रंगनाथ सिंह-
अतीक अहमद के साये में लोकतंत्र और नैतिकता का अक्स… अतीक अहमद हत्याकाण्ड के बाद सोशलमीडिया पर मुखर समाज दो धड़ों में बँटा दिखा। दोनों समूहों की पीड़ा कुछ लोगों की मृत्यु से उपजी है। ये दो समूह हैं-
1- गैंगेस्टर-नेता अतीक अहमद, अशरफ, असद इत्यादि की कथित गैरकानूनी हत्या से पीड़ित समूह।
2 – विधायक राजू पाल, देवी पाल, संदीप यादव, बृजमोहन कुशवाहा, प्रह्लाद कुशवाहा, अशोक साहू, सूरज कली, अशफाक कन्नू, नस्सन, जैद बैली, अताउल्ला, मोहम्मद कारी, जग्गा, सुशील यादव, सऊद, उमेश पाल और पुलिसकर्मी राघवेंद्र सिंह और संदीप निषाद इत्यादि की कथित तौर पर अतीक अहमद द्वारा करवायी गयी हत्या से पीड़ित समूह।
यूपी से बाहर के इंग्लिश मीडियम टाइप जन यूपी पुलिस और प्रशासन की ढिलाई पर कुपित हैं। यूपी पुलिस और प्रशासन की ढिलाई वाली बात से मैं सहमत हूँ।
यूपी पुलिस ढीली न होती तो अतीक का 19 साल का लड़का (सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल के अनुसार, मैंने वेरिफाई नहीं किया है) दो पुलिसवालों संदीप निषाद और राघवेंद्र सिंह को उमेश पाल के साथ बेरहमी से सरेआम कत्ल न करता। विकास दुबे ने आठ पुलिसवालों को मार दिया था। ये तो ताजा मामले हैं इसलिए याद हैं। उसके पहले भी पुलिसवाले यूपी में गुण्डों के हाथों मारे जाते रहे हैं। अगर ढीले न होते तो पुलिसवाले ऐसे मारे जाते! मेरे EMT दोस्त भी मानेंगे कि यूपी पुलिस अपनी ढिलाई की कीमत जान देकर चुका रही है।
यूपी प्रशासन ढीला न होता तो बहुजन समाज पार्टी के विधायक राजू पाल और उनके साथी संदीप यादव और देवी पाल सरेआम गोलियों से न भूने जाते। वो भी एक नहीं दो बार। राजू पाल को एक बार जिन्दा और दूसरी बार अस्पताल के बाहर मुर्दा जिस्म पर गोलियाँ खानी पड़ी थीं। राजू पाल अकेले विधायक नहीं थे जिन्हें विधायक रहते गोली मारी गयी। दो नाम तो तत्काल याद आ रहे हैं। भाजपा विधायक कृष्णानन्द राय और ब्रह्मदत्त द्विवेदी सरेआम मारे गये थे। ऐसे और भी हो सकते हैं, जिन्हें याद हो कमेंट बॉक्स में नाम लिख सकते हैं।
साफ है कि राज्य सत्ता के आधार स्तम्भ विधायक भी जान देकर ढिलाई की कीमत चुकाते रहे हैं। कुछ लोग कहेंगे कि प्रशासन में प्रशासनिक अधिकारी भी आते हैं तो सिर्फ विधायकों की बात क्यों की जा रही है। प्रशासनिक अधिकारी से याद आया कि अतीक अहमद ने एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के घर में घुसकर तोड़फोड़ की और उनकी माँ के संग बदसलूकी की और IAS संघ अतीक के खिलाफ FIR तक न करा सका। मेरे ख्याल से अच्छा हुआ कि FIR नहीं करा पाए वरना मृतकों की सूची में उनका भी नाम आ सकता था। गनीमत है कि थप्पड़ खाकर मान जाने वाली ढिलाई से आदमी की जान बच जाती है।
अतः बात साफ है कि यूपी पुलिस और प्रशासन दशकों से ढीले चल रहे हैं। ये इतने ढीले हैं कि एक वरिष्ठ सम्पादक ने कह दिया कि एक समय पूर्वी यूपी के हालात चम्बल से भी खराब थे। उनके बयान से वो लोग बेहद निराश हुए होंगे जो कई दशको से चम्बल को सबसे खराब हालात का प्रतीक मानते आ रहे थे। अतः यूपी पुलिस और प्रशासन कब कितने ढीले थे, यह विशेषज्ञों के विचार का विषय है।
