
संजय कुमार सिंह
आज खबर कोलकाता की है जो वहां कल आयोजित मार्च के दौरान हुई हिंसा से संबंधित है। खबरों के अनुसार इसमें 15 पुलिस वाले जख्मी हुए हैं। द टेलीग्राफ के अनुसार यह संख्या कम से कम 36 है। 126 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस वालों के घायल होने का मतलब बताने की जरूरत नहीं है। द टेलीग्राफ ने कल ही बताया था कि छात्रों की यह रैली अवैध है और हिंसा होने की आशंका (अलर्ट) है। इसके बावजूद आंदोलकारियों के घायल होने की खबर नहीं है जो आम तौर पर होती है पर पुलिस वालों के घायल होने की खबर भी सबमें नहीं है।
इसके दो ही मतलब हो सकते हैं। पहला कि उनके घायलों की संख्या छिपाई गई है जो (विरोधी) मीडिया के रहते संभव नहीं है और दूसरा यह कि आंदोलनकारी जरूरत और उम्मीद से ज्यादा हिंसक थे। यह मार्च कोलकाता में डॉक्टर से बलात्कार और हत्या के विरोध में किया गया था। द टेलीग्राफ में कल छपी खबर के अनुसार, ममता बनर्जी के इस्तीफे की मांग पर मार्च की अपील और प्रेस कांफ्रेंस करने वालों में एक, शुभंकर हलदर आरएसएस से जुड़े हैं। मामला पूरी तरह साफ है। पहले तो बलात्कार और हत्या को राजनीतिक रंग दिया गया। इसपर शोर मचाया गया और उतने से भी मन नहीं भरा तो कल का मार्च था।
ठीक है कि लोकतंत्र में किया जा सकता है लेकिन भाजपा और आरएसएस के बारे में जो जानकारी सामने आ रही है उसे छपना तो चाहिये। यह ठीक नहीं है कि किसी सरकार को बदनाम करने वाली खबरें तो प्रमुखता से छपें पर बदनाम करने वाले का नाम छिपाया जाये जबकि वह खुद नहीं छिपा रहा है। ऐसे में कल का मार्च और उसमें हिंसा, पुलिस वालों का घायल होना बड़ी बात है लेकिन आज खबरें वैसे नहीं हैं जैसे होनी चाहिये। द टेलीग्राफ ने बैनर शीर्षक बनाया है, द डे ऑफ द लुम्पेन। (लुम्पेन शब्द का मतलब है मानसिक रूप से सुस्त, बिना सोचे-समझे काम करने वाले यानी मूर्ख या बौद्धिक तीक्ष्णता की कमी से चिह्नित। इसका मतलब बेदखल और उजाड़ दिए गए व्यक्ति से भी है जो उस आर्थिक और सामाजिक वर्ग से कटे हुए हैं।)
आज की कुछ खास खबरें
- इसके अलावा जो खबरें हैं उसमें एक यह भी है कि बहुत आम परिवार से आने वाले अमित शाह के बेटे जय शाह आईसीसी के सबसे युवा प्रमुख बन गये हैं और भाजपा की लोकप्रिय राजनीति ने इंदिरा गांधी के पोते वरुण गांधी और बहू मेनका गांधी को सामान्य राजनीति में घेर कर रखा है।
- एक और खबर जो महत्वपूर्ण है वह यह कि आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी दवाइयों के भ्रम फैलाने वाले विज्ञापनों से संबंधित नियम को खत्म करने वाले सरकारी आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया है। यह एक जुलाई का आदेश था। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में दो कॉलम में है और द हिन्दू में पांच कॉलम में।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फोन से संदेश डीलिट करना या फॉरमैट करना अपराध नहीं है।
- दो दलित लड़कियां उत्तर प्रदेश में पेड़ से टंगी मिलीं।
- उत्तर प्रदेश में सड़क साफ करने के लिए थाने पर बुलडोजर चला।
- रेलवे बोर्ड को पहला दलित प्रमुख मिला।
कहने की जरूरत नहीं है प्रदर्शन में भाग लेने वालों के आचार-व्यवहार कार्य आदि से ही तय हुआ होगा कि अंग्रेजी में उन्हें लुम्पेन लिखा जाये और चूंकि इसके लिए हिन्दी में उपयुक्त शब्द नहीं है इसलिए मैंने डिक्सनरी की मदद ली। आज द टेलीग्राफ का पूरा पहला पन्ना इसी से संबंधित खबरों और फोटो से भरा है। खबर के अनुसार, भाजपा नेता शुभेन्दु अधिकारी ने 133 लोगों के घायल होने की खबर दी है और उनके अनुसार 17 महिलायं हैं। जाहिर है, अच्छी भिड़ंत हुई और इसकी जरूरत नहीं थी पर खबर क्या और कैसे है, जानने के लिए आगे पढ़िये।
