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अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सात मिनट बिजली न होना पहले पन्ने की खबर क्यों नहीं है?

संजय कुमार सिंह

हेडलाइन मैनेजमेंट, रेल दुर्घटना, सुरक्षा आयुक्त की जांच और नीट के लिए सीबीआई जांच की मांग पर सुनवाई न होने के घालमेल में अब खबरों की परिभाषा बदल गई है। वैसे ही जैसे अयोध्या में भारतीय जलवा पार्टी का उम्मीदवार हार जाये जीतने वाला हिन्दू ही हो तो भी हिन्दुओं को गाली दी जाये। आज इंडियन एक्सप्रेस में खबर है कि अल्पमत की सरकार को समर्थन करने वाले दल के एक  सांसद ने खुले आम कहा है कि फलानी जाति और धर्म के लोगों ने उन्हें वोट नहीं दिया इसलिए उनका काम नहीं करूंगा जबकि चुने जाने के बाद वे सबके सांसद हैं। अगर जाति वर्ग के वोट से जीतने वाले ही जाति वर्ग के लिए काम करेंगे तो बहुमत से चुनाव का मतलब ही नहीं है। हर जाति वर्ग के लोगों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व मनोनीत किया जा सकता है। सरकार समर्थक पार्टियों की ऐसी बात का मतलब ही संविधान बदलने की इच्छा रखना या विचार का समर्थन है और विचारधारा का मामला है। संवैधानिक संस्थाओं का चुप रहना ऐसे लोगों, नेताओं और उनकी राजनीति का समर्थन है। संवैधानिक संस्थाओं का काम उनका भला करना भी है जो अपना भला न सोच पायें। हेडलाइन मैनेजमेंट इन सारी चीजों को छिपाना है और सरकार आज किसानों की सम्मान निधि खातों में ट्रांसफर करेगी – इसका विज्ञापन तो है ही, बराबर में खबर भी है

आज मेरे सभी अखबारों में रेल दुर्घटना की खबर लीड है और कुछ अखबारों में राहुल गांधी के वायनाड सीट छोड़ने तथा वहां से प्रियंका गांधी के लड़ने की खबर लीड या प्रमुखता से है। इस लिहाज से यह सवाल उठता है कि रे दुर्घटना की खबर नहीं होती तो आज की लीड क्या होती। वायनाड की खबर तो लीड नहीं ही होती। ऐसे में आज अंग्रेजी अखबारों में जिस खबर को सबसे ज्यादा महत्व मिला है वह है निखिल गुप्ता का प्रत्यर्पण। यह खबर भी सरकार का प्रचार या सरकार के हित में नहीं है और रेल दुर्घटना की ही तरह नुकसानदेह है। ऐसे में माना जा सकता है कि रेल दुर्घटना नहीं होती तो यह खबर आज लीड हो सकती थी। हेडलाइन मैनेजमेंट की बात करूं तो यह साजिश हो सकती है और आप जानते हैं कि इस सरकार ने पहले की रेल दुर्घटनाओं को साजिश मानकर उसकी जांच रेल सुरक्षा आयुक्त से नहीं करवाकर या सीबीआई से भी करवाई गई है। साजिश के अंदेशे का क्या हुआ यह तो पता नहीं चला लेकिन रेल की दुर्घटना, जो हेडलाइन मैनेजमेंट हिसाब से साजिश हो सकती है उसकी जांच रेल सुरक्षा आयुक्त से करवाई जा रही है। इस सरकार में खबरों से संबंधित मामूली जानकारी भी इसलिए महत्वपूर्ण और दिलचस्प हो गई है क्योंकि हेडलाइन मैनेजमेंट का असर दिखता है और वह एनईईटी नतीजों में भी था।

