रहे थे कि मेरे एक भांजे ने कहा मामा मुझे भी पत्रकार बनवा दो। बहरहाल किस्सा कोताह यह कि मैंने उसे एक बड़े अखबार का ग्रामीण संवाददाता बनवा दिया। तीन-चार महीने बाद मुझे वह फिर मिला। मैने पूछा बेटा काम कैसा चल रहा है? उस हंसोड़ बालक ने कहा कि मामा मैने पत्रकारिता छोड़ दी है क्योंकि ग्रामीण पत्रकारिता का मतलब होता है सांड़रूपी पत्रकार को अखबार के नाम से दागकर छोड़ दिया जाता है कि जाओ चरो खाओ, जो मेरे बस का नहीं है। मजे की बात यह कि दो दशक बीते आज भी अखबार हो या टीवी चैनल ग्रामीण इलाकों में पत्रकाररूपी दगे सांड़ ही घूम रहे हैं। हालांकि सच यह भी है कि सारे कष्टों के बावजूद ये दगे सांड़ कभी-कभी बहुत शानदार खबरें देते हैं, जिनका क्रेडिट दफ्तरों में बैठे मोटाये सांड़ उठा ले जाते हैं।

खैर यह सब तो चल ही रहा था अब सम्पादकों के भी मजेदार अनुभव होने लगे थे। सहज, खासे पढ़े लिखे और सामान्य व्यवहार वाले सम्पादक हिन्दी पत्रकारिता में कम ही होते हैं। अधिकांश ‘यूनीक केस’ होते हैं। अशांत और षड्यंत्रकारी माहौल शायद उन्हें ऐसा बना देता हो जब मैं हिंदुस्तान में था तो प्रधान सम्पादक मृणाल पाण्डेय थीं। उनके लेख निहायत प्रांजल भाषा में लिखे जाते थे लेकिन कुल मिलाकर वे उपदेशपरक और निरर्थक होते थे अब भी ऐसा ही है। अब चूंकि वे सम्पादक थीं तो उन्होंने अपने पाठकों को यह बताना भी मुनासिब समझा कि वे पुश्तैनी साहित्यकार हैं। उनकी मां और नानी खासी बड़ी लेखिकायें थीं। अब बेचारे उस समय के हिन्दुस्तान के पाठकों की यह मजबूरी थी कि वे तीनों महान साहित्यकारों के बारे में न चाहते हुए भी उनके वृत्तांत जाने। सो साहब पाठकों ने मजबूरी में ही सही वह सारा वृत्तांत पढ़ा ही होगा।

कुछ पुरखों का पुरुषार्थ और कुछ खासे सम्पन्न बड़ी बहन और बड़े भाई की कृपा मेरे दिन बगैर कुछ खास किये भी बड़े आराम से कटते हैं। ऐसे में टाइम पास के लिए कई अखबार देखता हूं। कारण इससे सस्ता टाइम पास सम्भव भी नहीं। सो सम्पादकों के आलेख अब भी पढ़ता हूं। शशि शेखर महोदय के लेखों में थरथराहट काफी होती है। किसी घटना को अंजाम देने वाले पात्र घटना के समय उत्साह या आशंका से जितना थरथराते होंगे उससे कुछ ज्यादा ही उत्साह या आशंका से शशि शेखर अपने लेखों में थरथराते हैं। अपने लेखों में ही एकाधिक बात उन्होंने जिकर किया है कि न्यूज रूम में किसी घटना की जानकारी होते ही वह किस तरह से चीखने-चिल्लाने लगे। दैनिक जागरण के मालिक कम सम्पादक भी अपवाद नहीं हैं, वे समस्त विषयों के ज्ञाता हैं और आधिकारिक भाव से वे हर विषय पर कलम चलाते हैं। आश्चर्य है उन्हें अभी तक क्यों विश्वविद्यालयों ने मानद डॉक्ट्रेट की उपाधि नहीं दी।

