मनोज अभिज्ञान
मोदी सरकार की कूटनीति इन दिनों दोहरी चाल चल रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘सबका साथ, सबका विकास’ का संदेश देकर खुद को समावेशी लोकतंत्र के तौर पर प्रस्तुत करना, और देश के भीतर धार्मिक ध्रुवीकरण और विभाजनकारी राजनीति से चुनावी जीत सुनिश्चित करना। यह पूरी रणनीति ‘वैश्विक छवि बनाम घरेलू वास्तविकता’ की बारीक बुनावट है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए समावेशिता और लोकतांत्रिक मूल्यों का मुखौटा सजाया जाता है, जबकि असली खेल अपने ही भक्तों को भ्रमित कर वोटबैंक साधने का होता है। भाजपा सरकार की विदेश नीति आजकल सिर्फ रणनीतिक साझेदारी नहीं, बल्कि ‘ग्लोबल ऑप्टिक्स’, यानी दुनिया को दिखाने योग्य चेहरा बनाने में तब्दील हो चुकी है।
भारत के बारे में सबसे अधिक कवरेज देने वाले वैश्विक मीडिया संस्थान, जैसे BBC, The Guardian, The New York Times, Al Jazeera, और Deutsche Welle, लगातार भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों की स्थिति, और राजनीतिक दमन पर रिपोर्टें प्रकाशित करते हैं। ये रिपोर्टें भारत के भीतर शायद प्रत्यक्ष जनमत को प्रभावित न करती हों, लेकिन भारत की अंतरराष्ट्रीय साख, कूटनीतिक संवाद, और आर्थिक संबंधों पर इनका गहरा प्रभाव पड़ता है। वैश्विक मंच पर यह ‘नैरेटिव ऑप्टिक्स’ भारत की छवि को या तो लोकतांत्रिक नेतृत्व के रूप में स्थापित कर सकती है, या अधिनायकवादी व्यवस्था के रूप में सीमित कर सकती है।
ये मीडिया रिपोर्ट्स महज़ पत्रकारिता नहीं होतीं; इनके पीछे विशेषज्ञ संवाददाता, फील्ड रिपोर्ट्स, और मानवाधिकार संगठनों के निष्कर्ष होते हैं, जिन्हें पश्चिमी देश अपनी विदेश नीति, वाणिज्यिक निवेश, और रणनीतिक साझेदारी के निर्धारण में ध्यान में रखते हैं। जब भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हिंसा की खबरें नियमित रूप से प्रकाशित होती हैं, तो अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच यह सवाल उठता है कि क्या यह देश राजनीतिक स्थिरता, कानून के शासन, और न्याय प्रणाली के लिहाज़ से सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है। इसी कारण सरकार को समय-समय पर ऐसी रिपोर्ट्स का खंडन करने के लिए ‘Overarching Diplomatic Responses’ और Strategic Communication Campaigns चलाने पड़ते हैं।
यही कारण है कि भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसी बातों को प्रमुखता से दोहराती है। लेकिन जब ज़मीन पर विपरीत घटनाएं सामने आती हैं—जैसे दंगों पर प्रशासनिक चुप्पी, अल्पसंख्यकों की गिरफ़्तारी या धार्मिक नफरत फैलाने वालों को सत्ता का संरक्षण—तो यह विरोधाभास ग्लोबल मीडिया के लिए ख़बर बन जाता है और भारत की Soft Power को चोट पहुँचाता है। इन रिपोर्ट्स की गूँज संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद, Special Rapporteurs, और EU Delegations तक पहुँचती है, जो सीधे या परोक्ष रूप से भारत की Foreign Policy Calculations और Trade Negotiations को प्रभावित करती हैं। यही Global Optics भारत की विदेश नीति में आज सबसे जटिल और अनकहे दबाव का स्रोत बन चुकी है।
21 जुलाई 2025 को राज्यसभा में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा अतारांकित प्रश्न संख्या 135 के दिए गए जवाब में स्पष्ट कहा गया है कि सभी मंत्रालयों और विभागों को यह निर्देशित किया गया है कि वे अपनी योजनाओं में एक निर्धारित प्रतिशत लक्ष्य अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित करें। यहाँ तक कि पुलिस भर्ती में भी राज्य सरकारों को सलाह दी गई है कि वे चयन समितियों में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें और उनकी भर्ती में ‘विशेष तरजीह’ दी जाए।
राज्यसभा के उत्तर में कुछ विशिष्ट योजनाओं का उल्लेख भी किया गया है जिनमें अल्पसंख्यकों को विशेष लाभ पहुँचाने की व्यवस्था की गई है। उदाहरण के लिए, शहरी स्व-रोजगार योजना (SJSRY) के तहत जो दो प्रमुख घटक, USEP और UWEP, चलाए जाते हैं, उनमें शारीरिक और वित्तीय लक्ष्य का एक निश्चित हिस्सा अल्पसंख्यक समुदायों के गरीबों के लिए सुरक्षित किया गया है। इसी प्रकार, ग्रामीण क्षेत्रों में लागू संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (SGRY) में भी अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त रोजगार सृजन, सामाजिक ढाँचे और बुनियादी सुविधाओं के निर्माण पर ज़ोर दिया गया है।
