पुस्तक चर्चा : अंबेडकर और मार्क्स एक-दूसरे के पूरक

लखनऊ : जन संस्कृति मंच की ओर से कवि व लेखक भगवान स्वरूप कटियार की हाल में प्रकाशित ‘अन्याय की परम्परा के विरुद्ध’ पुस्तक पर यहां जयशंकर प्रसाद सभागार में सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष अजय कुमार ने कहा कि यह किताब हमारे समाज में व्याप्त अन्याय की विचारधारा और उसकी परम्परा से मुठभेड़ करती है। इस मायने में यह किताब मौजूदा समय में एक वैचारिक हस्तक्षेप है। 

‘अन्याय की परम्परा के विरुद्ध’ पुस्तक पर विचार व्यक्त करते विद्वान 

उन्होंने कहा कि डॉ. अम्बेडकर के बारे में इस पुस्तक में जो मूल्यांकन है, वह दलितों या गैर दलितों के द्वारा किये जा रहे मूल्यांकन से भिन्न है। तथ्यों के आधार पर यह बात सामने आती है कि डॉ. अम्बेडकर और कार्ल मार्क्स एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए ये दोनों सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में हमारे लिए जरूरी हैं। अगर अन्याय की परंपरा की बात करें तो आजादी के बाद की सत्ता ने अन्याय की परंपरा को आगे बढ़ाया है और इंसाफ का दमन किया है। तेलंगाना से बंगाल और फिर गुजरात की कहानी हमारे सामने है। वह चाहे नेहरू की सत्ता रही हो या फिर इंदिरा की। इसके बाद की सरकारें यहां तक कि मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सत्ता भी अन्याय की परंपरा को आगे बढ़ाती है। इन सभी के नेतृत्व में बनी सरकारों में कत्लेआम हुए।

सेमिनार को संबोधित करते हुए आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि भगवान स्वरूप कटियार की पुस्तक योजनाबद्ध तरीके से लिखे गए लेखों का संग्रह है। इतिहास की बहुत सारी पुस्तकों, यहां तक कि अयोध्या सिंह जैसे वामपंथी विचारक की पुस्तक को भी देखें तो ज्यादातर में अंबेडकर अनुपस्थित हैं। नेहरू जैसे लोगों को ही जगह मिली है। आज अंबेडकर का अधिग्रहण करने की दौड़ सी लगी हुई है। इसलिए कि अंबेडकर आज भारतीय संघर्षशील समाज के प्रतीक के रूप में हैं। अंबेडकर के अनुयायियों ने उनके साथ क्या सुलूक किया, यह जग जाहिर है। राजनीतिक लाभ लेने के लिए उनका अधिग्रहण तो किया, लेकिन उन्हें ही नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। आज दलित अंदोलन जिस मोड़ पर है और हिन्दुत्ववादी हमले जिस तरह हो रहे हैं, ऐसे में इस तरह के लेख और पुस्तक का आना अच्छी बात है। जिन्हें संदर्भों से अलग कर दिया गया है, उन्हें छोटी-छोटी पुस्तकों से सामने लाया जाना चाहिए। भारत में दो तरह की परंपरा रही है। एक बौद्धिक परंपरा और दूसरी सामाजिक हलचल के बीच से निकलने वाली परंपरा। पुस्तक के लेखों की धुरी के एक तरफ माक्र्स हैं तो दूसरी तरफ अंबेडकर। लेखक ने मार्क्स और अंबेडकर को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना है। इसके ढेर सारे उदाहरण भी दिए हैं, जिसमें अंबेडकर और मार्क्स एक जगह खड़े नजर आते हैं।

राजनीतिक चिंतक प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता, जिसमें बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर ने कभी भी संघ परिवार के किसी नेता के साथ कोई प्लेटफार्म शेयर किया हो। वह कभी भी ऐसे लोगों के साथ खड़े नजर नहीं आए। दूसरी तरफ अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी ने तीन बार भाजपा के साथ मिलकर सत्ता पर कब्जा किया। बाबा साहेब ने संघर्षों की शुरुआत ट्रेड यूनियनों के साथ ही और लगातार ट्रेड यूनियनों से संवाद बनाए रखा। भगवान स्वरूप कटियार की पुस्तक बड़े उद्देश्य को लेकर लिखी गई है। इसके दर्शन खंड में कटियार ने अपनी मूल बात रख दी है। कटियार की प्राथमिकता तर्क और वैज्ञानिकता के पक्ष में है। वैज्ञानिक समझ के साथ पाठक को तैयार करने का काम यह पुस्तक करती है। यदि तीनों खंडों की अलग-अलग पुस्तकें बनाई जाती तो इससे और भी अधिक लाभ मिलता। अन्याय की परंपरा की बात करें तो भारतीय वर्णाश्रम अपने आप में अन्याय की परंपरा रही है। अन्याय की परंपरा को चुनौती देने वाले संगठित और असंगठित लोग भी हुए हैं। अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाले नायकों का जिक्र इस पुस्तक में किया गया है। हमें उन नायको को याद करना याहिए। स्पार्टकस जैसे अदि विद्रोही पर हार्वड फास्ट ने लिखा। अगर 1930 के दशक की बात करें तो यह अन्याय और शोषण के विरुद्ध केंद्रीय दौर के रूप में रहा है। 

