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आज के अखबार : बिहार में मतदाता सूची के परीक्षण का गड़बड़झाला सीधे नहीं बताकर भी बता ही दे रहे हैं!

मतदाता सूची में नाम को नागरिकता से कनफ्यूज करने का काम राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है और चुनाव आयोग अगर राजनीतिक दल को उपकृत नहीं कर रहा है तो कोई कारण नहीं है कि वह नागरिकों को मतदाता बनाने की बजाय उनकी नागरिकता सुनिश्चित करे। किसी की भी नागरिकता उसके पासपोर्ट से ही सुनिश्चित होती है और भारत का हर पासपोर्ट धारी वोट नहीं दे सकता है। ना देश में ना विदेश में और ना विदेश में रहते हुए ना मतदान के दिन देश में आकर।

संजय कुमार सिंह

प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाले मुखिया की सरकार में अखबार बहुत सारी जानकारी नहीं देते हैं। सवाल तो नहीं ही करते हैं या कर पाते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक है, विपक्ष के विरोध के बीच चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण शुरू किया। इस खबर का इंट्रो है, शामिल करने के लिए नागरिकता की पुष्टि की जायेगी। इस खबर के साथ छपी दो कॉलम की एक दूसरी खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग नागरिकता कानून के तहत कार्रवाई के लिए ‘घुसपैठियों’ की शिकायत करेगा। आज यह खबर कई अखबारों में लीड है। द हिन्दू का शीर्षक है, बिहार की मतदाता सूची का सघन पुनरीक्षण जारी है। उपशीर्षक है, राज्य सरकार के अधिकारियों ने मतगणना फॉर्म का वितरण शुरू किया क्योंकि 2003 की मतदाता सूची में जिनके नाम नहीं हैं उनसे योग्यता साबित करने के लिए कहा गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसे गर्व का क्षण कहा है जबकि विपक्ष ने इस कदम को खतरनाक बताया है। अखबारों ने यह नहीं बताया है कि विपक्ष ने इसे खतरनाक क्यों कहा है और ना यह बताया है कि चुनाव आयोग फिर भी क्यों ऐसा कर रहा है। आयोग ऐसा कर सकता है कि नहीं उसपर कोई सवाल तो नहीं ही है। देशबन्धु में यह खबर लीड नहीं है। पहले पन्ने पर चार कॉलम की इस खबर के अनुसार, बूथ स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई गई है। मुख्य खबर के साथ छपी एक छोटी खबर का शीर्षक है, विपक्षी दल मतदाता सूची संशोधन पर सवाल उठा रहे हैं।     