ढिलाई के अलावा हर मसले की तरह इस मसले पर भी नैतिकता-अनैतिकता की बहस चल पड़ी है। देश के मुख्य न्यायाधीश ने कहा हो कि जन्म के आधार पर व्यक्ति को एब्सल्यूट मेल या एब्सलूट फीमेल नहीं कहा जा सकता। एब्सलूट नैतिकता जैसी चीज के होने न होने की बहस तो पहले से चल रही थी।
मेरे ख्याल से कलियुग में नैतिकता फ्री-साइज गारमेंट है। हर व्यक्ति को अपने साइज की नैतिकता मिल जाती है। या ये कह लें नैतिकता हर आदमी को फिट आ जाती है। इस प्रकरण में सभी अपनी नैतिकता से संतुष्ट हैं, वास्तविकता चाहे जो हो।
नैतिकता का हाल यह है कि जिस दल ने राजू पाल की हत्या के बाद अतीक को संरक्षण दिया, राजू पाल की पत्नी बाद में उसी दल से विधायक चुनी गयीं जबकि हमने खबरों में पढ़ा कि शादी के आठ-नौ दिन बाद ही पूजा पाल विधवा बना दी गयी थीं। राजू पाल बहन जी की पार्टी के विधायक थे। सत्ता में आने के बाद उन्होंने अतीक पर कार्रवाई भी की लेकिन एक कार्यकाल के बाद उनकी सत्ता से विदाई हो गयी।
बहन जी भी गेस्टहाउस काण्ड में अतीक की कथित शिकार हो चुकी थीं। लम्बे समय तक उनको इसका रंज रहा लेकिन आखिरकार उन्होंने उसी दल से हाथ मिला लिया जिसने उनके विधायक की हत्या की और उनके संग गेस्टहाउस काण्ड कराया था जिसे कथित तौर पर अतीक ने लीड किया था।
खुद अतीक की नैतिकता फ्री-साइज थी जैसा कि उसने एक इंटरव्यू में कहा कि मजबूत आदमी की सबको जरूरत होती है! वह कई दलों से सम्पर्क में रहता था। वक्त-वक्त पर सपा, बसपा और अपना दल के अलावा उसकी बीवी और बेटे काबिल वकील असदुद्दीन औवैसी के साथ भी नजर आए थे। अतीक ने अभी कुछ महीने पहले ही योगी आदित्यनाथ को बहादुर और ईमानदार बताया था।
यह फ्रीसाइज नैतिकता आपको इस पोस्ट के नीचे भी दिख जाएगी और पिछली पोस्टों के कमेंट बॉक्स में भी दिख जाएगी। बड़ी-बड़ी डिग्री रखने वालों की भी नैतिकता फ्रीसाइज ही है। ऐसे में असल बात इतनी है कि किस नैतिकता के पास ज्यादा संख्याबल है।
रोचक तथ्य यह है कि दोनों समूह अन्य सभी बिन्दुओं पर असहमत होते हुए भी दो नैतिक बिन्दुओं पर सहमत हैं।
1- जो चुनाव जीतता है उसके द्वारा करवायी गयी हत्या की अनेदखी की जा सकती है क्योंकि उसके पास जनसमर्थन है। अतीक ने कथित तौर पर बहुजन राजनीति करने वाले विधायक समेत अनगिनत लोगों की हत्या करा दी और चुनाव जीतता रहा तो अपने हमदर्द लोगों के बीच स्वीकार्य रहा। उसी तरह अतीक जैसे माफिया को मिट्टी में दफनाने का वादा करने वालों ने वादा निभा दिया तो वह अपने शुभचिन्तकों के बीच स्वीकार्य रहेंगे।
2- सहमति का दूसरा बिन्दु है, दोनों समूहों का कानून में यकीन। अतीक और उसके शुभचिन्तक कहते रहे हैं कि अगर उसने हत्या करायी है तो अदालत उसे सजा दे। अतीक इत्यादि की हत्या होने के बाद दूसरा समूह भी इसपर सहमत है कि अदालत में जाँच हो और यदि कोई दोषी हो तो उसे कानून सजा दे।
संक्षेप में कहें तो दोनों समूहों की लोकतंत्र और न्यायपालिका में आस्था डिग-डिग कर वापस आ जाती है। ग्रीक दार्शनिक ऐसी स्थिति को पैराडॉक्स कहते थे यानी ऐसी चीज जिसके दोनों पहलू अपनी-अपनी जगह सही लगें लेकिन परस्पर विरोधी हों। मसलन, पहले मुर्गी आयी या अण्डा? आप विज्ञानवादी हैं तो श्रोडिंगर की बिल्ली को याद कर सकते हैं।
आज इतना ही। शेष, फिर कभी।