सच यह है कि अधिकांश सम्पादकों के लेख उपदेशपरक और उबाऊ होते हैं। उनमें विषयों का विस्तार भी नहीं होता। क्योंकि वे सामान्य पढ़े लिखे हैं। ऐसे में उपदेशपरक लेख लिखना कहीं अधिक आसान होता है। मजे की बात यह भी कि उनके उपदेश उसी अखबार में छपते हैं जिसमें वे फिलहाल होते हैं। उनके जाने के बाद वह संस्थान उनके उपदेशों से लाभान्वित होने से कतई इनकार कर देता है। कभी-कभी मुझे यह भी लगता है कि इन पर उपदेश कुशल बहुतेरे सम्पादकों को अगर मोहल्ले स्तर की भी जमीनी सच्चाइयों से रूबरू होना पड़े और ठीक करने की जिम्मेदारी दी जाये तो ये भाग खड़े होंगे। लेकिन अपने लेखों में वे किसी को भी हिकारत की भावना से उपदेश दे डालते हैं।

और अंत में, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चतुर्वेदी का अनुभव बताना अप्रासंगिक नहीं होगा। चतुर्वेदी जी ने अपना कैरियर आज अखबार से शुरू किया था जिसकी महानता के बारे में आज भी तमाम झूठे सच्चे किस्से सुनाये जाते हैं। मैने चतुर्वेदी जी से पूछा कि महोदय आपने तो हिंदी पत्रकारिता के तथाकथित स्वर्ण युग में शुरुआत की थी और वह भी ‘आज’ अखबार जैसे स्वर्ण महल में रहकर, आपका क्या कहना है? चतुर्वेदी जी भले आदमी हैं। उन्होंने कहा- हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग कभी नहीं था, खुद को भ्रम में रखने के लिए हम लोगों ने सायास यह मानक गढ़ा है।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम किया. घुमक्कड़ी, यायावरी और किस्सागोई इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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राष्ट्रोत्थान की फेसबुकी टिट्टिभि प्रवृत्ति

-अनेहस शाश्वत-

इस आर्टिकिल की शुरुआत की जाये इससे पहले टिट्टिभि प्रवृत्ति पर चर्चा लाजिमी है। हालांकि यह एक मिथिकीय कथा है। माना जाता है कि टिट्टिभि (टिटिहिरी) नामक बेहद छोटा पक्षी जब सोता है तो पंजे आसमान की तरफ कर लेता है। टिटिहिरी का मानना है कि उसकी निद्रा की दौरान अगर आसमान फट पड़े तो अपने पैरों पर वह उस बोझ को सम्भाल लेगी और धरतीवासियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचने देगी। टिटिहिरी की यह प्रवृत्ति काबिले गौर और काफी हद तक हास्यास्पद है। भले वह गिरते आसमान को रोक पाये या नहीं।

यह टिट्टिभि प्रवृत्ति अनादिकाल से चली आ रही है और फेसबुक एकदम अधुनातन संरचना है। ऐेसे में टिटिहिरी की प्रवृत्ति और फेसबुक के अद्भुत संयोग से एक खास तरह की प्रजाति कम से कम भारत भूमि पर अवतरित हो चुकी है। अकिंचन और अल्पशिक्षित प्राणी हूं, इसलिए फेसबुकी टिट्टिभि प्रजाति के ऐसे अनोखे लोग शेष धरती पर और कहीं पाये जाते हैं या नहीं यह मुझ गरीब को फिलहाल नहीं मालूम। बहरहाल अपने भारत देश की धरा पर वे काफी बहुतायत से पाये जाने लगे हैं। खास तौर से भाजपा की केन्द्र सरकार बनने के बाद। ये फेसबुकी टिटिहिरियां अपने-अपने फेसबुक वाल को युद्ध का मैदान समझकर युद्ध में जुटी हुई हैं और इनका मानना है कि राष्ट्र उन्हीं की वजह से टिका है वर्ना कब का रसातल में चला गया होता।

