संतोष सिंह-
यही कोई सात वर्ष की पूर्व की बात होगी उस वक्त मैं कशिश न्यूज चैनल का संपादक था। ऑफिस पहुंचे तो हर दिन की तरह मेरा ऑफिस ब्वॉय कपिल पानी लेकर आया। रोजाना की तरह हालचाल लिए तो वह बोला सर कैमूर से एक व्यक्ति आया हुआ है आपसे मिलने, जमीन का कोई समस्या है… सुबह-सुबह पहुंच गया ऑफिस में, फ्रेश करवा दिया, बड़ा गरीब है नास्ता भी करा दिए हैं। आपको जानता है।
मैंने कहा बुलाओ। एक साधारण कद काठी का युवक कंधे में झोला लटकाए हुए अंदर आया। अपनी सारी बात बताई। कैसे छह धूर जमीन के लिए मुख्यमंत्री के जनता दरबार से लेकर डीजीपी आयुक्त, डीएम, एसडीएम और सीओ के दफ्तर का वो कम से कम पचास चक्कर लगा चुका था। सारे अधिकारी इसके दावे को सही मानते हुए कोर्ट के आदेश का अनुपालन कराने का आदेश देता था, लेकिन इसको कब्जा नहीं मिला।
मैंने पुछा अब क्या बचा है.. सारे पदाधिकारी को इसकी जानकारी है। कार्यवाही का आदेश भी दिया, फिर भी कब्जा नहीं मिल पाया। एक मिनट तक वो चुप रहा फिर कहा- सर आपके पास क्यों आए हैं पता है.. मैंने कहा नहीं।
मेरा आपसे एक आग्रह है, वैसे मेरी पत्नी आपके लिए गाय के दूध का पेड़ा बना कर दी हैं आपको बुरा ना लगे तो पहले एक बार खा लेते। उस बुजुर्ग ने कहा।
मैंने कपिल को बुलाया, पेड़ा खाए.. फिर मैंने पूछा अब बोलिए। वो बोला- मुझे सर आपके साथ टीवी पर आना है और इस देश को दिखाना है कि सिस्टम कितना लाचार और बेबस है। मैं तो हैरान रह गया। अरे भाई खबर से क्या होगा.. सर आप नहीं समझते हैं खबर दिखा दीजिएगा ना तो मेरे मन के अंदर जो गुस्सा है वह बाहर आ जाएगा। रात-रात भर सोते नहीं हैं, मुझे सुकून मिलेगा की मेरे बस में जो है वह कर लिए बाकी भगवान जाने मैं नक्सली के विचार से सहमत नहीं है, नहीं तो एक दिन में मामला सलट जाएगा।
दो घंटे बाद मैं और वो सीधे लाइव पर बैठे, इससे पहले मैंने मेरी भी सूनो साहेब करके प्रोमो चलवा दिए। लाइव पर बैठा और वो एक बार आन स्क्रीन बोला 30 मिनट के इस लाइव शो के खत्म होने के बाद उसके चेहरे की खुशी देखने लायक थी।
पहली बार मुझे महसूस हुआ कि लोकतंत्र में मीडिया का स्वतंत्र होना कितना जरूरी है, मीडिया सेफ्टी वाल्व का काम करता है। जनता के गुस्सा को नियंत्रित करता है। आज मीडिया क्या कर रही है, कोर्ट क्या कर रहा है, सूचना का अधिकार कानून जनता के हाथ भ्रष्टाचार से लड़ने का एक टूल था उसको भी मोदी सरकार ने खत्म कर दिया।
जितना तबाह बिहार में सिस्टम और सरकार की वजह से जनता है वह नेपाल से भी कहीं ज्यादा है। कह नहीं रहे हैं सचेत कर रहे हैं, स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो नेपाल से भी बूरे दिन देखने को मिल सकते हैं। ऐसा नहीं है कि इस देश में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ है, 1974 इसका उदाहरण है।



