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आज के अखबार : अंकिता भंडारी हत्याकंड में भाजपा नेता के बेटे को उम्र कैद की खबर को लीड नहीं बना पाये

प्रचार की खबरों से अखबारों ने सरकार को चने की झाड़ पर चढ़ा रखा है

संजय कुमार सिंह

अंकिता भंडारी हत्या कांड में भाजपा नेता और पूर्व मंत्री के बेटे को उम्रकैद की सजा हुई है। कोटद्वार के अपर जिला एवं सत्र न्यायालय (एडीजे कोर्ट) ने शुक्रवार, 30 मई 2025 को यह फैसला सुनाया। आज यह खबर मेरे आठ अखबारों में से किसी में भी लीड नहीं है। कोर्ट ने तीनों आरोपियों – वनंत्रा रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य, कर्मचारी सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को हत्या के मामलों में दोषी करार दिया है और उम्रकैद की सजा दी है। रिजॉर्ट की कर्मचारी अंकिता की हत्या कर लाश नहर में फेंक दी गई थी। अंकिता ऋषिकेश के वनंत्रा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट थीं। 18 सितंबर 2022 को लापता हो गई थी। 24 सितंबर को चीला शक्ति नहर से उसका शव बरामद हुआ था। जांच में सामने आया कि अंकिता को रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके दो कर्मचारियों ने विवाद के बाद धक्का देकर नहर में फेंक दिया था, जिससे उसकी मौत हो गई। हत्याकांड के बाद राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा ने पुलकित आर्य के पिता विनोद आर्य को पार्टी से निकाल दिया। वे उत्तराखंड सरकार में मंत्री रह चुके थे और भाजपा ओबीसी मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य तथा उत्तर प्रदेश के सह प्रभारी भी थे। पुलकित के भाई अंकित आर्य उत्तराखंड ओबीसी कल्याण आयोग के उपाध्यक्ष के पद पर थे। उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त था, पर उन्हें भी पद से हटा दिया गया था। जाहिर है, भाजपा ने यह सब इस मामले से पल्ला झाड़ने के लिए किया था। संभवतः इसीलिये सजा हो पाई हो। वरना भाजपा नेताओं को बचा लेने के ढेरों उदाहरण हैं और वाशिंग मशीन पार्टी यूं ही नहीं कहा जाता है। पर अदालत ने सजा दी है तो खबर छापने में संकोच उल्लेखनीय है। अगर किसी मामले में अदालत के आदेश की खबर को प्रमुखता से छापा गया है तब भी लीड कांग्रेस और भाजपा का प्रचार ही है।

उदाहरण के लिए, अमर उजाला की लीड कानपुर में प्रधानमंत्री के भाषण की है और शीर्षक है, दुश्मन कहीं भी हो, हौंक देंगे : मोदी। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, एक ही पाली में होगी नीट। यह सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है और खबर का उपशीर्षक है, उच्चतम न्यायालय ने पीजी-2025 परीक्षा के लिए निर्देश दिये हैं। देशबंधु अखबार ने अपने नई दिल्ली संस्करण में इस खबर को लीड बनाया है। शीर्षक में भी भाजपा नेता लिखा गया है और हत्याकांड के बाद पार्टी से निकाल दिये जाने के कारण पूर्व भाजपा नेता लिखकर पार्टी को बचाने का काम नहीं किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि केंद्र सरकार अभी भी चुनावी मोड में है और पुलवामा के बाद युद्धविराम की घोषणा करके भी कह रही है कि ऑपरेशन सिन्दूर अभी खत्म या पूरा नहीं हुआ है। द एशियन एज की आज की लीड का शीर्षक है, “ऑपरेशन सिन्दूर ने पाकिस्तान को युद्ध रोकने की अपील करने के लिए मजबूर किया, यह अभी तक समाप्त नहीं हुआ है : प्रधानमंत्री”। नवोदय टाइम्स की टॉप बॉक्स खबर का शीर्षक है, पिछली सरकारों ने खाया मेवा, हम कर रहे हैं सेवा : रेखा गुप्ता”। यहां यह उल्लेखनीय है कि दिल्ली की भाजपा सरकार ने सिद्धांत रूप में, घोषित तौर पर मोहल्ला क्लिनिक को बंद कर दिया है। इसकी घोषणा हो चुकी है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, दिल्ली सरकार ने कहा, शहर के सभी बड़े अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत आयेंगे।

