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आज के अखबार:चुनाव आयोग के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ‘फेट एकम्पली’ वह भी दोबारा पर ‘खबर’ नहीं है!

उद्योग जगत ने विज्ञापन छपवाकर सरकार की तारीफ की है और प्रधानमंत्री की फोटो अपने ब्रांड नाम तथा लोगो के साथ लगाकर उन्हें धन्यवाद कहा है। वह भी इसलिये कि उन्होंने अपनी सरकार द्वारा लागू जीएसटी और उसे लागू करने वाली समिति के रहते नई पीढ़ी की जीएसटी लागू की है और दरें कम हो गई हैं जिससे उद्योग जगत को लाभ हुआ है। जनता को पता चलेगा तो वोट मिलने की संभावना है इसलिए वे प्रचार कर रहे हैं ताकि मंदिर बनवाने वाली सरकार सत्ता में बनी रहे। यह ना खाउंगा ना खाने दूंगा तथा नीयत में खोट निकल जाये तो…. के बाद की आदर्श स्थिति है जिसपर देश के ‘स्वतंत्र’ मीडिया ने मुंह सिल रखे हैं क्योंकि माल उन्हें ही मिल रहा है।

संजय कुमार सिंह

एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में तारीख पर तारीख पड़ती रही। इतने बड़े और महत्वपूर्ण मामले में अगली तारीख सात अक्तूबर की है। एसआईआर देश भर में कराने की घोषणा हो चुकी है। 2021 की जनगणना नहीं हुई है। 2026 में शुरू होगी और 2027 के मार्च में खत्म होना है। 2021 की जनगणना 2027 की होगी। जो लोग जनगणना करते हैं लगभग वही एसआईआर भी करेंगे फिर भी दोनों की तैयारी है। जनगणना जो हर 10 साल पर होती रही है इस बार नहीं हुई। दूसरी ओर, देश भर में एसआईआर जो एक साथ नहीं हुआ, जरूरत नहीं है वह भी एक साथ करने की तैयारी है। घोषित मकसद घुसपैठियों की पहचान है (उन्हें वापस भेजना मुद्दा नहीं है) लेकिन इस बहाने मतदाता सूची से नाम काटे जा रहे हैं। यह सब तब हो रहा है जब आरोप है कि मतदाता सूची में फर्जी नाम डालकर वोट चोरी हुई है। वोट चोरी के मामले में कार्रवाई चुनाव आयोग को करनी थी लेकिन चुनाव आयोग की कानूफाड़ू चुप्पी मुद्दा नहीं है। उसे ठीक करने की जरूरत नहीं समझी गई या उसे प्राथमिकता नहीं मिली। कायदे से चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम कर रहा होता तो मामला सुप्रीम कोर्ट में नहीं जाता और सुप्रीम कोर्ट दूसरे जरूरी काम कर पाता। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का समय तो लगा ही नतीजा कुछ नहीं निकला या वही हुआ जो सिस्टम चाहता था। अब यह दिखाई दे रहा है कि सरकार ने (जिसका बहुमत से चुना जाना अब संदिग्ध है) नियम बनाकर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का अधिकार हासिल किया और चुनाव आयोग ने ऐसे काम किये जो सरकार के अनुकूल है। इसका नतीजा यह हो सकता है कि सरकार या भाजपा सत्ता में बनी रहे या कभी चुनाव हारे ही नहीं। इसके लिए अखबारों का मुंह कैसे बंद किया गया है उसकी चर्चा मैं कल यहां कर चुका हूं। सरकार सत्ता में बने रहने या अपने प्रचार के लिए जो कर रही है वह ठीक नहीं है निजी क्षेत्र के उद्योग-धंधे व्यापार जीएसटी कम करने के लिए सरकार और प्रधानमंत्री की प्रशंसा में प्रचार छपवा रहे हैं। प्रधानमंत्री सरकारी दौरे पर प्रधानमंत्री की हैसियत से भाजपा का काम बता रहे हैं, उसका प्रचार कर रहे हैं।