दि एशियन एज ने इस खबर को पांच कॉलम में छापा है। इसमें चुनाव आयोग का पक्ष अच्छी तरह बताया गया है। सबसे पहले फ्लैग शीर्षक में इस पूरे प्रयास का ‘मकसद’ स्पष्ट करने की कोशिश की गई है। जो स्थितियां हैं उनमें यह आरोप है कि चुनाव आयोग यह सब सत्तारूढ़ दल के फायदे के लिए उसकी जरूरत (या राजनीति) के अनुसार कर रहा है। ऐसे में यह संदेश महत्वपूर्ण है कि मकसद, अवैध प्रवासियों या घुसपैठियों को मतदाता सूची से (या देश से) बाहर करना है। अखबार का मुख्य शीर्षक का पहला हिस्सा है, ‘सिर्फ भारतीय वोट दे सकते हैं’। दूसरे हिस्से में कहा गया है, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का पुनरीक्षण शुरू किया। शीर्षक में, ‘सिर्फ भारतीय वोट दे सकते हैं’ सिंगल इनवर्टेड कॉमा में है। इसका मतलब है कि किसी ने ऐसा कहा है। खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने एक संवैधानिक प्रावधान की याद दिलाई है जिसके अनुसार सिर्फ भारतीय नागरिक वोट दे सकते हैं। अखबार के अनुसार, एक बयान में चुनाव आयोग ने कहा है कि भारत का संविधान सर्वोपरि है। सभी नागरिक, राजनीतिक दल और चुनाव आयोग संविधान का पालन करते हैं। अखबार ने बताया है कि यह बयान विपक्ष के इस सवाल पर है कि सघन पुनरीक्षण का मकसद या उससे जुड़ा इरादा क्या है? अखबार ने इस खबर के साथ जो अंश हाईलाइट किया है वह इस प्रकार है, यह कदम भिन्न राज्यों में म्यामार और बांग्लादेश समेत अवैध विदेशी प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई के कारण महत्वपूर्ण हो गया है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बिहार में अवैध विदेशी प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई की खबर नहीं है।  बिहार में यह कार्रवाई अगर हो रही है तो वह यही कार्रवाई है जो चुनाव आयोग कर रहा है और इसमें कोई शक नहीं है कि संविधान भले कहता है कि भारतीय नागरिक वोट देंगे पर व्यवहार में वही नाागरिक वोट देते हैं जो चुनाव क्षेत्र विशेष की मतदाता सूची में हैं। इसीलिये मतदाता सूची से मतदाता प्रमाणपत्र पत्र या सूची के अनुसार पहचान सुरक्षित करने के बाद मतदान करने दिया जाता है। अगर सभी नागरिक किसी एक मतदान केंद्र पर वोट नहीं दे सकते हैं तो चुनाव आयोग का काम नागरिकता सुनिश्चित करना है ही नहीं। क्योंकि नागरिक भी मतदाता सूची में नहीं हो तो वोट नहीं दे सकता है। मतदाता सूची का वही नागरिक वोट दे सकता है जो उस क्षेत्र का सामान्य निवासी होगा। अगर वह क्षेत्र विशेष का सामान्य निवासी नहीं है तो उसका नाम मतदाता सूची में नहीं होगा और वह नागरिक होकर भी वोट नहीं दे सकेगा। अभी तक के नियमों के अनुसार नागरिक उसी क्षेत्र में उसी दिन मतदान कर सकता है जहां उसका नाम है। इस तरह स्पष्ट है कि नागिरक होना और मतदाता सूची में नाम होना अलग चीजें हैं। मतदाता सूची में नाम को नागरिकता से कनफ्यूज करने का काम राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है और चुनाव आयोग अगर राजनीतिक दल को उपकृत नहीं कर रहा है तो कोई कारण नहीं है कि वह नागरिकों को मतदाता बनाने की बजाय उनकी नागरिकता सुनिश्चित करे। किसी की भी नागरिकता उसके पासपोर्ट से ही सुनिश्चित होती है और भारत का हर पासपोर्ट धारी वोट नहीं दे सकता है। ना देश में ना विदेश में और ना विदेश में रहते हुए देश के लिए।

मतदाता सूची से नागरिकता का इतना ही संबंध है कि सरकार का सक्षम विभाग और उसके अधिकारी चुनाव आयोग को यह सूचित करें कि मतदाता सूची के फलां लोग भारत के नागरिक नहीं हैं और उन्हें वोट नहीं देने दिया जाये या उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाये। जाहिर है इसके साथ उसे यह भी बताना होगा कि जो नागरिक नहीं हैं वे देश में कैसे और क्यों रह रहे हैं पर वह अलग मुद्दा है। मतदाता सूची में नाम के लिए नागरिकता और जन्म प्रमाणपत्र की जरूरत का कोई मतलब ही नहीं है। मतदाता सूची में देश के हर उस नागरिक का नाम हो सकता है  जो किसी चुनाव क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहता है। आज की खबरों से यह भी बताने की कोशिश की गई है। हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, बिहार में मतदाता पुनरीक्षण अभियान आज शुरू हो रहा है तब चुनाव आयोग ने नियम ‘स्पष्ट किये’। इस स्पष्टीकरण के अनुसार, बिहार में रहने वाले लोग (अधिवासी या मतदाता) स्वघोषणा के आधार पर आवेदन जमा कर सकेंगे। इसके लिए दस्तावेजी सबूत की आवश्यकता नहीं होगी और यह ड्राफ्ट की स्थिति में ही होगा। खबर के अनुसार इसके जरिये यह कोशिश की गई है कि दस्तावेजों को लेने, रखने, देखने, जांचने और संभालने की विशेष चुनौती से निपटा जा सके और इस आलोचना से बचा जा सके कि इस अभियान से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम छूट जायेंगे। चुनाव आयोग के अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची पूरी तरह नई नहीं बनाई जाएगी और अभी कोई नाम हटाये भी नहीं जा रहे हैं। बाद में उनलोगों के मामले सुने जायेंगे जिनके दस्तावेज नहीं हैं।

