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पत्रकारों की आपसी एकता, अधिकारों और मूल्यों की रक्षा को लेकर बांदा प्रेस क्लब में खुला संवाद!

बांदा। हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर बांदा प्रेस क्लब द्वारा होटल सारंग में एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें जनपद के वरिष्ठ एवं नवोदित पत्रकारों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत तिंदवारी तहसील अध्यक्ष की माताजी के निधन और पहलगाम आतंकी हमले में शहीदों की आत्मा की शांति हेतु दो मिनट के मौन से की गई। कार्यक्रम के अंत में होटल में सामूहिक भोज भी किया गया।

संगोष्ठी का उद्देश्य था; जनपद के समस्त पत्रकारों के बीच आपसी समन्वय स्थापित करना, गुटबाज़ी से ऊपर उठकर संगठित पत्रकारिता की ओर बढ़ना और एक साझा मंच तैयार करना जहाँ पत्रकारों की आवाज़ ज़ोर से गूंजे।

प्रेस क्लब के महामंत्री सचिन चतुर्वेदी ने संगोष्ठी का संचालन करते हुए सबसे पहले आपसी कटुता और व्यक्तिगत मनमुटाव को भुलाकर पत्रकारों को एक मंच पर संगठित होने का आवाहन किया। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि हर माह भोजन व्यवस्था के साथ एक संवाद बैठक रखी जाएगी, जिससे आपसी भाईचारे को मजबूती मिलेगी।

उन्होंने बताया कि प्रेस क्लब एक “पत्रकार लोक अदालत” की योजना पर विचार कर रहा है, जिसमें पत्रकारों की समस्याओं का निराकरण संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के समक्ष किया जाएगा। साथ ही उन्होंने नवोदित पत्रकारों के लिए वर्कशॉप और प्रशिक्षण सत्र आयोजित करने की भी बात कही, जिससे वे पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को समझ सकें।

उन्होंने सूचना विभाग पर तंज कसते हुए स्पष्ट किया कि “पत्रकार का माई-बाप उसका अखबार या चैनल होता है, न कि सूचना विभाग।” सूचना विभाग को केवल एक समन्वयक की भूमिका में देखा जाना चाहिए।

प्रेस क्लब अध्यक्ष दिनेश निगम ‘दद्दा’ ने अपने भावुक संबोधन में कहा, “आज से मैं किसी भी पत्रकार के खिलाफ कोई कटु टिप्पणी नहीं करूंगा। यदि अतीत में ऐसा कुछ कहा हो तो मैं सार्वजनिक रूप से क्षमा चाहता हूँ।”

उन्होंने शहीद पत्रकार सुरेश चंद्र गुप्ता के नाम पर बने प्रेस क्लब भवन को निजी व्यवसाय का अड्डा बनाए जाने की आलोचना की और मांग की कि यह भवन बांदा प्रेस क्लब को औपचारिक रूप से सौंपा जाए।

उन्होंने महिला पत्रकार सुलोचना तिवारी के साथ हुए अन्याय की भी चर्चा की और आश्वस्त किया कि वे उनके साथ खड़े हैं और उन्हें न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। उन्होंने बांदा प्रेस क्लब द्वारा पूर्व में किए गए समाजसेवा के कार्यों का भी उल्लेख किया, चाहे वो गरीब व बेसहारा बहनों तथा समाज से उपेक्षित किन्नरों के हाथों रक्षाबंधन का त्यौहार मनाना हो अथवा समय समय पर भंडारा, प्रसाद आदि का वितरण हो।

पत्रकार दीपक पांडे ने क्रांतिकारी अंदाज में निष्पक्षता की बात करते हुए कहा कि “हमें न तो किसी से डरना चाहिए, न झुकना चाहिए। पत्रकारिता सच्चाई की आवाज़ है और उसे बेधड़क उठाना चाहिए, चाहे सामने शासन हो या प्रशासन।”

सचिव सुनील सक्सेना ने ‘दद्दा’ की बातों का समर्थन करते हुए कहा कि इस प्रकार की एकजुटता पत्रकारिता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

कोषाध्यक्ष राजेंद्र खत्री ने सूचना विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए बताया कि “पत्रकार मद का पैसा वर्षों से सूचना विभाग खा रहा है। वहां केवल उन्हीं का सम्मान है, जो उन्हें अपना ‘माई-बाप’ समझ बैठते हैं।”

रूपा गोयल ने “हाँ, मैं पत्रकार हूँ” शीर्षक से एक कटाक्षपूर्ण कविता प्रस्तुत की, जो आज के दौर की पत्रकारिता पर एक गहरा व्यंग्य था।

रोहित धुरिया ने पत्रकारिता की प्रस्तुति शैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “सटीक, सार्थक और सशक्त खबरें ही प्रभावशाली होती हैं, लेकिन आज की भीड़ में यह कला लुप्त होती जा रही है।”

राजा त्रिपाठी ने एकजुटता पर बल देते हुए कहा कि “यदि हम संगठित हो गए, तो प्रशासन ही नहीं, शासन भी हमारी बात सुनने को मजबूर होगा।”

वरिष्ठ पत्रकार कमल सिंह ने पत्रकारों के बहुआयामी शोषण पर चर्चा की; “प्रशासन, अखबार मालिक और व्यवस्था, हर जगह पत्रकार का दोहन होता है। अब समय आ गया है कि हम इस चक्रव्यूह से बाहर निकलें।”

अनिल सिंह गौतम और मनीष निगम ने पत्रकार एकता की आवश्यकता पर बल देते हुए महोबा के एक पत्रकार साथी के साथ हुई अभद्रता का ज़िक्र किया जहाँ अपने बांदा शहर के ही कुछ नामचीन लोगों ने उनके साथ अभद्रता की थी, परन्तु ‘दद्दा’ ने डटकर अपने पत्रकार साथी का समर्थन किया।

कार्यक्रम में सुनील सक्सैना, सचिन चतुर्वेदी, राजेंद्र खत्री, विनय निगम, राजा त्रिपाठी, सुरेश साहू, रूपा गोयल, संध्या धुरिया, सुलोचना तिवारी, अनिल सिंह गौतम, सुशील कुमार, राजा बाबू दुबे, साकेत अवस्थी, श्रीकांत श्रीवास्तव, मनोज गोस्वामी, हिमांशु शुक्ला, दीपक पांडे, माजिद सिद्दीकी, इदरीश भाई, के.के. गुप्ता, संजय कुशवाहा, रामजी यादव, कमल सिंह, मनीष निगम, अनिल सिंह आवारा, राजेश तिवारी, रोहित धुरिया, अरविंद श्रीवास्तव सहित अनेक पत्रकारों ने भाग लिया।

आज की संगोष्ठी सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ठोस पहल थी; एकता, जागरूकता और आत्म-सम्मान की ओर। यह कार्यक्रम इस बात की मिसाल बना कि जब पत्रकार आपस में संवाद करें, तो न केवल समस्याओं की पहचान होती है, बल्कि समाधान की राह भी खुलती है।

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