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दिल्ली

21वीं सदी में अवध ओझा जैसों की हार धर्म और इंसानियत के लिए जरूरी है!

ओझाजी का अहंकार मध्यकालीन है. व्यवहार भी. इनका मन अजीब किस्म के श्रेष्ठताबोध से भरा हुआ लगता है. आप किसी भी इंटरव्यू में सुनें. इतने अहंकारी कम लोग दिखते हैं…

निराला बिदेसिया-

नसे व्यक्गित कोई जान पहचान नहीं. कभी बात मुलाकात भी नहीं. मैं दिल्ली का मतदाता भी नहीं. पर, भारतीय नागरिक होने की वजह से, राजनीति को बदलाव का कर्म या माध्यम मानने की वजह से मुझे पूरे दिल्ली चुनाव में ओझाजी के चुनाव परिणाम में रुचि थी.

एकाध बार ऐसा लगा कि क्या सच में यह जीत जायेंगे. जीत जायेंगे तो यह राजनीति से ज्यादा सामान्य इंसानियत धर्म के लिए भी बुरा होगा कि ऐसे लोग जीत रहे हैं. इस वजह से नहीं कि ये कभी एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी नहीं रहे.

वैसे तो अनेक लोग आ रहे हैं, जो बिना राजनीतिक कार्यकर्ता रहे, सीधे नेता ही बनते हैं. पर, ओझाजी का अहंकार मध्यकालीन है. व्यवहार भी. इनका मन अजीब किस्म के श्रेष्ठताबोध से भरा हुआ लगता है. आप किसी भी इंटरव्यू में सुनें. सच बोलते हैं, झूठ बोलते हैं, वह बात नहीं. सच-झूठ का कैलकुलेशन अपने अनुसार करते होंगे, पर इतने अहंकारी कम लोग दिखते हैं.

एक बार इन्होंने एक पॉडकास्ट में कहा कि गांव के लोगों को कुछ रुपये उधार दिये थे. वे जरा भी मेरी बात से असहमत होते तुरंत उनकी औकात याद दिलाता. वह हमारे गुलाम की तरह रहते. हमारी बात काट नहीं सकते थे.

फिर उसके बाद इन्होंने कहा कि किसी को मानसिक तौर पर गुलाम बनाना है, उसे पैसे दे दो. पैसे से गुलाम बना सकते हो. फिर एक बार इन्होंने कहा उसका आशय यह था कि जो लोग ढाबा चला रहे हैं, ड्राइवरी करते हैं, क्लर्क की नौकरी करते हैं, मजदूरी करते हैं, उनकी गिनती आदमी में कैसे कर सकते हैं? आज के समय में तो आदमी वही है, जो खूब पैसे कमा रहा है. ऐसी अनेक बातें इन्होंने अपने रील्स, शॉर्टस, पॉडकास्ट आदि में कही.

इनके रील्स, शॉर्टस, पॉडकास्ट आदि लोकप्रिय भी हुए. तो डर लग रहा था कि अभी रील, शॉट, पॉडकास्ट आदि का जमाना है. कहीं इनकी बातों में आकर नौजवान वर्ग इनका प्रशंसक बनकर इनका समर्थक या मतदाता तो नहीं बन जाएगा. कहीं इनकी बातों का फॉलोवर तो नहीं बन जाएगा न!

फॉलोवर बनने से बात एक सीट पर हार जीत की नहीं थी. फिर ऐसे गैर इंसानी और अमानवीय सोच का या मध्ययुगीन सोच का किसी भी रूप में बढ़ना ही खतरनाक होता. सिर्फ उस सीट या दिल्ली की सियासत के लिए नहीं बल्कि फिर शॉर्टस, रील्स, पॉडकास्ट आदि के माध्यम से यह बात फैलती कि देखिए ओझा ने कहा कि पैसा ही सब कुछ होता है. पैसा से गुलाम बनाया जा सकता है. जो अधिक पैसा नहीं कमा रहा, वह इंसान भी नहीं.

ओझा ने ऐसा कहा तो पब्लिक ने पसंद किया. विधायक बनाया. फिर दूसरी जगह भी ऐसे लोग खड़ा होते. इस भ्रम के साथ कि वे रील्स में लोकप्रिय हैं तो रियल में भी लोकप्रिय हो जाएंगे. इस सोच के साथ कि पैसे को ही सब कुछ बताकर, गरीबों का और गरीबी का मजाक उड़ाकर समाज पर राज भी किया जा सकता है.

ओझा जी के हारने से प्रसन्नता हुई. एक व्यक्ति की हार से नहीं, बल्कि ऐसी प्रवृत्ति की हार से.

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