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पॉलिटिक्स वाया चंपई सोरेन : एक के लिए वफादार तो दूसरे को दिखे गद्दार!

पुष्य मित्र-

राजनीति में हर कोई छल – प्रपंच और षड्यंत्र करता है मगर वह सामने वाले से अपेक्षा रखता है कि वह सिद्धांत पर चले और वफादार हो। कई दफे ऐसा लगने लगा है कि आज जो राजनीति है, उसमें सिद्धांत की उपयोगिता सिर्फ एक दूसरे के खिलाफ परसेप्शन बनाने की रह गई है।

अब जैसे चंपई सोरेन। जब हेमंत सोरेन जेल जा रहे थे तो उन्होंने तय किया कि वे अपनी जगह पर अपनी कुर्सी चंपई सोरेन को सौंप कर जायेंगे, फिर जैसे ही वे लौटे वे तत्काल उन्हें कुर्सी वापस कर देंगे। मतलब यह कि उन्होंने चंपई सोरेन को सिर्फ अपनी कुर्सी छेकने की जिम्मेदारी दी थी, राज चलाने की नहीं।

वे तो चाहते थे उनकी जगह वे अपनी पत्नी को बिठाकर जाएं, मगर दियादी झगड़े में यह मुमकिन नहीं हुआ। फिर उन्होंने सबसे वफादार आदमी चुना और उसे कुर्सी छेक कर रखने की जिम्मेदारी दे दी। मगर जब चंपई सोरेन कुर्सी पर बैठ गए तो उन्हें कुर्सी का रस भी समझ आ गया। मोह भी हो गया होगा। स्वाभाविक है।

अब लोग बाग कह रहे हैं इसी वजह से लालू जी ने कुर्सी अपनी बीवी को दी, क्योंकि बीवियों से अधिक वफादार और कुर्सी के प्रति निर्मोही कोई और हो ही नहीं सकता। जबकि जीतनराम मांझी जो खुद इस अनुभव से गुजर चुके हैं, कह रहे हैं, चंपई दा आपने बिल्कुल ठीक किया। तो एक पार्टी की निगाह में चंपई सोरेन कुर्सी के लोभी और गद्दार हैं, दूसरी पार्टी मानती है कि कुर्सी पर चंपई सोरेन का हक है।

मगर इस द्वैत के बीच लोकतांत्रिक परंपराओं का क्या? आप मानते हैं झामुमो शिबू सोरेन की पार्टी थी, अब हेमंत की पार्टी है। मगर लोकतांत्रिक मूल्य कहते हैं कि मुख्यमंत्री विधायक चुनते हैं। विधायक ही उन्हें अपदस्थ करते हैं।

जब हेमंत जा रहे थे तो लोकतंत्र का तकाजा था कि विधायक उनके बाद अपना नेता चुन लेते। मगर पार्टी पर हेमंत का जो गैरवाजिब प्रभाव था उसने ऐसा होने नहीं दिया। चंपई सोरेन चुने गए।

जब हेमंत वापस आए तो भी विधायकों को ही तय करना था कि चंपई रहेंगे या हेमंत। क्या विधायकों को बिना किसी दबाव के यह तय करने का अधिकार मिला?

अभी सीपीआईएमएल के विधायक मनोज मंजिल जेल गए तो उस वक्त वे अपना उत्तराधिकारी चुनकर नहीं गए, उनकी पार्टी ने अगियांव से उम्मीदवार को चुना। आज भी कुछ पार्टियों में यह परंपरा बची है।

मगर ज्यादातर पार्टियों बाएं चलने वाली हो या दाएं अब व्यक्ति आधारित पार्टी हो गई है। अब उन पार्टियों में लोकतंत्र बिलकुल नहीं बचा है। राष्ट्रीय दलों में आलाकमान सब तय कर रहा है। क्षेत्रीय दलों में पार्टियां फैमिली प्राइवेट लिमिटेड बन गई हैं। आम आदमी पार्टी तक का यही हाल है। ऐसे में हम यही समझते हैं कि चंपई ने हेमंत को धोखा दिया।

दिन बदिन पोलराइज होती देश की राजनीति के बीच अच्छे बुरे का फर्क बिलकुल खत्म हो गया है। हमारा गुंडा संत, उनका गुंडा गुंडा वाला सिद्धांत चल रहा है। ऐसे में कोई पार्टियों के आंतरिक लोकतंत्र की बात करे तो कैसे करे। हम पत्रकारों से भी अब इतनी ही अपेक्षा लोगों की रहती है कि हम कयास और अनुमान वाली पत्रकारिता करते रहें कि कौन किधर जा रहा है। मगर जो जा रहा है वह क्यों जा रहा है, यह कौन पूछेगा?

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