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आज मेरे सात में से पांच अखबारों में हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट और उसके बाद की खबर लीड है!

हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट से संबंधित खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स और द टेलीग्राफ में लीड नहीं है। दोनों ने जनहित की स्थानीय खबर को लीड बनाया है। बाकी अखबारों ने खंडन को ही प्रचारित किया है। द टेलीग्राफ में उसका जवाब है और उसपर यकीन करें तो लगता है कि हिन्डबर्ग की रिपोर्ट का ‘निराधार’ बताने के लिए सेबी प्रमुख और उनके पति ने अनुभवी खिलाड़ी होने की पूरी कोशिश की है। भाजपा और उसके समर्थकों की ओर से मुद्दे को घुमाने की कोशिश चल रही है और इसी क्रम में भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि जब भी संसद का सत्र चल रहा होता है अमेरिका से ऐसी कोई रिपोर्ट आ जाती है।

संजय कुमार सिंह

आज मेरे सात में से पांच अखबारों में हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट और उसके बाद की खबर लीड है। दिल्ली के अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड नहीं है जबकि कोलकाता के द टेलीग्राफ में यह सेकेंड लीड  है। लीड दोनों महानगरों की स्थानीय खबरें हैं। दिल्ली के हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड दिल्ली और गुरग्राम की स्थानीय खबर लीड है और यह जरा सी बारिश में दिल्ली, गुड़गांव के डूब जाने की है। अखबार में इस मुख्य खबर के साथ एक अन्य खबर में बताया गया है कि राजधानी में 13 साल के बच्चे को करंट लग गई जबकि सात साल का एक बच्चा डूब गया। यही नहीं, इस साल मानसून शुरू होने के बाद से कम से कम 33 लोगों की जान जा चुकी है। यह देश की राजधानी की व्यवस्था है। तो कोलकाता में एक मेडिकल कालेज अस्पताल में स्नातकोत्तर प्रशिक्षु महिला चिकित्सक से बलात्कार और हत्या का मामला गर्माया हुआ है। इस मामले में कार्रवाई चल रही है और पुलिस प्रमुख ने कहा है कि किसी को बचाया नहीं जा रहा है। ऐसे में निश्चित रूप से लीड तय करना मुश्किल काम है और आज लीड से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका शीर्षक है।

मैंने कल यहां कहा यहां कहा था कि हिन्डनबर्ग की खबर का शीर्षक इंडियन एक्सप्रेस में सबसे अच्छा था। आज शीर्षक कई तरह के हैं। द टेलीग्राफ का सबसे अच्छा है और इस चक्कर में मैं पूरी खबर पढ़ गया। हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, हिन्डनबर्ग पर हो हल्ला। तीन उपशीर्षक में दो आरोप हैं। एक खरगे बोले, बड़े घोटाले की जांच के लिए जेपीसी जरूरी। दूसरा शीर्षक बुच दंपत्ति और सेबी के हवाले से हैं। दंपति ने कहा है, सेबी की विश्वसनीयता पर हमला, चरित्र हनन की कोशिश और सेबी ने कहा है, बुच ने हितों के टकराव वाले मामलों से खुद को अलग रखा। अमर उजाला का शीर्षक है, सेबी ने हिन्डनबर्ग जैसी रिपोर्ट से किया आगाह प्रतिक्रया से पहले सावघानी बरतें निवेशक। कहा, अदाणी के खिलाफ विधिवत हुई जांच। कांग्रेस की मांग : जेपीसी करे जांच। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, सेबी ने बुच का समर्थन किया : हितों के टकराव मामले का खुलासा किया और इनसे अलग रहीं। उपशीर्षक है, “निवेश 2015 में किया गया था …. तब हम आम नागरिक थे:  माधवी, पति। आपको याद होगा मैंने कल लिखा भी था, हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट में यही कहा गया है और संबंध जोड़ने के नाम पर यही तथ्य है। आम मान्यता यही है कि रिश्तेदारी और संबंध से ही काम मिलता है। यहां यही बताया गया है तो उसे गलत कहा जा रहा है और स्वीकार भी किया जा रहा है। इसका विस्तार आगे है।