मानव की तरह टिटिहिरी की भी कई प्रजातियां होती होंगी, ऐसा मैं मान लेता हूं। हर जीव की कई प्रजातियां होती हैं तो टिटिहिरी की भी होती ही होंगी। सो फेसबुक की वाल पर पैर उल्टा कर राष्ट्रोत्थान में जुटी ये टिटिहिरियां अलग-अलग नेताओं और दलों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। अपने-अपने देवताओं के समर्थन में किसी भी हद तक जाकर शीर्षासन करने में उन्हें कोई परहेज नहीं है। सही मायनों में जान जोखिम में डालकर देश के लिए सड़क पर संघर्ष करने वाले लोग जब कुछ सही या गलत कर चुकते हैं तो ये फेसबुकी टिटिहिरियां एक दम से सक्रिय हो जाती हैं। पाठकों आप में से अधिकांश के पास फेसबुक अकाउण्ट होंगें और आप भी इन टिटिहिरियों के शीर्षासनी कुतर्क पढ़कर चमत्कृत होते ही होंगे, इसलिए इस पर बहुत ज्यादा चर्चा जरूरी नहीं है।

मुझे याद है बचपन से लेकर अभी हाल ही तक ड्राइंग रूम में बैठकर राजनीतिक चर्चा करने वालों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता था। ये करें-धरेंगे कुछ नहीं खाली जुबान चलायेंगे। मानो इसी से देश का भला होगा। फिर भी तबका मध्य वर्ग कम से कम चर्चा के बहाने सरोकार तो दिखाता था। उनके तर्कों में दम होता था और ये तर्क तथ्यों पर आधारित होते थे। अब उनका यह स्थान इन फेसबुकी टिटिहिरियों ने ले लिया है। दिल्ली में बैठे और खासे काबिल साथ ही ऐसी फेसबुकी गतिविधियों से वाकिफ मेरे एक मित्र ने मुझे बताया है कि उनमें से बहुत सारी टिटिहिरियां तो बाकायदा पेड हैं। उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है। इतने बड़े और ज्ञानी आदमी हैं तो सही ही बता रहे होंगे।

हालांकि इन टिटिहिरियों से इतर अपनी-अपनी विचारधारा के पक्ष में लड़ने-जूझने वाले तमाम लोग बड़ी संख्या में मौजूद हैं। जो जान जोखिम में डालकर अपने वर्ग से लेकर देश तक के उत्थान की लड़ाइयां लड़ रहे हैं। वे सही या गलत हो सकते हैं लेकिन उनकी मंशा चरित्र और लड़ाई के प्रति उनकी प्रतिबद्धता काबिल-ए-तारीफ है। वे हार सकते हैं, वे जीत भी सकते हैं, लेकिन वे सचमुच के योद्धा हैं, जो लड़ाई जमीन पर लड़ रहे हैं फेसबुक की वाल पर नहीं। इन्हीं टिटिहिरियों की एक और प्रजाति भी है इन्हें फेसबुकी टिटिहिरियां तो नहीं कह सकते लेकिन काम वे ऐसा ही करते हैं। इस प्रजाति में खास तौर से हिन्दी पत्रिकाओं, अखबारों के सम्पादक, मालिकान आते हैं।

सारे धतकरम करने के बाद जब यह सम्पादकीय लिखते हैं तो लगता है कि महराज हरिश्चन्द्र के बाद अब जम्बूद्वीप की धरा पर यही अवतरित हुये हैं। उन लेखों से यह ध्वनि भी निकलती है अगर इन लेखों को पढ़ा नहीं गया तो निश्चित रूप से कम से कम भारत वर्ष में प्रलय आ ही जाएगी। खैर यह सब संसार है, सब चलता है। लेकिन यह टिटिहिरियां जो कर रही हैं, उससे जल्दी ही हिन्दी भाषी पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की जो बची-खुची साख है वह भी मिट्टी में मिल जाएगी। यह सब तो होगा ही साथ ही यह टिटिहिरियां जो यह सोच रही हैं कि देश उनके उल्टे पैरों पर ही टिकेगा, तो उनकी इस खामख्याली को क्या कहा जाये ? मूर्खता का कोई तोड़ नहीं है। जम्बू द्वीप का जो अच्छा या बुरा होगा, जमीन पर लड़ रहे लोगों द्वारा ही होगा, इन फेसबुकी टिटिहिरियों से तो कतई नहीं।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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अखिलेश यादव की कहानी से याद आये राजीव गांधी!

