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सुख-दुख

बीएचयू में गलत इलाज से महिला की मौत और मेडिकल स्टूडेंट के आत्महत्या के प्रयास के बीच सीधा रिश्ता है!

समाज और पत्रकारों के लिए भी चुनौती…

विष्णु राजगढ़िया-

बीएचयू के लिए कौन रोएगा?

बीएचयू का आईएमएस मेडिकल कॉलेज फिर बदनाम हुआ। यहां राधिका देवी नामक दो महिलाएं भर्ती थीं। एक स्पाइनल कॉर्ड में ट्यूमर से पीड़ित थी। दूसरी के पैर में फ्रैक्चर था। लेकिन स्पाइनल कॉर्ड ट्यूमर से पीड़ित महिला की जांघ का ऑपरेशन कर दिया गया। गलत ऑपरेशन के कारण 27 मार्च को राधिका देवी की मौत हो गई। वह बलिया की निवासी थीं।

बीएचयू देश का प्रमुख शिक्षण संस्थान है। इसके तहत 1960 में आईएमएस (इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस) की स्थापना हुई थी। इसे 2018 में एम्स के स्तर तक उन्नत कर दिया गया। इसके बावजूद यह लगातार गलत कारणों से चर्चा में है। इसी वर्ष 13 मार्च को आईएसएम में सर्जरी विभाग की जूनियर डॉक्टर सत्या ने आत्महत्या का प्रयास किया। इंसुलिन की भारी मात्रा से किडनी को गंभीर नुकसान हुआ। अब तक इलाज जारी है। वह समस्तीपुर की रहने वाली हैं।

इन दोनों बड़ी घटनाओं पर देश में कोई चर्चा नहीं हुई। शायद हिंदी प्रदेशों की ऐसी दुर्गति को हमारी नियति मान लिया गया है। महिला की मौत मामले में अस्पताल में उन्हीं दोषी डॉक्टरों की टीम से जांच कराकर मामले की लीपापोती कर दी। छात्रा के आत्महत्या प्रयास में सभी स्टूडेंट्स को धमका दिया गया। कोई सच बताने को तैयार नहीं। क्या यह आईएमएस-बीएचयू की दुर्दशा पर रोने का समय नहीं? कौन रोएगा देश के इस प्रतिष्ठित संस्थान की इस विडंबना पर?

दोनों घटनाओं में क्या रिश्ता है?

गलत इलाज के कारण महिला की मौत और मेडिकल स्टूडेंट द्वारा आत्महत्या की कोशिश के बीच सीधा रिश्ता है। मेडिकल स्टूडेंट्स पर सरकारी अस्पतालों की अत्यधिक निर्भर होती है। इन अस्पतालों में हजारों की तादाद में मरीज आते हैं। आवश्यक डॉक्टरों तथा नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी होती है। सारी कमी मेडिकल स्टूडेंट से पूरी कराई जाती है। अन्य स्टाफ पर मैनेजमेंट का जोर नहीं चलता। मेडिकल स्टूडेंट्स को फेल करने का डर दिखाकर लगातार 36-36 घंटे लंबी ड्यूटी कराई जाती है। उनके सोने, भोजन और आराम जैसी बुनियादी मावनीय जरूरतों का ख्याल नहीं रखा जाता। थके-मांदे जूनियर डॉक्टरों से किस गुणवत्ता की उम्मीद करेंगे आप? (पीजी स्टूडेंट्स को रेजिडेंट डॉक्टर या जूनियर डॉक्टर कहा जाता है।)

महिला की मौत के पीछे किसकी लापरवाही है, इसका पता लगाना बाकी है। छात्रा द्वारा आत्महत्या के प्रयास के पीछे लंबी ड्यूटी की भूमिका का भी पता लगाना जरूरी है। इसके लिए आईएमएस के ऑर्थोपेडिक्स डिपार्टमेंट के मेडिकल स्टूडेंट्स के पिछले 6 महीने की ड्यूटी चार्ट का अध्ययन किया जाए। जांच हो कि डॉक्टरों की कमी तथा स्टूडेंट्स की लंबी ड्यूटी के कारण मरीजों के इलाज पर क्या असर पड़ रहा है।

क्या है ड्यूटी का नियम?