तकनीकी प्रशिक्षण के माध्यम से कौशल उन्नयन भी इस कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार ने स्वीकार किया है कि अल्पसंख्यक समुदायों का एक बड़ा हिस्सा तकनीकी कार्यों या हस्तशिल्प जैसे परंपरागत कार्यों में संलग्न है। ऐसे लोगों के लिए तकनीकी प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है ताकि वे आधुनिक दक्षताओं के साथ आगे बढ़ सकें। इसके लिए नए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) की स्थापना अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में की जा रही है और पहले से मौजूद ITIs को ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के रूप में उन्नत किया जा रहा है।
आर्थिक गतिविधियों के लिए क्रेडिट सपोर्ट की दिशा में भी केंद्र सरकार ने कदम उठाए हैं। 1994 में गठित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम (NMDFC) को और अधिक वित्तीय सहायता देने की बात कही गई है ताकि वह अल्पसंख्यकों के बीच आर्थिक विकास को प्रोत्साहित कर सके। इसके साथ ही घरेलू बैंकों के लिए यह निर्धारित किया गया है कि उनकी कुल ऋण आपूर्ति का कम से कम 40% हिस्सा प्राथमिकता क्षेत्र को मिले, जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए कृषि ऋण, छोटे उद्योग, व्यापार, शिक्षा और हाउसिंग लोन शामिल हैं। यह सुनिश्चित करने की बात कही गई है कि प्रत्येक श्रेणी में अल्पसंख्यकों को पर्याप्त ऋण सुविधा मिले।
राज्य और केंद्रीय सेवाओं में भर्ती के संदर्भ में उत्तर का वह भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसमें सरकार ने साफ तौर पर कहा है कि राज्य सरकारों को सलाह दी जाएगी कि वे पुलिस बलों की भर्ती में अल्पसंख्यकों को विशेष तरजीह दें। यहाँ तक कहा गया है कि भर्ती चयन समितियों में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। केंद्रीय बलों की भर्ती में भी यही दृष्टिकोण अपनाने की बात कही गई है। इसके अलावा रेलवे, राष्ट्रीयकृत बैंक और सार्वजनिक उपक्रमों में भी अल्पसंख्यकों को भर्ती में विशेष प्राथमिकता देने की बात की गई है।
यह सब वही बातें हैं जिनका जोर सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में दिया था। 2006 में जब जस्टिस सच्चर की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर जो रिपोर्ट दी थी, उस समय भाजपा और उससे जुड़ी संस्थाओं ने इस रिपोर्ट का विरोध किया था। संसद में हंगामा हुआ था, और भाजपा नेताओं ने इसे ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ करार देकर संसद ठप की थी। तब मोदी ने भी कई मंचों से इसे वोटबैंक राजनीति की संज्ञा दी थी। लेकिन अब वही मोदी सरकार, लगभग उसी दिशा में नीतियाँ बना और लागू कर रही है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब भाजपा की वैचारिक संरचना सच्चर कमेटी का विरोध करती थी, तब वही सरकार अब वही कार्यक्रम क्यों चला रही है? क्या यह किसी वैचारिक परिपक्वता का संकेत है या फिर कोई और कारण है? दरअसल इसका उत्तर देश के भीतर नहीं, बल्कि देश के बाहर छिपा है, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर।
मोदी सरकार को यह भली-भांति ज्ञात है कि वैश्विक व्यवस्था में किसी भी लोकतांत्रिक देश की साख केवल आर्थिक संकेतकों से नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक समावेशिता, धार्मिक सहिष्णुता और अल्पसंख्यकों की स्थिति से भी आँकी जाती है। अमेरिका के विदेश विभाग द्वारा जारी की जाने वाली International Religious Freedom Report, यूरोपीय संसद की Human Rights Resolutions, और संयुक्त राष्ट्र के Special Rapporteurs की टिप्पणियाँ भारत की छवि को वैश्विक पटल पर प्रभावित करती हैं। उल्लेखनीय है कि Special Rapporteurs (स्पेशल रैपोर्टर्स या विशेष प्रतिवेदक) संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञ होते हैं, जिन्हें किसी विशेष विषय, क्षेत्र या समूह के मानवाधिकारों की स्थिति की निगरानी, रिपोर्टिंग और सिफारिश करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है।
इन रिपोर्ट्स में यदि बार-बार यह दर्शाया जाता है कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हो रहा है, तो इसका सीधा प्रभाव भारत के व्यापारिक समझौतों, निवेश प्रवाह, और वैश्विक सहयोग पर पड़ता है। यही वजह है कि भारत सरकार एक तरफ़ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकतंत्र और विविधता की बात करती है, और दूसरी ओर अपने समर्थकों को घरेलू मोर्चे पर यह यकीन दिलाती है कि तुष्टिकरण की राजनीति अब ख़त्म हो चुकी है।
