संजय कुमार सिंह
आज अखबारों में दिल्ली के पालम क्षेत्र में स्थित एक चार मंजिला इमारत में आग लगने से नौ लोगों के निधन और तीन के घायल होने की खबर है। इंदौर में भी एक घर में आग लगने से आठ लोगों की मौत की खबर है। कहने की जरूरत नहीं है एक दिन में आग से मौत की ये दो खबरें ही नहीं होंगी। और भी हो सकती हैं लेकिन जो दो उपलब्ध थीं उन्हें प्रमुखता नहीं मिली और जहां मिली है वहां यह नहीं बताया गया है कि सहायता पहुंचने में डेढ़ घंटे लगे। जाहिर है, आग से बचाव और आपात स्थिति में सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए और इतनी मौतों के बाद कारण, बचाव और दूसरी स्थितियों की सूचना से प्रशासन पर व्यवस्था ठीक रखने के लिए दबाव पड़ेगा। वैसे तो मीडिया का काम है कि वह हादसे से पहले संभावित पीड़ितों और प्रशासन को सतर्क करे। यह सब तो नहीं ही होता है। हादसे के संबंध में अगर सूचना है कि डेढ़ घंटे तक सहायता नहीं मिली तो उसे जरूर बताया जाना चाहिए ताकि जो अपनी व्यवस्था कर सकते हैं कम से कम वो सरकारी व्यवस्था के भरोसे नहीं रहें। दिल्ली दंगे के सिलसिले में गिरफ्तार धर्म विशेष के लोगों को अभी तक जमानत नहीं मिली है। दूसरी ओर, मुझे दंगे के दौरान आगे बुझाते, पीड़ितों की मदद करते एम्बुलसेंस और सरकारी सेवकों की एक भी तस्वीर नहीं दिखी है। ऐसे में अमर उजाला में आज यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में बताया गया है कि पीएम ने दुख जताया और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने 10 लाख के मुआवजे की घोषणा की है। खबर में एक बाईलाइन है – प्रदीप कुमार सिंह।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है और तीन बाईलाइन से दो खबरें हैं। कर्ण प्रताप सिंह, हेमानी भंडारी और जिग्नासा सिन्हा की बाईलाइन दूसरी खबर में भी है पर क्रम बदल गया है और आम पाठक के लिए भले इसका मतलब नहीं हो – हम जैसे लोग समझते हैं कि एक घटना की रिपोर्टिंग कितने लोगों ने की। इसीलिए मूल खबर इस प्रकार है, आग से मरने वालों में एक परिवार के नौ सदस्य हैं। इनमें तीन बच्चे भी हैं। बुधवार सुबह दक्षिण-पश्चिम दिल्ली की पालम कॉलोनी में चार-मंज़िला रिहायशी-सह-व्यावसायिक इमारत में आग लगने से मौत हो गई। इस घटना ने अग्निशमन विभाग की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि खराब सीढ़ी के कारण बचाव कार्य में 90 मिनट की देरी हुई। परिवार के तीन अन्य सदस्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं। दो तो अग्निशमन कर्मियों की मदद से उतरते समय गिर गए जबकि तीसरे को डेढ़ घंटे इंतज़ार के बाद भागना पड़ा और वह भी गंभीर रूप से घायल हो गया। अग्निशमन विभाग की यह हालत दिल्ली में है। देश में क्या होगा समझा जा सकता है। मेरे लिए ताज्जुब की बात है कि यह खबर कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। आग लगने पर अग्नि शमन विभाग अगर डेढ़ घंटे तक किंकर्तव्यविमूढ़ रहे और नौ लोगों की मौत हो जाए, तीन गंभीर रूप से जख्मी हों, सीढ़ी खराब हो और उतरने में गिर जाएं तो निश्चित रूप से यह भी खबर है और हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे भी मूल खबर के साथ प्रमुखता से छापा