भारत सरकार के 1992 के नियम के अनुसार मेडिकल कॉलेजों में पीजी स्टूडेंट्स को सप्ताह में अधिकतम 48 घंटे और एक बार में अधिकतम 12 घंटे काम करना है। आईएमएस बीएचयू में भी यही नियम लागू है। इसे एम्स के अनुरूप विकसित किया जा रहा है। एम्स का 21 अगस्त 2025 का आदेश भी भारत सरकार के 1992 के नियम को शब्दश: दोहराता है। लेकिन आईएमएस बीएचयू सहित अधिकांश मेडिकल कॉलेजों में लगातार 36 घंटे लगातार लंबी अवैध और अमानवीय ड्यूटी लगती है। इसका मरीजों के इलाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फर्जी ड्यूटी रोस्टर बनाकर यह खुला खेल फरूर्खाबादी चल रहा है। इसके कारण मेडिकल स्टूडेंट्स का मानसिक अवसाद, सीट छोड़ने और आत्महत्या तक के लिए विवश होना पड़ता है। मेडिकल स्टूडेंट्स के अभिभावक खून के आंसू रोने को विवश हैं।

नेशनल मेडिकल कमीशन ने 2024 में मेडिकल स्टूडेंट्स के मेंटल हेल्थ पर एक नेशनल टास्क फोर्स बनाया था। इसकी रिपोर्ट के अनुसार 37 फीसदी स्टूडेंट्स में आत्महत्या के विचार पाए गए। हर साल 25 से ज्यादा मेडिकल स्टूडेंट्स की आत्महत्या के मामले सामने आते हैं। हर साल 250 से ज्यादा मेडिकल स्टूडेंट्स मुश्किल से मिलीसीट छोड़ देते हैं। यह मामला सिर्फ डॉक्टरों की आत्महत्या तक सीमित नहीं है। गलत इलाज के कारण राधिका देवी जैसी महिलाओं की मौत जैसे मामलों की समीक्षा करें, तो इसका सीधा संबंध जूनियर डॉक्टरों की लंबी ड्यूटी के साथ दिख जाएगा। जब तक पीजी मेडिकल स्टूडेंट्स की ड्यूटी के 1992 के नियम का पालन नहीं होगा, तब तक किसी भी सरकारी अस्पताल में अच्छे इलाज की कल्पना करना बचकानी है।

समाज और पत्रकारों के लिए चुनौती

इस गंभीर विषय पर समाज और खासकर पत्रकारों को पहल करनी चाहिए। उन्हें बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी और आईएमएस बीएचयू के निदेशक प्रो. एसएन संखवार से कुछ सवाल करने चाहिए –

  1. आईएमएस-बीएचयू में पीजी मेडिकल स्टूडेंट्स की ड्यूटी के नियम क्या हैं? क्या भारत सरकार के 1992 के नियम और एम्स के आदेश दिनांक 21 अगस्त 2025 का अनुपालन होता है?
  2. अगर हां, तो क्या स्टूडेंट्स और अभिभावकों की उपस्थिति में एक प्रेस कॉफ्रेस करके इसकी घोषणा करेंगे?
  3. अगर उक्त नियम का अनुपालन नहीं होता हो, तो किस अधिकार के तहत अवैध और अमानवीय लंबी ड्यूटी कराई जाती है?
  4. अगर लंबी, अवैध ड्यूटी कराई जाती हो, तो क्या इसे वास्तविक तौर पर रिकॉर्ड किया जाता है? क्या सभी विभागों में विगत तीन माह का प्रति स्टूडेंट ड्यूटी का डेटा सार्वजनिक किया जाएगा?
  5. क्या बनारस के कुछ स्वतंत्र नागरिकों और पत्रकारों की एक टीम को इस बात की जांच की अनुमति दी जाएगी, कि लंबी अवैध ड्यूटी का मरीजों के इलाज पर बुरा असर नहीं पड़ रहा?

अगर आईएमएस बीएचयू इन सवालों का जवाब न दे, तो बनारस के नागरिकों और पत्रकारों की एक टीम इसकी जांच करे। लोकतंत्र है। इतना तो हक बनता है। दायित्व भी।

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