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अर्णब गोस्वामी के समर्थन और विरोध में अलग-अलग खेमे बन चुके हैं!

नाज़िया खान-

इस साल की सबसे चर्चित हस्तियों में से अभी टॉप पर चल रहे हैं अर्णब गोस्वामी जी। मतलब इनके ऊपर ही इतनी कॉन्सपिरेसी थियरीज़ आ चुकी हैं अब तक। इनके समर्थन और विरोध में अलग-अलग खेमे बंट चुके हैं।

पहली है, भोली, डिमेंशिया पीड़ित, वल्नरेबल, सीधी-सादी जनता, जो इतनी त्रस्त हो चुकी है, इतने दुःख देख चुकी है कि जो भी अपना काम ढंग से करता दिखे, उस पर ही फ़िदा हो जाती है। दूसरों को भी डपट देती है कि किसी के ऑनेस्ट एफर्ट्स एप्रीशिएट नहीं करते, किसी पर भरोसा नहीं करते। अइसा-कइसा चलेंगा। ये मानते हैं कि क़िस्मत और हृदय कभी भी परिवर्तित हो सकते हैं। घर वापसी किसी की भी हो सकती है। ज़मीर किसी का भी जाग सकती है। नेचर्स और अंतरात्मा’ज़ कॉल पर किसी का वश नहीं। जितना भी दबाओगे, कभी तो विस्फोट होगा।

दूसरी है बंटी जनता। जिनका साबुन स्लो ही रहता है। ये है बेसिकली कन्फ्यूज़्ड जनता। जो क्या हो रहा, क्यों हो रहा, प्रोसेस नहीं कर पाती। बस टुकुर-टुकुर तकती रहती है, पूरे एक मिनट तक साबुन मलते हुए।

तीसरी है skeptical, cynical जनता। जो मानती है, घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या। शेर और बकरी एक साथ पानी नहीं पी सकते। घाट सेम है तो क्या, टाइमिंग अलग ही रहेगी। एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते। सांप जब केंचुली उतारता है तो बटरफ्लाई नहीं बन जाता, बल्कि और बड़ा सांप बन जाता है। वन्स अ बी&डी, ऑलवेज़ बी&डी।
इनके पास अपने वैलिड रीज़न्स हैं।

चौथी वह जनता है, जो बड़ी पारिवारिक सी है। घर का आज्ञाकारी बच्चा जब विद्रोही गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है तो पहले तो ये डिनायल में होते हैं, नहीं, हमारा लड़का ऐसा नहीं है। फिर जब पानी सिर से गुज़रने लगे तो इनको पहले तो आश्चर्यमिश्रित दुःख होता है, फिर ग़ुस्सा आता है, फिर स्वीकृति कि होता है, हॉर्मोनवा उबाल मार रहे हैं। टीन एज रिबेलियन फ़ेज़ चल रही है, गुज़र जाएगी यह भी। फल पेड़ से कितनी ही दूर गिर जाएगा।

पांचवी वह जनता है, जो श्योर है कि पॉ पॉ से रूठा हुआ है बालक। पु तिन का इंटरव्यू नहीं दिलाया। पॉकेट मनी कम पहुँच रही। सेटलमेंट हो जाएगा तो सब सही हो जाएगा।

छठी सबसे मज़ेदार जनता है। इनकी कॉन्सपिरेसी थ्योरी मस्त हैं। इनका कहना है कि मल्टी मिलेनियर, बिलेनियर इंटरनेशनल लॉबी सक्रिय हो गई है, जो देश में अस्थिरता लाना चाहती है। उसने सब मीडिया हाउस ख़रीद लिए हैं। इसलिये सब पत्रकारों के सुर अचानक से बदल गए हैं। बहुत बड़ी साज़िश है। कुछ तो बड़ा होने वाला है।

एक तो अब कुछ छोटा होता ही कहाँ है। हर भूतियापा ग्रैंड लेवल पर ही होता है। फिर भाई लोग, आपकी सब बातें ठीक, लेकिन उस लॉबी को इंटरनेशनल काहे बोल रहे हो? हर चीज़ का क्रेडिट जिनको जाता है, थैंक्यू जिनको जाता है, उन्हीं को दो न। एकदम शुद्ध, देसी लॉबी है वह तो। इंटरनेशनल लॉबी मूर्ख थोड़ी है जो फ्री फण्ड में काम हो रहा, उसके लिये फंडिंग करे। ख़ैर…..

बाक़ी लोटा जनता है। यह सबकी बात मानती है। सबसे सहमत होती है। सबकी असहमति से भी सहमत होती है। इनका पैंदा नहीं होता। स्लोप के अकॉर्डिंग इधर-उधर लुढ़क लेते हैं।

सबसे प्लॉज़िबल तो यही है कि कुछ अद्भुत, चमत्कारी, 200 वर्षों में एक बार घटने वाली खगोलीय घटना नहीं हुई है। आउटरेज को कंट्रोल किया जा रहा है। कब, किस बात पर, कितना बरसना है।

जो पत्रकार शाश्वत विपक्ष बने बैठे हैं, जो सास की तरह आँखों को खटकते हैं, उनको तो मुख्यधारा से हटा ही दिया गया है। उनको यू-ट्यूबिये, वन बीएचके जर्नलिस्ट कहकर मज़ाक़ उड़ाया जाता है। तो इससे बेहतर क्या ही होगा कि जनता के आक्रोश की आवाज़ अपना ही कोई भरोसेमंद, वफ़ादार आदमी बने। बिल्कुल ही भावनाओं में न बह जाए, इसलिये ममदानी से लेकर SRK पर कुत्ता-फ़ज़ीती करता रहे, ताकि अपने एलिमेंट में रह सके लेकिन मालिक से सवाल भी करता रहे। सबसे पहला सवाल तो यही कि मालिक बताइए, कब, क्या, किससे, कितना पूछना है। एक-तरफ़ा भोंपू बनने की बजाय, संतुलन क़ायम रहे।

तो लब्बो-लुआब यह कि कारण जो भी हो। ज़्यादातर लोग अर्णब को पहली बार जर्नलिज़्म करते देख रहे हैं। अर्णब से अचानक निराश, हताश और बौखलाई जनता का दुःख समझ आता है। लेकिन जो बाक़ी आम जनता है, जिसने उन्हें बस बेतरह चीख़ते-चिल्लाते और ज़हर उगलते ही देखा है, वह हैरान है, यह इतनी शांत, संयमित, डीप रिसर्च और होमवर्क करके, सही लोगों से, सही समय पर, सही सवाल भी पूछ सकता है। अर्णब के अंदर का जर्नलिस्ट जिस भी कारण, जितनी भी देर के लिये, जिस भी मुद्दे पर जागा हो, कोर से वह एक अच्छे जर्नलिस्ट हैं, इसकी झलक तो दिखला ही दी है।

लेकिन बात फिर वही है…..न दे दिल परदेसी नूं, तैनू नित दा रोणा पै जूगा

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