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अब तक आप जान गये होंगे कि एनईईटी के नतीजे समय से पहले आये और उसी दिन आये जिस दिन लोकसभा चुनाव नतीजे आये। शुरू में शिक्षा मंत्री दावा करते रहे कि मामला प्रश्नपत्र लीक का नहीं है, सीबीआई जांच की मांग के लिए छात्र सुप्रीम कोर्ट गये और अब प्रश्नपत्र लीक होने के संकेत मिलने लगे हैं। सीबीआई जांच की मांग करने वाले छात्रों को क्या नहीं करना पड़ रहा है जबकि पश्चिम बंगाल का मामला होता तो जांच का आदेश हो गया होता। भले वहां की सरकार विरोध कर रही होती। ऐसे में दिल्ली के अखबारों के लिए आज की सबसे बड़ी खबर है, दिल्ली हवाई अड्डे पर सोमवार को दोपहर दो बजे के बाद करीब सात मिनट बिजली नहीं रहना है। खबरों से पता चलता है कि पहले वोल्टेज में उतार चढ़ाव हुआ, फिर सिस्टम बैक अप पर चला और करीब एक घंटे बाद सभी सेवाएं वापस बिजली पर बहाल की जा सकीं। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बिजली जाने से दुनिया भर में देश की जितनी बदनामी हुई होगी उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। भारत की बदनामी का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है कि ईवीएम के खिलाफ ट्वीट करने पर सत्तारूढ़ भाजपा के आईटी सेल प्रमुख को भारत की बदनामी की चिन्ता होती है। और भी मौकों पर होती रही है। मुझे लगता है कि इससे ज्यादा बदनामी हुई होगी। हालांकि, मुझे तो यह भी लगता है कि इलेक्टोरल बांड लाने, उससे कमाने और वसूली करने वाली सरकार को जनता ने फिर चुन लिया यह ज्यादा बड़ी बदनामी है। पर मैं कुछ कर नहीं सकता।

हवाई अड्डे पर बिजली जाने के संबंध में दिल्ली की मंत्री आतिशी ने कहा है कि उत्तर प्रदेश के मंडोला सब स्टेशन में आग लगने से ऐसे हालात पैदा हुए। इस सब-स्टेशन में आग के असर की वजह से हुआ। अमर उजाला ने आज अपने दूसरे पहले पन्ने पर इस खबर को प्रमुखता से छापा है। इस खबर के अनुसार, प्रवक्ता ने बताया कि बिजली बैक अप सिस्टम कुछ ही मिनटों में चालू हो गया। कुछ देर बाद ही विद्युत आपूर्ति बहाल हो गई। दोपहर तीन बजे तक ग्रिड से वोल्टेज स्थिर हो गया और सभी सेवाएं वापस बिजली पर बहाल कर दी गईं। इस महत्वपूर्ण मामले में अधिकारियों ही नहीं अखबार का रवैया भी ढीला-ढाला है। ऐसे में अंतिम परिणाम 100 प्रतिशत दुरुस्त होना मुश्किल है। मेरा मानना है कि अखबारों का काम कमजोरियां उजागर करना है। इससे अच्छी सरकार और अच्छा प्रशासन मिलेगा तो दुनिया भर में देश का नाम होगा। अखबारों को सरकार के प्रचार में लगा दिया जायेगा तो वही अच्छी’ सरकार बार-बार चुनी जायेगी और सरकार देश में चाहे जितनी अच्छी प्रचारित हो विदेश में बदनाम हो जायेगी। और चिन्ता ईवीएम से बदनामी की होगी तो बिजली जाने की नहीं होगी। ठीक है कि अखबारों में ईवीएम की खबर भी कम ही थी लेकिन बिजली जाने से बदनामी तो लगभग नहीं है।

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इन दिनों दिल्ली में हालत यह है कि आम आदमी पार्टी की सरकार है, जिसे स्थानीय मामले देखने हैं, मुख्यमंत्री जेल में हैं। केंद्र की भाजपा सरकार पहले से ही आम आदमी पार्टी को हर तरह से बदनाम और कमजोर करने में लगी हुई है। इसका नतीजा है कि मंत्री आतिशी को दिल्ली में पानी की लाइनों की सुरक्षा की मांग करनी पड़ी है। जाहिर है यह मांग पानी की आपूर्ति खराब कर या होने पर सरकार को बदनाम करने के अंदेशे से भी की गई होगी। ऐसे में बिजली जाना भले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी का कारण हो, अखबारों और आईटी से के लिए एलन मस्क के ट्वीट से महत्वपूर्ण नहीं है। जहां तक खबर की बात है, प्रवक्ता ने गोल-मोल जवाब दिया। अखबार ने उसे ही छाप दिया। बैक-अप पर चलने की बात ठीक भी हो, सात मिनट का अंतराल क्यों है या वास्तव में नहीं है? सबको पता है कि जहां बिजली जाती है वहां कंप्यूटर यूपीएस से जुड़े होते हैं। लैपटॉप में बैट्री होती है। दिल्ली मेट्रो की लिफ्ट में भी लिखा रहता है कि लाइट जायेगी तो लिफ्ट रुक जायेगी लेकिन बत्ती जलती रहेगी और पंखे चलते रहेंगे, घबरायें नहीं।