है। खबर के अनुसार इसका कारण कुप्रबंध और आपात स्थिति से निपटने की तैयारी नहीं होना है। मौजूदा व्यवस्था में यह अक्सर दिखता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है लेकिन रूटीन खबर की तरह लिखी है। इसमें यह भी बताया गया है कि यह बिल्डिंग व्यवसायी और साधनगर मार्केट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेन्द्र कश्यप (70) की है और वे किसी काम से शहर के बाहर थे इसलिए बच गए। वे बुधवार को ही वापस पहुंचे और परिवार के लोगों को मृत पाया। इस खबर में यह हाईलाइट किया गया है कि सबसे ऊपर की मंजिलों से तीन लोग कूद गए और घायल हैं। लेकिन खबर का जो अंश पहले पन्ने पर है उसमें यह नहीं बताया गया है कि बचाव और राहत के लिए 90 मिनट इंतजार करना पड़ा – इस कारण कूदे या घबराहट में सामान्य तौर पर कूद कर घायल हुए। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी अच्छे काम करने और जनता की सेवा करने जैसे वादे करके सत्ता पर कब्जा करते जा रहे हैं लेकिन सरकारी काम की स्थिति पहले जैसी तो क्या, खराब ही हुई है। इसलिए मीडिया का काम था कि इसे रेखांकित किया जाता पर वह सब नहीं होता है और आप मान सकते हैं कि कमाई में सबको हिस्सा मिल रहा है या इस स्थिति में सबकी समान भागीदारी है। ऐसे में इस सूचना का कोई मतलब नहीं है कि मरने वालों में 70 साल से लेकर तीन साल तक के बच्चे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इंदौर की घटना को दिल्ली की मुख्य खबर के नीचे चार कॉलम में छापा है। यह दुर्घटना एक इलेक्ट्रीक कार (ईवी) को चार्ज करने के लिए प्लग लगा छोड़ने तथा शॉर्ट सर्किट से हुई बताई जाती है। खबर के अनुसार बिजली नहीं होने से इलेक्ट्रॉनिक लॉक नहीं खुले और लोग भाग नहीं पाए। जो भी हो, यह दुखद है कि इन्हें बचाया नहीं जा सका।
देशबन्धु में लिखा है कि आग बुझाने के लिए 30 दमकल मौके पर पहुंचे। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, 100 से ज्यादा फायर फाइटर्स (दमकल?, कर्मियों?) ने सात घंटे संघर्ष करके आग बुझाई। द हिन्दू में आग से मौत की खबर नहीं है। अमर उजाला ने उपशीर्षक से बताया है कि रसोई गैस की कमी बरकरार है। खबर के अनुसार रूसी तेल से लदे सात टैंकर भारत की तरफ मुड़ गये हैं। यह कैसे और क्यों हुआ होगा, समझना मुश्किल है। पर उपशीर्षक है, भारतीय रिफाइनरियां ऊंची बोली लगाकर खरीद रही हैं। जाहिर है यह निजी कंपनियों का मामला है और उनके अपने स्वार्थ से भी संबंधित हो सकता है। जो भी हो, गनीमत यह है कि खबर में मोदी है तो मुमकिन है जैसा कुछ नहीं लिखा है और यह स्वीकार किया गया है कि रसोई गैस की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास चल रहे हैं। अमर उजाला में एक सरकारी प्रचार भी है। इसके अनुसार, केंद्र सरकार ने राज्यों को 10% अधिक व्यावसायिक एलपीजी देने की घोषणा की है। केंद्र सरकार ने उन राज्यों को व्यावसायिक एलपीजी की आपूर्ति बढ़ाने का वादा किया है जो पाइपलाइन गैस नेटवर्क के विस्तार में तेजी लाएंगे, ताकि रसोई गैस की उपलब्धता पर दबाव कम हो सके। एलपीजी की आपूर्ति सीमित होने के बावजूद, घरों व उद्योगों को पाइपलाइन के माध्यम से प्राकृतिक गैस (पीएनजी) की