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आज के अखबार : चीन की जय-जय और सीमा पर शांति के मुद्दे के बीच गलत अनुवाद में अबकी बार महुआ फंसीं

संजय कुमार सिंह

प्रधानमंत्री चीन में हैं तो खबरें चीन की होनी थीं। इसमें ना कोई घुसा है, ना कोई घुसा हुआ है की याद या चर्चा नहीं है। दूसरी ओर अमित शाह पर विवादित टिप्पणी के लिए महुआ मोइत्रा के खिलाफ एफआईआर की खबर भी प्रमुखता से है। अमर उजाला में यह सिंगल कॉलम की खबर है जबकि द हिन्दू ने पहले पन्ने पर बताया है कि खबर अंदर के पन्ने पर है। इसमें फ्लैग शीर्षक है, आपत्तिजनक टिप्पणी। इसमें आपत्तिजनक या ऑबजेक्शनेबल को सिंगल कोट में लिखा गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर अंदर है लेकिन इतना महत्वपूर्ण कि पहले पन्ने पर इसके बारे में बताया गया है। यहां भी आपत्तिजनक कोट में है। पांच लाइन की सूचना इस प्रकार है, छत्तीसगढ़ पुलिस ने अमित शाह के खिलाफ ‘आपत्तिजनक’ टिप्पणी के लिए तृण मूल सांसद महुआ मोइत्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। संबंधित वीडियो में वे नाडिया में गृहमंत्री के बारे में बोलती हुई दिख रही हैं कि वे बांग्लादेश से घुसपैठ रोकने में नाकाम रहे हैं। अमर उजाला के अनुसार – महुआ ने कहा था, भारत में अवैध बांग्लादेशियों की घुसपैठ रोकने में विफल रहने के लिए गृहमंत्री का सिर काट दिया जाना चाहिये। यह अमर उजाला के ब्यूरो की खबर है और इसकी हिन्दी बताती है कि यह अनुवाद का मामला है। अव्वल तो बांग्ला बोलने वाली सांसद महुआ मोइत्रा बांग्ला बोलने वालों के क्षेत्र नाडिया में अपने मतदाताओं को संबोधित कर रही थीं और हिन्दी में भाषण नहीं दिया होगा। दिया भी हो और उन्होंने कहा भी हो तो मामला अनुवाद का लगता है। अगर भाषण हिन्दी में ही था तो मैं मानूंगा कि उन्होंने स्वयं या किसी से अनुवाद करवाकर ही बोला होगा। वे असल में कुछ और कहना चाहती हैं।

वैसे भी, हिन्दी में बोलने वाला कोई नहीं कहेगा कि किसी का सिर काट दिया जाना चाहिये। हिन्दी में बोलने वाला गर्दन काटने, गोली मारने, हत्या करने, जीने का हक नहीं है, लात मार कर भगा देने लायक है जैसी बात करेगा। और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है लेकिन, ‘सिर काट देना चाहिये’ हिन्दी में शायद ही कोई बोले या कहीं बोला जाता हो। हिन्दी के रिपोर्टर और संपादक के लिए यह सोचने-समझने वाली बात थी। वे चेक करते कि वास्तव में क्या बोला गया था। अंग्रेजी वालों की तरह आपत्तिजनक लिख सकते थे और चूंकि पता ही नहीं है कि क्या कहा है, वह आपत्तिजनक है कि नहीं इसलिए उसे कोट भी कर सकते थे। लेकिन हिन्दी भाषा ही ऐसी है और हिन्दी में काम करने वाले लोग भी ऐसे ही होते है। ज्यादा माथा पच्ची नहीं करते हैं। वरना महुआ मोइत्रा ने कल ही सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर दिया था और बताया था कि यह अनुवाद की गलती है। असल में उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। इसलिये आज खबर यह थी कि महुआ मोइत्रा ने नाडिया में जो बोला उसके लिए छत्तीसगढ़ में एफआईआर हुई और जो कुछ कहने के लिए एफआईआर हुई है वह उन्होंने कहा ही नहीं है। खबर एफआईआर होना नहीं, जबरन एफआईआर दर्ज करना है। भले उसका मकसद आका को खुश करना हो या महुआ मोइत्रा को परेशान करना। इससे पहले एक निजी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को भी गलत अनुवाद के कारण परेशान होना पड़ा है। इसमें सरकारी संसाधन तो लगते ही हैं, अदालतों का कीमती समय भी खराब होता है।

