सबसे ज़्यादा ध्रुवीकृत राज्य : बड़े पैमाने पर तबादले के बावजूद बंगाल में नागरिक और पुलिस प्रशासन अगर ‘पूरी तरह विफल’ है तो चुनाव की निष्पक्षता निश्चित रूप से संदिग्ध हो जाती है। दुनिया देख रही है कि सुभेन्दु अधिकारी को केंद्रीय गृहमंत्री चुनाव लड़वा रहे हैं। यही नहीं, राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात हैं। पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए, 2.4 लाख (2400+ कंपनियां) तैनात करने की योजना बनाई है। चुनाव में हिंसा रोकने और मतदाताओं का विश्वास बढ़ाने के लिए स्थानीय पुलिस की भूमिका सीमित रखते हुए सीएपीएफ को प्रमुख जिम्मेदारी दी गई है। स्वतंत्र और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए पहले ही 480 से अधिक कंपनियां, जिसमें सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी शामिल हैं, रूट मार्च और क्षेत्र में गश्त कर रही हैं।

संजय कुमार सिंह
पश्चिम बंगाल के मालदा में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से नाराज मतदाताओं के एक बड़े समूह ने बुधवार को सात अधिकारियों को बंधक बना लिया। इनमें तीन महिलाएं थीं। जाहिर है यह बड़ी खबर है लेकिन कल मेरे किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं थी। कल इस बारे में मैंने यहाँ लिखा था कि एसआईआर के दौरान बड़े पैमाने नाम हटाए जाने के खिलाफ विरोध करने के लिए ग्रामीणों ने सात अधिकारियों का घेराव किया था। इनमें तीन महिलाएं थीं। इन्हें छुड़ाने गए सुरक्षा बलों की गाड़ी से एक व्यक्ति के घायल होने की खबर द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर थी लेकिन एसआईआर के तहत नाम हटाए जाने के खिलाफ अफसरों के घेराव की खबर पहले पन्ने पर नहीं थी। आज यह खबर कई अखबारों में है। डिजिटल इंडिया में एक दिन पुरानी खबर इस तरह पहले पन्ने पर होना चौंकाता है लेकिन नामुमकिन मुमकिन है। आपको याद होगा, हाल में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आपत्तियों पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने पूछा था कि जब 12 अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है, तो केवल बंगाल को इससे दिक्कत क्यों है। बंगाल की दिक्कत आज अखबारों में है, एक दिन पुरानी घटना को लेकर। लेकिन खबरें ऐसे छपी हैं जैसे इससे सुप्रीम कोर्ट को दिक्कत है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “मालदा में न्यायिक अफसरों को बंधक बनाना बंगाल सरकार की निष्क्रियता : सुप्रीम कोर्ट” अदालत ने कहा, यह न्यायिक अधिकारियों को धमकाने का बेशर्म प्रयास, सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को चुनौती देने जैसा। तथ्य यह है कि कल सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के सार्वजनिक होने के बाद सोशल मीडिया पर मेरे जैसे तृणमूल समर्थकों ने कहा और कहना चाहा कि महामहिम, न्यायमूर्ति महोदय, राज्य की सरकार तो चुनाव मोड में चुनाव आयोग के पास है। इसलिए, डिजिटल इंडिया में देशबन्धु ने आज छह कॉलम की लीड बनाया है। आप समझ सकते हैं कि एक अखबार में जो विरोध एक दिन पुराना होने पर भी लीड है उसपर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया को अमर उजाला और दूसरे अखबारों ने लीड बनाया है तो कहीं कुछ असामान्य है।
