“इंडियन एक्सप्रेस” के जय मजूमदार ने आज उन महान लोगों के चेहरों का नक़ाब नोचकर फेंक दिया है, जो लोग अरावली के ताज़ा प्रकरण को लेकर झूठ पर झूठ बोले जा रहे थे। ख़बर इस प्रकार है: अरावली को लेकर सरकार का 100 मीटर नियम सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया, जबकि कोर्ट की अपनी समिति ने इसका विरोध किया था…
त्रिभुवन-
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित अरावली पर्वतमाला की 100 मीटर परिभाषा को स्वीकार कर लिया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट की गठित उसकी अपनी केंद्रीय अधिकारप्राप्त समिति (CEC) ने इस परिभाषा का स्पष्ट रूप से विरोध किया था।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने 13 अक्टूबर को अरावली की नई परिभाषा अदालत के समक्ष रखी थी। इसके तहत केवल उन्हीं पहाड़ियों को “अरावली” माना जाएगा, जिनकी ऊँचाई 100 मीटर या उससे अधिक है।
इसके अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति CEC ने अदालत में लिखित रूप से कहा था कि यह परिभाषा अरावली की पारिस्थितिकी और भौगोलिक निरंतरता को नुकसान पहुँचाएगी।
FSI की 3-डिग्री परिभाषा क्यों अहम है
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की परिभाषा के अनुसार अरावली की वे पहाड़ियाँ भी संरक्षित मानी जाती हैं जिनकी ढलान कम से कम 3 डिग्री है, भले ही उनकी ऊँचाई कम हो। FSI के मुताबिक, नीची पहाड़ियाँ भी रेत के तूफान, धूल प्रदूषण और मरुस्थलीकरण को रोकने में अहम भूमिका निभाती हैं। CEC ने अदालत को बताया था कि मंत्रालय की 100 मीटर वाली परिभाषा लागू होने पर अरावली की लगभग 90% पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हो जाएँगी, जिससे उन्हें खनन के लिए खोला जा सकेगा।
CEC का स्पष्ट विरोध
CEC के अध्यक्ष और पूर्व वन महानिदेशक सिद्धांत दास ने 14 अक्टूबर को लिखे पत्र में कहा था कि FSI की दी गई परिभाषा को ही अपनाया जाना चाहिए। CEC ने यह भी कहा कि मंत्रालय द्वारा सुझाई गई परिभाषा अस्पष्ट (vague) है और इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

CEC के अनुसार:
- अरावली केवल ऊँचाई से परिभाषित नहीं की जा सकती
- इसकी भौगोलिक निरंतरता टूटेगी
- पारिस्थितिकी संतुलन को गंभीर क्षति होगी
- थार मरुस्थल का विस्तार और तेज़ होगा
अदालत ने क्या किया
20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय की 100 मीटर वाली परिभाषा को स्वीकार कर लिया। हालाँकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसने CEC की सिफारिशों की समीक्षा नहीं की, बल्कि मंत्रालय के प्रस्ताव को मान लिया।
पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि:
- खनन केवल अरावली के 0.19% क्षेत्र में ही अनुमत है
- कुल अरावली क्षेत्र 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर है
- खनन की अनुमति सिर्फ 278 वर्ग किलोमीटर में है
हालाँकि FSI की आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार यह 278 वर्ग किलोमीटर वास्तव में पहले से खनन-प्रभावित क्षेत्र है और नई परिभाषा के बाद और बड़े हिस्से खनन के लिए खुल सकते हैं।
मुख्य सवाल
- यदि 100 मीटर नियम लागू होता है तो अरावली की अधिकांश नीची पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हो जाएँगी
- इससे राजस्थान, गुजरात और हरियाणा में खनन का दायरा बढ़ सकता है
- मरुस्थलीकरण, भूजल गिरावट और प्रदूषण का खतरा बढ़ेगा
जबकि CEC ने साफ़ शब्दों में कहा था कि अरावली की रक्षा ऊँचाई नहीं, उसकी पारिस्थितिकी और भौगोलिक निरंतरता से होनी चाहिए। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट का सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करना पर्यावरणीय संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।


