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24 सवाल, 3 सुनवाई लेकिन कुणाल कामरा ने माफी नहीं मांगी, कहा — ‘गलत मिसाल कायम होगी’

मुंबई: स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने महाराष्ट्र काउंसिल की एक पैनल सुनवाई के दौरान बिना शर्त माफी मांगने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसा करना “ईमानदार नहीं होगा” और इससे कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर “खतरनाक मिसाल” कायम हो सकती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनवाई के दौरान कुणाल कामरा से उनके कथित विवादित कंटेंट को लेकर जवाब मांगा गया था। इस पर उन्होंने साफ कहा कि वे अपनी बात पर कायम हैं और केवल औपचारिकता के लिए माफी देना सही नहीं मानते।

कामरा ने यह भी तर्क दिया कि अगर कलाकार हर विवाद पर माफी मांगने लगें, तो इससे क्रिएटिव फ्रीडम प्रभावित होगी और भविष्य में अन्य कलाकारों पर भी दबाव बढ़ेगा।

बताया जा रहा है कि यह मामला उनके एक स्टैंडअप या सार्वजनिक टिप्पणी से जुड़ा है, जिस पर आपत्ति दर्ज कराई गई थी और उसी के चलते यह सुनवाई हो रही है।

बहरहाल, इस मामले में पैनल की ओर से अंतिम फैसला आना बाकी है, लेकिन कामरा के इस रुख ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम जवाबदेही की बहस को तेज कर दिया है।


Sincere Dibya नामक एक्स हैंडल इस प्रकरण पर लिखता है-

“24 सवाल, 3 सुनवाई… लेकिन माफी नहीं”

कॉमेडियन कुणाल कामरा एक बार फिर अपने सख्त रुख को लेकर चर्चा में हैं। हालिया सुनवाई के दौरान उनसे बार-बार माफी मांगने को कहा गया, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया।

सूत्रों के मुताबिक, सुनवाई में उनसे पूछा गया—क्या उन्हें अपने बयान पर पछतावा है? क्या वे माफी मांगेंगे? यहां तक कहा गया कि माफी देने पर मामला खत्म हो सकता है। लेकिन कुणाल कामरा हर बार अपने जवाब पर कायम रहे और माफी से इनकार किया।

कामरा का तर्क है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी, जिसे Article 19(1)(a) of the Indian Constitution में सुनिश्चित किया गया है, उसका इस्तेमाल कलाकारों को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि अगर कलाकार दबाव में आकर माफी मांगने लगेंगे, तो यह एक गलत परंपरा की शुरुआत होगी।

बताया जा रहा है कि कुणाल कामरा पहले भी सरकार की फैक्ट-चेक यूनिट और ‘सहयोग पोर्टल’ जैसे मुद्दों को अदालत में चुनौती दे चुके हैं। अब मौजूदा विवाद में भी उन्होंने अपने रुख से पीछे हटने से इनकार किया है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही की बहस को तेज कर दिया है। जहां एक पक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा मान रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे जिम्मेदारी की सीमा से जोड़कर देख रहा है।

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