भाजपा सरकार के अपने तर्क हैं। खबरों के अनुसार दिल्ली में बीजेपी सरकार ने आम आदमी पार्टी के मोहल्ला क्लिनिकों को “लूट और फ्रॉड” बताते हुए 250 क्लिनिक बंद करने का आदेश दिया है। पूर्व सीएम आतिशी और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने इस फैसले का विरोध किया है। आतिशी ने कहा, “ये बस शुरुआत है, आगे फ्री बिजली, फ्री पानी, महिलाओं की फ्री बस यात्रा सब बंद होगी। दूसरी ओर, दिल्ली की महिलाओं को 2500 रुपये देने का वादा अभी पूरा नहीं हुआ है। दिल्ली सरकार के 100 दिन पूरे होने पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है, “ये कोई एक दिन की योजना नहीं बल्कि हर महिला की जिंदगी बदलने वाला मिशन है। तो थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन कोई छूटेगा नहीं।” वैसे तो यह सब मेरा विषय नहीं है पर तथ्य यह है कि दिल्ली सरकार को जो मिल रहा था (मोहल्ला क्लिनिक) बंद हो गया है और जो मिलना था वह 100 दिन में नहीं मिला है। तथ्य यह है कि मैं दिल्ली के पास गाजियाबाद के वैशाली में रहता हूं और एक आंख थोड़ी लाल हो गई तो डॉक्टर को दिखाने जाना पड़ा। डॉक्टर ने छह सौ रुपये की फीस ली और करीब नौ सौ की दवा लिखी। पांच दिन बाद फिर दिखाना है। मुफ्त राशन पर जीने वाले आयुष्मान योजना में ऐसी बीमारियों का इलाज कैसे करायेंगे या कराते होंगे मैं नहीं जानता – संबंधित खबर कभी नहीं दिखी। आपको दिखी हो तो मुझे कोई शिकायत नहीं है। मेरी चिन्ता यह है कि इस स्थिति में भी अखबार वाले भाजपा और नरेन्द मोदी की सरकार और उनकी कार्यशैली का समर्थन कर रहे हैं।  

आप जानते हैं कि दिल्ली में भाजपा के जीतने के बाद मुख्यमंत्री का नाम तय नहीं हुआ था। तभी यमुना की सफाई शुरू हो गई थी और दिल्ली सरकार को काम नहीं करने देने के ढेरों मामले हैं। उपराज्यपाल आपराधिक मामले में अदालत से राहत मिली हुई है दूसरी ओर विपक्ष के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को महीनों जेल में रखा गया और अब 100 दिन में मुख्य चुनावी वादा पूरा नहीं हो रहा है। नरेन्द्र मोदी ने भष्टाचार खत्म करने का वादा किया था लेकिन सरकार इलेक्टोरल बांड के जरिये सबसे बड़ा वसूली अभियान चला रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने भले उसे रद्द कर दिया पर ना जांच हुई ना किसी को सजा हुई। सजा तो चंडीगढ़ के चुनाव अधिकारी अनिल मसीह को भी नहीं हुई। ना खाउंगा, ना खाने दूंगा के आश्वासन के बाद आप पढ़ चुके हैं कि बहुत मामूली और असंबद्ध लोग बहुत कम पैसे में पाकिस्तान की जासूसी करने के लिए पकड़े गये हैं। इंडियन एक्सप्रेस में आज ही खबर है, एलएंडटी द्वारा अदालत में घसीटे जाने पर एमएमआरडीए ने कहा कि वह मेगा इंफ्रा परियोजना के लिए टेंडर खारिज कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एमएमआरडीए को ऐसा करना पड़ा है और मामला यह है कि लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने एमएमआरडीए के खिलाफ याचिका दायर कर उसे एक परियोजना के लिए बोली लगाने से अयोग्य करार दिया गया था। एलएंडटी ने पारदर्शिता की कमी का हवाला देते हुए तकनीकी बोली अस्वीकार किये जाने को चुनौती दी थी। इस मामले में पहले कहा गया था कि एलएंडटी की अयोग्यता “काल्पनिक आधार” पर नहीं थी और निविदा शर्तों के अनुसार कुछ खुलासे प्रतिबंधित’ थे। पारदर्शिता का मामला इसीलिए उठा और जब यह सब हो रहा है तब जज के घर में लाखों की नकदी मिली उसकी एफआईआर भी नहीं हुई है। यह सिस्टम है।

