संजय कुमार सिंह
आज मेरे सभी अखबारों की लीड ईरान की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, भारत ने भारतीयों से कहा किसी भी तरह ईरान छोड़ दें। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार – भारत ने भारतीयों से कहा है कि वे ईरान छोड़ दें, प्रदर्शन स्थलों से दूर रहें। द हिन्दू की खबर के अनुसार, ट्रम्प की धमकी के बीच ईरान ने फांसी देने और मुकदमे जारी रखने के संकेत दिए हैं। इस्लामिक रिपब्लिक के न्यायपालिका प्रमुख ने कहा, ‘अगर हमें कुछ करना है, तो यह सब जल्दी करना होगा’। दूसरी ओर, अमेरिका स्थित एक मानवाधिकार समूह ने कहा है कि सरकार विरोधी प्रदर्शनों के खिलाफ कार्रवाई में अभी ही 2,571 लोग मारे जा चुके हैं। अमर उजाला के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को फांसी दी जा सकती है। 18,000 से अधिक हिरासत में लिए गए हैं। निश्चित रूप से ईरान की, वहां भारतीयों की हालत खराब है और सरकारें जो कर सकती हैं कर रही हैं। ऐसे में देसी खबरें दब गई हैं और मैं देसी खबरों की ही बात करना चाहता हूं। आज उनकी जो अब पहले पन्ने पर नहीं होती हैं। ऐसी एक खबर भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को लोकपाल से क्लीनचिट मिलने की है। दिलचस्प यह भी कि अब शिकायतकर्ता पर ही कार्रवाई का अंदेशा है। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार दूर करने का वादा करके सत्ता में आए थे और भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले पर कार्रवाई की स्थितियां बन गई हैं।
वह भी तब जब उनके प्यारे ईडी ने कमाल कर रखा है। चुनाव के समय चुनावी राज्यों में गजब की सक्रियता दिखाता रहता है। सफलता की दर दो प्रतिशत भी नहीं है। पश्चिम बंगाल में ईडी का एक गंभीर मामला चल रहा है। आज उसकी खबर भी ईरान संकट के कारण दब गई है। जो छपी है उसमें भी कई वह भी सरकार के प्रचार के रूप में। इससे पहले एक खबर थी कि दिल्ली हाईकोर्ट के अनुसार पीएम केयर्स फंड सरकारी और कानूनी संस्था है लेकिन आरटीआई अधिनियम के तहत उसे प्राइवेसी का अधिकार है। प्रधानमंत्री की डिग्री का मामला और आरटीआई के आदेश, उसे अदालत में चुनौती का हाल हम जानते हैं। इन फैसलों के बाद मुझे याद आया कि इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी और संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप था। उन दिनों सोशल मीडिया नहीं था। अखबारों में ही खबरें छपी होंगी पर अदालत में जो सबूत पेश किए गए उन्हें अदालत ने माना। नहीं मानती तो जनता को पता चलने का साधन अब जैसा तो नहीं ही था। इसलिए, अब कानून की व्याख्या ही विचित्र होती है। भ्रष्टाचार पर विखंडित फैसले की खबर कल ही थी। जमानत पर अलग-अलग तर्क और व्याख्या हम सुन चुके हैं। प्रक्रिया ही जब सजा है तब ऐसा कानून बनाने की भी कोशिश हुई कि निर्वाचित जनप्रतनिधि भी एक महीने जेल में रहे (जमानत नहीं मिले) तो पद चला जाए। दूसरी ओर, नागरिकों के निजी जीवन में झांकने की कोशिशों के तमाम उदाहरण हैं, सुरक्षा कोई नहीं और उन्हें फंसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी नहीं है। जाहिर है देश एक नए या अलग मार्ग पर जा रहा है। सही है या गलत जनता को तय करना है लेकिन चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हों यह भी सुनिश्चित नहीं है। चिन्ता भी नहीं है।