अनेहस शाश्वत
23 जून, 1980 की सुबह रेडियो पर एक समाचार आया और सन्नाटा छा गया। समाचार यह था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र और उनके सम्भावित उत्तराधिकारी कांग्रेस नेता संजय गांधी का दुर्घटना में निधन हो गया। इस दारुण दुख के आघात से उबरी इन्दिरा गांधी ने सिर्फ इतना कहा कि-‘‘मेरे साथ इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है।’’ लेकिन किन्हीं भी परिस्थितियों में न डिगने वाली भारतीय मानसिकता की इन्दिरा गांधी ने तत्काल अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी को अपना उत्तराधिकारी चुनकर प्रषिक्षण देना शुरू किया। अभी यह प्रशिक्षण चल ही रहा था कि दूसरी दुर्घटना घटी और 31 अक्टूबर, 1984 को इन्दिरा गांधी की हत्या कर दी गयी। चूंकि सारी गोटें इन्दिरा गांधी बिछा चुकी थीं और उनके सिपहसालार भी जांनते थे कि उनका भविष्य वंशवादी शासन में ही सुरक्षित है। इसलिए तत्काल राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गयी।

कुछ ही दिन बाद हुए अगले आम चुनाव में सहानुभूति की लहर के फलस्वरूप प्रचन्ड बहुत की सरकार के मुखिया राजीव गांधी हुए। हंसमुख, ऊर्जावान और नये विचारों से भरे हुए राजीव गांधी ने कई नयी शुरुआत की। जिनका फल हम आज भी खा रहे हैं। राजनीति में नई संस्कृति लाने के विचार से प्रेरित राजीव गांधी ने स्वीकारोक्ति की कि दिल्ली से जो रुपया चलता है वह गांव तक पहुंचते-पहुंचते मात्र 15 पैसे रह जाता है और भी तमाम कदम उन्होंने उठाये। राजीव की ऐसी बेबाक बयानी और नई राजनीतिक संस्कृति लाने की आहट से पुराने जमे-जमाये घाघ कांग्रेसी सक्रिय हो गये। बहुत डिटेल में जाने की जरूरत नहीं क्योंकि यह सब हाल ही का इतिहास है। ज्यादातर लोग जानते हैं। इन घाघ नेताओं के सक्रिय होने का नतीजा यह हुआ कि राजीव गांधी खासी बदनामी झेलकर सत्ता से बेदखल हुए बाद में किस्मत ने भी दगा किया और वे एक दर्दनाक मौत का शिकार हुए। इस तरह सम्भावनाओं से भरे एक राजनैतिक जीवन का अंत हो गया। जो शायद पूरा समय पाता तो हो सकता है कुछ बहुत अच्छा देखने को मिलता।

इन्दिरा गांधी की कार्यशैली से नाराज और विश्वनाथ प्रताप सिंह के मण्डल अभियान से शीर्ष पर पहुंचे कई नेताओं में से मुलायम सिंह भी एक हैं। शीर्ष पर पहुंचने के बाद मुलायम सिंह में वे सारे गुण विकसित हो गये जिनके लिए मुलायम और उन सरीखे दूसरे नेता इन्दिरा गांधी की बुराई करते थे। वंशवाद भी ऐसा ही एक गुण है। सत्ता पाने और उसे बनाये रखने के लिए मुलायम सिंह ने भी वे सारे करम-धतकरम किये जो आम राजनीतिज्ञ करता है। और इन्दिरा गांधी की तरह सत्ता अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंप दी। यहां तक तो सब ठीक रहा। लेकिन अखिलेश ने भी वही गलती कर दी। जो कभी राजीव गांधी ने की थी। उन्होंने राजनीति में नये विचार और संस्कार का समावेश करने की कोशिश की और एक हद तक सफल भी रहे।

लेकिन आज के इस दौर में जब अलग चाल, चरित्र और चेहरे का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा तक सारे करम-धतकरम करने पर उतारू है, अखिलेश की यह सदाशयता कितने दिन चलती? पुराने राजनैतिक ढंग में रचे-बसे सपाई जो इत्तफाक से उनके परिजन भी हैं, सक्रिय हो गये। तर्क दिया गया कि केवल आदर्शों और काम के सहारे चुनाव नहीं जीता जाता। उसमें वे सब शतरंजी गोटें भी बिछानी पड़ती हैं, जिससे अखिलेश यादव अनभिज्ञ हैं या जानबूझकर परहेज करते हैं। जाहिर सी बात है रार छिड़नी ही थी और जमकर छिड़ी। दोनो ओर से आरोप-प्रत्यारोप और घात-प्रतिघात का दौर षुरू हुआ। अन्ततः पुराने सपाई सफल हुए और मुलायम सिंह के आशीर्वाद से सक्रिय भी हो गये।