आपूर्ति निर्बाध जारी है। मंत्रालय ने राज्य सरकारों को पत्र लिखकर 10 फीसदी अधिक व्यावसायिक एलपीजी की पेशकश की है, बशर्ते वे सभी पुराने आवेदनों को स्वतः स्वीकृत कर दें और पाइपलाइन के लिए नए आवेदन 24 घंटे में मंजूर कर दें। इसके लिए वार्षिक किराया या पट्टा शुल्क भी कम करें। खबर थी कि सरकार ने समय रहती एलपीजी की व्यवस्था नहीं की और अब उसके संकट को स्वीकार नहीं कर रही है। लेकिन इस प्रचार या योजना का समय और मकसद गौर करने लायक है। सबसे बड़ी बात यह है कि संकट अगर है ही नहीं तो सरकार यह सब किस लिए कर रही है और कर रही है तो अमर उजाला को प्रचार करने की जरूरत क्यों पड़ी।
इंडियन एक्सप्रेस में एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन के इस्तीफे की खबर सेकेंड लीड है। उन्होंने नैतिक चिन्ता और कतिपय व्यवहार को कारण बताया है। दूसरी ओर, स्टर्लिंग बायोटेक लिमिटेड के प्रोमोटर नितिन और चेतन संदेसरा को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने की खबर है। खबर के अनुसार, यह बैंक कर्ज का मामला है और बैंक ने कुल बकाया 19283.77 करोड़ बताया है। बैंकों से ऐसे समझौते होते रहे हैं और मन की बात करने वाली सरकार इस बारे में कुछ बताए नहीं, मीडिया को मतलब नहीं है तो सरकार ऐसे ही चलती रहेगी। भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए सत्ता में आई सरकार ने 50 दिन में सपनों का भारत देने का वादा किया था अब 2047 का लक्ष्य है। तब तक जो नहीं हो रहा है वह भी ठीक हो तो कोई क्या कर सकता है। सैकड़ों करोड़ के ऐसे कई मामले हैं और इनमें जीएसटी का बकाया भी है। दूसरी ओर, भाजपा ही नहीं, गुजरात की अनाम सी पार्टियों को सैकड़ों करोड़ के चंदे की खबरों पर किसी कार्रवाई का अता-पता नहीं है। ऐसे ही किसी मामले में एक दिन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की नौकरी चली गई। सरकार और सरकार के काम का आलम यह है कि गुजरात सरकार लिव-इन के लिए पंजीकरण जरूरी करने जा रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया में अधपन्ने के पीछे छपी खबर के अनुसार, उत्तराखंड में ऐसा पहले ही हो चुका है। देश भर में विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता और इनसे संबंधित ढेरों मामले होंगे। वर्षों से चल रहे है और लटके मामलों की संख्या भी कम नहीं है। फिर भी लिव का पंजीकरण और उसका मकसद समझना मुश्किल है।
उत्तर प्रदेश में रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन और अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन का पंजीकरण डिप्टी रजिस्ट्रार के दफ्तर में होता है। पंजीकरण नवीकरण के तमाम मामले लंबित हैं लेकिन कोई शिकायत हो तो जो पंजीकृत नहीं हैं उनपर भी कार्रवाई होगी और चूंकि डिप्टी रजिस्ट्रार को लेखा पुस्तकों की जांच कराने का अधिकार है तो शिकायत कुछ भी हो, वे जांच कराने का आदेश ही देते हैं। यह जांच बताए गए परीक्षक से करानी होती है और उसी फीस भी उसी एसोसिएशन को देनी होती है जिसकी शिकायत उसके किसी सदस्य ने की है। मैंने 20 साल से ज्यादा पहले जब फ्लैट खरीदा था तो महसूस किया कि विभाग के अफसर यही चाहते हैं कि लोग आपस में लड़ें, उनके शिकायत करें और