आज खुशी का दिन है। यह खुशी कई गुना बढ़ा दी मित्रों, शुभचिंतकों और पाठकों के दिल में उतरते संदेशों ने। आज भड़ास 17 वर्ष का पूरा हुआ। अगले साल वोट डालने काबिल हो जाएगा। हाहाहा। लिखने, कहने, पढ़ने, पढ़ाने की इसी आजादी का नाम है भड़ास। और भड़ास के सीईओ/संपादक यशवंत सिंह जैसे इंसान तो भाई विरले ही मिलते हैं। भड़ास के हैप्पी बड्डे पर हजारों की तादाद में बधाई और शुभकामनाएं देने के लिए आप सभी का पुन: दिल से आभार।
नीचे कुछ टिप्पणियों को संजोया गया है- आप भी पढ़ें, पढ़ाएं… और भड़ास की आंदोलनकारी खुशी में शामिल हों…. जैजै
गोलेश स्वामी-
भड़ास मतलब पीड़ित पत्रकारों की उम्मीद। भड़ास मतलब न्याय के लिए युद्ध। भड़ास मतलब कमजोर के साथ पहलवान। भड़ास मतलब देश के मीडिया संस्थानों के कार्मिकों का हमदर्द। भड़ास मतलब हर अन्याय के विरूद्ध न्याय का बिगुल।
भड़ास मतलब ईमानदार और उत्कृष्ट पत्रकारों का विश्वास। भड़ास मतलब मीडिया संस्थानों के दुष्ट मालिकों, प्रबंधन और संपादकों की हेकड़ी निकालने वाला। भड़ास मतलब हर पीड़ित की पुकार।
भड़ास मतलब यशवंत सिंह का संवेदनहीन और संवेदनशील दोनों स्वरूप यानी दुष्टों के लिए कोई संवेदना नहीं और पीड़ितों से बेपनाह मोहब्बत।
भड़ास मतलब जो दिल में है वो बाहर। यानी “नो ड्यूल करैक्टर “। भड़ास मतलब मित्रों के मित्र और समय पर दुश्मन का भी उद्धार। भड़ास मतलब और भी बहुत कुछ। लिखते-लिखते थक जाऊंगा। लेकिन भड़ास की सारी खूबियां अपनी लेखनी से न उतार पाऊंगा।
यह स्थिति तब है जब भड़ास अभी टीनेजर है यानी मात्र 17 बसंत देखे हैं। लेकिन धाक इसकी किसी बड़े से बड़े वयस्क मीडिया संस्थान से कम नहीं।
भड़ास को, यशवंत भाई, मनीष भाई, भड़ास के सभी संस्थापक सहयोगियों और पूरी भड़ास टीम को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं। ढेर सारे प्यार के साथ।
अजीत सिंह-
आज छोटे-छोटे कस्बों तक में हिंदी के पत्रकार अपने पोर्टल चला रहे हैं। इसके पीछे भड़ास बड़ी प्रेरणा है। इसने पत्रकारों को अपना मन का काम करने का रास्ता दिखाया और हिम्मत भी दी। भड़ास पर मीडिया की खबर लेते रहना चाहिए। संभव हो तो फैक्ट चेकिंग भी की जाए।
इन 17 वर्षों में जो सीखा, उसे Paid वर्कशॉप के जरिए साझा कर सकते हैं। बहुत शुभकामनाएं!
अशोक थपलियाल-
बहुत बहुत बधाई डियर यशवंत जी। आज 67+ में भी भड़ास खूब पढ़ता हूँ। वर्ष 2008 से 2010 के बीच (शायद आपको ठीक याद हो) की घटना अविस्मरणीय है। भड़ास में दैनिक भास्कर के दिल्ली स्थित किसी सीनियर बंदे (संपादकीय नहीं) का निजी कारनामा प्रकाशित हुआ था।
संपादकीय के लोग ऑफिस में कंप्यूटर पर चुपके-चुपके भड़ास खूब पढ़ते थे। एक दिन (स्व.) महान एडिटर ने पुष्टि के लिए हॉल में घूम-घूम कर देखा क्योंकि कॉर्पोरेट आफिस से भड़ास बंद करने का फरमान जारी हो चुका था। गनीमत रही कि उस दिन उस समय कंप्यूटरों पर अखबारी काम ही हो रहा था।
श्रीश सिन्हा-
विगत से आगत के बीच की सफल यात्रा के लिए शुभकामनाएं, बधाई। आप तो कुछ करके घृणा प्रेम के पात्र हैँ, यहाँ तो बस नाम या उपस्थिति (प्रत्यक्ष/परोक्ष) से ही प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो जाता है।
अनवरत, निर्बाध जारी रहे यात्रा…..
