
संजय कुमार सिंह
आज मेरे आठ में से छह अखबारों में ‘मन की बात’ लीड है। दस साल पुराने प्रधानमंत्री के मन की बात अभी भी खबर कैसे हो सकती है और वह भी लीड – पत्रकारिता के नियमों के अनुसार समझना मुश्किल है। सबको समझ में आ रहा है कि पाकिस्तान से युद्ध का माहौल बनाने की कोशिश चल रही है और इसमें पाकिस्तान के युद्ध विराम उल्लंघन की खबर नहीं है या सिंगल कॉलम में निपटा दी गई है क्योंकि इस खबर से लगता है कि भारत जो कर रहा है उससे पाकिस्तान डर नहीं रहा है या कह रहा हो कि आ बैल मुझे मार। दोनों स्थितियों में यह भारत की 56 ईंची रणनीति की पोल खोल रहा है पर खबर गोल है। ऐसे में, जो लोग जानते और मानते हैं कि इन दिनों तगड़ा वाला हेडलाइन मैनजमेंट चल रहा है उनसे कहा जा सकता है कि यह हेडलाइन मैनेजमेंट का बेहद अश्लील और घटिया रूप है। द टेलीग्राफ ने लिखा है कि प्रधानमंत्री ने जो कहा और आज छपा है वह तीन दिन में दूसरी बार है। इसलिए ज्यादातर अखबारों ने जो नया कहा वही लीड है और छह में सिर्फ एक, इंडियन एक्सप्रेस के लीड का शीर्षक अलग है। ज्यादातर शीर्षक है, हर भारतीय का खून खौल रहा है पर तथ्य है कि घटना के कई दिन हो गये, नाम पूछकर और धर्म देखकर भी हत्या की गई तो उसका मकसद था और हम उससे बचने की कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं। पहले दिन हिन्दी अखबारों ने हिन्दू होकर किया था और हर भारतीय के खून में आग लगाने की अनैतिक कोशिश की थी पर उसे सरकारी तौर पर भी लपक लिया गया है। ऐसे में कई दिनों बाद, सब कुछ जानने-समझने के बाद भी हर भारतीय का खून खौल रहा है और यह प्रधानमंत्री को मालूम है – तो इसमें खबर क्या है? उन्हें इसे ठंडा करने के लिए काम करना चाहिये पर वे जो कर रहे हैं उससे खून का खौलना कम तो नहीं होने वाला है। उसमें कुछ नुकसान हो जाये तो अलग बात है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, कश्मीर में शांति संपन्नता लौट रही थी… आतंकी उनके समर्थक इसे फिर से नष्ट करना चाहते हैं : प्रधानमंत्री। इसके साथ उन्होंने दोहराया है और मन की बात के बाद अखबारों में छपा कि वे सबसे सख्त जवाब देंगे। पर सबको पता है कि ऐसा ही उन्होंने पुलवामा के बाद भी कहा था और बालाकोट हमले के अलावा कुछ खास नहीं हुआ।
पहले भी लिख चुका हूं कि उस समय वहां तीन सौ मोबाइल फोन चार्ज हो रहे थे – के आधार पर कहा गया कि 300 आतंकी मारे गये। अखबारों की खबर थी कि एक कौव्वा मरा है। इतने समय में वास्तविक स्थिति ना बताई गई ना मालूम है। बीच में (कश्मीर चुनाव से पहले) यह दावा किया गया कि आतंकवाद खत्म हो गया है। भाजपा जीत नहीं पाई राज्य में सरकार भले बन गई। राज्य सरकार की मांग पूर्ण राज्य का दर्जा देने की है। 370 हटाये जाने से क्या फायदा हुआ और अगर वाकई शांति व संपन्नता बहाल हो रही थी तो पहले कब कहा गया या किस खबर से ऐसा लगा। जो भी, हो अगर ऐसा था भी तो आतंकवाद खत्म करने का दावा आतंकियों को चुनौती थी और अब पता चल रहा है कि बचाव या उनसे निपटने के उपाय पर्याप्त नहीं थे। इसलिए उन्होंने वो किया जो अब तक नहीं करते थे। इसपर गंभीरता से विचार करके काम करने की जरूरत थी तो वही घिसा-पिटा तरीका अपनाया गया है और घर तोड़ने की गैर कानूनी कार्रवाई से नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है वह भी जो देशवासी हैं, देश के नागरिक हैं। कार्रवाई पाकिस्तान के खिलाफ (भी) की जा रही है, बताया जा रहा है कि पाकिस्तान के समर्थन से हुआ, देश में आतंकवाद खत्म हो चुका था फिर ये कैसे बचे हुए थे? या वाकई आतंकी हैं? मीडिया की विश्वसनीयता नहीं रह गई है और वे उसे बहाल करने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। ऐसे में आज खबर यह भी है कि कश्मीर के नेताओं ने अपील की है कि आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर निर्दोष लोगों को सजा नहीं दी जाये।
