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चिदंबरम से नाराजगी तो ठीक है लेकिन मुद्दों पर मौन हैं उपराष्ट्रपति, कारण पीएमएलए पर यह खुलासा तो नहीं है?

संजय कुमार सिंह-

ज की खबरों में कुलगाम में दो मुठभेड़ में दो जवानों के शहीद होने और चार आतंकवादियों को मार गिराने की खबर के साथ नरेन्द्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला बजट 23 को पेश किया जायेगा भी है। इसके अलावा, द हिन्दू में ईरान के राष्ट्रपति के चुनाव की खबर लीड है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स के दोनों पन्नों की दो लीड आज के कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। अखबार के पहले पन्ने से अधपन्ने की लीड है, सैटेलाइट की तस्वीर से पता चलता है कि तीन पैंगोंग के पास खुदाई कर रहा है। यहां ईंधन या गोलाबारूद रखने के लिए भूमिगत व्यवस्था तैयार करने की खबर के साथ हथियाबंद गाड़ियों को ढंक कर रखने की व्यवस्था भी है। यह खबर सरकार को परेशान करने वाली है। शायद इसीलिए दूसरे अखबारों में यह खबर लीड नहीं है। इसी तरह, हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड आज हाथरस के ‘बाबा’ का वीडियो सामने आने और उसपर हंगामा मचने को लेकर है। आप जानते हैं कि बाबा के सत्संग में पिछले दिनों भगदड़ मचने से 121 लोगों की मौत हो गई थी। अभी तक की खबरों अनुसार सरकार ने इस मामले में बाबा को अभियुक्त नहीं बनाया था और इस मामले में अभी तक नौ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके बाद, अभी तक फरार चल रहे बाबा का वीडियो सामने आया है तो खबर यह भी है।

यह अलग बात है कि अमर उजाला के अनुसार भोले बाबा उर्फ सूरजपाल ने वीडियो में कहा है, दोशी बख्शे नहीं जायेंगे, सरकार पर भरोसा रखें लोग। इस खबर के ठीक नीचे की खबर का शीर्षक है, मायावती ने मांग की है कि सरकार को भोले बाबा को गिरफ्तार करे। आप जानते हैं कि हाथरस की मौतों की जांच साजिश के नजरिये से भी हो रही है। आज द टेलीग्राफ का कोट हाथरस में सत्संग के आयोजकों में से एक, गायत्री देवी का है। उन्होंने कहा है, साजिश का कोई चक्कर नहीं है। यह प्रशासन के गैर जिम्मेदार रवैये और बाबा के सुरक्षा गार्ड के कारण हुआ। आज की एक और महत्वपूर्ण खबर गुजरात में राहुल गांधी की रैली है। खबर के अनुसार राहुल गांधी ने अहमदाबाद में राज्य विधानसभा चुनाव से काफी पहले रैली करके भाजपा को घुस कर चेतावनी दी है और कहा है कि भाजपा को राज्य से बाहर किये जाने के लिए तैयार हो जाना चाहिये। द टेलीग्राफ में आज यह खबर लीड है। राहुल गांधी ने अहमदाबाद में कल पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित किया। इससे पहले मंगलवार को लोकसभा में राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में जोर देकर कह चुके हैं, हम गुजरात में आपको हरायेंगे, लिखकर ले लीजिये। इस तरह यह हफ्ते भर से कम में दूसरी बार की दहाड़ है। दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है यह अलग बात है। इन और ऐसी खबरों के बीच, नीट-यूजी की कल शुरू होने वाली कौनसेलिंग को कल ही स्थगित कर दिया गया।

यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है कि कल ही खबर थी कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि नीट-यूजी को रद्द करने की जरूरत नहीं है। आप जानते हैं कि लोकसभा चुनाव नतीजों की घोषणा के दिन ही नीट के नतीजे समय से पहले घोषित कर दिये गये थे। 67 छात्र टॉप किये थे जिन्हें शत प्रतिशत अंक मिले थे यानी पूरे 720। इससे पहले दो-तीन छात्र टॉप करते थे इस बार आठ छात्र एक ही परीक्षा केंद्र के थे। कुछ छात्रों को कृपांक भी दिये गये थे जो बाद में वापस ले लिये गये और छात्रों को विकल्प दिया गया कि वे दोबारा परीक्षा दे सकते हैं। परीक्षा में कथित गड़बड़ी के कारण इसे रद्द करवाकर फिर से परीक्षा आयोजित करने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। पर सरकार कहती रही कि रद्द करने की जरूरत नहीं है। खबरों के अनुसार, बाद में परीक्षा रद्द नहीं करने की मांग करने वाली याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई। कहने की जरूरत नहीं है कि अब मामला न सिर्फ परीक्षा की विश्वसनीयता और पवित्रता का है बल्कि बाद की स्थिति को हैंडल करने का भी है। सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आ रही है। पर खबर जो छपी है या छप रही है उसे आप देख सकते हैं।

‘बड़े सरकार’ की कंपनी और’ छोटे सरकार’

