जल्दबाजी में जबरदस्ती किए गए आधे-अधूरे एसआईआर के बाद, पश्चिम बंगाल का चुनाव महाभियोग प्रस्ताव और केंद्रीय सुरक्षा बलों के साये में होगा। एक तरफ पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़, भाजपा की विरोधी तृणमूल पार्टी है तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार की ताकत और उसके प्रतीक बन चुके या बना दिए गए अमित शाह हैं। चुनाव आयोग और उसके मुखिया भी एक पक्ष हैं जो महाभियोग प्रस्ताव के बाद भी पूरे लगन से चुनाव कराने में व्यस्त हैं।
संजय कुमार सिंह
पश्चिम बंगाल चुनाव में पिछली बार संदेशखली था इस बार मालदा बनता दिख रहा है। पिछली बार के मुख्य अभियुक्त का नाम था शाहजहां शेख था इस बार भी ऐसा ही होता (एक मुख्य अभियुक्त बनता) दिख रहा है। भाजपा कह रही है तृणमूल वालों ने कराया और तृणमूल वाले कह रहे हैं भाजपा ने कराया। पिछली बार जांच केंद्र सरकार की एजेंसी सीबीआई को दी गई थी। इस बार भी जांच केंद्र सरकार की दूसरी एजेंसी एनआईए को दी गई है। मुख्य चुनाव तृणमूल बनाम भाजपा है। तृणमूल की मुखिया ममता बनर्जी वाजपेयी सरकार में दो बार केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं। 1999–2001 तक रेल मंत्री के रूप में काम किया। तब उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा थी। 2001 में उन्होंने सरकार से अलग होकर इस्तीफा दे दिया था लेकिन 2004 में फिर एनडीए के साथ होकर कोयला एवं खान मंत्री बनीं। उनका यह कार्यकाल छोटा रहा। इस समय उनके मुकाबले में भाजपा के अमित शाह हैं। एलान कर चुके हैं कि 15 दिन बंगाल में ही रहेंगे। ममता बनर्जी के खिलाफ भाजपा उम्मीदवार शुभेन्दु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस में रह चुके हैं। उनके नामांकन के साथ अमित शाह ने रोड शो किया था। गायक से भाजपा में शामिल हुए बाबुल सुप्रियो केंद्रीय मंत्री होकर पार्टी छोड़ चुके हैं और अब तृणमूल में हैं। इसलिए मामला विचारधारा का नहीं सत्ता पर कब्जे का है। दोनों का कब्जा अपनी जगह तो है ही, भाजपा अपने विस्तार के प्रयास में है। उससे सबका सहयोग मिलता दिख रहा है। बंगाल फतह करने के लिए नामुमकिन को मुमकिन किए जाने के कई उदाहरण आज के अखबारों में हैं। यह अलग बात है चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड जैसा कुछ नहीं है, मालदा में हुए अपराध की जांच एनआईए से कराई जा रही है और सुरक्षा के नाम पर केंद्रीय सुरक्षा बलों का बड़ा दस्ता राज्य में तैनात है। यह सब एक ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हो रहा है जिसके खिलाफ पहली बार महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया गया है। देश के मुख्य न्यायाधीश जब उनकी नियुक्ति से संबंधित मामला सुनने से अलग हो चुके हैं तब चुनाव के लिए वे जो कुछ भी करना चाहते हैं उसका समर्थन कर रहे हैं।
नरेन्द्र मोदी ने पिछला चुनाव जीतने का एलान किया था और ‘दो मई, दीदी गई’ कहते रहे थे। इस बार भी वैसा ही है। संदेशखली के शाहजहां शेख के बाद इस बार का मास्टर माइंड मालदा का मोफक्करुल इस्लाम है। अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने की लीड के अनुसार, यह पेशे से वकील है और गिरफ्तार कर लिया गया है। एनआईए की टीम ने जांच शुरू कर दी है। मुख्य खबर के साथ छपी एक खबर है, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मालदा में न्यायिक अफसरों के घेराव के लिए एआईएमआईएम और आईएसएफ को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही, कांग्रेस व भाजपा पर उकसाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि घेराव के मुख्य साजिशकर्ता को राज्य की सीआईडी ने गिरफ्तार कर लिया है। ममता ने दावा किया कि पुलिस