इस लड़ाई में विपक्षियों ने भी छौंक लगाना शुरू किया और तमाम अरोप जड़ दिये। विपक्षियों के वे सारे आरोप निराधार भी नहीं हैं सत्ता के शीर्ष पर बैठे अखिलेश यादव दूध के धुले हों, यह सम्भव भी नहीं है। लेकिन कम से कम एक नई शुरुआत तो अखिलेश ने की ही और एक नई राजनैतिक संस्कृति लाने का प्रयास भी किया। अब रहा सवाल चुनाव जीतने की तिकड़मों का तो पिछला चुनाव जो समाजवादी पार्टी हार गयी थी तब भी तो प्रबन्धन इन्हीं सिपहसालारों की हाथ में था, जो अब मुलायम के आषीर्वाद से फिर सक्रिय हो गये हैं।

ऐसे में अगर अखिलेश को पूरी छूट दी जाती तो शायद कुछ अच्छा देखने को मिलता। आखिर बिहार जैसे जंगल राज्य में नीतीश ने ऐसा कारनामा करके दिखाया ही जैसा अखिलेश अब उत्तर प्रदेष में करना चाहते हैं। हालांकि नई पारी में लालू यादव नीतीश के प्रयास को फिर से मटियामेट करने पर उतारू हैं, ऐसा दिख रहा है। इन परिस्थितियों में एक बात कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि कांग्रेस की नीतियों से असंतुष्ट मुलायम, लालू सरीखा जो नेतृत्व विभिन्न राज्यों में उभरा उसके अगर ऐसे ही कारनामे रहे तो भाजपा को उनका सफाया करते देर नहीं लगेगी। सच यह भी है कि कांग्रेस फिर भी खासी उदार है भाजपा से उदारता की यह उम्मीद ये क्षेत्रीय-क्षत्रप नहीं करें, वही उनके हित में होगा।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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इस भ्रष्ट व्यवस्था में बच्चों की तथाकथित उच्च शिक्षा पर लाखों रुपये न फूंकें!

सामान्य शिक्षा दिलाइए और खर्चीली उच्च शिक्षा पर व्यय होने वाले धन को बच्चों के नाम फिक्स डिपॉजिट कर दीजिए… Continue reading

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प्रवचन नहीं दें, शासन करें

अनेहस शाश्वत

बहुत पहले किसी प्रसिद्ध भारतीय अंग्रेजी पत्रिका में एक इंटरव्यू छपा था, जिसमें इन्दिरा गांधी से उनके व्यक्तित्व से संबंधित सवाल पूछे गये थे। वैसा बेहतरीन इंटरव्यू न तो तब और न ही आज भी किसी हिंदी प्रकाशन में छपना सम्भव है। उसके बहुत से कारण हैं। बहरहाल ये स्यापा फिर कभी। इस इंटरव्यू की खासियत यह थी कि इंदिरा गांधी का पूरा व्यक्तित्व इसमें खुलकर सामने आया था। पूछने वाले की खूबी यह कि उसने ऐसे सवाल बनाए और इंदिरा गांधी का बड़प्पन ये कि उन्होंने सवालों के बेबाक और ईमानदार जवाब दिये। इन्दिरा गांधी से एक सवाल था कि जवाहर लाल नेहरू और इन्दिरा गांधी में बतौर प्रधानमंत्री क्या सबसे बड़ा अंतर है? थोड़ी विनोदी मुद्रा में इन्दिरा गांधी का जवाब था मेरे पिता संत थे और मैं राजनीतिज्ञ हूं। कितनी सच बात कही थी इंदिरा गांधी ने। नेहरू की मौत के जिम्मेदार माने जाने वाले चीन के चेयरमैन माओ-त्से-तुंग तब रुआंसे हो गए जब इंदिरा गांधी ने सिक्किम को हिन्दुस्तान का हिस्सा बना लिया। उस समय चीन सिक्किम पर कब्जा कर उत्तर पूर्व के राज्यों को अस्थिर बनाने की रणनीति पर काम कर रहा था कि इंदिरा गांधी ने बाजी पलट दी थी।