ऐसे में अव्वल तो हवाई अड्डे पर लाइट जानी नहीं चाहिये और गई तो सिस्टम को बैकअप पर जाने में सात मिनट नहीं लगने चाहिये। मुझे नहीं पता है कि बैक अप जेनरेटर से है या यूपीएस से पर यूपीएस तो अनइंटरप्टेड (यानी निर्बाध) पावर सप्लाई को ही कहा जाता है और जेनरेटर में ऑटोमेटिक स्टार्ट की सुविधा होती है। दोनों में सात मिनट बहुत ज्यादा है। इसलिए मामला सिर्फ बिजली जाने का नहीं, बैक अप में सात मिनट लगने का भी है। हम सबने ने देखा है कि अस्पतालों में और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर इमरजेंसी लाइट लगी होती है और उम्मीद की जाती है कि जरूरत होने पर अपने आप जल जायेगी। अगर समय पर नहीं जले तो उसका क्या मतलब? आजकल तो सबके हाथ में मोबाइल ऑर टॉर्च होता ही है। यहां मामला यूपीएस की जगह इनवर्टर लगाने और उसके समय पर काम नहीं करने का भी हो सकता है। यह, ना खाऊंगा, ना खाने दूंगाा” के कारण जवाब मांगता है और आज के समय में उम्मीद अखबारों से ही है। वो इसलिए नहीं कि पाठक साढ़े तीन रुपये देकर खरीदता है बल्कि इसलिए कि सरकार (लिखा प्रधानमंत्री है) किसानों की सम्मान निधि खातों में ट्रांसफर करेगी – इसका विज्ञापन तो है ही, बराबर में खबर भी है।

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कहने की जरूरत नहीं है कि विज्ञापन था तो खबर दूसरी लगाई जा सकती थी। मुझे उतने ही पैसे में एक और खबर पढ़ने को मिल जाती। लेकिन मकसद किसी तरह पढ़वाना और प्रधानमंत्री को महान बनाना हो तो बात अलग है। इसमें मौके पर बिजली जाने की खबर छिपाना जरूरी है। आज के अखबारों ने यही किया है। पानी की कमी के लिए दिल्ली सरकार को जितनी कोसा जा रहा है उतना बिजली जाने के लिए नहीं कोसा गया। पानी की कमी से वही प्रभावित होगा जो दिल्ली में रह रहा है। दिल्ली सरकार वैकल्पिक व्यवस्था भी कर सकती है लेकिन हवाई अड्डे पर बिजली जाने से प्रभावित होने वाले लोग दुनिया भर के हो सकते हैं और बेशक उसके लिए सिर्फ या अकेले दिल्ली सरकार जिम्मेदार नहीं ठहराई जा सकती है। ना ही विदेशियों को इससे मतलब है। यहां यह भी कहना होगा कि दिल्ली के मुख्यमंत्री का जेल में होना अब दिख रहा है। उनका जेल में होना राजनीति है यह पूर्व मुख्य मंत्री को ऐरा-गैरा नहीं मानने से साबित हो चुका है और ऐसे में जिसे भी यह सब देखना है उसे शीघ्र देखना चाहिये वरना सरकार और व्यवस्था की पोल खुलने लगी है। अखबार बहुत समय तक नहीं छिपा पायेंगे।   