सुप्रीम कोर्ट की स्वायत्तता और जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली का विरोध करने वाली सरकार और उसके समर्थक न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए इस मामले का उदाहरण देने से नहीं चूकते। पर मुद्दा यह है कि जज लोया की हत्या के मामले में यह तर्क दिया गया था कि अंतिम समय में उनके साथ रहे जजों को मौत की जांच की जरूरत नहीं लगती है इसलिए जांच की जरूरत नहीं है और जांच नहीं हुई। अब इस मामले में संबंधित जज ने कहा कि पैसे उनके नहीं हैं तो नहीं माना जा रहा है। हालांकि मैं मान लेने के पक्ष में भी नहीं हूं पर मुद्दा यह है कि एक जैसे मामले में दो पैमाने क्यों हों? जज लोया की मौत की भी जांच हो और इस बात की भी जांच हो कि दिल्ली में हाईकोर्ट के जज के घर पर पैसे कहां से आये? एक मामले में चुप्पी और दूसरे से सिस्टम को बदनाम करने का काम आम लोग नहीं कर रहे हैं जो कर रहे हैं उनके नाम बताने की जरूरत नहीं है। मैं सिर्फ व्यवस्था का हाल उस मीडिया को बताना चाहता हूं जो आंख मूंद कर सरकार के समर्थन में लगा है। आज ही खबर है कि सीबीआई ने ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय के डिप्टी डायरेक्टर, चिन्तन रघुवंशी को घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इसके बाद से ईडी द्वारा वसूली रैकेट चलाये जाने का मामला चर्चा में है। ईडी पर यह आरोप नया नहीं है और कई मामले हैं। पर कायदे से जांच ही नहीं हुई है। और दिलचस्प यह कि यही ईडी और सीबीआई विपक्षी नेताओं की जांच में लगा दी जाती है। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने एक निर्वाचित मंत्री के खिलाफ ईडी से जांच करवाई है और अब ईडी के अधिकारी ही रिश्वत के आरोप में पकड़े जा रहे हैं। सत्तारूढ़ दल पर वाशिंग मशीन पार्टी होने का आरोप है और पूर्व सेबी प्रमुख को बचाने की कोशिशों और फिर लोकपाल की क्लिन चिट और लोकपाल की अपनी कहानी बताती है कि सब ठीक नहीं चल रहा है। इसका पता आज ही की एक दूसरी खबर से चलता है और दोनों नवोदय टाइम्स में है।

