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भारत के मीडिया मालिक कब जागेंगे?

रंगनाथ सिंह-

वाशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस ने स्वीकार किया है कि उनके अखबार समेत अन्य सभी मीडिया की विश्वसनीयता गर्त में जा चुकी है। मैंने कुछ समय पहले भी लिखा था कि परम्परागत मीडिया के सामने इस समय एक बड़ा संकट वैचारिक पूर्वाग्रह का है। इसके शिकार वे अखबार ज्यादा होते हैं जिन्हें गम्भीर समझा जाता है।

वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स सम्मानित अखबार रहे हैं मगर एक खास पोलिटकल करेक्टनेस को पालते-पोसते उन्हें पता ही नहीं चला कि वे कब ईकोचैम्बर में तब्दील हो गये। आलोचनात्मक आवाजों को उन्होंने दुराग्रहपूर्ण लेबल लगाकर बाहर कर दिया होगा और जी-हुजूरों की फौज यह देखने में अक्षम हो जाती है कि गम्भीर भावभंगिमा वाला अखबार किस तरह अविश्वसनीय होता जा रहा है।

ज्यादातर मीडिया हाउस का यही हाल है कि वे किसी न किसी राजनीतिक समूह के कीर्तन-मण्डली बन चुके हैं। उनकी खबरें एक सामाजिक समूह के कनफर्मेशन बायस का औजार बन चुकी हैं। अब लोग सूचित होने के बजाय खबरों से अपना मनोरंजन करने लगे हैं।

विडम्बना ये है कि अब मीडिया के छात्रों को भी यह बताना मुश्किल होता है कि समाचार में वैचारिक पूर्वाग्रह क्यों नहीं होना चाहिए। कई पत्रकारिता छात्र भी क्लासरूम में छात्र से ज्यादा गुरु बनकर पहुँचने लगे हैं। आम जनता की तरह बहुत सारे छात्र भी यही समझते हैं कि उनकी पोलिटिकल लाइन को संतुष्ट करने वाले पत्रकार ही सच्चे पत्रकार हैं!

अच्छी बात है कि जेफ बेजोस ने खुलकर कहा है कि वह मीडिया को अललटप्पू पॉड-कास्टर और सोशल मीडिया मीम के नीचे दबने नहीं देंगे। वे विश्वसनीयता बहाल करने का प्रयास करेंगे।

हमारे देश में भी ऐसी पहल की सख्त जरूरत है ताकि यह साफ हो सके पत्रकारिता भी एक हुनर, एक काम है। पॉड-कास्टर की गप्प, सोशल मीडिया दबंगों की लाबिंग और मीमबाजों की चुहल, कभी उसकी जगह नहीं ले सकते।

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1 Comment

1 Comment

  1. मनीष कुमार मिश्रा

    October 30, 2024 at 9:41 pm

    बहुत सुंदर आर्टिकल लिखा है आपने

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