अमर उजाला में आज लीड का शीर्षक है,”बंगाल में उबाल :ममता का इस्तीफा मांग रहे प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज”। उपशीर्षक है, कोलकाता और हावड़ा में छात्रों पर छोड़ी पानी की बौछारें, आंसू गैस के गोले दागे। दूसरा उपशीर्षक है, पुलिस कार्रवाई के विरोध में आज भाजपा का 12 घंटे का बंगाल बंद। आप समझ सकते हैं कि भाजपा ने कैसे बलात्कार और हत्या के एक मामले को मुख्यमंत्री के खिलाफ आंदोलन और फिर बंगाल बंद में बदल दिया और अब खुलकर सामने आ गई है। डबल इंजन वाले भाजपाई राज्यों में बलात्कार और महिला अपराध की घटना होती है तो जो होता है वह सबको पता है। फिर भी इस मामले में कुछ भाजपा विरोधी पत्रकार भी ममता विरोधी हो गये थे यह भाजपाई रणनीति व दबाव के कारण ही होता है।
जो मामला है उसे द टेलीग्राफ ने लिखा है। हरेक पहलू को लिखा है। मुझे लगता है कि अमर उजाला ने कुछ बातें छोड़कर या बिना लिखे भाजपा और परिवार का समर्थन किया है। बाकी अखबार शांत हैं या अंदर के पन्ने पर अपने ढंग से राजनीति कर रहे हों जो उनका काम नहीं है। काम तो समर्थन करना भी नहीं है लेकिन खबर नहीं छाप कर भी समर्थन किया जाता है। नवोदय टाइम्स में शीर्षक है, बंगाल में फिर बवाल। इससे भी वास्तविकता का पता नहीं चलता है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, कोलकाता विरोध प्रदर्शन झड़पें हुईं, राज्यपाल ने कहा यह अंत की शुरुआत है।
भाजपा और आरएसएस के प्रयासों की जानकारी हो तो इस शीर्षक का मतलब है कि राज्यपाल भी नौकरी देने वालों की सेवा में मैदान में हैं। अगर निष्पक्ष पर्यवेक्षक की राय के रूप में देखें तो मुख्यमंत्री के खिलाफ सख्त टिप्पणी है। इंडियन एक्सप्रेस ने 1987 की हड़ताल में (अरुण शौरी के संपादन काल में) यह आरोप लगाया था कि कांग्रेस उसके खिलाफ है। तब मुझे लगता था कि अखबार सही है लेकिन तब के उसके लोगों और अब संघ व भाजपा के प्रति उसका झुकाव छिपा हुआ नहीं है। यह अलग बात है कि कभी-कभी स्वतंत्र पत्रकारिता भी यहां दिखती है। पर शीर्षक में भाजपा और संघ के प्रति झुकाव कैसे है वह आप समझ सकते हैं। सोशल मी़डिया के संघी ट्रोल यही कहते हैं कि आप भाजपा के विरोधी हैं मतलब (भाजपा विरोधी) कांग्रेस या आम आदमी पार्टी के समर्थक हैं। इसे इंडियन एक्सप्रेस पर लागू करना है कि नहीं, आप तय कीजिये।
टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। शीर्षक है, कोलकाता में आरजी कार मामले में विरोध प्रदर्शनकारियों और पुलिस में संघर्ष के बाद 245 गिरफ्तार। इससे भी पुलिस या सरकार की ज्यादती का पता चलता है जबकि 36 पुलिस वालों के घायल होने पर भी किसी प्रदर्शनकारी के घायल होने की खबर नहीं है जबकि भाजपा शासित राज्यों में पुलिस ने लोगों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा है, आम कार्यकर्ताओं को तो छोड़िये बड़े नेताओं से जबरदस्ती, धक्का मुक्की आदि होती रही है। यह अलग बात है कि बाद में उनमें से किसी का दिल जीत लिया गया। कीमत जो दी गई और जरूरत क्यों थी या जिसकी थी उसी के मामले में ऐसा क्यों हुआ यह सब आप जानते हैं।
दिलचस्प यह है कि कोलकाता पुलिस ने फिर भी मनमानी की है, भाजपा के कार्यवाहक अध्यक्ष ने इसपर सवाल उठाया है और टाइम्स ऑफ इंडिया ने दो कॉलम में छापा है, नड्डा ने पुलिस की मनमानी पर सवाल उठाया। अंदर भी एक खबर है, पुलिस ने 11 एफआईआर दर्ज की। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर फोटो के साथ है। शीर्षक है, कोलकाता का प्रदर्शन हिंसक हुआ, पुलिस ने बल प्रयोग किया। द हिन्दू में खबर है, कोलकाता में प्रदर्शनकारी और पुलिस भिड़े, भाजपा ने बंद की अपील की। उपशीर्षक में बताया गया है कि राज्य सचिवालय जाने वाली सड़क पर दोनों पक्षों में जमकर संघर्ष हुआ, पुलिस ने भीड़ को तिर-बितर करने के लिए पानी के फव्वारे और आंसू गैस के गोले छोड़े, 126 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया 15 पुलिस वाले जख्मी।


