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आज के अखबार:चुनाव आयोग ने बंगाल में सबसे ज्यादा तबादले किए और कहा, ‘गुंडागर्दी’ बर्दाश्त नहीं करेगा

घुटने टेक चुकी व्यवस्था में चुनाव आयोग की मनमानी खबर नहीं बनी। प्रधानमंत्री के जरिए भाजपा  का प्रचार ज्यादा है तृणमूल की शिकायत कल नहीं थी आज चुनाव आयोग की धमकी की खबर सिर्फ देशबन्घु में है। मतदाता सूची से ‘घुसपैठियों’ को निकालना था, लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के नाम पर निकाल दिए लाखों वोटर। सबको परेशान किया सो अलग। पिछले दरवाजे से नए वोटर बनाने की कोशिश खबर नहीं थी। जो रह गए वो वोट नहीं दे पाएंगे, नए वोटर बन गए तो खेल हो ही जाएगा लेकिन मताधिकार खत्म नहीं होने का सुप्रीम कोर्ट का गैर जरूरी आश्वासन पहले पन्ने पर प्रमुखता से है!

संजय कुमार सिंह

आज के भिन्न अखबारों के पहले पन्ने की कुछ खबरें, शीर्षक और हाईलाइट किए हुए अंश इस प्रकार हैं – केंद्र सरकार और केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीतने (लड़ने लिखना चाहिए) में व्यस्त है जबकि ज्यादातर अखबार खाड़ी युद्ध की खबरों में लगे हैं। युद्ध के कारण कमर्शियल सिलेंडर 195 रुपए (अमर उजाला), प्रीमियम डीजल डेढ़ रुपए (नवोदय टाइम्स) महंगा हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि प्रधानमंत्री नागरिकों की रक्षा के प्रयास कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, एटीएफ (विमान का ईंधन) 25 प्रतिशत महंगा हो गया है लेकिन देसी यात्रियों का किराया (फिलहाल) नहीं बढ़ेगा। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है, इंडिगो ने फुएल चार्ज बढ़ा दिए हैं। दिल्ली मुंबई उड़ान पर 600 रुपए की वृद्धि लागू होगी। दि एशियन एज ने अपने पाठकों को बताया है, मोदी ने मूल्यवृद्धि रोकने, आपूर्ति सुरक्षित करने के आदेश दिए जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने कहा है कि ईरान हमारी जंग नहीं है। असल में ब्रिटेन ने होर्मुज पर 35 देशों के राजनयिकों का सम्मेलन बुलाया है और प्रधानमंत्री, कीर स्टार्मर ने कहा है कि उनका नेतृत्व शांति का समर्थन करता रहेगा, व्हाइट हाउस के किसी दबाव में नहीं आएगाल (नवोदय टाइम्स)। खाड़ी युद्ध या ईरान संकट के कारण देश में जो परेशानियां हैं उस पर भारत जो कर रहा है उसे जैसे बताया गया है उसमें सबसे खास है, दि एशियन एज। यहां इस संबंध में मोदी का ‘आदेश’ लीड है। देश में जो हालत है उसे अकले द हिन्दू ने लीड बनाया है। शीर्षक है, ईरान संकट के बीच कमर्शियल एलपीजी और जेट फ्यूल की दरें बढ़ीं। उपशीर्षक है, बड़े मेट्रो शहरों में कमर्शियल सिलेंडरों की कीमतों में 10% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई; घरेलू यात्रा के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल की कीमत में 9% की बढ़ोतरी; घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में कोई बदलाव नहीं है। देश के पांच राज्यों में चुनाव चल रहे हैं। प्रधानमंत्री असम में थे उसकी तस्वीर है और बंगाल में एसआईआर चल रहा है उसपर सुप्रीम कोर्ट की खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने बंगाल में 483 अधिकारियों का तबादला किया है जबकि दूसरे चुनावी राज्यों जैसे असम, केरल और तमिलनाडु में यह संख्या सिर्फ 23 है। यह सभी राज्यों के लिए 23-23 नहीं, कुल 23 है। 2021 में चुनाव आयोग ने सिर्फ 15 अधिकारियों के तबादले किए थे।   