अगर एफआईआर का मकसद यह नहीं है तो भी गलत सूचना पर एफआईआर कराना गलत है और आज खबर यह होनी चाहिये थी गलत अनुवाद पर फिर एफआईआर। पहले अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद पर हरियाणा में एफआईआर हुई अब बांग्ला से हिन्दी (या अंग्रेजी) अनुवाद को लेकर छत्तसीगढ़ में एफआईआर। पर खबर ऐसी नहीं है और जैसे छपी है उसमें नहीं लगता है कि गलत अनुवाद की कोई गुंजाइश है या एफआईआर का कारण गलत अनुवाद हो सकता है। इसका कारण यही है कि ज्यादातर अखबार सरकार की सेवा में लगे हैं वरना चेक करना मुश्किल नहीं था। महुआ मोइत्रा का पक्ष लेना पत्रकारिता की बुनियादी जरूरत थी। उसकी अब किसी को परवाह ही नहीं है। गूगल करने पर मुझे नवभारत टाइम्स की संबंधित खबर मिल गई। इसके अनुसार, नए वीडियो में उन्होंने अमित शाह को सम्माननीय गृह मंत्री कहकर संबोधित किया है। महुआ मोइत्रा नए वीडियो में कह रही हैं कि अंग्रेजी में जो लिखा या कहा जाता है उसका अर्थ हिन्दी में वही नहीं होता है जो उसका अनुवाद होता है। एक्स पर उन्होंने अंग्रेजी में यह भी लिखा है कि मुहावरे मूर्खों के लिए नहीं होते हैं। जाहिर है, मुहावरों का अनुवाद भी नहीं होता है उसकी जगह वैसे ही दूसरे मुहावरे का उपयोग किया जाये या मुहावरे का अर्थ लिखा जाये न कि शब्दों का। छत्तीसगढ़ की रायपुर पुलिस को टैग करते हुए उन्होंने जो वीडियो पोस्ट किया है उसके साथ अंग्रेजी में जो लिखा है उसका अनुवाद होगा, … यह आपके लिए है। फर्जी मामले दर्ज करते हुए सावधान रहिये। अदालतें इन्हें समझती हैं और फिर हेड्स विल रोल (यानी कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई होगी / काम से जायेंगे।) इसका यह अर्थ तो नहीं ही होगा कि सिर लुढ़केंगे और उसके लिए काट दिया जायेगा या काटना ही पड़ेगा। हालांकि, एक मशहूर किताब के अनुवादक ने यही लिखा था और छपने के लिए फाइनल हो चुका था तब मैंने देखा और ठीक कराया। इस वीडियो में तमाम मुहावरों का उपयोग किया गया है और अभी वह मुद्दा नहीं है।

