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आज के अखबार : अपनी राजनीति चमकाने, आर्थिक हित साधने – में अंधे हैं या नंगे हुए आप तय कीजिए

संजय कुमार सिंह

संघीय ढांचे में विपक्षी सरकारों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने का रिवाज ही नहीं है। बिना अनुमति मुकदमा चल ही नहीं सकती और पी चिदंबरम के खिलाफ अनुमति अब मिली या दी गई है। अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में आरोपी को फंसाने के लिए ‘दोषी जांच अधिकारी’ की जांच का आदेश दिया है। यह खबर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसका मतलब है कि इसके लिए मुकदमा चलाने की अनुमति देने वाली केंद्र सरकार जिम्मेदार है। जांच अधिकारी स्पष्ट तौर पर सरकार के निर्देश पर काम कर रहा था। अदालत ने कहा भी है कि जांच एक ‘पूर्व नियोजित, सुनियोजित’ प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया एक अधिकारी या व्यक्ति के वश की बात नहीं है और  सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील करेगी तो इसीलिए वरना उच्च न्यायालय में फिर डांट पड़ सकती है।

आज मेरे नौ में से आठ अखबारों में आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल का मामला अदालत में नहीं टिकने की खबर लीड है। सिर्फ एक अखबार, नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड नहीं है और पहले पन्ने पर यह खबर तीन कॉलम में है। यहां शीर्षक भी अलग है, आबकारी मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने केजरीवाल-सिसोदिया को बरी किया। निचली अदालत के फैसले को सीबीआई ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। तथ्यात्मक रूप से यह खबर सही है और इस लिहाज से प्रस्तुति में कोई बुराई नहीं है। लेकिन बाकी सभी अखबारों में यह खबर लीड है तो यहां नहीं होना मायने रखता है।  इससे संबंधित तथ्य यह है कि नवोदय टाइम्स पंजाब केसरी समूह का अखबार है और पंजाब केसरी समूह के साथ पंजाब में आम आदमी पार्टी की ठनी हुई है। पाकिस्तान अफगानिस्तान के बीच खुली जंग, नवोदय टाइम्स की लीड है। हेडलाइन मैनेजमेंट वाली खबरें भी हैं लेकिन आज इनकी वैसी पूछ नहीं रही। कलकत्ता के दैनिक द टेलीग्राफ ने भी केजरीवाल की खबर को ही लीड बनाया है। देशबन्धु ने सीबीआई के हाईकोर्ट पहुंचने की खबर दी है। अदालत ने जांच में आई भारी कमियों को लेकर जांच एजेंसी को लगाई फटकार को हाईलाइट भी किया है। यह अमर उजाला में भी है। नवोदय टाइम्स का तो मामला ही अलग है। सीबीआई के दावे को हाईलाइट किया है, कई पहलुओं को या तो नजरअंदाज किया गया या अदालत ने उनपर ठीक से विचार नहीं किया”

अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया ने अदालत की एक टिप्पणी को हाईलाइट किया है, यह लाल स्याही में फ्लैग शीर्षक है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होगा, ‘चुनाव प्रचार में खर्च के आरोप भर पर जांच को राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती… इससे कार्यपालिका को ऐसे दमनकारी उपकरण मिल जाएंगे जो राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने में सक्षम होंगे।’ हिन्दुस्तान टाइम्स ने अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की कल की फोटो के साथ अदालत की टिप्पणी का जो अंश हाईलाइट किया है वह इस प्रकार है, एजेंसी द्वारा एकत्रित सामग्री के आधार पर जांच करने से पता चलता है कि… साक्ष्य और दस्तावेजों से उचित रूप से आकलन, मूल्यांकन या कानूनी निष्कर्ष निकालने में मूलभूत विफलता रही है। परिणामस्वरूप, अभियोजन पक्ष का मामला…कानूनी रूप से आगे बढ़ने के लिए अनुपयुक्त है। द हिन्दू ने लगभग वैसी या उसी मौके की फोटो का कैप्शन दिया है, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया शुक्रवार को दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति मामले में अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए। (पीटीआई) द हिंदू का उपशीर्षक पर्याप्त गंभीर है, अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में आरोपी को फंसाने के लिए ‘दोषी जांच अधिकारी’ की जांच का आदेश दिया; अदालत का कहना है कि जांच एक ‘पूर्व नियोजित, सुनियोजित’ प्रक्रिया थी; सीबीआई उच्च न्यायालय में अपील करेगी। (मुझे लगता है कि गर्दन बचाने के लिए करनी ही पड़ेगी और शायद बच भी जाए। लेकिन आज की खबर यही होनी थी। सोशल मीडिया पर इसकी पर्याप्त चर्चा रही। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर का शीर्षक है, सीबीआई के केस का नहीं टिक पाना ईडी की जांच को बड़ा झटका है। इसके साथ, अदालत की एक टिप्पणी है, अगर बुनियाद ढहती है तो सुपर संरचना को गिरना ही है। दि एशियन एज ने इस खबर को लीड बनाया है और कई सारी चीजें हाईलाइट की हैं। सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, विधानसभा चुनाव से पहले आप को नया लाभ।  

