
दिनेश श्रीनेत-
पूर्णत्व को प्राप्त करने के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता है. इसलिए अपने जीवनकाल में बुद्ध नहीं सिद्धार्थ को पाना है. वैसी प्रश्नाकुलता, वैसी जिज्ञासा, वैसी करुणा, वैसा त्याग और वैसा साहस कि सारा सुख-वैभव छोड़ सिर्फ भीतर और आकाश में सितारों की रोशनी के सहारे अनजाने मार्ग की तरफ निकल पड़ें.
इतना जैसे पर्याप्त नहीं. सिद्धार्थ को उन पर भी संशय था जो मार्ग दिखाने का दावा करते हैं. यदि सांसारिकता को त्यागा तो हठधर्मी संन्यासियों का भी अंधानुकरण न किया. हम बुद्ध को ज्ञान का मार्ग मानते हैं, हम बुद्ध की उपासना करते हैं, उनकी मूर्तियां अपने घर लाते हैं, लेकिन हम सिद्धार्थ नहीं बन पाते.
एक साधारण सांसारिक व्यक्ति जिसकी पत्नी भी है, बेटा है, माता-पिता हैं. हम किसी ज्ञान के वृक्ष की छांव नहीं खोजते हैं. हम मन को निर्मल रख किसी सुजाता के हाथों से खीर नहीं ग्रहण कर पाते. हम रोगी के दुःख से सहज रूप से व्यथित नहीं हो पाते. मृत्यु हमारे भीतर कोई वीरानी नहीं भर देती. हम बुढ़ापे से जर्जर शरीर को जीवन की अंतिम परिणति के रूप में नहीं देख पाते.
इसके बाद हम बुद्ध से ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं. हमें एक ही बार में वह सब कुछ चाहिए जिसे हासिल करने के लिए बुद्ध ने लंबी यात्रा तय की थी. हम बिना किसी अंतर्द्वंद्व के शांति की तलाश में भाग रहे हैं. भीतर प्रश्न नहीं हैं मगर बने-बनाए जवाब की तलाश कर रहे हैं. बाहर दीप जलाते हैं जबकि भीतर घुप अंधेरा है.
बुद्ध को पाने से पहले सिद्धार्थ बनना होगा. बुद्ध शायद इकलौते दार्शनिक थे जिन्होंने कहा था कि उनकी कही बातें भी अक्षरशः न मानी जाएं.
वे कहते है, “किसी बात को सिर्फ इसलिए मत मानो कि ऐसा सदियों से होता आया है, परंपरा है या सुनने में आई है. इसलिए मत मानो की किसी धर्मशास्त्र, ग्रंथ में लिखा हुआ है या ज्यादातर लोग मानते हैं. किसी धर्म गुरु, आचार्य, साधु-संत, ज्योतिषी की बात को आंख मूंदकर मत मान लेना. किसी बात को सिर्फ इसलिए भी मत स्वीकार करो कि वह स्वयं मैंने कही हैं, हर बात को पहले बुद्धि, तर्क, विवेक, चिंतन व अनुभूति की कसौटी पर तोलना, कसना, परखना और यदि बात स्वयं के लिए, समाज व संपूर्ण मानव जगत के कल्याण के हित लगे तो ही मानना. अपने दीपक स्वयं बनो…”
यह विडंबना ही है कि ऐसा करने वाले के अनुयायियों ने उनके नाम पर भी मठ और संप्रदाय बना डाले.
मुझे बुद्ध अपने उत्तरार्ध में नहीं पूर्वार्ध में आकर्षित करते हैं. किसी अनंत को रास्ता वहीं से खुलता है.
बुद्ध की जन्मस्थली मेरे गांव से बहुत करीब सीमा से लगी नेपाली भूमि में पड़ती है. बचपन से यह खयाल मुझे रोमांचित करता आया है कि सैकड़ों बरस पहले किसी ने इस धरती पर किसी भी साधारण मनुष्य की तरह कदम रखा था. अपने शब्दों और विचारों से वह अभी जाने कितनी सदियों तक हमारे भीतर जीवित रहेगा.
इक्कीसवीं सदी सचमुच जैसे बुखार से तप रही है. वो सारे मूल्य आज मानवता के लिए और ज्यादा प्रासंगिक हो चुके हैं. अहिंसा, करुणा और शांति. इसी की तलाश में सिद्धार्थ निकले थे. इसी की तलाश आज भी जारी है.
बुद्ध की प्रतिमा घर में लाकर रखने से बेहतर है, अपने भीतर सिद्धार्थ को खोजना, इस दुनिया के दुःखों का उत्तर तलाशने के लिए खुद को एक दीप की तरह प्रज्ज्वलित करना.