प्रधानमंत्री के मन की बात का प्रचार करने के फेर में आज जो खबरें दब गई हैं उनमें तमिलनाडु के दो मंत्रियों के इस्तीफे की खबर भी है। इन लोगों ने अदालत की सख्त टिप्पणी के कारण इस्तीफा दिया है और विडंबना यह कि मुख्यमंत्री ने उसी राज्यपाल से स्वीकार करने की सिफारिश की है जिनके खिलाफ टिप्पणी के क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट की। राष्ट्रपति को सलाह दी जिसे आदेश बना दिया गया और भारी विवाद रहा। राज्यपाल का इस्तीफा मुद्दा ही नहीं बना। एक तरह से भाजपा ने बचा लिया। आज यह खबर द हिन्दू में लीड है और प्रधानमंत्री का मन की बात सेकेंड लीड है। यहां भी शीर्षक खून खौलने वाला नहीं है और जो है वह पुराना है – पहलगाम के दोषियों को सबसे सख्त सजा मिलेगी। दि एशियन एज की लीड एनआईए जांच शुरू होने की खबर है। इसके अनुसार एफआईआर हो गई है और 537 पाकिस्तानियों ने चार दिन में भारत छोड़ दिया है। हालांकि अमर उजाला ने शीर्षक में बताया है कि 850 भारतीय भी पाकिस्तान से वापस आये हैं। आप जानते हैं कि वारदात अपराधियों ने की सजा पाकिस्तानियों (और भारतीयों को भी) मिली तथा उन्हें जिनके करीबी भारत में रहते हैं या जो घूमने के लिए भारत को पसंद करते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि वीजा नहीं देने से आतंकियों के नहीं आने की कोई गारंटी नहीं है। फिर भी सरकार ‘कार्रवाई’ कर रही है और अखबार प्रचार कर रहे हैं। यह नहीं बताया जा रहा है कि आतंकी अवैध रूप से प्रवेश न कर पायें इसके लिए क्या किया जा रहा है। वास्तविकता यह है कि बांग्लादेश सीमा पर आम घुसपैठियों को नहीं रोका जा सका है तो आतंकियों को कैसे रोका जायेगा और भारत जब शेख हसीना की मेजबानी कर सकता है तो आम घुसपैठियों और फिर अपराधी या आतंकी को रोकने का क्या या कितना मतलब है?
खबरों के चयन और प्रस्तुति में पक्षपात और उपेक्षा का आलम है कि दि एशियन एज में सिंगल कॉलम की खबर बताती है कि पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा पर लगातार तीसरे दिन युद्ध विराम का उल्लंघन किया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर को सेकेंड लीड बनाया है और इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, चीन ने कहा है कि पाकिस्तान अपने सुरक्षा हितों की रक्षा कर रहा है। एनआईए ने जांच का काम शुरू किया – खबर आज दि एशियन एज की लीड है पर यहां वह खबर सिंगल कॉलम में है। आज जिन अन्य खबरों को कम महत्व मिला है उनमें एक है, अलीगढ़ में करनी सेना के लोगों का समाजवादी पार्टी के सांसद, रामजी लाल सुमन के काफिले पर टायर फेंकना। अखिलेश यादव ने इसे घातक कार्रवाई कहा है और द हिन्दू में यह छह कॉलम में छपी है। कहने की जरूरत नहीं है यह डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति है और करनी सेना अगर सांसद का विरोध कर रही है तो इसलिए कि उन्होंने अपने मन की बात संसद में कही थी। एक तरफ तो प्रधानमंत्री के मन की बात को बासी होने पर भी प्रचार दिया जा रहा है जबकि उसका बहुत मतलब नहीं है और दूसरी तरफ संसद में सही बात कहने के लिए सांसद को परेशान किया जा रहा है और प्रशासन उपद्रवियों पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा है। नेता अपने कार्यकर्ताओं से यह अपील तक नहीं करते कि कानून हाथ में न लें। फिर भी पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है। कई मामलों में वर्षों।