ध्यानेंद्र त्रिपाठी-
बधाइयां मित्र… स्मृतियों में अब भी स्पंदित वो दिन जब आप मोबाइल कंटेट बनाने वाली कंपनी (एमग्लोबल- शायद यही नाम था) में उपाध्यक्ष हुआ करते थे. आपकी दूरदर्शिता का कायल कि आपने उन्हीं दिनों, आगत की तस्वीर को मुकम्मल तौर पर समझने की कोशिश की और समाचारों की दुनिया को इंटरनेट के मंच पर उतारने की परिकल्पना की..
आप फ़कीर हैं वर्ना आप नव इंटरनेट समाचारों की दुनिया के बेताज बादशाह होते.. हालांकि राजा तो हैं ही आप.. पुनश्च ढ़ेरों बधाइयां..
अजीत कुमार पांडेय-
तलवे चाट दौर में भी सत्ता से लगायत नौकरशाही और खबरचियों की खबरें प्रकाशित करने वाला भड़ास आज सतरहशाली हो गया…. पूरी टीम को बधाई!
भड़ास ऐसे ही लोगों की आवाज बुलंद करता रहे।
महिपाल सिंह-
भड़ास के १७ वर्ष पूरे होने पर उन सभी को बधाई जिन्हें यह प्लेटफॉर्म मिला! जिले पर मान्यता प्राप्त पत्रकार या फिर गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार, हिंदी पट्टी के दो बड़े अख़बार या तो उनके खांचे के हिसाब से पत्रकार की श्रेणी लायक नहीं होते या फिर ख़बर में उनके नाम के आगे सिर्फ़ फलां विकलांग, फलां आदीवासी, फलां दलित,अमुक गली का निम्न श्रेणी का इंसान लिखकर इतिश्री कर लेते हैं स्थानीय संवाद सूत्र तथा संवाद न्यूज़ एजेंसी वाले बताते हैं स्थानीय को पत्रकार लिखना पालिसी में ही नहीं है।
जबकि हल्ला बोल के दौरान ऐरा-गैरा सभी को बुला-बुला कर फोटोशूट कर सबको पत्रकार बताया गया था। पत्रकार कहलाने के लिए लखनऊ दिल्ली में रहना तथा जैसे-तैसे सरकारी आवास होना चाहिए, ओनरेरियम का ओनर अब नहीं रहा यानी पिरामिड उल्टा कर दिया। अगर कोई नामचीन पत्रकार जिसे एक दो मंत्री संतरी जानते हों मतलब कम से कम मुख्यमंत्री द्वारा गहरी संवेदना भेजने लायक रहा हो यदि वह स्वर्ग सिधार जाए तो उसे वही स्थानीय ओनरेरियम मेरे देखे वास्तविक पत्रकार संवेदना व्यक्त करने में लहालोट हो जाते हैं जो अन्य दुखों जैसा बड़ा दुखदाई होता है।
कहने का मतलब भड़ास ने उन लोगों को जस-का-तस मानते हुए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराया और उक्त ऐसे ना जाने कितने लोग जो जाने अनजाने में खुद को पत्रकार सिद्ध करने में अपना सबकुछ होम कर चुके उन्हें भी अपनी व्यथा कहने का मौका दिया। देश से सोने की चिड़िया लेकर गोरे भले ही चले गए पर वह जाते-जाते स्ट्रींगर नाम की चिड़िया को यहीं छोड़कर चले गए……शर्म इनको आती नहीं?
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