महुआ मोइत्रा ने कहा है, “माथा केटे टेबिले राखा” (মাথা কেটে টেবিলে রাখা) — यह कथन बांग्ला मुहावरे के रूप में प्रयोग हुआ है, जिसका आशय होता है: उत्तरदायित्व तय करना, जवाबदेही पर सवाल उठाना, किसी को सार्वजनिक रूप से दोषी ठहराना। खबरों के अनुसार उन्होंने कहा है, “आमी बोलछी, जदि भारतेर सीमा केउ रक्षा कोरते ना पारे, अन्नो देशेर लोक प्रति दिन हज़ार हज़ारे अनुप्रबेश कोरछे, आमादेर मा-बोन-देऱ देखछे, आमादेर जोमी छिनिये निच्छे — ताहोले प्रथमे, अमित शाह-र माथा केटे टेबिले राखा उचित।” इसका हिन्दी अनुवाद होगा, “मैं कह रही हूं कि अगर भारत की सीमाओं की रक्षा कोई नहीं कर रहा है, अगर दूसरे देश के लोग हर दिन हज़ारों की संख्या में घुसपैठ कर रहे हैं, हमारी मां-बहनों को देख रहे हैं (घूर रहे हैं), हमारी ज़मीन छीन रहे हैं — तो सबसे पहले, अमित शाह का सिर काटकर टेबल पर रखना चाहिए।” यहां माथा केटे टेबिले राखा का अनुवाद भले ‘सही’ हो लेकिन बांग्ला में इसके प्रयोग को समझना होगा। अंग्रेजी में फक ऑफ बहुत आम है। भले इसका उपयोग गाली की तरह ही किया जाये पर यह गाली हो भी तो हर बार यौन संदर्भ नहीं रखती। गला काट प्रतियोगिता अगर सिर धड़ से जुदा करना नहीं है तो “माथा केटे टेबिले राखा” भी हत्या नहीं है। वैसे भी, हत्या के लिये माथा काटने का प्रयोग हिन्दी में नहीं होता है। बंगाली मछली का सिर काटकर खाते हैं। इसमें सिर के टुकड़े किये जाते हैं। दो टुकड़ा तो बहुत आम है। हिन्दी में सिर काटने का संदर्भ नहीं मिलता है। गर्दन काटने की बात होती है। वैसे ही जैसे गोली मारो का मतलब गोली चलाना और पिस्टल या राइफल अथवा बंदूक से गोली मारना नहीं होता है। उसका मतलब छोड़ो हटाओ ही होता है। लिहाजा, महुआ मोइत्रा ने कहा है कि एफआईआर के खिलाफ वे कोर्ट जाएंगी। उन्होंने यह भी कहा है कि उनके विरोधियों को हर बार शिकस्त मिली है। इस बार भी ऐसा ही होगा।

अगर देसी भाषा बांग्ला में भाषण और उसके अनुवाद की यह हलात है तो चीन में क्या कहा गया होगा और क्या रिपोर्ट हुआ होगा उसका भगवान ही मालिक है। वैसे भी, भारत में बांग्ला बोलने वालों को विदेशी करार देने के मामले सुनने में आये हैं। ऐसे में एक सांसद के बांग्ला भाषण का गलत अनुवाद और देश की एकता अखंडता के लिए खतरा बताना अगर राजनीतिक होता तो नजरअंदाज किया जा सकता था लेकिन पुलिस ने किया है इसलिए गंभीर है पर ऐसे गंभीर मामलों पर इन दिनों ध्यान दिये जाने का कोई रिवाज नहीं है। पुलिस के राजनीतिक उपयोग का यह कोई पहला संभावित मामला नहीं है। उदाहरण के लिए, वेस्ट बंगाल माइग्रेंट वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड और सांसद समीरुल इस्लाम की ओर से दायर पीआईएल में आरोप लगाया गया है कि बांग्ला (बंगाली भाषा) बोलने वाले कामगारों को बिना कानूनी प्रक्रिया के गिरफ्तार या जबरन निष्कासित किया जा रहा है। खबरों के अनुसार गुड़गांव से काफी लोग बंगाल जाने को मजबूर हुए हैं और उनमें से किसी को जबरन बांग्लादेश भेज दिये जाने का मामला चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या बांग्ला बोलना व्यक्ति को निष्कासित कर बांग्लादेश भेजने की प्रक्रिया का आधार बन रहा है? कोर्ट ने इस धारणा की वैधता और संवैधानिकता पर सवाल उठाया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सीमा पर अवैध प्रवेश को रोका जा सकता है, परंतु देश के भीतर पहुँच चुके व्यक्तियों की नागरिकता जांच किए बिना निष्कासन की प्रक्रिया अमान्य है। कोर्ट ने केंद्र व नौ राज्य सरकारों (जैसे ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली, यूपी आदि) को नोटिस जारी किया और प्रतीक्षा करते हुए कहा कि इस मामले में किसी भी व्यक्ति को बिना जांच बेदखल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भाषा के आधार पर किसी को विदेशी मानना तर्कसंगत या संवैधानिक नहीं है। उसने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा महत्त्वपूर्ण है, पर साथ ही यह भी देखा जाए कि बांग्ला बोलने वाले लोगों में एक साझा सांस्कृतिक विरासत है जो सीमापार विभाजित है। इसलिए, भाषा के आधार पर पूर्वग्रह नहीं होना चाहिए।