एसआईआर के मामले में आप देख रहे हैं कि मांग क्या थी और हुआ क्या। अब सात अक्तूबर की तारीख है। सुप्रीम कोर्ट ने कभी एसआईआर पर रोक नहीं लगाई, चुनाव आयोग अपनी इच्छा से काम करता रहा, चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि उसे अधिकार है कि वह जब चाहे, जैसे एसआईआर करे और सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करे। बेशक शब्द यही नहीं हैं पर बात यही है। इन सबके बावजूद एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में अगली तारीख 7 अक्तूबर है। आप जानते हैं कि बिहार विधानसभा का कार्यकाल नवंबर तक ही है और उससे पहले विधानसभा चुनाव करवाकर विधानसभा का गठन किया जाना जरूरी है। इसके लिए चुनाव का समय अक्तूबर ही हो सकता है और सात अक्तूबर तक एसआईआर के तहत जो मतदाता सूची बनेगी वह सबसे ताजी होगी और चुनाव उसी से करवाना होगा। आज जब सभी अखबारों की लीड वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला है तब देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, (फ्लैग) बिहार एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी (मुख्य) गड़बड़ी मिली तो पूरी प्रक्रिया रद्द कर देंगे। मुझे लगता है कि यह आश्वासन बेमतलब है इसलिए खबर धोखा है। आइये, देखें कैसे? खबर में बताया गया है कि कोर्ट ने अंतिम दलीलें सुनने के लिए 7 अक्तूबर की तारीख तय की। जाहिर है कि समय रहते मामला नहीं निपटा और तारीख पर तारीख पड़ती रहीं। बहुत कुछ पहले से तय था तब भी। मोटे तौर पर बिहार चुनाव की तारीख तय थी, एसआईआर के लिए समय कम था। यह शिकायत भी थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होती रही, एसआईआर चलता रहा, कभी स्टे नहीं हुआ। एक समय था कि अदालत जाने का मकसद स्टे लेना ही होता था और अदालतों में पहली कार्रवाई स्टे करने की होती थी। एसआईआर कई कारणों से गैर जरूरी था, सरकारी खर्च पर होना था और आम मतदाता को परेशान होना था। कानूनी तौर पर सही है कि नहीं यह मुद्दा रहा हो या नहीं, इसपर विचार हुआ या ऐसी कोई खबर नहीं दिखी। इस तरह, अदालत में पहले जो आम था वह नहीं हुआ, अब आश्वासन है कि पूरी प्रक्रिया रद्द की जा सकती है। और यही खबर है लगभग अविश्वसनीय किन्तु सत्य किस्म की।

यह फेट एकम्पली (Fait accompli) जैसी स्थिति है। इस फ़्रेंच वाक्यांश है का शाब्दिक अर्थ है “किया हुआ कार्य” या “सिद्ध कार्य”। इसका प्रयोग ऐसी स्थिति या निर्णय के लिए किया जाता है जो पहले ही पूरा हो चुका होता है और जिसे बदला नहीं जा सकता। जब कोई चीज़ “फेट एकम्पली” होती है, तो प्रभावित व्यक्तियों के पास उसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता, क्योंकि वह पहले ही हो चुकी होती है। यह अक्सर तब प्रयोग किया जाता है जब काम पहले जो जाये न्यायिक समीक्षा बाद में। यह प्रवृत्ति संवैधानिक संतुलन को प्रभावित करती है। इससे न्यायिक समीक्षा बेमतलब हो जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में जो हुआ वह भी फेट एकम्पली की स्थिति है। नोट बंदी और तमाम दूसरे मामले में ऐसा हो चुका है। चुनाव आयोग के मामले में दो बार हुआ। पहले चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में और चुनाव आयोग कहता रहा कि वह संवैधानिक संस्था है, उसके अधिकार क्या हैं आदि। अब एसआईआर इसीलिये चलता रहा और 7 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट अगर एसआईआर रद्द भी कर दे तो जो नुकसान होना था वह हो चुका है। इसका राजनीक प्रभाव भी होगा। सरकार समर्थक समझेंगे कि सुप्रीम कोर्ट के कारण ऐसा हुआ, विरोधी समझेंगे कि कोर्ट ने निर्णय में देरी कर दी या मजबूरी में किया। जो भी हो, मामला फेट एकम्पली का तो लगता है पर यह खबर नहीं है।

मुझे लगता है कि यह एक बड़ी और महत्वपूर्ण खबर है। अखबारों में यह चाहे जिस कारण से प्रमुखता से नहीं छपी हो इसका असर देश और देश की राजनीति पर होगा ही। अब जब मीडिया में तमाम मुद्दों पर चर्चा नहीं होती है तो समझने के लिए मैं एआई से चर्चा कर लेता हूं। इसके अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और फिर चुनाव आयोग के काम पर सुप्रीम कोर्ट में फैसला फेट एकम्पली है। दूसरी ओर, एसआईआर तथा वोट चोरी पर चुप्पी, कर्नाटक की मतदाता सूची से नाम हटाने के मामले में पुलिस जांच में सहयोग नहीं करना जैसे मुद्दे पर्याप्त गंभीर हैं और सुप्रीम कोर्ट को जैसी कार्रवाई करनी चाहिये थी वैसी हुई नहीं लगती है। एआई के अनुसार, दोनों मामलों में न्यायिक देरी और प्रशासनिक जल्दबाज़ी का टकराव है। सुप्रीम कोर्ट को यदि किसी मामले की संवैधानिक वैधता पर शंका है, तो उसे तुरंत “यथास्थिति” का आदेश देना चाहिए था ताकि बाद में न्यायिक निर्णय प्रभावी रहे। यह लोकतंत्र, मतदाता अधिकार, और संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए जरूरी है।

