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आज के अखबार : चुनाव की घोषणा से पहले छापा, मतदान से पहले गिरफ्तारी पूछ-ताछ… पर सन्नाटा

एक विचारधारा की खबर के बाद आज दो ही खबर और दो ही अखबार। बंगाल चुनाव से संबंधित खबर और भाजपाई मनमानी द टेलीग्राफ में है। इसी तरह, खास विचारधारा के जज को बचाने की भाजपाई कार्यशैली की याद दिलाने वाली खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर कुमार यादव बिना किसी कार्रवाई रिटायर हो गए जबकि भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे या घेरे गए यशवंत वर्मा ने हाल में इस्तीफा देकर जान (असल में पेंशन और दूसरी सुविधाएं) बचाई है। जो कहा है उसके बारे में आप पढ़ चुके होंगे।

संजय कुमार सिंह 

केंद्र सरकार की एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने ऐन चुनाव के मौके पर तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के चुनाव सलाहकार आई-पैक के ठिकानों पर छापा मारा था। इनमें उसके निदेशकों में एक, प्रतीक जैन का घर भी था। अब इसी मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप के तहत इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (आई-पैक) के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को गिरफ़्तार किया है। सत्तारूढ़ टीएमसी नेताओं ने इसे चुनाव से ठीक पहले साज़िश क़रार दिया है। लेकिन खबर और चर्चा वैसे नहीं है जैसे चुनाव के समय किसी राजनीतिक मामले में सरकारी कार्रवाई पर होनी चाहिए। वैसे भी छापा पड़ा एक निदेशक के घर पर, गिरफ्तार किया गया दूसरे निदेशक को वह भी कई महीनों बाद लेकिन ऐन चुनाव से पहले। संबंध हो या न हो, अगर मकसद चुनाव के समय राजनीति नहीं है तो इससे बचना चाहिए था। छापा पूरी तरह सरकारी हो तो भी अधिकारियों को सोचना चाहिए था और अधिकारी किसी दबाव में या पूरी तरह स्वतंत्र रूप से भी काम कर रहे हों तो राजनीतिक नेतृत्व से पूछ कर ही कार्रवाई की गई होगी क्योंकि पिछली बार की कार्रवाई के बाद इसके राजनीतिक मायने तो सबको समझ में आ ही जाने चाहिए थे। जाहिर है, राजनीतिक आदेश न हो तो मना नहीं किया गया है और इसलिए यह खबर तो है ही लेकिन मेरे किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। ढूंढ़ने पर दि एशियन एज में छोटी सी खबर जरूर दिखी। द टेलीग्राफ में प्रकाशित ब्यूरो की खबर का शीर्षक है, ईडी ने आई-पैक पर कसा शिकंजा। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तृणमूल और डीएमके के चुनावी सलाहकार आई-पैक के सह-संस्थापक और निदेशक प्रतीक जैन की पत्नी और भाई को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में पूछताछ के लिए समन भेजा है। यह कार्रवाई उनके सहयोगी विनेश चंदेल की गिरफ्तारी के एक दिन बाद की गई है।