द हिन्दू में चार कॉलम की एक खबर है, दिल्ली के उपराज्यपाल ने रिश्वतखोरी के एक मामले में आम आदमी पार्टी के नेता सत्येन्द्र जैन के खिलाफ एसीबी जांच की मंजूरी दी। आम आदमी पार्टी ने कहा है कि यह पार्टी के खिलाफ भाजपा के अभियान का अंग है। खबर के अनुसार मामला सीसीटीवी लगाने के काम में देरी होने पर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के खिलाफ 16 करोड़ रुपये की जुर्माने की राशि के बदले सात करोड़ रुपये की रिश्वत देने का है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि बीईएल सरकारी कंपनी है और सरकारी कंपनी से रिश्वत मांगने और दिये जाने का मामला अगर है तो भ्रष्टाचार सरकारी कंपनी भी कर रही है। रिश्वत देना भी भ्रष्टाचार है और कंपनी के एक कर्मचारी ने शिकायत की थी उसने अपने विक्रेताओं के जरिये रिश्वत के पैसों की व्यवस्था की। अगर रिश्वत मांगी गई थी और कंपनी ने रिश्वत दी या देने को तैयार हो गई तो दोष उसका भी है और ऐसे मामलों में सरकार द्वारा समर्थकों को वायदा माफ गवाह बनाकर विरोधियों को फंसाने की पुरानी चाल है। इसकी शुरुआत पी चिदंबरम के खिलाफ मामले से हुई थी। जो भी हो, तथ्य यह है कि कार्रवाई सरकारी कर्मचारी और जनप्रतिनिधि दोनों के खिलाफ होनी चाहिये पर खबर सत्येन्द्र जैन के खिलाफ है, कर्मचारी का तो नाम भी नहीं है।

इन सबके साथ आज की सबसे दिलचस्प खबर इंडियन एक्सप्रेस में है जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। कल यहां मैंने बताया था कि इंडियन एक्सप्रेस में पूर्व वित्त और गृहमंत्री पी चिदंबरम का एक इंटरव्यू छपा था। इसका शीर्षक था, “नये कानून अंशकालिकों ने लिखे हैं…. कब कोई प्रमुख कानून विधि आयोग के संदर्भ बिना पास हुआ है?” कल ही मैंने सोशल मीडिया पर एनडीटीवी का दो मिनट से कम का एक वीडियो देखा इसमें उपराष्ट्रपति यह सवाल करते हुए दिखाये गये थे, हम संसद में अंशकालिक हैं। वे इसे अक्षम्य और अपमानजनक बता रहे थे और उम्मीद जताई थी कि श्री चिदंबरम अपना यह बयान वापस लेगें। चूंकि उपराष्ट्रपति की यह टिप्पणी इंडियन एक्सप्रेस में छपे इंटरव्यू पर थी इसलिए इंडियन एक्सप्रेस में यह पहले पन्ने पर है और इस तरह कल जिन लोगों ने इंटरव्यू नहीं पढ़ा होगा वे आज पढ़ लेंगे।

नए अपराध कानूनों पर टिप्पणी के विषय

इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर का फ्लैग शीर्षक लगाया है, नए अपराध कानूनों पर टिप्पणी के विषय। मुख्य शीर्षक है, क्या हम पार्ट टाइमर हैं…. सदन का अपमान है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह इंटरव्यू का ही नहीं, शीर्षक का भी छोटा सा हिस्सा है और इस मुद्दे पर उपराष्ट्रपति चिदंबरम की आलोचना करके न सिर्फ उन्हें स्टार बना रहे हैं बल्कि अपना कद भी छोटा कर रहे हैं। खबर के अनुसार उपराष्ट्रपति ने तिरुवनंतपुरम में इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नालॉजी के 12वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर यह बात कही। जैसा मैंने ऊपर लिखा है, शीर्षक में यह भी है,”…. कब कोई प्रमुख कानून विधि आयोग के संदर्भ बिना पास हुआ है?” ऐसे में मुद्दा यह भी था कि नया कानून विधि आयोग के संदर्भ के बिना लागू हो गया है। उपराष्ट्रपति ने जनहित और जनता की तरफ से बोलने की बजाय अपने ऊपर ले लिया अपने या सदन के लिए अपमानजनक मान लिया जबकि इस तरह कानून पास होना भी संसद और उसके साथ-साथ आम जनता का अपमान है जिसपर यह कानून लागू होगा।