मेरे नौ अखबारों में पहले पन्ने की सबसे अलग तरह की खबर देशबन्धु और द टेलीग्राफ में है। कोलकाता के इस अखबार में एक खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है जो दिल्ली में नहीं है तो खास बात नहीं है लेकिन देशबन्धु की खबर दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर हो सकती थी। मुझे दिखी नहीं। चुनाव आयोग ने कहा है कि (कोलकाता में) सीईओ दफ्तर के सामने गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दिलचस्प यह है कि बंगाल चुनाव से संबंधित खबरें दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर हैं लेकिन ये वाली खबर नहीं है। टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर है तो शायद इसलिए कि इसका शीर्षक है, सुरक्षा बलों की कार ने मालदा के प्रदर्शनकारी को घायल किया। टेलीग्राफ की इस खबर के अनुसार, एसआईआर के दौरान बड़े पैमाने नाम हटाए जाने के खिलाफ विरोध करने के लिए ग्रामीणों ने सात अधिकारियों का घेराव किया था। इनमें तीन महिलाएं थीं। इन्हीं को छुड़ाने गए सुरक्षा बलों की गाड़ी से एक व्यक्ति के घायल होने की यह खबर टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। लेकिन एसआईआर के तहत नाम हटाए जाने के खिलाफ अफसरों के घेराव की खबर अंदर है। मुझे लगता है कि मतदाताओं के नाम हटाए जाने के विरोध में घेराव बड़ी खबर है और देश भर में तमाम बीएलओ की मौत के बाद ग्रामीणों के इस घेराव से पता चलता है कि एसआईआर से आम लोगों में नाराजगी है जबकि हाल में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की आपत्तियों पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने पूछा था कि जब 12 अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है, तो केवल बंगाल को इससे दिक्कत क्यों है। कोर्ट ने पूछा था कि क्या इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है।

आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री, सरकार और भाजपा ने घुसपैठियों को मतदाता सूची के निकालने की राजनीतिक मांग (जरूरत) पर ही एसआईआर हो रहा है। बहुत कम समय में जबरन हो रहा है जबकि जो सब हो रहा है वह फुर्सत में और लगातार चलते रहने वाला काम है। शुरुआत घुसपैठियों की निकालने से हुई थी जो कायदे से चुनाव आयोग का काम होना ही नहीं चाहिए और आखिरकार वह लॉजिकल डिसक्रिपेंसी ठीक करने लगा। इसमें लाखों लोग परेशान हुए, करोड़ों खर्च हुए और फायदा कुछ नहीं हुआ क्योंकि तमाम लोग बिना किसी उचित कारण से बाहर रहे गये। चूंकि बहुत सारे मतदाताओं से संबंधित मामला है इसलिए खबर दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर है। कल मैंने लिखा था कि पिछले दरवाजे से भाजपा के लोग 30 हजार नए वोटर बनाने की फिराक में हैं और उसकी खबर नहीं थी। शायद इसी दम पर चुनाव आयोग ने कहा है कि सीईओ दफ्तर के सामने गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कहने की जरूरत नहीं है कि सीईओ कार्यालय में जो हुआ या किया गया वह सामान्य नहीं है और उसका विरोध किया ही जाएगा। विरोध गुंडागर्दी नहीं है और गुंडा गर्दी से निपटने के लिए पुलिस होती है। बंगाल में जो तैयारियां रहती आई हैं वह सबको मालूम है। ऐसे में कोई जरूरत नहीं थी कि चुनाव आयोग इस भाषा और तेवर में बात करता। जहां तक गुंडागर्दी की बात है, किसी दफ्तर की तो छोड़िए किसी व्यक्ति के खिलाफ भी बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। डबल इंजन की निर्वाचित सरकारें बुलडोजर न्याय कर रही हैं और जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी स्थिति है। चुनाव आयोग यही करता दिख रहा है और अब तो कह भी रहा है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग से जिस निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है वह तो नहीं ही है। कई मामलों में संतोषजनक जवाब नहीं है।

कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग ने जो किया है या उससे करवाया गया है उसमें विरोध स्वाभाविक है और अधिकारियों की जान तो गई ही है, घेराव भी हुआ है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने सीधे तौर पर टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया है। आयोग की यह प्रतिक्रिया मंगलवार रात से शुरू हुई घटनाओं के बाद आई है। सवाल यह उठता है कि क्या टीएमसी सरकार में होने या केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ होने के कारण मतदाताओं को छोड़ दे? धरना-प्रदर्शन या इसका नेतृत्व गुंडागर्दी कैसे हो सकता है? जो भी हो अमर उजाला की सेकेंड लीड है, बंगाल एसआईआर के तहत 47 लाख आपत्तियां निपटीं। सुप्रीम कोर्ट ने काम पूरा करने के लिए समय सीमा तय की है। द हिन्दू की खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, मतदाता सूची से नाम हटने से मतदान का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त नहीं होता। मुझे लगता है कि ऐसा कहने या आश्वासन देने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए थी। कोई भी जानता और समझता है कि मतदाता सूची से नाम हटाए गए हैं (या किसी प्रक्रिया के कारण हट गए हैं) तो जिसके नाम हट गए वो वोट नहीं दे पाएंगे और जिनके जबरन या चोरी से जुड़वाए गए हैं या जो विशेष ट्रेन से बुलाए जाएंगे वो वोट दे लेंगे। इससे आए नतीजों से जो चुना जाएगा वह पांच साल सरकार चलाएगा, वेतन-भत्ते और पेंशन भी लेगा। मतदान का अधिकार बना रहे या नहीं, फर्क क्या पड़ा। अगली बार किसी और का नाम हटा दिया जाएगा और  या जोड़ दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट को सुनिश्चित करना था कि ऐसा नहीं हो पर हुआ है तभी आश्वासन देना पड़ रहा है। अगर ऐसा ही होना था पुरानी सूची से या आधार से नाम डालने में क्या दिक्कत थी? यही ना कि तथाकथित घुसपैठियों के भी वोट पड़ जाते जो पहचाने नहीं गए हैं और जिनके नहीं पड़ेंगे वे सामने खड़े हैं। इससे नतीजा न भी बदले तो ये अपने अधिकार का उपयोग करने से वंचित रहे। यह सुनिश्चित नहीं हुआ कि वोट देने वालों में घुसपैठिए नहीं हैं।