इंदिरा गांधी की हत्या हुए आज 25 साल में ज्यादा अरसा बीत गया है। ऐसे में सवाल आता है कि आज की तारीख में उनके बारे में क्यों बात की जाए? तो इस बात का जवाब है कि आज शायद इंदिरा गांधी अपने समय से भी ज्यादा प्रासंगिक हैं। जवाहरलाल नेहरू की मौत के समय सयाने लोगों को याद होगा कि स्वप्न भंग सरीखी स्थिति थी। सारे आदर्श हवा-हवाई हो चुके थे और हिन्दुस्तान अनाज की बेहद कमी होने से भुखमरी के कगार पर खड़ा एक पराजित और पस्तहिम्मत मुल्क था, जो दूसरे देषों की दया और मदद का मुहताज था और अंतरराष्ट्रीय राजनय में उसकी हैसियत पाकिस्तान से भी गई-बीती थी।

इन हालात की वजहें बहुत सी थीं लेकिन एक प्रमुख वजह नेहरू जी के कई मुद्दों पर हवा-हवाई आदर्श भी थे। ये आदर्श संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों में भाषणों के लिहाज से तो ठीक थे लेकिन खांटी राजनय में ऐसे आदर्श बेकार थे खास कर तब जब पड़ोस में चीन और पाकिस्तान सरीखे राष्ट्र हैं। बहरहाल नेहरू के बाद आये लाल बहादुर शास्त्री ने बीमार राष्ट्र के मर्ज को समझा और नब्ज को पकड़ लिया, लेकिन दुर्भाग्यवश वे उसी समय काल-कवलित हो गए। उसके बाद कांग्रेसियों के प्रखर विरोध के बीच इंदिरा गांधी ने तमिलनाडु के वरिष्ठ नेता कामराज नाडार के समर्थन से सत्ता संभाली। ये बात है सन् 1966 की और मात्र आठ साल बाद 1974 में परमाणु विस्फोट कर इंदिरा गांधी ने भारत को दयनीय राष्ट्र से ईष्या करने योग्य राष्ट्र के तौर पर स्थापित कर लिया।

जितनी भी समस्याएं इंदिरा गांधी को विरासत में मिलीं उनमें से ज्यादातर का हल उन्होंने राष्ट्रहित में खांटी राजनेता के तौर पर किया। कोई बनावटी आदर्श, कोई बहाना, कोई दिखावा और कोई झूठ नहीं। इसका सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण उदाहरण है, सन 1971 की पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई जिसके परिणाम स्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ। जब बांग्लादेश भी पाकिस्तान का हिस्सा हुआ तब लड़ाई के दौरान पाकिस्तान पूर्वी और पश्चिमी समीओं पर एक साथ हमला करता था। इससे संकट और जटिल होता था। बांग्लादेश बनवा कर न केवल इंदिरा जी ने पूर्वी सीमा को सुरक्षित किया बल्कि धर्म के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धांत की कमर भी तोड़ दी। नतीजे में आज पाकिस्तान की पहचान पर ही सवालिया निशान लग गया है और अमरीका के भारी समर्थन के बावजूद उसे एक असफल राष्ट्र की संज्ञा दी जाने लगी है।

हरित क्रांति इंदिरा गांधी की ऐसी ही दूसरी उपलब्धि है जिसकी शुरुआत लाल बहादुर शास्त्री ने की, लेकिन उसे परवान इंदिरा गांधी ने चढ़ाया। नतीजे में आज किसानों की लाख दुर्दशा के बावजूद भारत के अन्न कोठार जरूरत से ज्यादा भरे हैं। इन्दिरा गांधी की उपलब्धियों की संख्या बहुत हैं। शीत युद्ध के दिनों में जब भारत एक निर्धन एवं कमजोर राष्ट्र था, रूस के साथ संधि कर इंदिरा गांधी ने न केवल अमरीका का घमंड तोड़ा वरन पाकिस्तान मुद्दे पर उसे झुकने के लिए विवश किया। आज समर्थ भारत के साथ के लिए अमरीका लालायित है, तब ऐसा नहीं था। इंदिरा गांधी की मृत्यु के साथ ही षायद यह कहना उचित होगा कि स्वतंत्र भारत के अब तक एक मात्र खांटी और घाघ राजनीतिज्ञ का निधन हो गया। जिनका असर आज तक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर साफ दिखाई देता है।