देशबन्धु ने भीड़ की कार्रवाई को लीड बनाया है और लिखा है, सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाया। मतदाता सूची में नाम न आने पर बवाल। नवोदय टाइम्स ने इसे टॉप पर पांच कॉलम में छापा है। शीर्षक है, बंगाल में 7 चुनाव पर्यवेक्षकों को 9 घंटे बंधक बनाया, सुप्रीम कोर्ट सख्त। उपशीर्षक है, खाना-पानी तक नहीं दिया, सीजेआई के नेतृत्व वाली पीठ ने इसे सोची समझी और भड़काऊ घटना बताया। दिलचस्प है कि सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव और डीजीपी को कारण बताओ नोटिस दिया है जबकि पुलिस ने 17 लोगों को गिरफ्तार किया है और कहा है कि ये लोग घटना में शामिल थे। हमारे पास पुख्ता सबूत है इनसे पूछताछ की जाएगी। वैसे तो यह सामान्य पुलिसिया कार्यव्यवहार और अंदाज है। इसलिए, मुख्य सचिव तथा डीजीपी से पूछताछ का कोई मतलब नहीं है। लेकिन यह कार्रवाई तो सुप्रीम कोर्ट ने की है जो कभी-कभी होती है। दि एशियन एज ने इस मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पक्ष को लीड बनाया है। शीर्षक है, मालदा में जजों के घेराव के लिए ममता ने चुनाव आयोग, ओवैसी की आलोचना की और इसे वोट बांटने के लिए भाजपा की साजिश कहा। द टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ, चुनाव आयोग ने मालदा की जांच एनआईए को दी। आप जानते हैं कि बंगाल के मामलों की जांच एनआईए और सीबीआई को दी जाती रही है। दिलचस्प यह है कि इस बार जब सारा प्रशासन चुनाव आयोग के तहत है तब भी जांच एनआईए से कराई जाएगी। टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर लीड है। इसका शीर्षक है, ‘कानून-व्यवस्था ध्वस्त’: सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में घेराव की कड़ी आलोचना की। इस शीर्षक के साथ प्रमुखता से छपा है, राज्य की सरकारी व्यवस्था अब चुनाव आयोग के नियंत्रण में है : ममता। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के मद्देनजर यह सबसे खास बात है और इसे हाइलाइट किया जाना जरूरी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की आलोचना की।
आप जानते हैं कि सरकार खासकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने घुसपैठियों का मुद्दा बनाया और चुनाव आयोग ने एसआईआर की कार्रवाई शुरू की। इससे संबंधित तमाम शिकायतों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इसे होने दिया और बाद में जब पता चला कि कथित लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के कारण लाखों मतदाता बाहर हो गए हैं और तय समय के अंदर उनके दावों को सुनने के लिए पश्चिम बंगाल में समकक्ष और सक्षम अधिकारियों की कमी है तो सुप्रीम कोर्ट ने यह काम न्यायिक अधिकारियों से कराने का आदेश दिया और जब पता चला कि राज्य में न्यायिक अधिकारियों की भी कमी है तो पड़ोसी राज्यों के न्यायिक अधिकारियों की भी सेवा लेने का आदेश दिया गया। इसके बावजूद मतदाता सूची समय पर तैयार नहीं हुई, कल इस बारे में खबर थी और उम्मीद है कि है समय पर तैयार हो जाएगी। लेकिन न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाना, नौ घंटे तक घेरे रह पाना गंभीर है और निश्चित रूप से खबर है इसीलिए लीड बनी है। एक दिन बाद भी। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट की राय भी महत्वपूर्ण है। लेकिन मूल खबर के बिना उसका क्या मतलब? वैसे भी, खबर में यह बताया जाना चाहिए कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाले अध्याय से भारत के मुख्य न्यायाधीश परेशान हो गए। जो आदेश दिया है उससे परेशानी भी झलकती है। पूर्व जज जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने 2018 में मौजूदा मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच होने तक हिमाचल प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी।

बंगाल में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था का सच यह भी है