जाहिर है, जो हो रहा है वह सामान्य नहीं है लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने का एक शीर्षक है, मोदी ने ईरान युद्ध के प्रभाव को कम करने के लिए हर संभव प्रयास का आह्वान किया। इस शीर्षक का मकसद और इसका प्रभाव समझा जा सकता है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी या तृणमूल कांग्रेस का आरोप खबर नहीं है, विरोध करने वालों को धमकाया जा रहा है सो अलग। और बात इतनी ही नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया, नवोदय टाइम्स और दि एशियन एज में चुनाव प्रचार की प्रधानमंत्री तस्वीर और खबर प्रमुखता से है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, प्रधानमंत्री ने इसे एक्स पर पोस्ट किया है। दि एशियन एज ने असम में लगातार तीसरी बार भाजपा की जीत की भविष्यवाणी को शीर्षक बना दिया है। खबर के अनुसार दो चुनाव रैलियों में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, … अगर असम में कांग्रेस सत्ता में आती है, तो वह घुसपैठियों को बचाने के लिए एक कानून लाएगी; और भाजपा तथा उसके सहयोगी यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी घुसपैठियों को बाहर निकाल दिया जाए। जाहिर है, प्रधानमंत्री यह नहीं बताते कि 10 साल उन्होंने क्या किया। इसमें घुसपैठियों को निकालने की दिशा में किए गए काम का भी उल्लेख नहीं है। लेकिन उनका कहना है कि कांग्रेस घुसपैठियों को बचाने के लिए कानून लाएगी – मतलब कांग्रेस क्या करेगी उसे भी ‘सरकार’ ही बताएंगे। जो नहीं किया या कर पाए उसे स्वीकार भी नहीं करेंगे।  जो भी हो, यह उनकी राजनीति हो सकती है। चुनाव आयोग इसपर आंख मूंद ले या मूंदा हुआ है। खबर यही है लेकिन खबर कुछ और बता रही है। पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री की कही ऐसी बात छपी है जो उनके स्तर का चुनाव प्रचार नहीं है। वैसे भी असम के मुख्यमंत्री पूर्व कांग्रेसी हैं, खुल कर हिन्दू-मुसलमान करते रहे हैंष उनके भ्रष्टाचार और उनपर भाजपा के आरोपों से संबंधित सवाल पूछने पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह असहज होते रहे हैं, जवाब तो नहीं ही दिया है। फिर भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं असम में भाजपा तीसरी बार जीतेगी। केरल में वे कह चुके हैं कि, जो अब तक नहीं बदला, वह अब बदलेगा। केरल के पलक्कड़ में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि केरलम बदलाव का संदेश दे रहा है और युवाओं, महिलाओं व किसानों का विश्वास अब बीजेपी-एनडीए में है। यहां दिलचस्प है कि केरल देश का सबसे अधिक साक्षरता वाला राज्य है और प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी आगे है। इसे ‘गॉड्स ओन कंट्री’ या ‘ईश्वर की अपनी धरती’ कहा जाता है। यह नाम केरल पर्यटन की विपणन रणनीति के तहत मशहूर हुआ है और इसे उत्तर भारत की हिन्दी पट्टी से बहुत अलग माना-समझा जाता है। भाजपा ने 2026 विधानसभा चुनाव के लिए ‘विकसित केरलम’ नाम का संकल्प पत्र जारी किया है। धार्मिक मामला इसमें भी है और सबरीमाला के लिए विशेष बोर्ड का आश्वासन दिया गया है। संयोग से चुनाव के समय सबरीमाला मामले की समीक्षा होने वाली है। यही नहीं, ठेठ हिन्दी भाषी शैली में मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, और प्रति माह 20,000 लीटर मुफ्त पानी देने जैसे वादे किए हैं। भाजपा ने स्वास्थ्य सुविधाओं में वृद्धि, एम्स, कोच्चि और तिरुवनंतपुरम में मेट्रो तथा हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर जैसे बुनियादी ढांचे के वादे किए हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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