देशबन्धु के अनुसार, आम आदमी पार्टी के नेता ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में एसआईआर के बाद साढ़े चार करोड़ मतदाता गायब हो गए हैं। उन्होंने इसे सीधे-सीधे लोकतंत्र पर हमला कहा है। मुझे याद नहीं है कि इंदिरा गांधी पर इतने गंभीर और ऐसे स्पष्ट आरोप थे फिर भी प्रधानमंत्री के खिलाफ कोर्ट का आदेश आया। अब शपथपूर्वक दी गई जानकारी को अपुष्ट कहा जा रहा है और अदालतों में जो हो रहा है उसके आज कई उदाहरण हैं। दिलचस्प यह है कि अब मुख्य न्यायाधीश पर भी भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं, गृहमंत्री पूर्व तड़ी पार रहे हैं, जजों के तबादले होते रहे हैं, यशवंत वर्मा मामले में उन्हें फंसाए जाने के लक्षण हैं, एक जज को बचा लिए जाने का उदाहरण है तथा जजों को चुनाव लड़ने के टिकट मिले हैं, संघ परिवार से अपने संबंध बताए हैं। जो शुरुआत याद है वह जज की मौत की जांच नहीं होने देने और सीबीआई प्रमुख को आधी रात की कार्रवाई में बदल दिए जाने की है। तब बचाए गए अधिकारी दिल्ली पुलिस के प्रमुख होकर रिटायर हुए।
निशिकांत दुबे के मामले में फैसला ही नहीं, खबर भी दिलचस्प है। शिकायतकर्ता ने 2009 से 2024 तक दुबे के चुनावी हलफनामे के आधार पर उनकी पत्नी की संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोतरी का मामला उठाया था। लोकपाल ने पाया कि दुबे के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के संबंध में कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं, सिर्फ उनकी अपनी होल्डिंग्स में मामूली बदलाव हुआ है। लोकपाल के आदेश में पब्लिक डोमेन में उपलब्ध ‘अपुष्ट’ दावों के आधार पर शिकायत दर्ज करने के लिए अमिताभ ठाकुर की आलोचना करते हुए कहा गया है कि यह साफ तौर पर राजनीतिक या निजी दुश्मनी की वजह से किया गया और सोशल मीडिया पर शिकायत सार्वजनिक करके गोपनीयता भंग की गई। यही नहीं, जस्टिस ए एम खानविलकर की अगुवाई वाली लोकपाल की बेंच ने निशिकांत दुबे के खिलाफ शिकायतों को devoid of merit, ओछा और कष्टकर बताते हुए कहा कि यह खुद सांसद के बजाए उनकी पत्नी को टारगेट करने के लिए लगाए गए हैं, जबकि लोक सेवक होने के नाते सांसद लोकपाल के क्षेत्राधिकार में आते हैं। नवभारत टाइम्स की खबर में यह नहीं लिखा है कि पत्नी नहीं आती हैं और यह कहा भी नहीं गया होगा पर मुद्दा यह है कि अगर पत्नी की आय मायने नहीं रखती है तो शपथपत्र क्यों लिया जाता है। अगर यह व्यर्थ है तो ‘भ्रष्ट’ कांग्रेस के शासन में किया गया था और अब शपथपूर्वक दी गई सूचना को ‘अपुष्ट’ माना जा रहा है। प्रधानमंत्री की डिग्री से संबंधित शपथपत्र की पुष्टि की जरूरत नहीं समझी गई। इसके बावजूद नवभारत टाइम्स का शीर्षक है, निशिकांत दुबे की लोकपाल में जीत, अधिक संपत्ति के आरोप खारिज, बुरा फंसेगा शिकायतकर्ता। खबर के अनुसार, लोकपाल ने एक्टिविस्ट अमिताभ ठाकुर के आरोपों को ठुकराते हुए झारखंड के गोड्डा से एमपी को बड़ी राहत दी है और उन्हें शिकायतकर्ता के खिलाफ कार्रवाई के लिए कानूनी विकल्प अपनाने की छूट भी दे दी है। बाद में निशिकांत दुबे ने भी संकेत दिए हैं कि वह शिकायतकर्ता के खिलाफ कानूनी विकल्पों को निश्चित तौर पर आजमाएंगे। यह अघोषित इमरजेंसी और घोषित अमृतकाल की खबर है।