सकारात्मक खबरें और शीर्षक

दूसरी खबर के अनुसार, सतर्कता विभाग के अधिकारियों ने उड़ीशा में एक सरकारी इंजीनियर के पास से दो करोड़ रुपये नकद बरामद हुए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि उड़ीशा या भुवनेश्वर में भाजपा की सरकार है। आम आदमी के लिए नियम है कि 50,000 रुपये से ज्यादा नकद निकालने वाले को पैनकार्ड नंबर देना होता है। बैंकों को और सरकार को इसकी जानकारी होती है। 50 हजार रुपये या कम के हिसाब से दो करोड़ नकद चार सौ बार में एक या भिन्न बैंकों से निकाले जा सकते हैं। दूसरी ओर एक बार में अगर निकाले जायें तो आज के समय में बेहद असामान्य लेन-देन माना जायेगा और ऐसे लेन-देन पर नजर होने के बावजूद अफसर के पास नकद बरामद होना बहुत कुछ कहता है पर सरकार ऐसे ही चल रही है। ये दोनों खबरें ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं हैं। जो खबरें हैं वो सरकार का प्रचार करने वाली। अमर उजाला का सेकेंड लीड का शीर्षक है, कृषि व निर्माण क्षेत्र की मजबूती से चौथी तिमाही में 7.4 प्रतिशत बढ़ी जीडीपी। दो उपशीर्षक दो बुलेट प्वाइंट से हैं। इनमें पहला है, चार तिमाहियों में सबसे तेज रही जनवरी-मार्च में आर्थिकी की रफ्तार और दूसरा बुलेट प्वाइंट है चीन समेत दुनिया भर की बड़ी अर्थव्यस्थाओं के मुकाबले सबसे तेज। इस खबर के साथ हाईलाइट करके बताया गया है कि जीडीपी का आकार 51.35 लाख करोड़ रुपये है। यहां तक तो ठीक है पर तथ्य यह है कि देश में बेरोजगारी अधिकतम है। बहुत सारे लोगों के पास काम नहीं है और यह सब नोटबंदी से ही शुरू हो गया था। शेल कंपनियों को बंद कराने, विदेशी चंदा और दान लेने के नियम सख्त बनाने और जीएसटी के नियमों के कारण कई छोटे व्यवसाय बंद हो गये हैं।

अर्थव्यवस्था को नोटबंदी और जीएसटी की झटका लगभग एक साथ लगा था पर उससे बंद हुए काम-धंधों को फिर से चालू कराने की कोई योजना नहीं सुनाई पड़ी। एमएसएमई और मेड इन इंडिया का प्रचार ज्यादा है और काम कम हो रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इसके बारे में लिखते रहते हैं लेकिन जनता की जरूरतें सुनने का रिवाज इस सरकार में है ही नहीं। दूसरी ओर आज कई अखबारों की लीड वही है जो अमर उजाला की है। लेकिन शीर्षक का अंतर गौर करने लायक है। इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में ही बताया है, वित्त वर्ष 25 का विकास चार साल में सबसे कम है। उपशीर्षक है, एनएसओ डाटा के अनुसार निर्माण में विकास तीन तिमाही में सबसे ज्यादा है जबकि खपत जैसा था वैसा ही है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, जनवरी-मार्च (की तिमाही) में 7.4 प्रतिशत जीडीपी विकास ने वित्त वर्ष 25 के आंकड़े को 6.5 प्रतिशत पर पहुंचाया। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, भविष्यवाणियों को पीछे छोड़कर वित्त वर्ष 25 में भारत की अर्थव्यवस्था 6.5 प्रतिशत बढ़ी। द हिन्दू का शीर्षक है, 2024-25 में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर महामारी के बाद से सबसे कम है। उपशीर्षक है, भले ही चौथी तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.4 प्रतिशत रही जो 2024-25 में सबसे तेज तिमाही वृद्धि है पर यह पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही के 8.4 प्रतिशत के मुकाबले कम ही है।  