आम पाठक को इन खबरों या इसके कारणों से मतलब हो या नहीं – यह निष्पक्ष, स्वतंत्र और आदर्श  पत्रकारिता नहीं है। हाल में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरन को भी सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने सोरेन के खिलाफ ईडी द्वारा शुरू की गई क्रिमिनल कार्रवाई पर रोक लगा दी है। ईडी ने यह कार्रवाई प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत जारी समन की जानबूझकर अवज्ञा करने के आरोप में की थी। झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने अपनी याचिका में झारखंड हाई कोर्ट के हालिया फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। ईडी द्वारा दायर एक मामले में एक विशेष सांसद-विधायक (एमपी-एमएलए) अदालत द्वारा सोरेन के खिलाफ संज्ञान लिया था। शीर्ष अदालत ने 15 जनवरी को इसे रद्द करने से इनकार कर दिया। इससे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेता को झटका लगा। जमीन घोटाले में कथित संलिप्तता से जुड़े मामले में जारी समन के बावजूद ईडी के समक्ष पेश नहीं होने के कारण जांच एजेंसी ने सोरेन के खिलाफ शिकायत दर्ज की थी।

जाहिर है, अरविन्द केजरीवाल को राहत मिली तो खबर बड़ी है और हेमंत सोरेन को राहत मिली तो खबर ही नहीं दिखी। आप कह सकते हैं कि दोनों मामले अलग है। एक आम आदमी पार्टी के खिलाफ है और एक हेमंत सोरेन के खिलाफ। एक मुख्यमंत्री के काम को लेकर है दूसरे मुख्यमंत्री के पद पर बैठे एक व्यक्ति के ऐसे लेन-देन से संबंधित है जो प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट का मामला है। बेशक, दोनों मामले अलग हैं लेकिन दोनों मामले केंद्र की भाजपा सरकार के मातहात काम करने वाली सरकारी एजेंसी चला रही है, दोनों में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत कार्रवाई की कोशिश चल रही है। इस तरह, दोनों मामले राजनीतिक हो सकते हैं और मौजूदा व्यवस्था में पीएमएलए के मामले राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने, जेल में रखने, बदनाम करने के लिए हो ही सकते हैं। वरना मुख्यमंत्रियों के खिलाफ ऐसे मामले पहले नहीं होते थे और भाजपा शासन में आम आदमी पार्टी के खिलाफ जो मामला शुरू किया गया उसी में अदालत को दम नहीं दिखा। दूसरे मामले में दूसरे मुख्यमंत्री को चुनाव के समय भी जमानत नहीं मिली थी और गिरफ्तारी से पहले मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। ऐसे में दोनों मामले विपक्षी मुख्यमंत्रियों को परेशान करने के हो सकते हैं और चूंकि आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली की आबकारी नीति में परिवर्तन किया इसलिए उसके खिलाफ पीएमएलए का मामला बनाने का आधार मिला। लेकिन झारखंड की सरकार बहुमत की नहीं थी और ऐसा मामला नहीं मिला या ऐसे मामलों में फंसाने की दूसरी मुश्किलें होंगी। इसलिए रांची में सेना की 8.86 एकड़ जमीन अवैध रूप से हासिल करने और इसमें मनी लॉन्ड्रिंग का मामला बनाया गया हो सकता है। इसके लिए राजस्व विभाग के पूर्व अधिकारी भानु प्रताप प्रसाद के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया गया है। सोरेन ने इन आरोपों को “मनगढ़ंत”, राजनीति से प्रेरित और झूठा बताते हुए किसी भी अवैध जमीन या आरोपी से संबंध से इनकार किया है। इसे अपनी छवि खराब करने की साजिश कहा है। यही नहीं, सोरेन ने भाजपा और ईडी को चुनौती दी थी कि अगर उनके नाम पर 8.5 एकड़ जमीन का कोई दस्तावेज है तो वे राजनीति छोड़ देंगे। फिर भी मुकदमा चल रहा है। (जारी)

लेखक संजय कुमार सिंह से [email protected] संपर्क के जरिए किया जा सकता है।

अगली किस्त में पढ़िए – झूठे आरोपों से चुनाव जीतना और राजनीतिक विरोधी को कमजोर करना मुद्दा ही नहीं है। लिंक यह रहा –  https://www.bhadas4media.com/joothe-aaropon-se-chunav-jeetna/ 

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