संजय रॉबिन-
कितनी दुःखद बात है कि जिस हार्ट सर्जन ने सैकड़ों दिल के मरीजों को दिल की बीमारी से बचने की सैकड़ों सलाहें दी होंगी, उनका खानपान ठीक कराया होगा, उन्हें व्ययाम की सलाहें दी होंगी, उन्हें सिगरेट शराब से दूर कराया होगा, लो केलोस्ट्रोल खाने की लिस्ट थमाई होंगी, तनावमुक्त रहने के तरीके बताए होंगे, वही युवा होनहार डॉक्टर, एक मेजर हार्ट अटैक से अपने को नहीं बचा पाया!
यहीं ईश्वर और साइंस में फर्क नज़र आता है। सच यही है कि ईश्वर ने सांसें लिख कर भेजी हैं, साइंस चाहे जितनी मर्जी तरक्की कर ले, होता वही है, जो ईश्वर की इच्छा होती है अच्छे कर्म और ईश्वर की आराधना करने के लिए हमे बुढ़ापे का इंतज़ार नही करना चाहिए, ना जाने कब किसका बुलावा आ जाए। 39 वर्षीय इन डॉक्टर की असमय मृत्यु पर मुझे बहुत अफसोस है, ग्रैडलीन रॉय, CMC वेल्लूर मे हार्ट सर्जन थे, और एक मेजर हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें और उनके परिवार को यह सदमा सहने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शांति
प्रदीप चौधरी-
39 साल के एक युवा कार्डियोलॉजिस्ट की अस्पताल में राउंड लेते समय ही अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी। न वे मोटे थे, न इलाज मिलने में देर हुई। सब कुछ सैकेंड की दूरी पर था, फिर भी नहीं बच पाए। हाल ही में एक डॉक्टर की कैथलैब में ही मृत्यु हुई थी। डॉ साहब को मेरी तरफ़ से विनम्र श्रद्धांजलि। पर ऐसे में गोल्डन ऑवर वाली अवधारणा पर भी भरोसा डगमगाने लगता है।

आधुनिक विशेषज्ञों ने कारण बताए हैं, जिसमें क्या हुआ इसका जबाब मिल भी जाता है, पर क्यों – इसका मुझे नहीं मिला। मैं आयुर्वेद की दृष्टि से अगर देखता हूँ तो असली जड़ कहीं और दिखती है।
आचार्य चरक और आचार्य सुश्रुत दोनों एक बात कहते हैं। “वेगान् धारयतो रोगान् बहवः सम्प्रजायन्ते।” (चरक)
जो लोग शरीर के प्राकृतिक वेगों को रोकते हैं, उनमें अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। “वेगान् धारयतो मृत्युर्भवति।” (सुश्रुत)
वेगों को रोकने वाला मनुष्य मृत्यु तक को प्राप्त हो सकता है। तेरह ऐसे वेग बताए गए हैं जिन्हें रोकना नहीं चाहिए। पेशाब, मल, गैस, छींक, डकार, उल्टी, जम्हाई, आँसू, भूख, प्यास, नींद, हाँफ और वीर्य। इन्हें दबाने से शरीर का प्रवाह रुकता है और रोग बनते हैं।
आज का जीवन देखिए। अस्पताल या दफ्तर में बैठे-बैठे लोग गैस रोकते हैं, पेशाब रोकते हैं, भूख और नींद को टालते हैं। यही धीरे-धीरे हृदय तक असर करता है। आप ख़ुद सोचिए आप ने कब खोल के मन से हवा खोली है?
घर पर फिर भी संभव है, ऑफिस वाले क्या करें? जहाँ दिन भर कुर्सी पर बैठना है। आप ख़ुद महसूस कीजिए जब आप हवा की वेग को रोकते हैं, तुरंत आपके शरीर में उसका असर दिखता है, अजीब सा अनकम्फर्टेबल महसूस होता है।
यहीं से शुरुवात होती है, उदावर्त नामक रोग की। आचार्य चरक ने साफ कहा है कि वायु का वेग रोकने से उदावर्त होता है। उदावर्त के लक्षण रोज़मर्रा में महसूस होते हैं।
पेट में भारीपन, दर्द या ऐंठन।डकार उल्टी दिशा में आना। छाती में जकड़न और दबाव।गले में अटकाव, कभी सिर तक चढ़ जाना। बार-बार गैस रोकने के बाद ऊपर की ओर उसका फील होना। यह सब वही है जिसे आयुर्वेद ने उदावर्त कहा है।
इसी स्थिति में अगर तनाव और रात्रि जागरण भी जुड़ जाए तो हृदय के लिए खतरा और बढ़ जाता है। इसलिए इन अचानक हृदयाघातों के पीछे केवल ब्लॉकेज या कोलेस्ट्रॉल नहीं, बल्कि यह भी एक गहरी सच्चाई है। नैसर्गिक वेगों को रोकना, उदावर्त की स्थिति बनना और उस पर जागरण और तनाव। यही तीन बातें हृदय के असली शत्रु हैं। गोल्डन ऑवर तभी काम करेगा जब शरीर को पहले से स्वाभाविक चलने दिया जाए।
साइड नोट- मेरी बात को किसी पैथी की तारीफ़ और किसी की बुराई की नज़र से ना देखें। मैंने केवल अपनी समझ की बात लिखी है।