रिपोर्ट में और भी मामले हैं जिनका जवाब नहीं है लेकिन मुद्दे को घुमाने की कोशिश चल रही है और इसी क्रम में भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि जब भी संसद का सत्र चल रहा होता है अमेरिका से ऐसी कोई रिपोर्ट आ जाती है। पर यहां मुद्दा यह है कि भाजपा नेता और संपादक अरुण शौरी ने स्वीकार किया था कि उनके खुलासे संसद सत्र के दौरान होते हैं क्योंकि उसका फायदा और प्रभाव होता है। यह तथ्य है कि इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी के खुलासे वाले अखबार संसद में लहराये जाते रहे हैं। इनमें एआर अंतुले के सीमेंट घोटाले की उनकी शुरुआती रिपोर्ट शामिल है और अंतुले के खिलाफ कार्रवाई संसद में हंगामे के बाद ही हुई थी। अघोषित इमरजेंसी के इस दौर में देसी अखबारों में खबरें छपती ही नहीं हैं तो हंगामा क्या होगा और तथ्य यह भी है कि अरुण शौरी भी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ रहे हैं। उनके खिलाफ भी एक पुराना मामला निकल आया था जो उनके विनिवेश मंत्री रहने के समय का था। बाद में अरुण शौरी बीमार हुए तो प्रधानमंत्री उनसे मिलने गये। सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली और फिर अरुण शौरी प्रधानमंत्री के विरोध में नहीं देखे गये। मेरे लिखने का कोई मतलब नहीं लगाया जाये। मैंने प्रसंगवश सिर्फ तथ्य बताया है। इससे यह समझना मुश्किल नहीं है कि हिन्डनबर्ग जैसे खुलासे संसद सत्र के दौरान ही किये जाते रहे हैं। अब संसद सत्र को तय समय से पहले ही स्थगित कर दिया जाता है और निश्चित रूप से मुद्दा यह भी है लेकिन उसकी चर्चा अखबारों में नहीं है और क्यों नहीं है समझना मुश्किल नहीं है। अभी हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट को खारिज करना ज्यादा जरूरी है।

अदाणी समूह की कंपनियों में विदेशी निवेश के जरिये 20,000 करोड़ रुपये आये हैं। यह खुलासा भी फाइनेंशियल टाइम्स ने किया था। यह जानना इसलिए जरूरी है कि ये पैसे अवैध तरीके से कमाये हुए तो नहीं हैं। आतंकवाद, नशा और भ्रष्टाचार से कमाये पैसे अगर लाभदायक निवेश किये जा सकें तो इन्हें रोकना मुश्किल होगा। नरेन्द्र मोदी सरकार का वादा भ्रष्टाचार और आतंकवाद को रोकने का था। नशे के कारोबार को रोकने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से भारत अलग नहीं है और पीएमएलए कानून उसी का भाग है। इसके सख्त प्रावधान इसीलिए स्वीकार्य होते हैं। हालांकि, भारत में जो प्रावधान हैं वो विवादास्पद हैं, भाजपा ने विशेष तौर पर पास करवाये हैं और इनमें सुप्रीम कोर्ट के जज को ईनाम देना शामिल है। यही नहीं इन प्रावधानों की समीक्षा की सुनवाई नहीं होने देना और उसमें देरी भी सरकारी इच्छा के परिणामस्वरूप है। सबको पता है कि आम आदमी पार्टी के नेताओं के मामले में भ्रष्टाचार के कथित मामलों को पीएमएलए का बनाकर इस कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है और हाल में लोकसभा में घोषणा की गई कि ईडी ने दस साल में कुल 5297 मामले दर्ज किये हैं। पिछले छह साल में मौजूदा व पूर्व सांसदों, विधायकों और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ मनी लांड्रिंग के कुल 132 मामले दर्ज किये गये हैं। दूसरी ओर, ईडीके अधिकारियों को भी सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। इस तरह, एक तरफ तो ईडी की कथित जांच और बगैर ठोस सबूत व परिस्थितिजन्य साक्ष्य के बिना निर्वाचित नेताओं को जेल में रखा जा रहा है दूसरी ओर डीई के अधिकारी को ही रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। सरकारी  अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार और रिश्वत मांगने के और भी मामले हैं। पर अभी वह मुद्दा नहीं है।

