इस अख़बार ने लिख दिया- सरकार के आर्थिक कदम असफल हैं और वह लूटपाट में लगी है!

सत्येंद्र पीएस-

बहुत कड़ी टिप्पणी है। इस युग में कोई सम्पादक इस तरह सीधे सीधे लिखता है क्या कि सरकार के आर्थिक कदम असफल हैं और वह लूटपाट में लगी है? हिंदी में यह लेख भले न पढ़ा गया, लेकिन वैश्विक रूप से बहुत पढ़ा गया है।

लेकिन तालिबानी स्टाइल में देखें तो आएगा मोदी ही! अंग्रेजी वाले सरकार नहीं बनाते।

अमेरिका रूस ने लंबी कवायद की कि अफगानिस्तान सुधर जाए। अफीम छोड़ दे। महिलाओं को सम्मान मिले। लोग पढ़ें लिखें। इन देशों ने इंफ्रा पर भारी भरकम खर्च किया। यूनिवर्सिटी खोली, सड़क, हवाई अड्डे बनाए।

लेकिन जनता हमेशा इसके फेवर में रही कि महिलाओं को काले बोरे में भरकर रखा जाना चाहिए, उन्हें बच्चे पैदा करने की मशीन होने तक सीमित रहना चाहिए। फवाद अंद्राबी जैसे लोक गायकों को मार डाला जाना चाहिए। अफगनिस्तान ने यही विकल्प चुना।

भारत में भी वही हाल है। 100 रुपये लीटर पेट्रोल हो जाए। आईआईटी की फीस 10 लाख रुपये हो जाए। मेडिकल की आधी सीटें प्राइवेट हो जाएं और एक एक करोड़ रुपये में एमबीबीएस की डिग्री बिके, आदिवासी दलित ट्रक के पीछे बांधकर घसीटे जाएं और मार डाले जाएं।

लोगों के गहने और घर बिक जाएं। किसानों का सिर फोड़कर मार दिया जाए। अंधों को बेतहाशा पुलिस से पिटवाया जाए। टीचर भर्ती घोटाले का विरोध कर रहे बच्चों को पीट दिया जाए।

प्राचीन गौरव वापस आ रहा है, यही सब देश का प्राचीन गौरव था, लोगों को पसन्द है।



 

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