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बेसमेंट में लाइब्रेरी नहीं, सड़क पर पानी भरना मुद्दा है, यह नगर निगम या दिल्ली सरकार का मामला नहीं है

संजय कुमार सिंह

कोचिंग सेंटर की कथित अवैध लाइब्रेरी में तीन छात्रों की मौत पर सबसे गंभीर प्रतिक्रिया राहुल गांधी की है। द टेलीग्राफ ने आज इसे अपना कोट बनाया है। राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा था, “दिल्ली की एक बिल्डिंग के बेसमेंट में पानी भर जाने के कारण प्रतियोगी छात्रों की मृत्यु बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। कुछ दिन पहले बारिश के दौरान बिजली का करंट लगने से एक छात्र की मृत्यु हुई थी। सभी शोकाकुल परिजनों को अपनी भावपूर्ण संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। इन्फ्रास्ट्रक्चर का ये कोलैप्स सिस्टम की संयुक्त असफलता है। असुरक्षित निर्माण, लचर टाऊन प्लानिंग और हर स्तर पर संस्थाओं की गैरजवाबदेही की कीमत आम नागरिक अपना जीवन गंवा कर चुका रहा है। सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन हर नागरिक का अधिकार और सरकारों का दायित्व है।“ इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में बताया है कि मरने वालों में दो स्नातक और एक पीएचडी छात्र है। तीनो देश के तीन राज्यों के हैं।

आज जो भी खबरें हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है, कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में लाइब्रेरी, उसमें पानी भरने से तीन छात्रों की मौत और उसपर मचे हंगामें के बाद सीईओ और उनके सहायक की गिरफ्तारी। आज यह खबर सभी अखबारों में लीड, सेकेंड लीड है। शीर्षक में भी यही सब बातें बताई गई हैं सोशल मीडिया पर भी इस बारे में काफी कुछ कहा गया है। हर कोई अपने हिसाब से दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहा है पर जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है। इसमें सबसे बुरा यह हुआ है कि एमसीडी ने बाकी जगहें सील कर दी हैं। इससे कोई लाभ हो या नहीं, पढ़ाई तो बाधित होगी ही। गौरतलब है कि सालभर से कुछ पहले दिल्ली के ही एक और कोचिंग इंस्टीट्यूट में आग लगी थी। वह ऊपर की मंजिल में था। छात्र किसी तरह रस्सी के सराहे उतर गये थे। तब एक की मौत हुई थी कई घायल हो गये थे। वायरल वीडियो में देखा गया था कि आपात स्थिति में निकलने का कोई उपाय नहीं था और छात्र रस्सियों के सहारे उतर पाये थे। हादसा तो तब भी बड़ा हो सकता था और जो हुआ वह कम नहीं था। उससे किसने सीख ली और ली होती तो क्या यह हादसा होता? आप कह सकते हैं कि यह अलग तरह का हादसा है। बेसमेंट में लाइब्रेरी थी, उसमें पानी भर गया।

अव्वल तो वह प्लॉट पांच लोगों के एक परिवार के लिए है। बहुमंजिले घर या फ्लैट में 25 लोग रहते बेसमेंट में पार्किंग होता। पर जिस ढंग से पूरे मोहल्ले में सड़कों पर पानी भर गया और लाइब्रेरी में बैक फ्लो के कारण पानी भरा है उसमें कोचिंग सेंटर की गलती कहां है? गलती तो उस व्यवस्था की है जिसकी वजह से जरा सी बारिश में ही पूरे मोहल्ले की सड़कों पर पानी भर गया और जब सड़कों पर पानी भरा तो बेसमेंट में भी भरना ही था और तीन लोग तो कार और पार्किंग में भी हो सकते थे और तब भी मरते। हालांकि, दोषी तब भी बिल्डिंग का मालिक होता या मरने वाला राम भरोसे होता जैसे कोविड में हुआ। अगर वहां लाइब्रेरी अवैध थी तो छात्र अनपढ़ थे? मुफ्त में शिक्षा पा रहे थे या लाइब्रेरी का उपयोग कर रहे थे? आप कह सकते हैं कि शिकायत की गई थी, कार्रवाई नहीं हुई। तो दोषी वह हुआ जिसने कार्रवाई नहीं की। मैं इसका मतलब यह निकालता हूं कि कोचिंग चलाने वाले दोषी नहीं है। जिसे देखना रोकना था वो क्यों नहीं हैं?    

