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उत्तर प्रदेश

बांदा में पत्रकारों के बीच विवाद; एक ने घर पर बोला धावा तो दूसरा सुनवाई न होने पर पहुंचा कोर्ट!

बांदा। उत्तर प्रदेश के बांदा में पत्रकारों के बीच विवाद गंभीर टकराव में बदल गया है। एक ओर जहां एक पत्रकार के घर पर धावा बोलने, गाली-गलौच और धमकी देने के आरोप लगे हैं, वहीं दूसरी ओर पुलिस से सुनवाई न होने पर पीड़ित पत्रकार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

पीड़ित पक्ष के अनुसार, दैनिक सूचना संसार व द प्रेस ट्रस्ट ऑफ बुंदेलखंड के फाउंडर और एनजीटी याचिकाकर्ता आशीष सागर दीक्षित के सिविल लाइन स्थित वन विभाग आवास पर कथित तौर पर एनडीटीवी इंडिया के स्ट्रिंगर मनीष मिश्रा और भारत समाचार से जुड़े मनोज गोस्वामी पहुंचे और मां-बहन की गाली-गलौच की। आरोप है कि पूरी घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद है और मोबाइल रिकॉर्डिंग भी मौजूद है।

आरोप है कि इसी दौरान भारत समाचार से जुड़े मनोज गोस्वामी ने सिविल लाइन चौकी इंचार्ज और एक अन्य पत्रकार की मौजूदगी में पीड़ित का मोबाइल तोड़ने या जबरन कब्जे में लेने का प्रयास किया। हालात बिगड़ने पर पीड़ित ने तत्काल एसपी बांदा को फोन किया, जिसके बाद अपर एसपी शिवराज सिंह सिविल लाइन चौकी पहुंचे। हालांकि, पीड़ित का कहना है कि जिन पत्रकारों पर आरोप हैं, वे चौकी नहीं पहुंचे।

पीड़ित पक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि कालू कुआं पुलिस चौकी प्रभारी ने आईजीआरएस/जनसुनवाई पोर्टल पर तथ्यों के विपरीत कथित तौर पर एनडीटीवी और भारत समाचार से जुड़े लोगों का कूटरचित बयान दर्ज कर लिया और उल्टा पीड़ित पत्रकार पर ही पानी फेंकने जैसे झूठे आरोप लगा दिए, जबकि घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज पेनड्राइव के रूप में तहरीर के साथ दी गई है।

पीड़ित का कहना है कि 26 दिसंबर की रात करीब 9:55 बजे से 10 बजे के बीच, चार लोगों के साथ उनके घर पर आकर न सिर्फ गालियां दी गईं, बल्कि जानलेवा हमले की नीयत से ललकारते हुए चढ़ाई भी की गई। आरोप है कि इस दौरान उनके कैंसर पीड़ित बुजुर्ग पिता और माताजी को भी नहीं बख्शा गया।

आशीष सागर दीक्षित का कहना है कि उन्होंने नगर कोतवाली, पुलिस अधीक्षक और जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत देने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। पुलिस से कोई राहत न मिलने पर वे मजबूरन कोर्ट पहुंचे, जहां मामला दर्ज हुआ और सुनवाई के दौरान पीड़ित, वादी मुकदमा, अधिवक्ता और साक्षी गवाह अदालत में उपस्थित रहे।

पीड़ित पक्ष ने यह भी आशंका जताई है कि मौरम माफियाओं और तथाकथित “गटर पत्रकारिता” से उन्हें जान-माल का गंभीर खतरा है और यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो स्थिति और भयावह हो सकती है।

फिलहाल पूरा मामला अदालत में विचाराधीन है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 16 जनवरी 2026 तय की है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायिक प्रक्रिया में आगे क्या रुख सामने आता है और पुलिस की भूमिका पर क्या सवाल खड़े होते हैं।

IGRS की प्रति…

घर पर गाली गलौज होने के बाद पुलिस को दी गई शिकायत भी देखें…

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