एक समय था जब बजट के अगले दिन अख़बार हाथ में लेते ही पहला पन्ना नहीं, बल्कि भीतर के पन्ने खोलने का मन करता था। आँकड़े पढ़े जाते थे, शब्द तौले जाते थे, घोषणाओं के पीछे की मंशा खोजी जाती थी। संपादकीय पन्नों पर बहस होती थी — किसे क्या मिला, किससे क्या छीना गया, और देश की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है।
आज तस्वीर बिल्कुल उलट है। अब अख़बार उठाते ही लगता है जैसे किसी सरकारी ब्रोशर को पलट रहे हों। हर जगह मुस्कुराते चेहरे, चमकदार ग्राफिक्स, बड़े-बड़े फॉन्ट में ‘ऐतिहासिक’, ‘क्रांतिकारी’, ‘स्वदेशी कवच’ और ‘अमृतकाल का बजट’ जैसी सुर्खियां। सवाल कहीं नहीं, सिर्फ़ सलाम है। पहले बजट पर विवेचना होती थी, अब बजट की अर्चना हो रही है।
विश्लेषण गायब, सजावट हाज़िर
बजट समीक्षा अब तथ्यों की पड़ताल नहीं रही, बल्कि डिजाइन और इन्फोग्राफिक्स का उत्सव बन चुकी है। आधे पन्ने पर प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की तस्वीरें, नीचे तीर-तुक्कों से भरे आंकड़े, और बीच में ऐसा टेक्स्ट, जो सवाल नहीं उठाता — बस सरकारी प्रेस रिलीज़ को नए शब्दों में दोहरा देता है।
- किस सेक्टर को कितना नुकसान हुआ?
- महंगाई पर क्या असर पड़ेगा?
- गरीब, किसान, नौकरीपेशा, मिडिल क्लास के लिए असली मायने क्या हैं?
ये सवाल अब हेडिंग से पहले ही दम तोड़ देते हैं।
समीक्षा नहीं, रिचार्ज पैक पत्रकारिता
आज की बजट कवरेज ‘रिचार्ज पैक’ जैसी हो गई है —
- थोड़ा डेटा,
- थोड़ी तस्वीरें,
- थोड़ी तारीफ़,
- और ऊपर से “एक्सपर्ट बोले” का स्टिकर।
जिन विशेषज्ञों को बुलाया जाता है, वे भी अब सवाल पूछने नहीं, बल्कि सरकार की लाइन को संतुलित भाषा में दोहराने आते हैं। असहमति, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण को या तो “नकारात्मक” कहकर काट दिया जाता है, या फिर जगह ही नहीं दी जाती।
डर, निर्भरता और विज्ञापन का दबाव
इस गिरावट की वजह सिर्फ़ पत्रकारिता की आलस नहीं है। इसके पीछे डर है, निर्भरता है और विज्ञापन का दबाव है। सरकारी विज्ञापन, कॉरपोरेट साझेदारी और डिजिटल एल्गोरिद्म ने न्यूज़रूम को यह सिखा दिया है कि सवाल पूछना जोखिम है, जबकि तारीफ़ करना सुरक्षित कारोबार। नतीजा ये कि बजट जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी अब राजनीतिक प्रचार सामग्री में बदलती जा रही है।
बजट लोकतंत्र का दस्तावेज़ था, अब पोस्टर बन गया है
बजट कभी देश की आर्थिक आत्मकथा हुआ करता था। आज वह सोशल मीडिया के लिए तैयार किया गया पोस्टर है। जहां पहले अख़बार ज्ञान देता था, अब वह ‘नैरेटिव’ देता है। जहां पहले पत्रकार विवेचक था, अब वह भक्त-टाइप पैकेजर बन चुका है।
सही ही कहा गया है — अब बजट पर विवेचना नहीं, अर्चना हो रही है। और अर्चना में सवाल पूछने की परंपरा नहीं होती, बस सिर झुकाया जाता है।
वह भी क्या दिन थे जब बजट के अगले दिन के अखबारों के पन्नों में ज्ञान और समीक्षा हुआ करती थी। तब लपक कर अखबार उठाने और पढ़ने का मन होता था। अब तो सिर्फ सजावट और भर-भर का तारीफें। बजट समीक्षा की कला में ऐसी गिरावट आई है कि क्या कहें। अब तो एक हेडिंग के अंदर झांकने का मन नहीं होता। पुष्य मित्र, वरिष्ठ पत्रकार