आज की दूसरी प्रमुख खबर सिख नेता गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश में भारतीय नागरिक, 52 साल के निखिल गुप्ता को चेक गणराज्य से अमेरिका प्रत्यर्पित किये जाने की है। इन्हें पिछले साल 30 जून को चेक गणराज्य में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद अमेरिका ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की थी। इस साल की शुरुआत में चेक संवैधानिक न्यायालय में उनके प्रत्यर्पण के खिलाफ उनकी अपील के कारण उनका प्रत्यर्पण रुका हुआ था। पिछले महीने उनकी अपील खारिज होने पर उन्हें अमेरिका भेजे जाने का रास्ता साफ हो गया। गुप्ता पर भारत सरकार के एक कर्मचारी के साथ मिलकर खालिस्तानी अलगाववादी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश का आरोप है।हालांकि यह नाकाम रहा था। पन्नून अमेरिका में रहते हैं और उनके पास कनाडा की भी नागरिकता है। वैसे., निखिल गुप्‍ता ने अपने पर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है। निखिल गुप्‍ता पर अमेरिका में मुकदमा चलेगा। यह खबर हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। वह भी तब जब इस मामले में दिलचस्प है कि यह खबर जब आई है तो अमेरिकी एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) जेक सुलीवन भारत में हैं।

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अमर उजाला ने पहले पन्ने पर खबर छापी है, पीएम मोदी से मिले सुलीवन। इसका मुख्य शीर्षक है, वैश्विक भलाई के लिए मिलकर काम करेंगे भारत और अमेरिका। कहने की जरूरत नहीं है कि गुप्ता पर जो आरोप है वह अमेरिका में भारत के काम का ही उदाहरण है। नवोदय टाइम्स में भी सरकार के प्रचार वाली यह खबर पहले पन्ने पर है। मुख्य शीर्षक है, डोभाल ने सुलीवन के साथ सुरक्षा स्थिति पर चर्चा की। इसके साथ हाइलाइट किया अंश है, दो दिन की भारत यात्रा पर आये हैं अमरीकी एनएसए जैक सुलीवन। दूसरी ओर, टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को टॉप पर तीन कॉलम में छापा है और शीर्षक वगैरह भले ही वही है जो दूसरे अखबारों में है, खबर इस प्रकार शुरू होती है – अमेरिकी एनएसए जैक सुलीवन का भारत आना ऐसे समय पर हुआ है जब चेक सरकार ने भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता को अमेरिकी सरकार को सौंपा। सुलीवन इनिशियेटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नालॉजी की समीक्षा के लिए आये हुए हैं। गुप्ता के प्रत्यर्पण के बाद बिडेन प्रशासन नए सिरे से इस दबाव में है कि भारत से इस मामले में जिम्मेदारी लेने के लिए कहे। अखबार ने इस खबर के साथ एक फोटो भी छापी है जिसका कैप्शन है – इस फोटो को अमेरिकी अधिकारियों ने जारी किया है इसमें कथित रूप से एक अंडरकवर अमेरिकी अधिकारी को 15,000 अमेरिकी डॉलर दिये जा रहे हैं जिसे अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा गुप्ता के एक सहयोगी द्वारा मैनहटन में एक कार में 9 जून 2023 को सौंपा गया अग्रिम भुगतान कहा जा रहा है। अंग्रेजी अखबारों में दोनों खबरें हैं। एक साथ और अलग-अलग भी। हिन्दी में सिर्फ प्रचार है।

द टेलीग्राफ में आज टॉप पर सिंगल कॉलम में एक खबर है, एनसीईआरटी को लेखकों की चेतावनी। यही खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में भी पहले पन्ने पर है, हमारे नाम हटाइये वरना हम कार्रवाई करेंगे। संबंधित लेखकों के नाम यहां योगेन्द्र यादव और सुहास पलशीकर बताये गये हैं। खबरों से लगता है कि लेखक द्वय के नाम से प्रकाशित किसी आलेख में  कोई तथ्य जोड़ा गया है जिसकी वजह से लेखक नहीं चाहते हैं उनका नाम लेखक के रूप में स बना रहे। पर वह भी नहीं हो रहा है। मुझे लगता है कि सरकार को यह अधिकार है कि वह बच्चों को जो चाहे पढ़ाये, जो चाहे लिखवाये पर लिखे हुए लेखक की सहमति के बिना अपने स्तर पर बदल दे यह कैसे सही हो सकता है और अगर ऐसा किया गया है तो लेखक का नाम हटा देने में क्या दिक्कत है? इसके लिए लेखक को परेशान होने या अदालत जाने की चेतावनी देने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिये?

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