अभी मुद्दा शेल कंपनियां हैं। भ्रष्टाचार और  काले धन का प्रवाह रोकने के नाम पर सरकार ने करीब चार लाख कंपनियां बंद करवाई हैं। यह 20 सितंबर 20 की फाइनेंशियल एक्सप्रेस की खबर के अनुसार है। 27 फरवरी 2024 की बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार ऐसी कंपनियों की संख्या पांच लाख है। खबर थी कि इस साल जून-जुलाई में कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय अगले दौर की कार्रवाई शुरू करेगा। हालांकि, 2013 के कंपनी अधिनियम में शेल कंपनी पारिभाषित नहीं है इसलिए ऐसी फर्में जिनमें काम नहीं होता और जो कतिपय नियमों का पालन नहीं  करते हैं उन्हें शेल कंपनी कहा जाता है और चूंकि ऐसा दूसरे देशों की या ऑफशोर कंपनियों के मामले में नहीं किया जा सकता है इसलिए विदेशी शेल कंपनियां चल रही हैं और इनमें अदाणी की शेल कंपनियां शामिल हैं। इन्हीं शेल कंपनियों के जरिये आये 20,000 करोड़ रुपये के निवेशकों का पता लगाना सेबी का काम है जो नहीं हुआ जबकि ऐसा निवेश होना ही नहीं चाहिये था। और अगर हो गया तो जो कार्रवाई होनी चाहिये थी वह तो नहीं हुई है। हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट से यह साबित होता है कि यह कार्रवाई इसलिये नहीं हुई कि सेबी प्रमुख के अदाणी से रिश्ते  हैं। 

टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की खबर का शीर्षक है, बुच दंपत्ति, अदाणी और फंड ने हिन्डनबर्ग के आरोपों से इनकार किया। आप जानते हैं कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने कल ही इनकार छाप दिया था आज फिर इनकार ही लीड और शीर्षक है। मूल खबर लीड नहीं थी। द हिन्दू का शीर्षक है, सेबी प्रमुख पर हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट ने राजनीतिक भूचल ला दिया है। निवेश अनुसंधान फर्म के आरोपों पर कांग्रेस जेपीसी की जांच चाहती है; भाजपा को वैश्विक ताकतों द्वारा भारत की प्रगति रोकने का प्रयास दिखता है; अदाणी समूह ने कहा है सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किये जा चुके निराधार दावों को फिर से पेश किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला 20,000 करोड़ रुपये के स्रोत का पता लगाने का है और इसके बिना इसके निवेश की इजाजत नहीं होनी चाहिये थी। पर निवेश हुआ है और स्रोत का पता नहीं चल रहा है। कह दिया गया कि हम डेड एंड पर पहुंच गये हैं और निवेशकों का ऐसा जाल है कि असल निवेशक का पता लगाना मुश्किल है। अब हिन्डनबर्ग ने आरोप लगाया है कि सेबी प्रमुख के संबंध अदाणी से हैं (पहले पति पत्नी का निवेश किया था, उसका संरक्षक सिर्फ पति को बनाया गया और उसके बाद निवेश वापस ले लिया गया तब भी संबंध तो बन ही गये) इसलिए निवेश की इजाजत मिली और जांच नहीं हुई। सारी बातें सहीं हैं। इनकार तकनीकी आधार पर किया जा रहा है जैसे मेरा निवेश नहीं था पति का था, पहले था वापस ले लिया है या अब कहीं और है तथा जहां हितों के टकराव का मामला था वहां अलग रहीं। पर जांच नहीं हुई या 20,000 करोड़ के स्रोत का पता नहीं लगा यह भी तो तथ्य है। अदाणी से कहा गया होता कि वे 20,000 करोड़ रुपये वापस कर दें या निवेश प्राप्त करने के नियमों की अनदेखी के मामले में कोई कार्रवाई हुई होती तो कहा जा सकता था कि बुच के अदाणी से संबंध होने के बावजूद कार्रवाई हुई। अभी तो संबंध (पुराने ही) स्वीकार किये जा रहे हैं पर निष्पक्ष कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है।