आइये अब चीन की जय-जय करने वाले शीर्षक देख लें। यह ध्यान रखने वाली बात है कि नरेन्द्र मोदी सात साल बाद चीन गये हैं। उससे पहले झूला झुला चुके थे और फिर चीनी ऐप्प पर प्रतिबंध लगा, डोकलाम और गलवान हुआ। भारत में, ना कोई घुसा है ना घुसा हुआ है कह कर चुप्पी साध ली थी। फिर कई वर्षों बाद चीनी सैनिकों के वापस जाने की खबरें छपने लगीं और जो घुसे ही नहीं थे और घुसे हुए तो थे ही नहीं, वापस जाते रहे। कई दिनों तक रोज देखा गया उसकी रिपोर्ट हुई और खबरें छपीं फिर अचानक ट्रम्प ने सैंक्शन लगाने की धमकी दी। युद्ध विराम करवाया और अंततः टैरिफ लागू भी हो गया। वहां की एक अदालत ने इसे रोक दिया, ट्रम्प के अधिकारों की बात हुई और यह भी कि अमेरिका को पैसे चाहिये इसलिये ट्रम्प प्रशासन ने भारी टैरिफ लगाये हैं। आज अमर उजाला के पहले पन्ने की एक खबर के अनुसार, ट्रम्प ने कहा है कि टैरिफ के खिलाफ फैसला देने वाले सात में से चार जज कट्टर वामपंथी हैं। इससे आप दोनों देशों (या दोनों प्रमुखों) की समानता समझ सकते हैं। ऐसे में शीर्षक तो लोकलुभावन होने ही हैं। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, भारत-चीन दोस्ती सही विकल्प… सीमा विवाद के परस्पर स्वीकार्य समाधान तलाशने पर सहमति। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, सीमा पर शांति को (के लिये) भारत-चीन सहमत। ऐसा नहीं है कि पहले पन्ने पर चीन की एक ही खबर है या लीड ही है। और भी कई खबरें हैं और लगता ही नहीं है कि कभी ऐप्प पर प्रतिबंध लगा था और उसका कारण तथा अभी दोस्ती की मजबूरी भी बताने की कोई जरूरत या जवाबदेही है।

ऐसा नहीं है कि मामले को नजर अंदाज कर दिया जाये और ‘मन की बात’ के लिए एक्सक्लूसिव रहने दिया जाये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे समझा और बताया भी है लेकिन (कई) अखबारों को उसकी जरूरत नहीं लगी या उसका महत्व समझ नहीं आया। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, सीमा पर सैनिकों की वापसी के बाद बदला माहौल। बीस शहीद सैनिकों को भूल जाना भी मुद्दा है। लेकिन उसकी चर्चा आज नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने अपने अंदाज में बताया है कि जो वे कर रहे हैं वह कितना जरूरी और कल्याणकारी है। उपशीर्षक है, दोनों देशों के बीच संबंधों से 2.8 अरब लोगों के हित तथा मानवता का कल्याण जुड़ा है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे और बड़ा मामला बनाया है। शीर्षक है – मोदी, शी ने अहम मुलाकात में सीमा पर शांति और वैश्विक स्थिरता पर जोर दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा है, संबंधों से 2.8 अरब लोगों का कल्याण जुड़ा है। शी ने कहा है, मित्रता दोनों (देशों) के लिए सही चुनाव है। इंडियन एक्सप्रेस ने और आगे बढ़कर बताया है, भारत और चीन ने कहा : पार्टनर्स हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं। अबकी बार ट्रम्प सरकार, के बाद भारत ने ऐसा क्यों कहा और चीन ने क्यों कहा होगा समझना मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री ने यह कहा बताते हैं कि आपसी विश्वास पर आधारित संबंधों को बेहतर करने के लिए प्रतिबद्ध हूं। द हिन्दू के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि भारत चीन सीमा के मुद्दे को सही ढंग से निपटाने के लिए प्रतिबद्ध है। दि एशियन एज का शीर्षक है, संबंधों को रीसेट करने के लिए तियानजिन में टाइगर और ड्रैगन की टैंगो। हमेशा की तरह, मेरे नौ अखबारों में सिर्फ द टेलीग्राफ का शीर्षक और प्रस्तुति समग्रता में है। मुख्य शीर्षक ‘दास कैपिटल’ बहुत कुछ कहता है — यह सिर्फ शब्द-चातुर्य नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की चीन यात्रा को राजनीतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक संदर्भों में गहराई से देखने का प्रयास है। इसके साथ रिवर्स में दिया गया उपशीर्षक इस रिपोर्ट को सामान्य दैनिक रिपोर्टिंग से अलग, एक बहुआयामी परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है। जब अधिकांश मीडिया संस्थान इस खबर को केवल यात्रा और ‘आज की घटना’ तक सीमित रखते हैं, तब यह शीर्षक चीन से संबंधों की जटिलताओं, मतभेदों और द्विपक्षीय असहमतियों को भी समेटे हुए है। आप इसे नाटकीय कह सकते हैं, लेकिन इसकी गंभीरता कम नहीं है।