दलित चिंतक लालजी प्रसाद निर्मल ने कहा कि परिवर्तनों के पक्ष में लेखन हो रहा है। यह इतिहास के पुनर्लेखन की शुरुआत है, जो स्वागत योग्य है। दलितों और दलित आंदोलन में भटकाव आया है। भारतीय परिवेश में जब भी चिंतन होगा, जाति को अलग नहीं रखा जा सकता। लोहिया के उन विचारों को भी लिपिबद्ध करना चाहिए था, जिसमें उन्होंने जाति की श्रेष्ठता के चलते देश के गुलाम बनने की बात कही थी। बाबा साहेब चाहते थे कि अंग्रेजों के रहते जाति के सवाल पर कोई फैसला ले लिया जाय, नहीं तो आजादी के बाद अछूतों के साथ न्याय नहीं हो पाएगा। पूना पैक्ट अगर नहीं होता तो आज की स्थिति में ऐसा संभव नहीं था। जाति आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है और अपना रौद्र रूप प्रदर्शित कर रही है। इसके खिलाफ लेखन नहीं हो रहा है। जाति विनाश के उपाय नहीं खोजे जा रहे हैं। 

एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व स्त्री अधिकार आंदोलन की कार्यकर्ता ताहिरा हसन ने महिलाओं के संदर्भों में कहा कि अन्याय की सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं रही हैं। समाज में ही नहीं वे अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं है। घरों में उनके साथ दुव्र्यवहार होता रहा है। उन्होंने इसका प्रतिकार भी किया है। अन्याय की परंपरा के विरुद्ध महिलाएं भी आंदोलन कर रही हैं। एक तरफ 33 प्रतिशत आरक्षण की बात तो हो रही है, लेकिन ज्यादातर दलों की इच्छा इसके विपरीत है। अंबेडकर पहले नेता थे जिन्होंने जाति और धर्म के आधार पर होने वाले शोषण को पकड़ा था। अंबेडकर और माक्र्स में बड़ी समानता है। दोनों पूंजीवाद के खिलाफ थे। इस समानता को कटियार जी अपनी किताब में तर्कों और तथ्यों के साथ लाते हैं।

कार्यक्रम के आरंभ में जसम के प्रदेश अध्यक्ष व कवि कौशल किशोर ने कटियार की पुस्तक का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कवि के रूप में श्री कटियार के चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और पांचवें की तैयारी चल रही है। अब यह पुस्तक आने से उनके एक नए नजरिये के बारे में पता चला। उनकी यह पुस्तक अन्याय की परंपरा के विरुद्ध कटियार की विचार यात्रा है। इसका नजरिया वैज्ञानिक है। इस यात्रा के मूल में अन्याय को मिटाना और नई दुनिया का निर्माण करना है। वर्ग और वर्ण पर आधारित व्यवस्था के साथ ही ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद भी अन्याय का हिस्सा रहा। पुस्तक में अन्याय और शोषण से परिचित कराने के साथ ही इसे बदलने का मकसद भी नजर आता है। यह पुस्तक हमारी समझ को नया आयाम और दिशा देती है। परिवर्तन की चेतना को मजबूत करती है। यह पुस्तक सवालों के जवाब तलाशने में भी सहायक होगी। इस पुस्तक में तीन खंड पहला दार्शनिक विमर्श, दूसरा सामाजिक अन्याय की परंपरा और तीसरा विकल्प है। अगर एक तरफ अन्याय है तो दूसरी तरफ उसके बरक्स न्याय के लिए संघर्ष है। अन्याय के प्रतिकार में न्याय की शक्तियों को मजबूत करना इस पुस्तक की मूल चिंता है। इसके मूल में इस धरती से अन्याय की व्यवस्था को समाप्त कर समता व न्याय पर आधारित व्यवस्था का निर्माण है। न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने में यह पुस्तक हस्तक्षेप करती नजर आती है, क्योंकि न्याय आज सबसे दुर्लभ है।

इस मौके पर पुस्तक के लेखक भगवान स्वरूप कटियार ने अपनी किताब के हवाले से कहा कि जब से समाज बना, तब से हम बेहतर व मानवीय समाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विडम्बना है कि सभ्यता व विकास के दावे के इस दौर में जो समाज मिला, वह आज सबसे ज्यादा विकृत रूप में है। मार्क्स व अंबेडकर का मकसद बदलाव का था। अंबेडकर के हस्तक्षेप से ही सामाजिक न्याय का मुद्दा राजनीतिक मुद्दा बना। जन के बिना इतिहास तो क्या कोई भी रचना पूरी नहीं हो सकती। महान रोम हो या चीन की दीवार, ताजमहल हो या खजुराहो, इसे बनाने वाले कारीगर व मजदूर क्या इतिहास के हिस्से नहीं हैं ? वास्तव में इतिहास बनाने वाली ताकत जनता है। जो लोग इतिहास व विचार के अन्त तथा आधुनिक पूंजीवाद को विकल्पहीन बता रहे हैं, वे जनता के विरुद्ध साजिश रचते हैं। जबकि सच्चाई है कि विषम परिस्थितियों में संघर्ष करके जनता आगे बढ़ी है। उसका यह संघर्ष आज भी जारी है। इसी संघर्ष ने हमें लिखने के लिए प्रेरित किया है।  हमारी किताब या हमारा लेखन अन्याय की परम्परा के विरुद्ध एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।

कार्यक्रम का संचालन जसम लखनऊ के संयोजक श्याम अंकुरम ने किया। इस मौके पर सुभाष राय, नसीम साकेती, दयानंद पांडेय, नलिन रंजन सिंह, राजेश कुमार, प्रदीप घोष, आदियोग, कल्पना, अलका पांडेय, किरन सिंह, ऊषा राय, जुगुल किशोर, केके वत्स, रविकांत, बी एन गौड़, अशोक चन्द्र, उमेश चन्द्र, ओ पी सिन्हा, धर्मेन्द्र कुमार, के के शुक्ला, सत्येन्द्र कुमार आदि उपस्थित रहे।

श्याम अंकुर से संपर्क : 9454514250 

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