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भास्कर ने गलती से साल की शुरुआत की है!

नए साल की पहली सुबह आमतौर पर हैंगओवर, नींबू पानी और आराम की होती है। लेकिन अगर कोई पत्रकार 31 दिसंबर की रात मिली “फड़कती खबर” के पीछे भागते हुए बिना उतरे हुए नशे के सीधे दफ्तर पहुंच जाए, खबर जोड़ दे और बदले में दिल्ली ऑफिस से “पिछवाड़े पर लात” खा ले—तो मामला सामान्य मीडिया रूटीन का नहीं रह जाता।

कहानी यहीं से दिलचस्प होती है, क्योंकि सामने आता है दैनिक भास्कर, खबर का एक ऐसा नमूना और सावरकर की माफ़ी से जुड़ा विवाद, जिसने नए साल की शुरुआत में ही भास्कर को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल ये नहीं कि खबर क्या थी, सवाल ये है कि गलती किससे हुई—रिपोर्टर से, सिस्टम से या उस न्यूज़रूम संस्कृति से, जहां सबसे पहले “ब्रेक” चाहिए, सच बाद में।


इस मामले में पत्रकार सौमित्र राय जी लिखते हैं-

जब 31 दिसंबर की रात दारू पार्टी में कोई कान में बोले–एक फड़कती हुई खबर है। फिर अगले दिन, यानी नए साल की पहली तारीख को बंदा नींबू पानी से उतारा किए बिना दफ्तर पहुंचकर खबर जोड़ ले।

उसके बाद दिल्ली ऑफिस से पिछवाड़े पर लात पड़े तो समझ लें कि वह दैनिक भास्कर है। खबर का नमूना और सावरकर की माफ़ी के साथ पेश है। भास्कर ने गलती से साल की शुरुआत की है।

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