लगभग एक साल में दिल्ली के कोचिंग संस्थानों में हुए इन दो हादसों से साफ है कि दिल्ली में कोचिंग चलाने के लिए किराये पर उपयुक्त जगह उपलब्ध नहीं हैं। लाइब्रेरी बेसमेंट में नहीं होती तो छत पर होती और तब आग लगने पर मौतें होतीं। कायदे से बहुमंजिली बिल्डिंग में ऊपर की मंजिल पर ज्यादा लोग रहें या इकट्ठे हों तो आपात स्थिति में उनके निकलने की व्यवस्था होती है। सीढ़ियां बाहर की ओर खुले में बनाई जाती हैं ताकि जो उतर नहीं पायें वो सुरक्षित खड़े हो सकें। आवासीय इमारतों का ऐसा उपयोग होगा तो ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकेगी और हादसे की स्थिति में ज्यादा मौतें होंगी। जहां तक मौत की बात है, हाल ही में एक सत्संग के पंडाल में भगदड़ मचने से कई लोगों की मौत हो गई थी। जो खबरें छपीं उससे तो यही लगता है कि भगदड़ चरण रज लेने के लिए मची थी और घोषणा की गई थी कि चरण रज लेकर जायें तथा यह नहीं कहा गया कि इसके लिए जल्दबाजी न करें या भगदड़ न मचायें। जो भी हो, मुझे लगता है कि चरण रज लेने के लिए भगदड़ मचेगी तो लोग मरेंगे ही। और इसी तरह अगर असुरक्षित भवन में कोचिंग चलेंगे तो हादसे हो ही सकते हैं।

सरकार जब रिहायशी इलाकों में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बाजार, ऑफिस, नर्सिंग होम, बारात घर, विवाह मंडप आदि के लिए जगह छोड़ती है तो अब कोचिंग इंस्टीट्यूट के लिए भी छोड़ना चाहिये और जब तक उचित जगह नहीं मिले तब तक अगर कोई कोचिंग नहीं चलायेगा तो इससे किसका भला होगा यह सोचिये। जाहिर है, कोचिंग चलाने की जरूरत है और जगह नहीं है। ऐसे में कोचिंग चलाने वाले की मजबूरी है कि अपने रोजगार या व्यवसाय के लिए कोचिंग चलायें और जो मिले उसी में चलायें जो व्यवस्था है उसका पालन करे। अगर यही उसका दोष है तो सजा भी भोगें। ऐसे में व्यवस्था कभी ठीक नहीं होगी। सरकार से यह मांग की जानी चाहिये कि वह कोचिंग के लिए उपयुक्त भवन की व्यवस्था करे, छात्र चाहें तो असुरक्षित भवनों में चलने वाले कोचिंग की फीस न दें। उसमें नहीं जायें। मैंने देखा है कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग एंड मैनजमेंट (आईआईपीएम) का भवन दक्षिण दिल्ली में इस कोचिंग इंस्टीट्यूट के मुकाबले ज्यादा जगह में बना और अच्छा था। पर ऐसे परिसर उपलब्ध नहीं हों तो?  

यह दिलचस्प है कि आईएएस की प्रतियोगिता में बैठने वाले छात्र यह आरोप लगाते हैं कि हादसे में मौतें कम बताई जा रही हैं, लाशें छिपाई जा रही हैं आदि। आज के समय में यह सब संभव नहीं है और संस्थान में नामांकित तथा उपस्थित छात्र अगर नहीं मिलें तब यह आरोप लगाया जा सकता है लेकिन पहले ही यह ऐसा आरोप लगाना पिछली बार भी शुरू हो गया था। इस बार भी हुआ। जहां तक ऐसे हादसों पर राजनीति की बात है, भारतीय जनता पार्टी की बेशर्मी का क्या कहा जाये। जब जेल में बंद मुख्यमंत्री को दोषी ठहराने वाले लोग हैं और समाज या व्यवस्था को यह चिन्ता नहीं है कि अदालत में कम से कम एक, उनका अकेला मामला जल्दी (समय से) निपटे, प्राथमिकता पर सजा हो या छोड़ा जाये तो बाकी क्या बात करनी है। अगर दोनों नहीं हो सकता है तो जमानत का प्रावधान है और पीएमएलए में जमानत का मामला अलग है तो वह भी भाजपा के कारण और यह जज को ईनाम देकर है। पर वह अलग मुद्दा है। इसके बावजूद लोग नहीं समझते हैं और आम आदमी पार्टी की सरकार या केजरीवाल को जिम्मेदार ठहराया जाता है। वह भी तब जब कथित छेड़छाड़ और खरोंच आने के मामले में उनके सहायक कई महीने से जेल में हैं, जमानत नहीं हो रही है और देश के मुख्य न्यायाधीश ने कहा है, जमानत नहीं देकर ट्रायल जज सुरक्षित रहते हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया)।