द हिन्दू में प्रकाशित खंडन के अनुसार, सेबी चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच ने अदाणी समूह के हित में काम करने से इनकार किया है और अदाणी समूह ने एक नियामक फाइलिंग में कहा है कि उसकी विदेशी होल्डिंग संरचना पूरी तरह पारदर्शी है। पर सवाल उठता है कि 20,000 करोड़ के निवेशकों का पता क्यों नहीं चल रहा है या पता है उसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। यह भी तभी संभव है जब सेबी प्रमुख अदाणी का साथ दें और सामान्य संबंध में इतना साथ दिया जाना भी खबर है। और इस लिहाज से रिपोर्ट गलत नहीं है। बाकी जो तकनीकी मामले हैं, पूजी बाजार की साख और निवेशकों की बचत को जोखिम वो सब बड़े मामले हैं। मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं। मेरा सवाल है कि माधवी पुरी बुच अदाणी समूह में 20,000 करोड़ रुपये के निवेश पर क्यों नहीं बोल रही हैं। इसपर सवाल करने वालों के खिलाफ जो कार्रवाई हुई है भले दूसरे मामलों में हुई हो, सर्वविदित है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर रुटीन खंडन की तरह है जो कल की खबर के बाद आया और बाद में उसी तरह छप गया। ऐसी खबरों के साथ ऐसा व्यवहार भी सही ही है।

द टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, सेबी प्रमुख का दावा कि निवेश कार्यकाल शुरू करने से पहले किया था में अदाणी से संबंधित सुराख है। इसके अनुसार, बुच दंपत्ति ने 2015 में जो निवेश किया था उसका निर्णय धवल बुच के बचपन के साथी अनिल आहुजा के मुख्य निवेश अधिकारी होने के नाते किया गया था। दंपत्ति ने कहा है कि 2017 में आहुजा ने जब फंड के सीआईओ का अपना पद छोड़ा तो उन्होंने अपना निवेश रीडीम करा लिया था। इसमें हिन्डनबर्ग के इस खुलासे का जवाब नहीं है कि 2015 में जब निवेश किया गया था तब आहुजा अदाणी एंटरप्राइजेज के डायरेक्टर के रूप में भी काम कर रहे थे। इस तथ्य की पुष्टि अदाणी समूह की प्रमुख कंपनी की 2015-16 की वार्षिक रिपोर्ट से होती है। हिन्डन बर्ग की रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि अदाणी एंटरप्राइजेज में आहुजा का कार्यकाल तीन हिस्सों में है और अंतिम जून 2017 में पूरा हुआ था। यहां दिलचस्प तथ्य यह है कि बुच के बयान के अनुसार आहुजा ने इस बात की पुष्टि की है कि उनकी दूसरी कंपनी ने अदाणी की कंपनी में निवेश नहीं किया था। अखबार ने लिखा है, यह पुष्टि दंपत्ति को निजी तौर पर की गई या सेबी को भी यह खुलासा किया गया था। अगर हां तो कब। कुल मिलाकर, मुझे यह मामला वैसा ही लगता है जैसे अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ सबूत नहीं होने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, केजरीवाल अनुभवी चोर हैं।

