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सियासत

भाजपा के यूपी वाले अध्‍यक्ष जी के अरमां आंसुओं में बह गये!

अनिल सिंह

विपक्षी गठबंधन का हिस्‍सा होने के बावजूद रालोद अध्‍यक्ष जयंत चौधरी ने राज्‍यसभा में दिल्‍ली सेवा बिल पर भाजपा सरकार के खिलाफ मतदान नहीं किया, लेकिन हंफरी छूटने लगी है भाजपा यूपी के अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी की। भाजपा वाले चौधरी साहब परेशान हैं। उन्‍हें डर लग रहा है कि अगर रालोद वाले चौधरी साहब एनडीए में शामिल हो गये तो फिर उनकी बहुत जरूरत पार्टी को नहीं रह जायेगी। वह कतई नहीं चाहते कि रालोद वाले चौधरी एनडीए का हिस्‍सा बनें, लेकिन गुजरात वाले हैं कि सीट जीतने के लिये छोटे चौधरी तो क्‍या मुख्‍तार अंसारी को भी शामिल करने की जरूरत पड़ गई तो परहेज नहीं करेंगे और धो-पोंछकर मुख्‍तार को साफ-सुथरा भी कर देंगे।

दरअसल, चौधरी साहब जब यूपी के निवर्तमान वाले भाई साहब की कृपा से अध्‍यक्ष बने तो उनके दिल में अनेकों अरमान मचल उठे। स्‍वतंत्रत देव सिंह पटेल के मंत्री बनने के बाद बाकी कार्यकाल के लिये अध्‍यक्ष बनाये गये भूपेंद्र चौधरी साहब के सपने थे कि वह निवर्तमान अध्‍यक्ष की टीम को दरकिनार कर अपनी खुद की पूरी टीम गठित करेंगे, लेकिन उनके यह अरमान जल्‍द ही आंसुओं में बह गये। उन्‍हें ब‍स रिक्‍त स्‍थान की पूर्ति करने वाला अध्‍यक्ष बना दिया गया। अध्‍यक्ष जी केवल उन्‍हीं रिक्‍त पदों पर अपने लोग बैठा पाये, जो पदाधिकारियों के मंत्री बनने या कोई और जिम्‍मेदारी मिलने से खाली हुए थे। बाकी टीम पुरानी ही रह गई, उनके सपनों वाली टीम नहीं बन पाई।

अध्‍यक्ष जी अभी इस दर्द से बाहर निकलने की कोशिश कर ही रहे थे कि मीडिया में उनके पद से जल्‍द ही रूखसत होने की खबरें भी चलने लगीं। कारण बताया गया कि भाजपा जयंत चौधरी को एनडीए में शामिल करने वाली है इसलिये अब चौधरी साहब की जरूरत पार्टी को नहीं रह जायेगी। अध्‍यक्ष जी परेशान हुए और अपने लोगों को सफाई देने के काम पर लगाया कि वो कहीं नहीं जा रहे हैं, यह अफवाह है, झूठ है। दरअसल, यह अफवाह कहीं बाहर से शुरू नहीं हुई बल्कि उनकी अपनी ही मीडिया की टीम ने उनका काम लगाने का प्रयास किया। यह उस टीम का पुराना और जांचा परखा टोटका है कि पहले अध्‍यक्ष जी का काम लगवाओ, फिर मैनेज करने के नाम पर उनके गुड बुक में शामिल हो जाओ।

बीते दो अध्‍यक्षों के कार्यकाल में भी यह टोटका बहुत काम आया था। इसी टोटका के जरिये अध्‍यक्ष जी लोग साधे गये थे। दरअसल, इस टीम की कोटरी में एक खास वर्ग के चुनिंदा पत्रकार हैं, जो मीडिया विभाग की पिछली कोठरी में बैठकर अध्‍यक्षों को साधे रखने की रणनीति बनाते हैं। इस बार भी इसी प्रयास में अध्‍यक्ष जी की विदाई करवाने वाली खबरों को छपवाने तथा उसे मैनेज करके गुड बुक में शामिल होने की रणनीति बनाई गई, लेकिन यह बात कहीं से लीक होकर अध्‍यक्ष जी तक पहुंच गई। अध्‍यक्ष जी दुखी हुए। पूरी टीम बदलने का अरमान लेकर आये अध्‍यक्ष जी अब सब कुछ जानने के बाद भी मीडिया की टीम को नहीं हिला पा रहे हैं। यह टीम उनके लिये शिव जी की धनुष हो गई है, जो पूरी ताकत लगाने के बाद हिल नहीं रही है।

अभी अध्‍यक्ष जी अपनी मीडिया टीम से निपटने की रणनीति सोच रहे हैं, तो छोटे चौधरी ने नई मुश्किल खड़ी कर दी है। विपक्षी गठबंधन का हिस्‍सा होने के बावजूद रालोद वाले छोटे चौधरी बिल के खिलाफ मतदान करने की बजाय अनुपस्थित रहे तो अध्‍यक्ष जी का माथा ठनकने लगा है। वह इस अनुपस्थिति को जयंत चौधरी की रणनीति मानकर चौतरफा परेशान हैं। सूत्र बता रहे हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्‍व की बातचीत लगातार छोटे चौधरी और उनके लोगों के साथ चल रही है। मामला केवल सीटों पर आकर अटक रहा है। अगर सीटों के समीकरण फिट बैठ गये तो छोटे चौधरी भी ठीक उसी प्रकार एनडीए का हिस्‍सा होंगे, जैसे भाजपा और उनके नेताओं को पानी पी पीकर गरियाने वाले ओम प्रकाश राजभर हैं।

सम्पर्क- [email protected]

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