जहां तक इस्तीफे की बात है, किसानों पर जीप चढ़ाने के लिए इस्तीफा नहीं हुआ, रेल दुर्घटनाओं के लिए नहीं हो रहा है, कवच छोड़कर दूसरे तमाम खर्चों के लिए नहीं हो रहा है, बेमतलब की नोटबंदी के लिए नहीं हुआ, 370 हटाने से कोई फायदा नहीं हुआ, अकेले जुलाई में 12 शहीद हुए, कोई इस्तीफा नहीं हुआ, 50 दिन में सपनों का भारत नहीं बना, 100 दिन में विदेश में रखा काला धन वापस नहीं आने पर नहीं हुआ तो आम आदमी पार्टी के विधायक या मुख्यमंत्री का इस्तीफा हो ही जाये तो क्या फर्क पड़ना है।

द टेलीग्राफ में आज फिरोज एल विनसेन्ट की खबर लीड है। शीर्षक है, अवैध लाइब्रेरी में छात्र डूबे। इस खबर में कहा गया है, दिल्ली नगर निगम ने सभी कोचिंग सेंटर्स का ऑडिट करने और लापरवाही के लिए जिम्मेदार किसी भी नगर निगम कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया है। आम आदमी पार्टी और भाजपा ने एक दूसरे पर आरोप लगाए हैं। आप जानते हैं कि आम आदमी पार्टी दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार चलाती है जबकि भारतीय जनता पार्टी के पास उपराज्यपाल (एलजी) के जरिये दिल्ली में व्यापक अधिकार हैं। भाजपा ने आरोप लगाया कि नालों की सफाई न होने और आम आदमी पार्टी की विफलता के कारण यह हादसा हुआ है। नई दिल्ली से भाजपा की नई सांसद बांसुरी स्वराज ने कहा, “पिछले एक सप्ताह से, यहां के लोग आम आदमी पार्टी के विधायक दुर्गेश पाठक से नाले की सफाई करवाने का आग्रह कर रहे थे। पर दुर्गेश पाठक ने उनकी बात नहीं सुनी…. अरविंद केजरीवाल, दुर्गेश पाठक और आप सरकार इस घटना के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं।” इसपर आम आदमी पार्टी के मंत्री सौरभ भारद्वाज ने पिछले महीने मुख्य सचिव नरेश कुमार और अन्य अधिकारियों के साथ कथित बैठक का वीडियो ट्वीट करके कहा है, “हर कोई कह रहा है कि दिल्ली में नालों और सीवरों से गाद निकालने का काम ठीक से नहीं हुआ। इस वजह से पूरी दिल्ली में जलभराव हो गया…।” उन्होंने कहा, “सरकार न तो इन अधिकारियों का तबादला कर सकती है और न ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती है। केवल एलजी साहब ही कार्रवाई कर सकते हैं।” ऐसे ही एक वीडियो को एक्स पर जारी करते हुए आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने लिखा है, असली अपराधी भाजपा है जो एलजी और अधिकारियों के साथ मिलकर दिल्ली वालों की ज़िंदगी नरक बनाने में जुटी है। ये वीडियो उसका सबूत है बारिश शुरू होने से पहले हमारे मंत्रियों ने बार बार डिसिल्टिंग के लिये कहा “इन अधिकारियों ने सफ़ाई रोकने का अपराध किसके कहने पर किया?” इन पर एलजी ने कार्यवाही क्यों नहीं की? माननीय सीजेआई जी कृपया इसका संज्ञान लीजिए। भाजपा की साज़िश से दिल्ली को बचाइये। यहां यह गौरतलब है कि कोचिंग इंस्टीट्यूट के भवनों को सील करने की कार्रवाई का समर्थन करते हुए यह सवाल उठाया जा सकता है कि कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई। मेरा मानना है कि पहले हुई होती तो यह आरोप लगाया जाता कि कोचिंग चलाने नहीं दे रहे हैं, पैसे मांग रहे हैं आदि। अगर ऐसा नहीं भी होता तो कोचिंग के मार्ग में बाधा तो खड़ी होती ही। जहां तक रिहाइशी इमारतों में व्यावसायिक गतिविधियों का मामला है, यह काफी उलझा हुआ है और निपटाना आसान नहीं है। पर मौत का कारण सड़क पर पानी भरना है। बेसमेंट में लाइब्रेरी होना तो बाद की बात है। ऊपर लिख चुका हूं वहां पार्किंग होता तब भी मौत हो सकती थी और मौतें तो हवाई अड्डे की छत गिरने से भी हुई है।

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