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पत्रकार संजीव मिश्रा की विकास दुबे पर लिखी किताब “बवाली कनपुरिया” एक सीख भी देती है!

अमीर बनने का चस्का ज़मीन के धंधे में धकेल देता है। कब्ज़ा, रंगदारी और उसका आपराधिक रसूख उसे कानपुर देहात और आसपास का बेताज बादशाह बना देता है। विकास दुबे, “पंडित जी”.. बनकर उभरता है….

शैलेश अवस्थी-

पत्रकार मित्र संजीव मिश्र की लिखी पुस्तक “बवाली कनपुरिया” एक ही बार में पूरी पढ़ गया। किस्सागोई अंदाज़ में लिखी गई यह सच्ची कहानी, एक सामान्य घर के संस्कारी गंवई लड़के के रंगबाज़ी में डॉन बनने तक की है।

कानपुर देहात के बिकरू गांव का भोला लड़का विकास दुबे, जिसकी बुद्धि कुशाग्र थी, लेकिन राह भटक गया और उसकी बंदूक शोला उगलने लगी। एक लड़का, जिसका सपना सेना में जाकर देश की रक्षा करने का था, जो कड़ी परीक्षा के मानकों पर खरा भी उतरता है, लेकिन पुलिस रिकार्ड में चढ़े नाम की वजह से उसे नियुक्ति नहीं मिल पाती और तब वह अपराध के पेशे में उतर जाता है।

उसका भौकाल देख नेता उसे लपक लेते हैं, उसके कंधे पर बंदूक रख अपने निशाने साधते हैं और बदले में उसे राजनीतिक छतरी में सुरक्षित रखने का भरोसा देते हैं। राजनीति की चकाचौंध देख विकास खुद राजनेता बनने का शौक पाल लेता है, प्रधान, पंचायत सदस्य बनता है और फिर यहीं से उसकी राजनीतिक शत्रुता का भी आगाज़ होता है।

अमीर बनने का चस्का ज़मीन के धंधे में धकेल देता है। कब्ज़ा, रंगदारी और उसका आपराधिक रसूख उसे कानपुर देहात और आसपास का बेताज बादशाह बना देता है। विकास दुबे, “पंडित जी”.. बनकर उभरता है।

वह कोई पैदाइशी बदमाश नहीं था, वह अपने अशुभ कर्मों से बदमाश बनकर उभरा और उसका भौकाल देख उसे महिमामंडित भी किया गया। छुटभैये बदमाश और नेता उसके सानिध्य में अपने को रंगबाज़ समझने लगते हैं और उसका आपराधिक कुनबा बढ़ता जाता है।

खुशामद करने वालों की बढ़ती तादात उसे अहंकारी बना देती है और फिर अपने को वह सर्वशक्तिमान समझने लगता है। गुरु हत्या का दोष राजनीतिक आका का कत्ल। दौलत के नशे में बेगुनाहों का खून और फिर आठ पुलिसवालों की सामूहिक हत्या, उसके काले करेक्टर रोल को भर देते हैं।

आखिरकार उसे एनकाउंटर में ढेर कर दिया जाता है। अपराधी चाहे जितना बड़ा हो, उसका अंत ऐसा ही होता है। संजीव मिश्र ने 12 एपिसोड में विकास के आगाज़ से अंजाम तक की कथा तफसील से बयान की है। पत्रकार गुड्डू पीएचडी के जरिये उकेरी गई जानकारी रोचक बन पड़ी है।

इस किताब का उजला पक्ष यह है कि यह किसी अपराधी का महिमामंडन नहीं करती, बल्कि सीख देती है कि गुनाह की दुनिया में उतरने का मतलब, बदनामी, बर्बादी और फिर मौत ही है… बेहतर होता कि इसमें विकास के जीवन से जुड़े कुछ चित्र भी होते तो और जीवंत हो जाती।

अपने पत्रकारिता जीवन में संजीव ने अपराध कि रिपोर्टिंग बहुत ही कम की है, लेकिन बवाली कनपुरिया पढ़कर यह बिल्कुल नहीं लगता कि इसे एक परिपक्व क्राइम रिपोर्टर ने नहीं लिखा। भाषा, रिदम, निरंतरता और अंदाज़ शानदार। संजीव जी को बधाई… शुभकामनाएं।

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