
मनीष दुबे-
एक दफा एक सीनियर एडिटर ने मुझसे यह बात कही थी- “भड़ास मीडिया में तो कुछ भी छप जाता है!” शायद कोविड के आस-पास। उनकी बात सुनकर तब लगा- यार सीनियर मनई है, कह रहा है तो कुछ सोच समझकर ही कहा होगा। बात आई गई हो गई।
अब जब भड़ास के लिए काम कर रहा हूं तो ख्याल आता है कि उन संपादक महोदय ने सिरे से खारिज करने वाली बात कही थी। भड़ास में यूँ ही कुछ नहीं छपता। एक लाइन भी नहीं।
हां, इतना जरूर कह सकता हूं कि भड़ास में एक आध सप्ताह के अंतराल में दो चार लेख सिफारिशी जरूर चले जाते हैं, लीक से हटकर… लेकिन हम लोग, खासकर बाबा यशवंत कंटेंट, क्वालिटी और मुद्दे से बिल्कुल भी समझौता नहीं करते।
अब तक कितने ही ऐसे मौके आए होंगे जब शासन, सत्ता, मीडिया और मठाधीशों के खिलाफ मुझे हेडिंग को और फायरी (तीखा) करने का आदेश मिलता रहता है। मीडिया के कई दुकानदारों का मैंने भड़ास के नाम पर पिछवाड़ा चटकते देखा है तो कैसे माना जाए कुछ भी छप जाता होगा?
आज की तारीख में भड़ास एकमात्र ऐसा मीडिया है जो पत्रकारों के लिए टॉप क्लास प्लेटफॉर्म है। हाशिए पर खड़े पत्रकारों की बिंदास आवाज यदि कोई है तो वह भड़ास ही है। दूर दराज का कोई भी पत्रकार जिसकी आवाज कोई नहीं सुन रहा होता है तो उसे यकीन होता है यार भड़ास और यशवंत से संपर्क करो। वे पक्का आपको जगह देंगे।
कृपा आते पड़ते, अब तो काफी संख्या में लोग मुझे भी डायरेक्ट संपर्क करने लगे हैं। भड़ास में छपने के लिए। कई जो छद्म वेश में रिरियाते हैं उन्हें हड़का भी दिया करता हूं। जरूरी नहीं हर एक सिरदर्दी यशवंत बाबा को ही दी जाए। मैं कोई झक मराने के लिए थोड़ा न हूं। आखिर जिम्मेदारी है। क्या लगेगा, क्या लगना चाहिए और क्या नहीं…?
आप साइट खोलकर सर्च कर लीजिए, छत्तीसगढ़ का मुकेश चंद्राकर हत्याकांड हो या हरदोई दैनिक जागरण के राघवेंद्र बाजपेई, जौनपुर के आशुतोष श्रीवास्तव अथवा अन्य कोई पत्रकार हो, भड़ास दिल खोलकर कवरेज करता है। शर्त लगा सकता हूं कि भड़ास के जितना कवरेज शायद ही किसी दूसरे मीडिया संस्थान ने दिक्कतमंद पत्रकारों के लिए किया हो।
यही वजह है कि भड़ास के चाहने वालों की लिस्ट बड़ी लंबी है। हम लोगों को खुद भी नहीं पता कि हमारी पहुंच और चाहत कहां और कितनी फैली है। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि हमारे सभी अनगिनत चाहने वाले हमारी अनमोल धरोहर की तरह हैं।
यह तो 100 प्रतिशत सत्य है कि जितना प्यार लोग भड़ास और यशवंत से करते हैं उतना ही यशवंत भी लोगों के सम्मान में पलक पांवड़े बिछाकर हरदम हरवक्त मदद को तैयार रहते हैं। इसके कई उदाहरण हैं लेकिन नाम गिनाने से भड़ास की मदद का भार हल्का हो जाएगा। रहने दीजिए।
टॉपिक ज्यादा लंबा हो रहा है। खींचने को कुछ भी खींच दिया जाए, लेकिन उसका फायदा क्या है। बस यहीं विराम। यह बात बड़े दिनों से मन में अटक रही थी, आज निकाल दी। कि, भड़ास में यूँ ही कुछ नहीं छपता। भड़ासियों का स्टाइल ही अलग है। जिंदाबाद।



हरीश
August 21, 2025 at 12:19 am
दशा और दिशा दौनो ख़राब है थराली उत्तराखंड की दर्दनाक घटना को सुनकर