अब बात बजट में खेल की

कांग्रेस नेता और राज्य सभा टीवी के पूर्व सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल ने एक्स पर अपनी लंबी सी पोस्ट में लिखा है …. अब बात बजट में खेल की। लांग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स (किसी संपत्ति को लंबे समय बाद बेचने पर होने वाली आय पर लगने वाले टैक्स) का फ़ायदा उठाने के लिए पहले आरईआईटी यूनिट्स को 36 महीने तक रखना पड़ता था। उसके पहले बेचने पर टैक्स सामान्य आय के अनुसार लगता था। इस बजट में सरकार ने इस 36 महीने की अवधि को कम करके 12 महीने कर दिया है यानी कि ब्लैकस्टोन जैसी किसी भी बड़ी कंपनी को सिर्फ़ 12 महीने बाद यूनिट्स बेचकर 35% कॉरपोरेट टैक्स की जगह सिर्फ़ 12.50% लांग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि यह विशेष लाभ तो है ही अनैतिक और दो बिल्कुल अलग तरह की चीजो पर एक जैसा टैक्स कर दिया गया है। मैंने लिखा है कि भाजपा सरकार का ऐसा करना भ्रष्टाचार नहीं है जबकि आम आदमी पार्टी ने जो किया और वापस ले लिया वह भष्टाचार है। अब जाँच इस बात की होनी चाहिए कि भारत की आरईआईटी कंपनियों में किस किस का पैसा लगा है और किसको इस एलटीसीजी की अवधि 12 महीने करने वाले आदेश से फ़ायदा होगा। सनद रहे कि माधवी बुच का सेबी से कोई लेना देना नहीं था। प्राइवेट सेक्टर से इस पद पर नियुक्त होने वाली वो पहली चेयरमैन हैं। उनको सीधा सरकार ने बाहर से ला कर सेबी सदस्य और बाद में चेयरमैन बना दिया था। आपको याद होगा कल मैंने लिखा था, माधवी बुच के पति ब्लैकस्टोन के सलाहकार हैं। रीटेस के शेयर का प्रचार माधवी बुच भी कर चुकी हैं और ये सब हिन्डबर्ग के खुलासे के दूसरे गंभीर मामले हैं।

आज की तीसरी बड़ी खबर मणिपुर से

जातिय हिन्सा प्रभावित मणिपुर में उग्रवादियों और एक समुदाय के ग्रामीण स्वयंसेवकों के बीच गोलीबारी में चार लोगों की मौत हो गई। इसके अलावा, कांपोकपी जिले में बम धमाके में पूर्व विधायक और भाजपा नेता की पत्नी की मौत हो गई। अमर उजाला में पहले पन्ने पर छपी ब्यूरो की खबर के अनुसार, पूर्व विधायक की पत्नी चारुबाला (59) ने घर के बगल में रखे कचरे को जब जलाया तो उसमें विस्फोट हो गया जिससे उनकी मौत हो गई। लाइव हिन्दुस्तान की खबर के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि सैकुल के पूर्व विधायक यमथोंग हाओकिप के घर के पास एक मकान में शनिवार शाम को बम धमाका हुआ। धमाके में हाओकिप की दूसरी पत्नी सपम चारुबाला घायल हो गईं। उन्होंने बताया कि चारुबाला को सैकुल के एक अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। धमाके के समय हाओकिप भी घर में मौजूद थे, लेकिन उन्हें कोई चोट नहीं आई। उन्होंने बताया कि पुलिस धमाके की जांच कर रही है। चारुबाला मैतेई समुदाय से थीं और कुकी बहुल इलाके में रहती थीं। हाओकिप 2012 और 2017 में कांग्रेस टिकट पर जीतकर विधायक रहे हैं। 2022 में विधानसभा चुनाव से पहले वे भाजपा में शामिल हो गए थे। पुलिस का कहना है कि उनके घर में आईईडी प्लांट किया गया था। चारुबाला जब कूड़ा जला रही थीं तभी धमाका हो गया। इस मामले में अभी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसके पीछे पारिवारिक विवाद वजह हो सकती है।

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