इसे समझने के लिए याद रखना होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेज़बानी की थी। 17 सितंबर 2014 को भारत दौरे के दौरान अहमदाबाद में साबरमती रिवरफ्रंट पर दोनों नेता झूले पर देखे गए थे — यह तस्वीर काफ़ी चर्चित हुई थी और भारतीय मीडिया में “डिप्लोमेसी ऑन द स्विंग” कहा गया था। यह मोदी-शी की पहली औपचारिक मुलाकात थी और भारत ने इसे एक “व्यक्तिगत और सौहार्दपूर्ण स्वागत” के रूप में पेश किया था। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें (कांग्रेस को) “चीन को लाल आंखें दिखानी चाहिए”। उसके बाद से मोदी जी से पूछा जाता रहा है कि चीन को लाल आंखें कब दिखायेंगे। इसके बावजूद 2017 में डोकलाम हुआ और 2020 में गलवान। इतना ही नहीं, 20 सैनिकों की शहादत और उससे संबंधित, ना कोई घुसा है ना घुसा हुआ है भी हो चुका है। इसके बावजूद जैसा टेलीग्राफ का शीर्षक है, मोदी और शी ने अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित व्यापार को स्थिर करने के लिए एकता के संकेत दिये हैं जबकि अखिलेश यादव ने आत्मनिर्भर और स्वदेशी जैसे भाजपाई जुमलों का सच बताया है जो देशबन्धु में तो पहले पन्ने पर है लेकिन दूसरे अखबारों में नहीं है। उन्होंने कहा है कि चीन अपना माल भारत के बाजारों में भर देगा। इससे चीन पर निर्भरता इतनी बढ़ जायेगी कि भाजपा के लोग उसकी हर गलत हरकत को नजरअंदाज करने के लिए मजबूर होंगे। उसके बाद चीन हमारे उत्पादों और उद्योगों को धीरे-धीरे बंद करने के कगार तक ले जायेगा। आप इसे किसी विपक्षी नेता की भड़ास मानकर नजरअंदाज कर सकते हैं पर यह तथ्य है कि मोदी के ऐसे ही क्रांतिकारी दिखने और दिखाये जाने वाले उपायों से उद्योग धंधों का भारी नुकसान हो चुका है और यह साबित हो चुका है कि उन्हें मामले की पूरी समझ नहीं भी होती है तो वे अपने कदम को न सिर्फ सही ठहराते हैं। वे और उनके समर्थक उसके खिलाफ सुनते भी नहीं हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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1 Comment

1 Comment

  1. भवि मेनारिया

    September 13, 2025 at 10:05 am

    सुन संजय सिंह, ऐसे ही बोला जाता है कि सिर काट दूंगा, हमको पता है कि आपको मोदी सरकार से नफरत है और आपके लेख वामपंथी सोच के प्रतीत होते हैं, सरकार के अच्छे काम के लिए कभी नहीं लिखते लेकिन जहाँ मौका मिला नहीं की अपनी सोच थोपते हैं।

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