बर्बर सत्ता के मुंह पर दुनिया थूकती ही है

अभी कुछ दिनों पहले ही डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों ने यूएस कैपिटल बिल्डिंग में घुसकर बड़ा तांडव किया था और तब भारत के तमाम न्यूज़ चैनल सुबह 6:00 बजे से रात के 11:30 बजे तक उस तांडव की खबर पर बने रहे। कभी अमेरिकी लोकतंत्र का इतिहास दिखाया, कभी डोनाल्ड ट्रंप का राजनीतिक सफरनामा दिखाया। कभी उस तांडव के बहाने सबसे बड़े लोकतंत्र में पैदा हुए खतरे पर डिबेट की। और आज जब भारत में घट रही घटनाओं पर दुनिया के अलग-अलग देशों के लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं तो वही न्यूज़ चैनल, वही सारे एंकर उसे भारत के मामले में दखल बता रहे हैं।

ऐसी मानसिक गुलामी क्यों भाई?

आप अमेरिका के मामले में सुबह 6:00 बजे से रात 11:30 बजे तक 5 दिन लगातार डिबेट करते रहो लेकिन आप के मामले में दुनिया का कोई देश बोले नहीं यह कैसे संभव है! दुनिया के किसी भी देश में जब बड़ी घटनाएं होती हैं, कोई आंदोलन खड़ा होता है, सत्ता समर्थक वर्ग या फिर सत्ता विरोधी वर्ग की तरफ से अलोकतांत्रिक कदम उठाए जाते हैं तो बाकी देशों में उसकी आलोचना होती है। लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले लोग, मानवता में भरोसा रखने वाले लोग उस पर अपनी प्रतिक्रियाएं देते हैं। इसलिए भारत के मामले में अगर दुनिया के अलग-अलग देशों से लोगों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं तो यह बेहद स्वाभाविक है। आप अपने आप को कुएं का मेंढक बनाने को अगर बेचैन हैं तो आप क्यों चाहते हैं कि दुनिया के बाकी देश के लोग भी खुद को कुएं का मेंढक बना लें।

हां, एक और प्रोपगंडा चल रहा है, इन बयानों को भारत के विरुद्ध बताया जा रहा है। भारत का विरोध कहां हुआ है? कोई एक शब्द बता दे कि इसमें भारत का विरोध कहां है। ये विरोध इंटरनेट पर लगे बैन का है। आप नागरिक अधिकारों को प्रतिबंधित कीजिएगा तो आवाज उठेगी। आजाद सोंच के लोग खामोश नहीं हो जाएंगे। कुछ बयान किसानों के आंदोलन के समर्थन में आए हैं। कहा गया है कि इस पर चर्चा होनी चाहिए। इसमें क्या गलत है? किसी भी देश में जब नागरिक आंदोलन होंगे तो लोग तो यही चाहेंगे उस पर चर्चा हो, समस्या का समाधान हो, आंदोलन खत्म हो, टकराव खत्म हो। इसमें भारत विरोध की बात कहां से आ गई ? दो-चार लोग नागपुरिया चिलम पीकर कोई एक विचार ठोक दे रहे हैं और आप उसे स्थापित करने में लग जा रहे हैं।

क्या आपके विवेक पर उन चीलमचियों का कब्जा हो गया है? आप यह सोचिए। खुद से सवाल पूछिए कि आप जिसे अपने देश के आंतरिक मामलों में दखल समझ रहे हैं क्या वह सही मायनों में किसी संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामले में कोई दखल है या वह एक लोकतांत्रिक मानवतावादी दृष्टिकोण है। आप खुद से यह सवाल पूछिए कि आप जो यह लगातार बोल रहे हैं कि भारत के खिलाफ बोला जा रहा है, क्या यह जो प्रतिक्रियाएं आई हैं वह भारत के खिलाफ हैं। क्या एक बर्बर सरकार ही भारत है? क्या बर्बर विचारधारा से जुड़े दो-चार 10 लोग ही भारत हैं? क्या भारत का मतलब यही है? जो लगातार देश में दंगे फसाद करवा रहा है, लगातार साजिशें कर रहा है, कुचक्र रच रहा है, जनता का दमन करने में बर्बरता की सारी हदें लांग रहा है, क्या वही सोच भारत है? अब खुद से यह सवाल पूछिए और हां, ध्यान रखिए अपनी बुद्धि पर अपने विवेक पर किसी और का कब्जा मत होने दीजिए।

वो बड़े शातिर लोग हैं। वो अपने हिसाब से आपका नजरिया सेट करना चाहते हैं। सावधान हो जाइए। आगे अंधा मोड़ है। और हां उन संपादकों, एंकरों-एंकराइनों से जरूर यह पूछिए कि भाई तू क्यों अमेरिका के मामले में घंटों डिबेट कर रहे थे। तुम्हें क्या हक था उसके आंतरिक मामले में दखल देने का। उन्हें बताइए कि लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर अगर तुम अमेरिकी मामले पर डिबेट कर सकते हो तो दुनिया के बाकी देश के लोग भी तुम्हारे देश में हो रही घटनाओं पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। यह स्वाभाविक है। और हां, अपनी समस्याओं के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहरा कर खुद की जिम्मेदारी से भागना वाला शातिर और कायर होता है, ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से ज़रूर कहिए। जय हिंद।

असित नाथ तिवारी
लेखक एवं कवि
asitnath@hotmail.com

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