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ वह निराशाजनक है। फिर भी अखबारों और यू ट्यूब के भी शीर्षक ऐसे हैं जैसे सात अक्तूबर को एसआईआर रद्द किया जा सकता है। लेकिन उससे होगा क्या? अमर उजाला में दूसरे पहले पन्ने की लीड का शीर्षक है, बिहार एसआईआर में गड़बड़ी मिली तो पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी जाएगी। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट का देश भर में एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार। बिहार मामले में सात अक्तूबर को अंतिम दलीलों पर सुनवाई। नवोदय टाइम्स में यह वक्फ अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ दो कॉलम में छपी है। शीर्षक है, एसआईआर में अवैधता निकली तो बिहार में कर देंगे रद्द। देश भर में इसे नहीं रोका जा सकता है। इसकी तुलना मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित मामले से कीजिये और नोट कर लीजिये कि फैसला लंबित है। उस कोर्ट में जहां यह तय किया जाना है कि राज्यपालों और राष्ट्रपति को भी अनंत काल तक फैसला रोके रहने का अधिकार है कि नहीं। पहले तय किया जा चुका है कि नहीं है, तब भी। सुप्रीम कोर्ट पूर्व में समय सीमा तय कर चुका है। उसे चुनौती दी गई है या उसपर पुनर्विचार की मांग की गई है और सरकार की तरफ से दलील दी जा रही है कि यह अधिकार होना चाहिये। कानूनी स्थिति जो हो, सबको पता है कि केंद्र सरकार राज्यपालों के जरिये राज्यों के मामले में हस्तक्षेप करती है और इसीलिए ऐसा कानून चाहती है या सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश पर विचार। दिलचस्प यह है कि राष्ट्रपति ने भी इस पर सवाल किये हैं और मामले पर संविधान पीठ ने विचार किया है। महाराष्ट्र की सरकार गिराने के मामले में विधानसभा अध्यक्ष ने समय रहते फैसला नहीं किया। मुझे लगता है 2014 से पहले के भ्रष्ट काल में ऐसे मामले इक्का दुक्का होते थे, अमृत काल में आम हैं। पहले कम होते थे तो मीडिया में चर्चा होती थी अब आम है तो राहुल गांधी की विदेश यात्रा पर चर्चा होती है।

सुप्रीम कोर्ट की कल की खबर में अंबानी के वनतारा को क्लीनचिट मिलने की भी खबर भी है। देश भर की अदालतों में जब तमाम मामले वर्षों से लंबित हैं, समय पर न्याय की संभावना ही बहुत कम है तब कुछ लोगों को या कुछ मामलों में मिले क्लीन चिट काले टीके की तरह हैं। वक्फ मामले में खबर यह भी है कि कुछ लोगों को यह सफलता या जीत लगता है तो मुस्लिम समूह ना खुश हैं। द टेलीग्राफ में आज वक्फ पर फैसला लीड, वनतारा सिंगल कॉलम और एसआईआर पर चेतावानी अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। अंग्रेजी के मेरे बाकी पांचों अखबारों में भी वक्फ अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लीड है। पांच अखबारों के शीर्षक से आप फैसले को मोटे तर पर समझ जायेंगे और किसी एक अखबार की पूरी खबर पढ़ने से बेहतर जानकारी मिलेगी। सभी शीर्षकों का हिन्दी अनुवाद मेरा है। 1) इंडियन एक्सप्रेस : वक्फ कानून पर कोई स्टे नहीं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ‘गार्डरेल’ लगाये : डीसी के अधिकार सीमित किये, गैर मुसलमान मौजूदगी की अधिकतम सीमा तय कर दी। फ्लैग शीर्षक के अनुसार, यह मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति अगस्टिन मसीह का अंतरिम आदेश है। 2) टाइम्स ऑफ इंडिया : सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून को रोकने से मना किया लेकिन  कुछ प्रावधानों को स्टे कर दिया। 3) हिन्दुस्तान टाइम्स : सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ अधिनियम को स्टे करने से इनकार किया लेकिन प्रमुख धाराओं को स्टे किया। 4) द हिन्दू : सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ में ‘मनमाने’ परिवर्तनों को स्टे किया लेकिन कानून को जारी रखा 5) दि एशियन एज : सर्वोच्च अदालत ने प्रमुख वक्फ कानूनों को रोका; लेकिन कोई स्टे नहीं।  