द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक अप्रैल को दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि वह भ्रष्टाचार या कदाचार की शिकायतों से जुड़ी जजों की खास जानकारी अपने पास नहीं रखता है। यह बात सुप्रीम कोर्ट के जन सूचना अधिकारी की ओर से पेश वकील रुक्मिणी बोबडे ने जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव के सामने कही। उन्होंने आरटीआई अर्जी को “एक तरह की छानबीन और बेमतलब की पूछताछ” बताया। उन्होंने कहा कि रजिस्ट्री ऐसी जानकारी इकट्ठा करने में अपने संसाधन नहीं लगा सकती। दूसरी ओर, एक जज के भ्रष्टाचार से संबंधित मामले में 63 विपक्षी सांसदों के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को अचानक इस्तीफा देना पड़ा था। नौकरी गई सो तो गई ही इसमें भी नियमों की अनदेखी, ईडी का डर और आरटीआई से दो तरह के खुलासों का मामला है। ऐसे समय में जनता का रोष महत्वपूर्ण है या भारत के मुख्य न्यायाधीश की नाराजगी या टिप्पणी इसे तय करना एक मुश्किल संपादकीय कार्य है। यह सामान्य नियमों से तय नहीं हो सकता है। इसीलिए परस्पर विरोधी निर्णय दिख सकते हैं। हालांकि द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, “बंगाल में न्यायिक अधिकारियों का घेराव सुप्रीम कोर्ट को एक चुनौती है : सीजेआई”। इसमें दोनों बातें हैं। उपशीर्षक के अनुसार, उनका कहना है कि मालदा में हुई हिंसा कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ने और न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने की एक ‘सोची-समझी, सुनियोजित और जान-बूझकर की गई’ कोशिश थी; अदालत ने इसे नागरिक और पुलिस प्रशासन की ‘पूरी तरह विफलता’ बताया है। इसमें दिलचस्प यह है कि चुनाव की घोषणा के बाद पूरा प्रशासन चुनाव आयोग के तहत होता है और बंगाल में तो चुनाव आयोग ने धुंधाधार तबादले किए हैं। मैंने कल इसपर भी लिखा था। इसके बावजूद अगर बंगाल में नागरिक और पुलिस प्रशासन पूरी तरह विफल है तो चुनाव की निष्पक्षता निश्चित रूप से संदिग्ध हो जाती है। पर यह अलग मुद्दा है।
जहां तक पश्चिम बंगाल में चुनाव और इसके लिए समय पर मतदाता सूची तैयार होने की बात है, इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, (इसके लिए बनाये गए) 19 ट्रिब्यूनल को गुरुवार से काम शुरू करना था पर शुरू नहीं हो पाया और राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी, मनोज अग्रवाल ने कहा कि वे इस बारे में कुछ नहीं बता सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस की संवाददाता स्वीटी कुमारी ने मौके पर पहुंचे यासिल मोल्ला से बात की। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल के काम शुरू करने के दिन उन्हें इस जगह पर आना पड़ा क्योंकि उनकी सास का नाम हटा दिया गया है। वे सोनारपुर से जोका इंस्टीट्यूट आए थे जो यहाँ से 18 किलोमीटर दूर है। कागज़ातों का एक फ़ोल्डर हाथ में थामे हुए उन्होंने समझाया, ट्रिब्यूनल में ऑनलाइन आवेदन तो कर सकते हैं। लेकिन,”मैं ऑनलाइन प्रक्रिया को समझ नहीं पा रहा हूँ, इसलिए मैं यह पता लगाने यहाँ आया हूँ कि ट्रिब्यूनल कब से काम शुरू करेगा।” आप समझ सकते हैं कि नाम हटाना और उसे फिर ठीक करवाना आम आदमी के लिए कितना मुश्किल है और पहले ऐसा कभी नहीं होता था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मतदाता बनना इतना मुश्किल हो जाए तो बहुत सारे लोग मतदाता बन ही नहीं पाएंगे। भारतीय जनता पार्टी लोगों को मतदाता बनने में सहायता करती रही है और इस कारण उसे अनुमान होता है कि कौन उसके वोटर हैं और कौन नहीं। इसके अलावा, उसके पास कार्यकर्ताओं का अच्छा नेटवर्क है जो बूथ और पन्ना प्रमुख तक के काम करते हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