उदाहरण के लिए, ईडी के खिलाफ तृणमूल की याचिका खारिज, अमर उजाला की खबर है। उपशीर्षक है, कोई दस्तावेज जब्त न होने की दलील पर हाईकोर्ट ने अर्जी निरस्त कर दी। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड है, ईडी ने कहा कि टीएमसी के चुनाव सलाहकार से कोई चुनावी दस्तावेज जब्त नहीं किए गए। इसमें यह हाइलाइट किया गया है कि ईडी की अपील पर वीरवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, ईडी ने कहा कि आई-पैक की तलाशी में कुछ भी जब्त नहीं किया, हाईकोर्ट ने टीएमसी की अपील निपटाई। दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, आईपैक मामले में दीदी के हस्तक्षेप पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। मुझे लगता है सभी खबरों के संदेश अलग हैं और जो मामला था (या है) उसपर अभी फैसला नहीं हुआ है। मेरी समझ से मामला यह है कि ईडी ने ऐन चुनाव के मौके पर तृणमूल के चुनावी रणनीतिकार के दफ्तर पर छापा मारा। यह बिल्कुल सही, इसी समय जरूरी और जायज भी हो तो सत्तारूढ़ दल के रणनीतिकार के घर और दफ्तर में चुनाव के समय छापा मारने की जरूरत के मद्देनजर ईडी को यह तो सुनिश्चित करना ही चाहिए था कि सत्तारूढ़ दल इसका राजनीतिक फायदा न उठा पाए। मैं समझता रहा हूं कि पहले इसी कारण चुनाव के समय छापे नहीं पड़ते थे और नकदी बरामद होती थी, वह भी बहुत कम। इसी कारण छापे के दौरान ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया वैसी हो पाई। प्रतिक्रिया में ईडी ने सीबीआई को मामला सौंपने की मांग कर दी, बंगार के अधिकारियों की भी शिकायत की गई जबकि बंगाल के अधिकारियों को पहले ही भरोसे में लिया जाना चाहिए था। ईडी के खिलाफ ममता बनर्जी की शिकायत थी कि उसने उनकी चुनावी रणनीति की जानकारी के लिए सरकार या भाजपा के इशारे पर छापा मारा और ईडी की शिकायत सरकारी काम में बाध्यता डालने की थी।
अदालत में फैसला चाहे जो हो, ईडी और उसकी इस समय की कार्यशैली ममता बनर्जी के दावे या आरोपों को मजबूती देती है। फिर भी खबरें ऐसी नहीं हैं। दूसरी ओर, एसआईआर में जो हो रहा है वह तमाम लोगों को मतदाता नहीं रहने देगा। द टेलीग्राफ की आज की लीड के अनुसार, राम कृष्ण मिशन और राम कृष्ण मठ के साधु, सन्यासी और स्वामी एसआईआर के कारण नाम की समस्या से जूझ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ही बांकुड़ा के खातरा सिनेमा मोड़ के पास एक गाड़ी की तलाशी में मतदाता सूची से नाम हटाने वाले ‘फॉर्म-7’ की लगभग 4,000 प्रतियां बरामद हुईं। हिरासत में लिए गए लोगों में एक तालडांगरा विधानसभा क्षेत्र की बीबरदा ग्राम पंचायत की पूर्व भाजपा मंडल अध्यक्ष झुमा घोष के पति प्रबीर घोष हैं। यही नहीं, मुर्शिदाबाद जिले के फरक्का ब्लॉक में आम लोगों को परेशान किए जाने का आरोप लगाते हुए सभी बूथ लेवल ऑफिसर ने एक साथ इस्तीफा दे दिया है। इसके बावजूद एसआईआर चल रहा है। इसके बाद बनी ऐसी ही शुद्ध मतदाता सूची से बिहार में चुनाव हुए। इसकी तुलना इंदिरागांधी के चुनाव से करें तो इमरजेंसी लगाने का कारण समझ में आएगा लेकिन उसके बारे में अलग प्रचार है और अभी जो प्रचार चल रहा है उसे आप देख सकते हैं। आज नवोदय टाइम्स की लीड अमेरिकी टैरिफ पर कोर्ट का फैसला टलने की खबर है और यह भी महत्वपूर्ण है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