उनके बाद से आज तक के दौर में अकुशल, बड़बोले, हवाई बातें कहने वाले और अक्षम लोग सत्ता पर काबिज हैं। एक मात्र अपवाद प्रधानमंत्री नरसिंह राव हैं और राजीव गांधी को राजनीतिज्ञ कहने का कोई तुक नहीं, क्योंकि वे एक भले आदमी थे जो अपनी माता की स्त्रियोचित महत्वाकांक्षा का शिकार हुए। आज की वास्तविकता यह है कि हमारे देश की समस्याओं के मद्देनजर ठोस समाधान किसी भी राजनैतिक नेता के पास नहीं है। इसीलिए हवाई बातें, बड़बोलेपन, झूठ और गाली-गलौच का बोलबाला है। इसके लिए सिर्फ एक नजीर पर्याप्त होगी। विश्व की स्वयंघोषित महाशक्ति भारत के बनाये एक भी ब्रांड की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई पहचान नहीं है। इसलिए निवेदन है कि राजनीतिज्ञ शासक बनें। बड़ा बोलने, प्रवचन करने और आत्ममुग्धता से परहेज करें तो राष्ट्रहित में शायद बेहतर होगा।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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फिर-फिर मुठभेड़ करेगी यह उन्मत्त भीड़

हार्दिक पटेल आज की तारीख में एक बिसरा हुआ नाम है। ज्यादा आशंका है कि हुक्मरान-ए-दौरां इस नाम को हमेशा के लिए दफन करने की पूरी कोशिश करेंगे। वे सफल हो या न हों, लेकिन जो मुद्दे हार्दिक पटेल ने उठाए हैं, वे प्रथम दृष्ट्या बेढंगे दिखने के बावजूद पूरी शिद्दत और तार्किकता के साथ शासक वर्ग के सामने फिर-फिर मुठभेड़ करने के लिए उठ खड़े होंगे। इतिहास गवाह है गुजरात में ही चिमन भाई पटेल के मुख्यमंत्रित्व काल में छात्रों के स्वतः स्फूर्त आंदोलन को तत्कालीन सरकार ने भले ही दबा दिया हो, लेकिन उसकी तार्किक परिणति इमरजेंसी और फिर इन्दिरा गांधी की बेदखली के रूप में सामने आयी। और भी कई उदाहरण हैं। उस समय प्रभुवर्ग ने गुजरात के छात्रों को दिग्भ्रमित बताया और भी तमाम लांछन लगाये गये। जैसा आज भी हो रहा है।

कहा जा रहा है कि आंदोलन को कांग्रेस की फण्डिंग है और भी कई कारण गिनाये जा रहे हैं। हो सकता है कि यह सब कारक हार्दिक पटेल के आंदोलन में सक्रिय हों, लेकिन तब भी ऐसे स्वतः स्फूर्त आंदोलन में उमड़ी जनता की अपनी शिकायतें होती हैं, जो कई बार पूरी तरह से स्पष्ट और परिभाषित भी नहीं होतीं, लेकिन जनता अपनी उन उलझी शिकायतों का तत्कालिक समाधान चाहती है। इस आंदोलन को मोटे तौर पर समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। फर्ज कीजिए-तीन दोस्त है। एक आईएएस बन जाता है, दूसरा बड़ा काश्तकार है, वह अपनी खेती संभालता है, और तीसरा बड़े व्यापारी का बेटा है, सो अपना पुश्तैनी कारोबार संभालता है। जीवन की संध्या बेला में ज्यादा सम्भावना है कि सबसे ऐश्वर्यशाली और स्थिर जीवन आईएएस ने ही जिया होगा। बड़े काश्तकार के सामने जीवन भर कृषि जन्य समस्याएं मुंह बाये रही होंगी। कई बार प्रकृति की बेरुखी से अपनी बर्बाद फसल को देखकर उसने अफसोस किया होगा। यही हाल बड़े व्यापारी का भी हुआ होगा। ऐश्वर्यशाली जीवन जीने के बावजूद जीवन भर उसने व्यापारिक जगत की उठा-पटक का दंष झेला होगा। और उससे उत्पन्न अस्थिरता उसकी मन स्थिति को निरन्तर विचलित करती रही होगी।