अखबारों में खबरें नहीं छपती हैं, हेडलाइन मैनेजमेंट तो होता ही है। ऐसे में बहुत सारे लोग यू ट्यूब के सहारे हैं लेकिन यूट्यूब की अपनी समस्या है। वह ज्यादा खतरनाक है। जरा सी शिकायत पर चैनल ही बंद कर दिया जाता है और इसमें फंसाने, बचने-बचाने का खेल भी चल रहा है। लिहाजा यू ट्यूह चैनलों के शीर्षक भी ऐसे नहीं हैं जैसे अघोषित इमरजेंसी से पहले होते थे। कुछ एक शीर्षक इस प्रकार हैं।

  • बिहार एसआईआर : सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन के आगे घुटने टेके?
  • सुप्रीम कोर्ट में फंस गया इलेक्शन कमीशन, एसआईआर पर सुनवाई जारी
  • विपक्ष बनाम चुनाव आयोग : एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में भिड़ंत!
  • ईसी को कोर्ट ने क्या कहा, आधार, वोटर आईडी पर सुना दिया ये फरमान।
  • इलेक्शन कमीशन से सुप्रीम कोर्ट ने पूछे सवाल
  • बिहार एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, फिलहाल रोक नहीं, ईसी से पूछा सवाल

आइये, अब यह भी देख लें कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के मामले में सरकार ने कैसे जल्दबाजी और मनमानी की है।

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की क्रोनोलॉजी

तारीखघटना
2 मार्च 2023सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच का फैसला — इस फैसले में कहा गया था कि जब तक संसद एक नया कानून नहीं बनाएगी, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति एक चयन समिति करेगी जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।
10 दिसंबर 2023संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्त, सेवा शर्तं और कार्यकाल) विधेयक, 2023 पास किया।
28 दिसंबर 2023राष्ट्रपति ने नए कानून को सहमति दी।
2 जनवरी 2024नया कानून लागू हुआ।
12‑13 जनवरी 2024सुप्रीम कोर्ट ने नए कानून के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। कोर्ट ने इसपर स्टे नहीं लगाया लेकिन केन्द्र को नोटिस जारी किया गया और मामले को आगे की सुनवाई के लिए अप्रैल तक सूचीबद्ध किया गया।
17‑18 फरवरी 202517‑18 फरवरी 2025  सरकार ने ज्ञानेश कुमार को नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया, यह 2023 के नये कानून के तहत पहली नियुक्ति थी।
19 फरवरी 2025सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं की सुनवाई के लिए तारीख तय की जो नए कानून के अंतर्गत सीईसी और ईसी की नियुक्तियों की वैधानिकता को चुनौती देती हैं।
14 मई 2025सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं की सुनवाई की तारीख 14 मई 2025 तय की थी। इस दिन सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई टाल दी। मामला लंबित है।

इसके बाद एसआईआर के मामले में चुनाव आयोग की मनमानी चलने दी गई जिसका उद्देश्य चुनाव जीतने में भाजपा की मदद करना हो सकता है और इसपर रोक नहीं लगाना सरकार के दबाव में हो सकता है। दूसरी ओर, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में था 18 फरवरी को पुराने सीईसी को रिटायर होना था। 17 फरवरी को नये सीईसी की नियुक्ति कर दी गई और 19 फरवरी 2025 को नये सीईसी ने चार्ज ले लिया। यह सब ऐसे समय हुआ जब कोर्ट में अगले ही दिन सुनवाई होनी थी। दूसरी ओर, तमाम लोग रिटायर हो जाते हैं विकल्प तय नहीं होता है और मोदी सरकार के राज में सीमा सुरक्षा बल के प्रमुख से लेकर दिल्ली पुलिस के प्रमुख तक का पद खाली रहा है और काम चलाऊ लोग रहे हैं पर सीईसी की नियुक्ति समय से पहले पहले की गई। इसमें दुलारे अफसर राकेश अस्थाना को बचाने के लिए की गई ऐतिहासिक आधी रात की कार्रवाई उल्लेखनीय है। इस बार मुख्य चुनाव आयुक्त काम चलाऊ एक दिन भी नहीं रहे। ये सवाल संवैधानिक ईमानदारी और शक्ति-संतुलन का है। चूंकि सीईसी का पद लोकतंत्र की बुनियादी संरचना से जुड़ा है इसलिए निष्पक्षता, पारदर्शिता और न्यायिक स्वतंत्रता की बहुत अहमियत है। सुप्रीम कोर्ट से विशेष अपेक्षा थी, खास कर इस समय जब वोट चोरी के आरोपों पर चुनाव आयोग ने मौन साध रखी है। मुझे नहीं पता कि यह लोया होने के डर से है या कोई और कारण है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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