वे अपने अधिकारों का उपयोग करके खातों की जांच कराएं। अगर कुछ गडबड़ी मिल जाए तो बल्ले-बल्ले न मिले तो शिकायत पर कार्रवाई न उनका अधिकार है ना कर्तव्य। पंजीकरण तो राम भरोसे है ही। जब अग्निशमन, लिफ्ट जैसी जरूरी चीजों की नियमित जांच की कोई व्यवस्था नहीं है तो राज्य का क्रीडा विभाग चाहता है कि जिम और स्वीमिंग पुल के भी पंजीकरण कराए जाएं। दिलचस्प यह है कि पूरे अपार्टमेंट का पंजीकरण डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय में 600 रुपए साल की फीस पर होता है जबकि स्विमिंग पूल के लिए 15,000 तथा जिम के लिए 15,000 कुल तीस हजार रुपए प्रतिवर्ष का पंजीकरण शुल्क राज्य सरकार के क्रीड़ा विभाग ने तय कर रखा है। पंजीकरण हो या नहीं, इससे कोई लाभ हो या नहीं, जरूरत के अनुसार आरडब्ल्यूए के पदाधिकारियों को परेशान और ब्लैकमेल करने के हथियार के रूप में इसका उपयोग हो ही सकता है। ऐसे में लिव इन के पंजीकरण से क्या होगा और इसे भी आरडब्ल्यूए का काम बना दिया जाए तो क्या नफा नुकसान है – इस पर कौन विचार करेगा और कहां सुनवाई होगी। सब कुछ बस चल रहा है। हादसा होता है तो बलि के बकरे तलाशे जाते हैं और वो कोई राजनीतिक या सरकारी बाबू नहीं होता है।
राज्यसभा के 59 सदस्यों का कार्यकाल खत्म होने पर मल्लिकार्जुन खरगे और नरेन्द्र मोदी ने अपनी बात रखी इसमें कुछ व्यंग, कटाक्ष, अनुभव और विचार आदि रहे। खरगे ने रिटायर होने वाले सदस्यों में एक, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के भाजपा के साथ होन पर टिप्पणी की। देवेगौड़ा उस समय संसद में नहीं थे। बाद में उन्होंने एक बयान जारी कर अपनी बात रखी है और इससे संबंधित खबर दि एशियन एज में लीड है। दिल्ली की आग में नौ लोगों के मरने की खबर भी इसमें है। द टेलीग्राफ ने पश्चिम बंगाल चुनाव और मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्रवाई को लीड बनाया है। आप जानते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त महाभियोग के साये में हैं फिर भी चुनाव करा रहे हैं और लगभग मनमानी कर रहे हैं। ऐसी खबरों का खास महत्व होना चाहिए लेकिन विज्ञापनों से बिके और सरकारी कार्रवाई से डरे अखबारों में जो हो सकता है वही है। देशबन्धु की खबर के अनुसार, केंद्र सरकार ने 33,600 करोड़ की ‘भव्य’ योजना को मंजूरी दी है। वैसे तो यह महत्वपूर्ण खबर है, इनमें कई सारी योजनाएं होंगी लेकिन चुनाव की घोषणा के बाद ऐसा करना अनैतिक है लेकिन नरेन्द्र मोदी ऐसा करते आए हैं। अब इसे महत्व देना नहीं देना संपादकीय विवेक का मामला है। मुधे देशबन्धु में प्रमुखता से छपा दिखा। द हिन्दू के अनुसार, भारत आ रहे 22 जहाज होर्मुज से आगे बढ़ाए जाने की सूची में हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में बंगाल चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट की खबर है। इसके अनुसार, ईडी के काम में दीदी के बाधा पहुंचाने को सर्वोच्च न्यायालय ने बेहत असमान्य कहा है। मुझे लगता है कि छापा अपने आप में ज्यादा असमान्य था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है तो खबर है ही और महत्वपूर्ण भी। इसलिए टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