जहां तक पी चिदंबरम के कहे की बात है, उन्होंने कानून का मसौदा तैयार करने के बारे में कहा होगा। उपराष्ट्रपति ने उसे सांसदों के लिए और अपने लिये मान लिया। ठीक है कि जनप्रतिनिधियों को लॉ मेकर कहा जाता है लेकिन हम मुख्यमंत्री (यों) पर कानून का प्रभाव देख रहे हैं। सबको पता है कि पीएमएलए के प्रावधानों को मंजूरी देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज ईनामी हैं और उनके इस फैसले के बाद सरकार ने उन्हें ईनाम दिया है और सरकार की सक्रियता से इसपर विचार करने के मामले में मौके पर सुनवाई नहीं हो पाई है। इसका खामियाजा कई जनप्रतिनिधियों को भुगतना पड़ रहा है। दूसरी ओर, कानून का मसौदा तो कोई पेशेवर ही तैयार करेगा सांसद नहीं, उपराष्ट्रपति तो बिल्कुल नहीं। राज्यसभा के सदस्य भी नहीं। देश में पेशेवरों का कार्यकाल आमतौर पर 25 साल की आयु से शुरू होता है और नौकरी तरक्की विस्तार के अनुसार 75 साल तक चलता है। मेरा कहना है कि उसमें पांच या छह साल की सांसद की ‘नौकरी’ अंशकालिक या अल्पकालिक ही होगी। नये कानूनों का मसौदा किसी सांसद या सासंदों के समूह ने तैयार किया हो तब भी ये वाली नौकरी तो अंशकालिक ही हुई। इसमें अपमान जैसी कोई बात है ही नहीं। इसलिए, चिदंबरम ने कुछ गलत नहीं कहा है। उपराष्ट्रपति जी ने उसे मुद्दा बनाकर उनका इंटरव्यू पढ़वा दिया और शीर्षक के ही बाकी हिस्से पर मौन साधे हैं। यह मुद्दा अनुत्तरित है कि विधि आयोग किसलिए है?

इंडियन एक्सप्रेस ने कल प्रकाशित अपने इंटरव्यू के साथ पी चिदंबरम का जो परिचय दिया है उसमें बताया है कि नए अपराध कानून पर संसदीय पैनल की चर्चा के दौरान उन्होंने अपना डिसेंट दर्ज कराया था। उनसे पूछा गया कि आपकी मुख्य आलोचना यह थी कि नए कानून की जरूरत नहीं थी। इसपर उन्होंने कहा है, आपको वही बदलाव करने चाहिये जो जरूर हैं। कानून में स्थिरता होनी चाहिये। इसका मतलब है कि न सिर्फ कानून की सामग्री बल्कि संसद द्वारा इसे दुनिया को पेश किये जाने वाले तरीके में भी स्थिरता होनी चाहिये। उदाहरण के लिए अपराध प्रक्रिया संहिता को 1973 में पूरी तरह नए सिरे से लिखा गया था। ठीक है, 50 साल हो चुके हैं आप इसे फिर से लिखेंगे मुझे कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन आपने उसी को कॉपी किया है …. आईपीसी, सीआरपीसी, सब कुछ …. आईपीसी का 90-95 प्रतिशत कॉपी किया हुआ है; सीआरपीसी का 95 प्रतिशत कॉपी किया हुआ है। आपके अनुसार क्या बदलाव किये जाने चाहिये थे? यह हाथ की सफाई है। उदाहरण के लिए राजद्रोह को खत्म किया जाना चाहिये था। बदलाव (नये कानून) का वही प्रभाव है। मौत की सजा को खत्म किया जाना चाहिये था। इसके उलट एक और अस्वाभाविक सजा शुरू की गई है। इसे सॉलीटेरी कनफाइनमेंट (कालकोठरी में कैद) कहा गया है। सामुदायिक सेवा को पारिभाषित किया जाना चाहिये था। देखिये, अब हर जज सामुदायिक सेवा को पारिभाषित करेगा। उदाहरण के लिए पुणे के अवयस्क (जिसपर पोर्श कार से दो लोगों को कुचलने का आरोप है) …. से निबंध लिखने के लिए कहा गया। क्या यह सामुदायिक सेवा है?

एक सवाल पीएमएलए पर भी है – पीएमएलए मामले में जमानत में सख्ती की इस व्यवस्था में ज्यादातर तो यूपीए के कार्यकाल में लागू किया गया था। जवाब – पीएमएलए 2002 में पास हुआ था ….. उस समय सत्ता में कौन था? तब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार थी जिसने कानून पास किया और इसे राष्ट्रपति की सहमति 17 जनवरी 2003 को मिली। उस समय प्रधानमंत्री कौन था? अटल बिहारी वाजपेयी। पर इसकी अधिसूचना तब जारी हुई जब आपकी सरकार सत्ता में आई 2004 में। फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स हमपर 2002-03 से दबाव डाल रहा था। यशवंत सिन्हा (एनडीए के वित्त मंत्री) और वाजपेयी 2004 तक सवाल से बचते रहे। और तब हम सत्ता में आये। एफएटीएफ ने हमें चेतावनी दी कि आप इस कानून को अधिसूचित नहीं करेंगे तो हम आपको अलग कर देंगे। तब हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। और हमलोगों ने दो महत्वपूर्ण संशोधन के बाद इसे एक जुलाई 2005 को अधिसूचित किया। आइये धारा 45 का इतिहास (भी) समझ लें …. इसके लिए हमलोगों ने 2005 में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया पर इसे 2018 में फिर संशोधित किया गया। कहने की जरूरत नहीं है कि पूरा इंटरव्यू पढ़ने लायक है और संभव है इससे हो सकने वाले नुकसान के कारण ही उपराष्ट्रपति जी नाराज हों। यह अलग बात है कि इससे यह इंटरव्यू चर्चा में आ गया।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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