इन दो स्पष्टीकरणों से लगता है कि जो नाम पहले से हैं वो संकट में नहीं हैं। जो अपने पते पर नहीं मिलेगा उससे दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। हालांकि परिवार के मामले में परिवार वाले के कहे पर भरोसा करने का रिवाज रहा है और नाम हटाने के लिए वोटर को भी कहना पड़ता है। नियम है कि अगर कोई घर बदल ले तो वह नई जगह पर बतायेगा कि उसका नाम इस मतदाता सूची में था जिसे अब यहां की मतदाता सूची में शामिल कर लिया जाये। दूसरी ओर, उससे कहा जाता है कि वह पुरानी मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए आवेदन करे। कायदे से नई जगह नाम लिखाने वाले जो लोग सूचित नहीं करते हैं उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये और नई जगह पर नाम बिना पुरानी सूचना के लिखा ही नहीं जाना चाहिये। अगर इसका पालन किया जाता तो दिक्कत नहीं आनी थी और सब ठीक रहता। हालांकि तब नाम हटाना और जोड़ना दोनों मुश्किल हो जाता। यही नहीं, नाम हटाने का इससे अलग जो नियम है वह यह कि जिनकी मृत्यु हो जाये उनके परिवार को लोग पुष्टि करें, मृत्यु प्रमणपत्र लगाया जाये पर आयोग के लोग वैसे भी नाम हटाते रहते हैं जो गलत है। बिहार जैसे मामले में यह सब न सिर्फ मुश्किल है बल्कि दिलचस्प भी। द टेलीग्राफ और नवोदय टाइम्स में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।

द हिन्दू की खबर के अनुसार बिहार की मतदाता सूची का पुनरीक्षण पिछली बार 2003 में हुआ था। 22 साल बाद केंद्रीय चुनाव आयोग यह काम कर रहा है तो नये नियम लागू किये जाने की खबर है जिसका विरोध किया जा रहा है और यह विरोध जायज भी है। बिहार में अगर 22 साल से मतदाता सूची का पुनरीक्षण नहीं हुआ है तो तथ्य यह भी है कि 2011 के बाद जनगणना नहीं हुई है। गरीब राज्य है और पलायन भी होता है। गरीबी के कारण घर में प्रसव और जन्म मृत्यु का पंजीकरण जरूरी व सुनिश्चित नहीं होने से जो अनुमान है वह अपनी जगह दस्तावेज किसके पास होगा और क्या होगा। ऐसे में जब चुनाव आयोग कागज की बात कर रहा है तो जाहिर है, बहुतों के पास होगा नहीं और हम सबने कभी न कभी महसूस किया होगा कि कागज संभालना कितना मुश्किल है और बहुत संभाल कर भी रखा जाये तो समय पर नहीं मिलता है। ऐसे में बिहार में मतदाता सूची में नाम लिखाने के लिए कागज मांगना और यह काम दो महीने में पूरा करने की उम्मीद करना बताता है कि मकसद काम पूरा करना है, काम करना नहीं है। जो नियम बताये गये हैं उसस लगता है कि सरकार (या चुनाव आयोग) की कोशिश है कि नये युवाओं का नाम सबसे कम दर्ज हो क्योंकि नौकरी, रोजगार और काम नहीं होने से वे इस सरकार को वोट देने में सबसे पीछे रहेंगे या सरकार को पता होगा कि उसे तो वोट नहीं ही देंगे।