लाख मनमोहक प्रयासों, विकास के नारों और भूमण्डलीकरण के शोर के बावजूद अभी भी भारतीय समाज में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ है। खेती पुश्तैनी धंधा है उसी तरह व्यापार। खेती में लगी जातियां परम्परागत हैं और उसी तरह व्यापारी और व्यवसायी घराने भी। हां एक बहुत बड़ा फर्क हुआ है, और इस फर्क ने 1991 में मनमोहन सिंह के आने के पहले तक आकार ले लिया था। आरक्षण के चलते पिछड़ों और दलितों के एक तबके ने सरकारी नौकरियों की सम्पन्नता और स्थिरता का स्वाद ले लिया था। 1991 से मनमोहक नीतियां लागू होने के बाद और आज तक उसके नैरन्तर्य के बावजूद एक बहुत छोटे तबके को छोड़ दिया जाये तो नये स्थिर और सम्पन्न तबकों का निर्माण नहीं हुआ है। खेती नष्ट हो चुकी है, किसान आत्म हत्यायें कर रहे हैं और व्यवसायी अस्थिर व्यापारिक माहौल में सरकार की नई-नई नीतियों में स्थिरता खोजने में जुटे हैं।

मनमोहक नीतियों के कई परिणाम जो ज्यादा चर्चा में नहीं आये, खासे भयावह रहे। किसानों की आत्महत्याएं तो लोग देख ही रहे हैं, लेकिन शेयर बाजार की उठा-पटक में बर्बाद लाखों लोगों का अवसाद ग्रस्त जीवन और कई बार मृत्यु तक लोगों का उतना ध्यान नहीं गया। तमाम नई डिग्रियां जिनके बारे में दावा था, वे नये आर्थिक माहौल में छात्रों के लिए सुनहरे जीवन का दरवाजा है, उनके लिए मृगतृष्णा साबित हुई। राज्य दर राज्य बीटेक पास लाखों बेरोजगारों की भीड़, इसका एक उदाहरण है। कुल मिलाकर यह कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि मनमोहक नीतियों से सम्पन्नता आयी तो जरूर लेकिन वह स्थाई नहीं बल्कि अस्थिर सम्पन्नता है। पिछली मंदी में जिसका लोगों ने भयावह अनुभव भी किया है। रातों रात लोग राजा से रंक बन गये। एक झटके में नौकरियां गवाकर मजदूरों की तरह जिन्दाबाद-मुर्दाबाद का नारा लगाने वाले पायलटों का नजारा लोगों की स्मृति में ताजा होगा।

इस सारी उथल-पुथल के दौर में अगर कोई वर्ग लगातार सम्पन्न और स्थित जीवन बिता रहा है, तो वह सरकारी नौकर है और लगातार बढ़ रही आबादी के मद्देनजर सरकारी नौकरियों की संख्या अपेक्षाकृत अनुपात में कम होती जा रही है। ऐसे में आरक्षण ही लोगों को एक मात्र विकल्प नजर आ रहा है, जो अर्थव्यवस्था रूपी रेगिस्तान के नखलिस्तान में पहुंचने का एक मात्र साधन है, खास तौर से उन वर्गों के लिए जो परम्परागत रूप से सरकारी नौकरियां कैसे हासिल हों, इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं हैं। षायद यह कारण हो सकता है, जो लोगों का हुजूम हार्दिक पटेल के पीछे लामबन्द हो गया। अगर ऐसा है तो तय जानिए हुक्मरान हार्दिक पटेल को तो खत्म कर सकते हैं, लेकिन ये मुद्दे दिन पर दिन विकराल होकर सत्ताधीषों का जीना हराम कर देंगे।

लेखक अनेहस शाश्वत उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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