भारत के लिए खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, यूएई, क़तर और ओमान के साथ आर्थिक संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लाखों प्रवासी भारतीय इन देशों में कार्यरत हैं और भारत की विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से रेमिटेंस के रूप में आता है। इन इस्लामिक देशों में भारत की मुस्लिम नीति पर अक्सर निगरानी रहती है। ऐसे में यदि भारत यह नहीं दिखाता कि वह अपने मुसलमान नागरिकों को मुख्यधारा में शामिल कर रहा है, तो यह उसकी विदेश नीति पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
इसी तरह भारत के अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देशों के साथ जो रणनीतिक संबंध हैं, उनमें भी ‘ह्यूमन राइट्स ट्रैक रिकॉर्ड’ अनिवार्य शर्त है। चाहे वह व्यापार समझौते हों, रक्षा सौदे हों या तकनीकी सहयोग, इनमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों और समावेशिता की छवि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वित्तीय संस्थान जैसे OECD, FATF, World Bank और IMF भी अब केवल आर्थिक आंकड़ों पर ही नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में समावेशिता, सामाजिक न्याय और पारदर्शिता जैसे पहलुओं को भी महत्व देते हैं। यदि अल्पसंख्यकों की उपेक्षा की छवि मजबूत होती है, तो इससे भारत की रेटिंग और निवेश योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लग सकते हैं।
मोदी सरकार की पूरी रणनीति यही है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह प्रमाणित कर सके कि भारत में अल्पसंख्यकों को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं; लेकिन यह सारा प्रबंध काग़ज़ी दस्तावेज़ों और संसदीय उत्तरों के दायरे में ही सीमित रहे। न तो भाजपा समर्थकों को इन बातों की भनक लगने दी जाती है, न ही इन्हें चुनावी मंचों पर प्रचारित किया जाता है। सरकार अपने समर्थकों के बीच राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी छवि बनाए रखने का प्रयास करती है, जबकि विदेशों में वह उदार लोकतंत्र की छवि पेश करती है।
यह दोहरी रणनीति न केवल मोदी सरकार की कूटनीतिक चतुराई को दिखाती है, बल्कि यह भी प्रमाणित करती है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में अब घरेलू नीति अंतरराष्ट्रीय दबाव से अछूती नहीं रही। वास्तव में यह कहना गलत न होगा कि प्रधानमंत्री का 15 सूत्रीय कार्यक्रम अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर भारत सरकार की ‘Dual Communication Strategy’ का हिस्सा है; एक तरफ़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शांत रखने के लिए योजनाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना, और दूसरी तरफ़ घरेलू राजनीति में इस मुद्दे पर मौन रहकर अपने कोर वोटबेस को संतुष्ट रखना।
यह पूरा घटनाक्रम उस गहरी खाई की ओर इशारा करता है जहाँ घरेलू नीति और वैश्विक छवि (global optics) आमने-सामने खड़े हैं और सरकार को दोनों तरफ़ की रोशनी में खुद को सही साबित करना है, चाहे उस रास्ते पर विचारधारात्मक ईमानदारी की कितनी ही बार बलि देनी पड़े।
भाजपा आज जिस रणनीति पर चल रही है, वह अपने विरोधियों से ज़्यादा अपने ही समर्थकों को धोखे में रखने की है। एक ओर वह मंचों से गरजते हुए ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ को कोसती है, दूसरी ओर संसद के भीतर चुपचाप वही नीतियाँ लागू कर रही है जो कभी उसने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के नाम पर धिक्कारी थीं। वह अपने समर्थकों को राष्ट्रवाद और बहुसंख्यक गौरव का झुनझुना पकड़ाकर यह यकीन दिलाती है कि अब अल्पसंख्यकों को कोई विशेष लाभ नहीं मिल रहा, जबकि अंदरखाने योजनाओं में उन्हें 15% आरक्षण देने की बात खुद उसके मंत्री राज्यसभा में स्वीकार कर रहे हैं। यह विश्वासघात है, लेकिन खुला नहीं, बहुत ही सुनियोजित और चालाकी से छिपाया गया विश्वासघात।
भाजपा के आईटी सेल और उसके प्रचार तंत्र ने ऐसा मानसिक बंधन रच दिया है जिसमें भक्तों को केवल वही दिखता है जो उन्हें दिखाया जाता है। उन्हें बताया गया कि ‘अब तुष्टिकरण (appeasement) नहीं होगा’, जबकि सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि वही तुष्टिकरण अब नीति बन गया है, बस नाम नहीं लिया जा रहा। यह अजीब स्थिति है जहाँ एक पार्टी अपने समर्थकों को गर्व बेचती है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समावेशिता दिखाती है। भक्त मंच पर सुनकर ताली बजाते हैं, लेकिन फाइलों में दर्ज हकीकत से अनजान रहते हैं। यही वह धोखा है जहाँ विचारधारा नहीं, सत्ता ही अंतिम लक्ष्य बन चुकी है।


