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सुख-दुख

कैंसर हो ही जाए तो क्या करें!

रवि प्रकाश-

मैंने कई ऐसे लोगों की कहानियाँ पढ़ी है, जिन्होंने कैंसर के अंतिम स्टेज में भी शानदार तरीक़े से अपनी ज़िंदगी जी। ऐसे कुछ लोग कैंसर से पूरी तरह मुक्त भी हुए और आज बिल्कुल सामान्य हैं। मनीषा कोईराला, युवराज सिंह, लांस आर्मस्ट्रांग, लीजा रे आदि इसके उदाहरण हैं। मैंने इन चारों की किताबें पढ़ी है। कैंसर हो जाना क़तई ठीक बात नहीं। फिर भी अगर कैंसर हो जाए तो क्या करें?

क्या रोना, पछताना, खुद को कोसना…इसका उपाय है। जवाब है- नहीं। कैंसर हो जाने के बाद उसका प्रबंधन ही एकमात्र उपाय है, जिससे हम अपनी और अपने परिवारजनों की ज़िंदगी ठीक रख सकते हैं। मैं विभिन्न मंचों पर ये बातें बताता हूँ। राँची के नामी मेडिका अस्पताल में अपनी तरह के दूसरे कैंसर सर्वाइवर्स से बात करते हुए मैंने फिर से यही बातें दोहरायीं।

मैं लंग कैंसर के अंतिम स्टेज का मरीज़ हूँ और कैंसर के साथ रहना ही अब मेरी पहचान है। तो, अब जब कैंसर के साथ ही रहना है, तो मेरे पास क्या विकल्प हैं। या तो मैं रोकर अपनी और अपने शुभेच्छुओं-परिजनों की ज़िंदगी ख़राब करूँ, या फिर कैंसर का इलाज कराते हुए अपनी बाक़ी बची ज़िंदगी को और खूबसूरत बनाऊँ। इतनी ख़ूबसूरत, कि कल इसकी कहानियाँ सुनायी जा सकें।

मैंने अपने लिए दूसरा विकल्प चुना है। क्योंकि, रोना इसका समाधान नहीं है। ईश्वर न करें कि कोई कैंसर से पीड़ित हो लेकिन अगर कैंसर हो जाए, तो इससे घबराकर ज़िंदगी से भागने की ज़रूरत नहीं। पिछले 18 महीने से कैंसर के साथ रहते हुए मैंने यही सीखा है। शुक्रिया डॉ गुंजेश और आनंद जी, मुझे बुलाने के लिए और प्रभात खबर के मित्रों का धन्यवाद, इसके प्रकाशन के लिए। #Cancer #LivingWithLungCancerStage4


WorldNoTobaccoDay पर एक राँची के एक होटल में आयोजित कार्यक्रम में मैंने बताया कि मैं स्मोकर नहीं हूँ। मैं सिगरेट नहीं पीता। तंबाकू का किसी और रुप में भी सेवन नहीं करता हूँ। फिर भी मुझे फेफड़ों का #कैंसर हुआ। इसका पता चला, तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी। अब मैं अंतिम स्टेज के कैंसर से जूझ रहा हूँ। जो कभी ठीक नहीं होगा। मुझे अपनी अंतिम साँस तक इस कैंसर के साथ ही रहना होगा। जानते हैं क्यों? क्योंकि, आप सिगरेट पीते हैं। इससे आप खुद को कैंसर के लिए vulnerable बनाते ही हैं, अनजाने में दूसरों की ज़िंदगी भी दांव पर लगा देते हैं। इसलिए, आज ही तंबाकू छोड़िए। खुद स्वस्थ रहिए, सबको स्वस्थ रखिए।


जितेंद्र पात्रो-

Ravi Prakash : a true living legend.

जानता हूँ समय कम है पर जिए जा रहा हूं,
एक सपना अधूरा है जिसे पूरा किए जा रहा हूं !
याद मुझे मुस्कुराते हुए करना यारों,
तुमको जो आज हंसाएं जा रहा हूं !!