भाजपा और फेक न्यूज

द टेलीग्राफ की आज की लीड सबसे अलग है। यह खबर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खास अणुब्रत मंडल के खिलाफ बीरभूम पुलिस द्वारा एफआईआर लिखे जाने से संबंधित है। यह एफआईआर अणुब्रत द्वारा एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को फोन पर गालियां देने और धमकी देने से संबंधित है। आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में तृणणूल कार्यकर्ताओं की मनमानी की शिकायतें आती रहती हैं। और नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा का आरोप रहा है कि राज्य पुलिस तृणमूल के लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है। कोलकाता के आरजी कार अस्पताल के मामले में भी ऐसा ही आरोप लगा था और सीबीआई जांच करवाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। तथ्य यह है कि सीबीआई ने महीनों की जांच के बाद जो पता लगाया वह कोलकाता पुलिस की शुरुआती जांच से अलग भी नहीं था। यह तो हुई बंगाल की बात जिसे कोसना भाजपा के लिए आम बात है। पुलिस पर तृणमूल नेताओं के खिलाफ कार्रवाई न करने का आरोप भी लगता है लेकिन आज एफआईआर लिखने की खबर तो है ही, टेलीग्राफ की लीड भी है। इस तरह, आम अखबारों ने पश्चिम बंगाल की इस खबर को महत्व नहीं दिया है तो टेलीग्राफ ने ही दिया है। वह भी तब जब डबल इंजन वाले भाजपा शासित राज्यों में भाजपा नेताओं को बचाने के ढेरों मामले हैं। अदालतों ने स्वतः संज्ञान नहीं के बराबर लिया है और मध्य प्रदेश के एक भाजपा नेता के मामले में हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, सख्त आदेश दिये तो भी राज्य की पुलिस ने न सिर्फ कार्रवाई नहीं की, बचाने की कोशिश की जिसके लिये फिर अदालत से डांट पड़ी और अब भले सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के आदेश दिये हैं, पुलिस ने कार्रवाई नहीं ही की। पश्चिम बंगाल का यह मामला न सिर्फ राज्य सरकार पर आरोप लगाये जाने के कारण रेखांकित करने लायक है बल्कि राज्य के अखबार ने उसकी खबर भी छापी है जो संयुक्त उत्तर प्रदेश के अमर उजाला ने आज अंकिता भंडारी को अदालत से सजा होने के बाद भी नहीं किया है।

ऐसा नहीं है कि वह खबर पत्रकारिता के किसी नियम के कारण दिल्ली में लीड लगाने लायक नहीं थी। ऐसा होता तो देशबन्धु में लीड नहीं होती।  इन सब खबरों से अलग, भारतीय जनता पार्टी ने कल दैनिक भास्कर की एक खबर को फेक न्यूज करार दिया और ममता बनर्जी पर आरोप लगाया कि इस फेक न्यूज के आधार पर उन्होंने प्रधानमंत्री की प्रिय अभियान ऑपरेशन सिन्दूर के खिलाफ कथित रूप से ट्रोल की तरह व्यवहार किया। कायदे से आज इस खबर की चर्चा जरूर होनी चाहिये थी। एक अच्छी-भली खबर को (भाजपा के एक अनाम वरिष्ठ नेता के हवाले से है) कई घंटे बाद फेक न्यूज करार दिये जाने के कारण या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा उसके आधार पर कथित रूप से ट्रोल का आचरण करने के कारण या ममता बनर्जी के आचरण पर भाजपा की प्रतिक्रिया के कारण। पर आज यह खबर मेरे सातो अखबारों में से किसी में भी पहले पन्ने पर वैसे नहीं है जैसी खबर है या जैसे होनी चाहिये थी। दैनिक भास्कर की खबर में कार्यक्रम, योजना, पच्चे बांटने की तैयारी, जन प्रतिनिधियों के पैदल चलने की जानकारी इतनी सारी बातें हैं कि वो गलत नहीं हो सकती हैं और थीं तो उसी दिन उसका खंडन होना चाहिये था जैसे भाजपा दूसरे मामलों में करती रही है। अब इसका खंडन ममता बनर्जी के सवाल उठाने के भी कई घंटे बाद किया गया है। जब कर ही दिया गया तो आज खबर भी होनी चाहिये थी जो मेरे अखबारों में ठीक से नहीं है। कारण चाहे जो हो, पत्रकारिता या उसके नियम तो नहीं हो सकते हैं।

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