तीन दिन से भारत जो कर रहा है उसके जवाब में या उसके बावजूद पकिस्तान ऐसा कर रहा है तो यह मन की बात से बड़ी खबर है लेकिन सिंगल कॉलम में है। और किसी अखबार में है कि नहीं ढूंढ़ता हूं। इतना तो तय है कि सरकार (प्रधानमंत्री) का रवैया ऐसा रहा है जैसे हम पाकिस्तान से युद्ध की ओर बढ़ते लग रहे हैं। नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार, सीडीएस (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) ने रक्षा मंत्री से मुलाकात की है। हालांकि, यह खबर एएनआई के वीडियो के आधार पर है जो समाचार एजेंसी ने एक्स पर पोस्ट की है और माहौल बनाने के लिए भी हो सकती है। इन दिनों सरकार न तो खबर की तरह खबर देती है और न जो छपता है वह खबर की तरह प्राप्त किया या लिखा हुआ होता है। इसके साथ एक और खबर है, सीमा सुरक्षा बल के डीजी गृह मंत्रालय पहुंचे। पहले खबरें ऐसे नहीं छपती थीं। खबरों के साथ बताया जाता था कि मुलाकात का मकसद क्या है। यहां लिखा है, रक्षा तैयारियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए लिये सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी रविवार को दिल्ली में मौजूद थे। कहने की जरूरत नहीं है कि सीमा सुरक्षा बल का मुख्यालय दिल्ली में है और उसके प्रमुख का दिल्ली में होना आम है और सरकारी अधिकारी रविवार को भी सामान्यता मुख्यालय पर रहते हैं। इसलिए यह खबर नहीं है। खबर यह है कि रविवार को गृह मंत्रालय खुला था और कौन से लोग दफ्तर में थे। अगर दफ्तर खुला था तो मौजूद लोगों से मिलने वालों में बीएसएफ प्रमुख अकेले थे या कोई और था। इसके बिना खबर जितना बताती है उससे ज्यादा जिज्ञासा पैदा होती है। लेकिन खबर है तो है। जहां तक पाकिस्तान से युद्ध की बात है, युद्ध पहले भी हो चुका है। हम जीत भी चुके हैं और पाकिस्तान फिर भी बाज नहीं आया है तो क्या दूसरा तरीका नहीं है? युद्ध ही करना है तो चीन से क्यों नहीं जिसके सैनिकों ने हमारे 20 जवानों को मार दिया था और हम ना कोई घुसा है …. कह कर चुप हो गये। आम उपयोग की चीजों पर प्रतिबंध लगा पर व्यापार चलता रहा।
मुझे लगता है कि पाकिस्तान की यह स्थिति उसके मुस्लिम और संभवतः कमजोर देश होने के कारण है। एक ही समय आजाद हुये (या बने) दोनों देश इतने अलग हैं तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हम अभी तक धर्म निरपेक्ष हैं वह मुस्लिम देश है। भले ही एक पार्टी या संघ परिवार की चाहत के कारण हम देखा-देखी हिन्दू राष्ट्र बनने को आमादा हैं और उसका नुकसान उठा रहे हैं। पहलगाम हमले के बाद सरकार के प्रचार के लिए कश्मीर में जैसी कार्रवाई की खबरें आ रही हैं वैसी पंजाब में आतंकवाद के समय और पूर्व में कश्मीर से भी आती रही हैं। युवाओं की कई पीढ़ियों को सरकार और देश की राजनीति ने तबाह किया है और अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है। देश के युवा अगर किन्ही कारणों से पथभ्रष्ट हो रहे हैं, आतंकवाद का रास्ता चुन रहे हैं, मालेगांव और समझौता ब्लास्ट जैसे मामले हुए हैं तो उनकी कट्टरता कम करने की सामूहिक कोशिश नजर नहीं आती है। उनके खिलाफ कार्रवाई तो छोड़िये आरोपियों में से एक को सांसद बना दिया गया। सेक्यूलर होना आजकल गाली है और हो सकता है कि कट्टरता कम करने की सामूहिक कोशिश बड़ी अपेक्षा हो लेकिन सरकार ने कक्षा सात की पुस्तकों में संशोधन किया है और उसमें 66 करोड़ लोगों के महाकुम्भ में शामिल होने का जिक्र है तथा उसकी खबर अमर उजाला में है तो यह जो हो रहा है उसे बताना भी है। खबर का शीर्षक है, कक्षा सात की किताब से मुगल बाहर, महाकुम्भ शामिल। अमर उजाला में यह खबर पांच कॉलम का बॉटम है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में टॉप पर। ऐसे में पाकिस्तान से दोबारा युद्ध की जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है, युद्ध के माहौल का राजनीतिक फायदा? लोकतंत्र में पड़ोसी देश से युद्ध का निर्णय़ देश का होता लेकिन अभी तो प्रधानमंत्री का होगा या भाजपा का या संघ परिवार का जिसके प्रमुख राजा-प्रजा की बात कर चुके हैं। दूसरी ओर, यह कोई नई बात नहीं है कि तनावपूर्ण माहौल भी भाजपा के लिए चुनावी फायदे का होता है और राष्ट्रवाद की बातें इसीलिए की जाती हैं।