इस बार रांची की यात्रा बहुत कुछ खास और लंबी रही। यह कहूं कि मुझे एक फ़रिश्ते जैसा दोस्त मिल गया, जिसके साथ बहुत ज्यादा समय बिताना चाहता था कुछ गलत न होगा।

कोलकाता से रांची पहुंचते ही मैं सीधा अशोकनगर,राँची रवि प्रकाश जी के निवास स्थान पर पहुंचा। रवि प्रकाश जी एक वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी के रिपोर्टर भी हैं। फिर उनसे बातचीत शुरू हुई। किताबों की बातें फिर जीवन की बातें।

रवि प्रकाश जी को फोर्थ स्टेज का लंग कैंसर है। पर मैंने रवि जी में एक जिंदादिली और एक परफेक्ट फिट & फाइन इंसान को देखा।

एक ऐसा इंसान जो जानता है कि उसका आने वाला कल क्या होना है पर वह आज वह सब कुछ कर गुजरना चाहता है जिसके लिए वह बना है। रवि भैया हर 3 महीने में एक बार मुंबई आते हैं और टाटा अस्पताल से काम निपटने के बाद हमेशा प्रकृति का आनंद लेने कभी गोवा तो कभी कश्मीर चले जाते हैं।

रवि भैया ने खुद को एक्टिव रहने को ही जीवन का मोटो बना लिया है और उनकी इस एक्टिंवनेस का मैं बहुत बड़ा फैन हूं हूं।

लगातार तीन दिन हमारी बैठक होती रही और तीनों दिन मैंने रवि भैया से कुछ न कुछ नया सीखा। पत्रकारिता से लेकर साहित्य जगत की हर बात और हर कंट्रोवर्सी और उससे निपटने के रास्ते।
बिहार के बाढ़ ग्रसित इलाकों के दौरे से लेकर कोलकाता की खट्टी मीठी यादों एवं अनुभव पर बातचीत करना बड़ा सुखद रहा। जुगाड़ लगाना तो कोई इनसे सीखे।

उनसे पत्रकारिता और राजनीति के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला और सबसे महत्वपूर्ण बात जो मैंने सीखी जिंदगी के इस पड़ाव पर भी मुस्कुराते रहना। 2020 के उन क्षणों को मैं याद कर रहा था जब मैं भी कुछ हद तक इन्हीं चीजों से गुजरा था।

रवि जी की एक विशेषता मुझे यह भा गई कि वे अपने हर काम को खुद करना और अपनी बातों पर टिके रहना जानते हैं, इसके लिए किसी पर निर्भर नहीं है।
a totally self dependent personality.

इस स्टेज पर जीवन अत्यंत पीड़ादायक होता है। शरीर और शरीर के अंग साथ देना छोड़ देते हैं। पर रवि भैया ने जैसे अपने शरीर के हर अंग पर काबू पा लिया हो। नियमित योग और चलने को इन्होंने अपने रूटीन बना लिया है।

एक जिंदादिल पत्रकार की जिंदादिली को सलाम।
कुछ कर गुजरने के उनके ज़ज्बे को सलाम।
सच को समझने के उनके हौसले को सलाम।
एक मुस्कुराते हुए चेहरे को प्यार भरा सलाम।

जिंदगी जीना कोई आपसे सीखे …!!

याद है न आपके साथ हमारा अनुबंध 20 साल का है !!
आप जल्दी ठीक हो जाइए, एक बहुत लंबी पारी खेलनी है हमें !


प्रवीण तिवारी-

बारह जून को रवि भैया ( Ravi Prakash ) का चौबीसवाँ सालगिरह था।

लंग्स कैंसर के फोर्थ स्टेज में होने के बावजूद इन्होंने अपने जीवन को एक नया आयाम दिया है। अदम्य ऊर्जा और जिजीविषा के परिचय बन गए हैं। जिंदगी के हर पल को खूबसूरती से जीने की कला इनसे सीखी जा सकती है। इन्होंने अपनी जिंदगी को बांटा है। कभी कोई तराजू ,बटखरा नहीं रखा। सबको बराबर से प्यार दिया। हमेशा बाहें फैलाए रखा। जब भी मिले, बात भी की तो गर्मजोशी से ही। कोई निराशा- भाव नहीं। यह उनके व्यक्तित्व का ही कमाल है। अंदर-बाहर एक जैसा। वे मिसाल हैं। एक और बात कि उनका ढाँचा ही अलग किश्म का है। कस्बाई पत्रकारिता से लेकर संपादकीय तक का लंबा वक्त इन्होंने गुजारा। बीबीसी में भी खूब चर्चित रहे हैं। इनका मिज़ाज कभी नहीं बदला।

और इस दौरान भाभी के साथ-साहस को भी हमारा सैल्यूट है।

यक़ीन करिए पाज़ ने कभी इनके लिए ही लिखा होगा-

करता है अज्ञात तैयार अपने को अगली
चढ़ाइयों के लिए।

आप दोनों को तमाम शुभकामनाएं और प्रणाम। बधाई। जय हो।

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