उनके नियंत्रण में है न कि चुनाव आयोग के। दक्षिण दिनाजपुर के हरिरामपुर की एक रैली में ममता ने आरोप लगाया, भाजपा ने आरोपी को एआईएमआईएम से उधार लिया और यहां लेकर आई है। आईएसएफ उनके साथ है। मालदा के मोथाबाड़ी में हिंसा इन्हीं लोगों ने करवाई। जाहिर है, मामला सीधा नहीं है और ममता बनर्जी भी आसानी से हार मानने वाली नहीं है। इसका पता देशबन्धु के इस शीर्षक से लगता है, बंगाल में नतीजों के बाद भी होगा बवाल। चुनाव के बाद भी तैनात रहेंगी सीएपीएफ की पांच सौ कंपनियां। आप जानते हैं कि मतदाता सूची से घुसपैठियों को निकालने के नाम पर एसआईआर हुआ है और तमाम शिकायतों, मुश्किलों तथा आरोपों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने होने दिया है। इसपर ममता बनर्जी का सवाल अलग है, अगर वोटर लिस्ट में घुसपैठियों के नाम थे तो नरेन्द्र मोदी भी पहले उन्हीं के वोटों से जीते हैं। इसलिए, सबसे पहले उन्हें इस्तीफा देना चाहिए। जाहिर है, ऐसा होना नहीं है और घुसपैठिये निकालने के लिए हुए एसआईआर में लॉजिकल डिसक्रिपेंसी चेक करने के नाम पर लोगों को परेशान किया गया। यह आश्वासन दिया जा रहा है कि इस बार वोट नहीं दे पाएंगे तो भी मताधिकार सुरक्षित रहेगा लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि इस सुरक्षित अधिकार का क्या उपयोग जब सरकार, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट यह सुनिश्चित नहीं कर पाया है कि कोई वोटर छूटे ना। नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर बंगाल चुनाव से संबंधित कोई खबर नहीं है।
दि एशियन एज की लीड पुड्डुचेरी में प्रधानमंत्री का चुनावी भाषण है और बंगाल चुनाव की खबर सिंगल कॉलम की है। वह भी एआईएमआईएम की। खबर के अनुसार, पार्टी ने बंगाल चुनाव के लिए 12 उम्मीदवार उतारे हैं। इन दर्जन भर उम्मीदवारों में तीन मुर्शिदाबाद के हैं और एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने हाल में अपने चुनाव अभियान की शुरुआत यहीं से की थी। बंगाल चुनाव से संबंधित अजीबोगरीब कार्रवाई की सूचना द टेलीग्राफ में है। खबर का हाईलाइट किया हुआ हिस्सा है, चुनाव आयोग ने मार्च में सुप्रतिम सरकार को कलकत्ता पुलिस आयुक्त पद से हटा दिया था। बंगाल सरकार ने जल्द ही इन्हें सीआईडी प्रमुख के रूप में बहाल कर दिया गया था। अब इन्हें चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में तमिलनाडु जाने के लिए कहा गया है। यह चुनाव आयोग द्वारा किए गए परिवर्तनों की श्रृंखला में नवीनतम है। सुप्रतिम सरकार बंगाल कैडर के एडीजी रैंक के एकमात्र अधिकारी हैं जिन्हें किसी अन्य राज्य में चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में जाने के लिए कहा गया है। सरकार के करीबी सूत्रों ने बताया कि उन्होंने इस असाइनमेंट से छूट के लिए आवेदन किया था। कल यहां मैंने लिखा था कि राज्य में चुनाव की घोषणा के बाद पूरा प्रशासन चुनाव आयोग के नियंत्रण में रहता है। अब पता चल रहा है कि मालदा की घटना के बाद चुनाव आयोग ने सुरक्षा के नाम पर कुल्हाड़ी चलाई है। खबर का फ्लैग शीर्षक है, मालदा को लेकर ज्ञानेश की नाराजगी के बाद अपराध के आरोपियों की सुरक्षा वापस ले ली जाएगी। आप जानते हैं कि निष्पक्ष चुनाव के लिए लेवल प्लेइंग फील्ड होना चाहिए और इसका मतलब है कि स्थितियां सबके लिए एक जैसी होनी चाहिए। पर बंगाल में टक्कर केंद्र और राज्य का है या अमित शाह बनाम ममता बनर्जी है। ममता बनर्जी के पास राज्य की पुलिस है तो अमित शाह के पास सीमा सुरक्षा बल से लेकर देश के तमाम सुरक्षा बल हैं। मुख्य खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने बंगाल के सभी जिला मजिस्ट्रेट से कहा है कि वे अपराध के मामले में आरोपी और जो