इसलिये सरकार और चुनाव आयोग का इरादा हो या नहीं, स्थितियां बताती हैं कि असली मकसद क्या हो सकता है। जो भी हो, नई शुरुआत के लिए बिहार ही क्यों या जून 2025 से क्यों? एक देश एक चुनाव की तैयारी और योजना है ही जब भी शुरुआत हो, देश भर की मतदाता सूची एक पूर्वघोषित नियम के अनुसार पर्याप्त समय देकर संशोधित की जा सकती है। विदेशी या अवैध घुसपैठियों का नाम अगर मतदाता सूची में है तो उसे हटाने या नए मतदाताओं में विदेशी नागरिक या घुसपैठियों का नाम न हो इसे सुनिश्चित करने का तरीका यही हो सकता है कि सरकार उनकी पहचान कराये, उन्हें देश निकाला दे या चुनाव आयोग को सूची देकर बताये कि अमुक नाम मतदाता सूची से इस कारण हटा दिये जायें। मतदाता सूची बनाने वालों का काम नहीं है कि वे मतदाता सूची में नाम लिखाने वालों से वो दस्तावेज मांगें जो पासपोर्ट बनवाने के लिए देने होते हैं। मतदाता सूची में नाम होने और पासपोर्ट होने में फर्क है, दोनों का उपयोग भी अलग है। ऐसे में दोनों की शर्तें एक नहीं हो सकती हैं और अगर दो दस्तावेज के काम एक से हो सकते हैं तो दो की जरूरत ही क्यों नहीं। अगर विदेशियों का आधार नहीं है, बाकी सबका है ही या 18 साल से कम वालों का भी है तो क्यों नहीं आधार कार्ड से वोट करा लिया जाये?अगर जरूरत हो तो आधार में ही मतदान केंद्र, बूथ आदि का नाम ट्रांसफर किया जा सकता है। अभी सब एसएमएस से आता ही है। कुल मिलाकर, जिसका आधार नहीं है उससे मतदाता सूची में नाम लिखाने के लिए आधार या पासपोर्ट के लिए जरूरी दस्तावेज मांगे जायें तो ज्यादती है। खासकर बिहार जैसे गरीब राज्य में जहां जन्म प्रमाणपत्र होना भी मुश्किल है। बिहार में जन्म मृत्यु पंजीकरण की स्थिति भी दिलचस्प है। इसपर चैट जीपीटी का जवाब चौंकाने वाला है। उसकी रिपोर्ट अलग से।

वैसे भी चुनाव आयोग को इसकी जरूरत ही नहीं है। उसे आयु और पता सुनिश्चित करना होता है और बीएलओ को जाकर देखना होता है। इसमें जांच के समय आयु गलत बताने का डर हो सकता है पर उससे मतदाता होने के अधिकार में कोई फर्क नहीं पड़ना है। 18 वर्ष के किसी व्यक्ति का नाम दस्तावेज न होने से दर्ज न हो तो वह चुनाव में मतदान से वंचित रह जायेगा और फिर मौका न जाने कब मिलेगा। वैसे भी, चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि हर वोटर को वोट देने का मौका दे और वोट वही देता है जो मतदाता सूची में है। द हिन्दू की खबर के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा है कि यह काम सभी भारतीयों के लिए गर्व के क्षण हैं तथा चुनाव आयोग मतदाताओं के साथ है और हमेशा रहेगा। अगर ऐसा है तो मतदाता बनाने में सरकार का साथ क्यों और जब कोई मतदाता बनेगा ही नहीं तो उसका आयोग का साथ कैसे मिलेगा और आयोग साथ है तो यह शुरुआत 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद क्यों नहीं हुई, एक जनवरी 2025 के बाद हुए चुनाव से क्यों नहीं हुई, लोकसभा चुनाव के बाद शुरू होने वाले विधानसभा चुनावों से क्यों नहीं हुई। यह शुरुआत बिहार से करने का संतोषजनक कारण क्या हो सकता है। यह शुरुआत दिल्ली से हुई होती तो हम मान लेते कि राजधानी से हुई है पर बिहार से होने का कोई कारण नहीं है। बिहार में घुसपैठियों के होने का कोई कारण नहीं है और प्रधानमंत्री ने पूर्व में ऐसा कोई आरोप भी नहीं लगाया है। 10 साल में ज्यादातर समय वहां भाजपा की ही सरकार रही है फिर वहां घुसपैठिये कैसे आये और रहे। अगर ऐसा है तो क्या राज्य सरकार ने कोई रिपोर्ट भी दी है?