उनके रैंक या खतरे के अंदाज़े के हिसाब से ऐसी सुरक्षा के लायक नहीं हैं, उनकी सुरक्षा तुरंत वापस ले लें। जाहिर है कि यह राज्य द्वारा जी गई सुरक्षा के मामले में ही है और केंद्र सरकार की सुरक्षा के साथ-साथ निजी सुरक्षा भी रखी जा सकती है। इससे भी सभी उम्मीदवारों को लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं मिलेगा। अपराधियों के मामले में यह भले सही लगे लेकिन जिनका अपराध साबित नहीं हुआ है उनके साथ तो ज्यादाती होगी जबकि चुनाव आयोग ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने की आजादी देता है और किसी भी तरह के आरोप में दो साल की सजा हो जाए तो सुप्रीम कोर्ट में अपील और उसके नतीजे का इंतजार किए बगैर राहुल गांधी की सदस्यता खत्म की जा चुकी है। ऐसे में उम्मीदवारों के एक छोटे वर्ग के लिए यह आदेश लेवल प्लेइंग फील्ड की जरूरत के खिलाफ है। इसके अलावा, यह दिलचस्प है कि केंद्र सरकार जिसे सुरक्षा देती है या दे सकती है उन्हें सुरक्षा मिल ही जाएगी। राज्य सरकार से सुरक्षा पाने वाले बहुत सारे लोग इससे वंचित रह जाएंगे।
द हिन्दू की खबर के अनुसार मालदा मामले में गिरफ्तार कथित मास्टरमाइंड एक अधिवक्ता है और उत्तर दिनाजपुर जिले का निवासी है। एआईएमआईएम के टिकट पर 2021 का चुनाव लड़ चुका है। ऐसे में मतदाता सूची में नाम को लेकर उसका परेशान होना स्वाभाविक है और अधिवक्ता होने के नाते कानून की जानकारी नहीं होने या गैर कानूनी काम करने की उम्मीद कम है। फिर भी वह आरोपी है इसलिए उसे या उसकी पार्टी के नेता या प्रचारक को चुनावी नुकसान न हो यह सुनिश्चित करना संवैधानिक जरूरत है। पर नाम, धर्म या पार्टी के आधार पर परेशान किया जाना इस व्यवस्था में आम है या कम से कम पहला नहीं हो सकता है। अगर ऐसा कोई आरोपी चुनाव लड़ना चाहता है और इस बार नहीं लड़ पाए या मतदान कर पाए तो उसका मताधिकार सुरक्षित होना बेमतलब है और अगली बार इसके उपयोग के बावजूद जरूरी नहीं है कि स्थितियां ऐसी ही रहेंगी और वह खुद चुनाव जीत सकेगा या किसी को जिता सकेगा। जीवन में कभी-कभी मिलने वाले ऐसे मौका का उपयोग नहीं कर पाना – क्या कहा जाएगा? इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड का शीर्षक है, मालदा में बंधक बनाने की घटना की जांच के लिए एनआईए की टीम बंगाल पहुंची। टाइम्स ऑफ इंडिया के अधपन्ने की लीड भी बंगाल चुनाव ही है और शीर्षक वही है जो देशबन्धु का है,चुनाव आयोग ने कहा – नतीजों के बाद भी केंद्रीय सुरक्षा बलों की 500 कंपनियां बंगाल में रहेंगी। मुझे लगता है कि यह चुनाव में गड़बड़ी और उसके विरोध को स्वीकारना है और विरोध को रोकने या दबाने की तैयारी भी है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर सबसे अलग है। शीर्षक के अनुसार, घेराव से कई दिन पहले न्यायिक अधिकारियों ने मालदा के डीएम को लिखा था और सुरक्षा को लेकर चिन्ता जताई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा है तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल नहीं होना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी कहीं और दिख रही है। जो भी हो, मेरा आकलन खबरों के आधार पर है और संभव है सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई या आदेश उसे मिली और दी गई सूचनाओं पर आधारित हो। लेकिन ऐसा है तो अखबारों की खबरों पर गौर किए जाने की जरूरत है। इसकी खासियत है कि आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा की खबर आज दूसरे दिन भी कई अखबारों में प्रमुखता से है जबकि यह आम आदमी पार्टी का आंतरिक मामला है लेकिन नामुमकिन को मुमकिन करने के लिए बांटो और राज करो से परहेज नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