आज की दूसरी खबर, स्पष्ट रूप से सांप्रदायिकता फैलाने वाली है और बिहार चुनाव के मद्देनजर कोई और दाल नहीं गलने से इसे गलाने की कोशिश की गई है। इससे न सिर्फ सरकार और सरकारी पार्टी उससे अभिभावक संगठन आरएसएस ने भी अपना असली रंग दिखा दिया है और खुल कर सांप्रदायिकता की बात कर रहे हैं। इसपर चर्चा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि पार्टी और उसके संगठन चाहते हैं बिहार चुनाव से पहले ध्रुवीकरण हो और 80 प्रतिशत हिन्दुओं में से कुछ कम भी इसे इसके हिन्दुत्व के लिए वोट दें तो वह जीत जायेगी। जीतने के लिए तमाम दूसरे उपाय करती है और ‘भोटकटवा’ उम्मीदवार से लेकर वाशिंग मशीन में धुले उम्मीदवार तक सब मैदान में होंग। सरकारी विभागों का डर भी रहता है। अमर उजाला की लीड का फ्लैग शीर्षक है, उपराष्ट्रपति धनखड़ ने संघ के सरकार्यवाह होसबोले की मांग का समर्थन किया और कहा…. (मुख्य शीर्षक है) आपातकाल में संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गये शब्द नासूर, सनातन की आत्म का अपमान। मुझे लगता है कि उपराष्ट्रपति को इसमें नहीं पड़ना चाहिये था। भाजपा और  सरकार को चाहिये था कि वह उपराष्ट्रपति को इसमें नहीं घसीटती। ठीक है कि बंगाल  के राज्यपाल रहते हुए काफी कुछ संघ अनुकूल करके ही उपराष्ट्रपति बन पाये हैं फिर भी पद का सम्मान कुछ होता है।

इसके बावजूद यह सब हुआ है तो इसकी गंभीरता का पता चलता है। यह संघ की योजना है तो इस समय उसका अंतिम हथियार भी है। 400 पार और उसके बाद का हश्र जानते हुए पार्टी और परिवार यह सब कर रहा है तो मानना पड़ेगा कि कितना जरूरी है। समर्थन करने वाले अखबारों और नागरिकों को भी तय करना होगा। वैसे इसका तात्कालिक उद्देश्य बिहार जीतना ही है ताकि लोकसभा चुनाव में हार के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजों से जो संभला है वह फिर हाथ से न निकल जाये। महाराष्ट्र कैसे जीता गया और उसके लिये क्या सब करना पड़ा से साफ है कि पार्टी-संगठन ने अपना असली रूप और अंतिम लक्ष्य खोलकर रख दिया है। देखना है इसका लाभ होता है कि नहीं और होता है तो कितना। चुनाव आयोग के साथ मिलकर काम करने की यह रणनीति भी घातक हो सकती है और मुझे लगता है कि परिवार ने बड़ा जोखिम लिया है। कारण चाहे जो हो। खबर के लिहाज से यह बड़ी खबर तो है ही इसलिए इसे लीड बनाने पर उंगली नहीं उठाई जा सकती है पर इसके जरिये उसके अभियान का समर्थन तो किया ही गया है। इंडियन एक्सप्रेस भी इसमें है।  पर चुनाव आयोग का अभियान भी सरकार का ही है। कोई माने या न माने। इसलिए आज और कुछ हुआ या नहीं, जीतने की जरूरत और कोशिश का पता तो चल ही रहा है।       

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