ईडी के एक अधिकारी ने बताया, “प्रतीक की पत्नी बार्बी और भाई पुलकित को दिल्ली स्थित एजेंसी के मुख्यालय में जांच अधिकारियों के सामने पेश होने के लिए कहा गया है। उनके बयान मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत दर्ज किए जाएंगे।” अधिकारी ने आगे बताया कि यह मामला बंगाल में कथित कोयला घोटाले और उससे जुड़े हवाला लेन-देन से जुड़ा है। अधिकारी ने विस्तार से जानकारी दिए बिना बताया कि जैन और चंदेल के व्यावसायिक संबंधों की भी जांच की जा रही है। जनवरी में, ईडी की दो टीमों ने जैन के कोलकाता स्थित घर और आई-पैक के सॉल्ट लेक स्थित कार्यालय पर छापा मारा था। इस घटना के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मिलकर ईडी की कार्रवाई में कथित तौर पर बाधा डाली थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था। इससे ईडी और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी। वहीं, ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि केंद्रीय एजेंसी ने तृणमूल के चुनावी दस्तावेज़ों को ज़ब्त करने की कोशिश की थी। मंगलवार को दिल्ली की एक अदालत ने चंदेल को गिरफ्तार किए जाने के बाद आधी रात को हुई सुनवाई के उपरांत 10 दिनों के लिए ईडी की हिरासत में भेज दिया। अदालत ने तड़के करीब 3:30 बजे अपना आदेश सुनाया। इस तरह, ईडी को 23 अप्रैल तक चंदेल से पूछताछ करने की अनुमति दे दी। उल्लेखनीय है कि तृणमूल के वर्चस्व वाले पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना निर्धारित है। तृणमूल सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने चंदेल की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की मांग करते हुए कहा, “हम मांग करते हैं कि चुनावों से पहले बंगाल से केंद्रीय एजेंसियों को वापस बुला लिया जाए।” आप जानते हैं कि आठ जनवरी 2026 को कोलकाता में प्रवर्तन निदेशालय ने आई-पैक के एक अन्य संस्थापक सदस्य प्रतीक जैन के घर पर छापा मारा था। उस छापे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौके पर पहुंची थीं और कथित तौर पर ईडी के अधिकारियों द्वारा जांचे जा रहे कुछ दस्तावेज़ों को छीन लिया था। बुधवार को ईडी ने जैन के भाई पुलकित और पत्नी बार्बी को समन जारी किया। प्रतीक जैन के खिलाफ कार्रवाई की सूचना नहीं है और उनके घर पर छापे के बाद अब की कार्रवाई से लगता है, मामला कोयला घोटाले की जांच का नहीं तृणमूल कांग्रेस का ही है। वैसे भी यह कार्रवाई अगर पहले नहीं हो सकती थी तो चुनाव तक टाली जरूर जा सकती थी। फिर भी खबर नहीं छपना बताता है कि एक खास विचारधारा के लोग हर जगह हैं। इसमें खबर लिखने वाले ही नहीं, प्राथमिकता तय करने वाले भी शामिल लगते हैं।

ऐसा ही एक और मामला आज टाइम्स ऑफ इंडिया में है। पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की यह खबर नई नहीं है और पहले से पता थी। इसलिए यह खबर भले पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन हिन्दी अखबारों में भी है। दिलचस्प यह है कि विपक्षी दलों से संबंधित गैर राजनीतिक लोगों को भी परेशान करने वाले सरकारी विभागों और एजेंसियों ने प्रचारक जज को बचा लिया। मीडिया ने परवाह ही नहीं की। वास्तविकता यह है कि अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की जज स्वर्ण कांता शर्मा से कहा है कि उनके मामले से अलग हो जाएं या खुद को रिक्लूयज कर लें। इसके तमाम कारणों में एक कारण यह भी है कि न्यायामूर्ति आरएसएस की विचारधारा से संबंधित एक संगठन के कार्यक्रम में जाती रही हैं। केजरीवाल का कहना है कि मामला विचारधारा का है और जब यह सार्वजनिक है कि मैं उस विचारधारा का विरोध करता हूं तो मुझे शक है कि न्याय नहीं मिलेगा। उधर राहुल गांधी यह आरोप लगा चुके हैं कि हर महत्वपूर्ण जगहों पर एक खास विचारधारा के लोग बैठा दिए गए हैं। इसका असर भी दिखता रहता है। ऐसे में यह महत्वपूर्ण है आपत्तिजनक भाषण देने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर यादव ने न तो अपने कहे के लिए माफी मांगी ना उनके खिलाफ कार्रवाई हुई फिर भी वे आज रिटायर हो जाएंगे और नियम है कि अब उनके खिलाफ इस मामले में कार्रवाई नहीं हो सकती है। यह नियम इस्तीफा देने पर भी लागू होता है और हाल में खबर थी कि दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा, जिनके घर में नोटो का जखीरा देखा गया था, ने इस्तीफा दे दिया है। उनके खिलाफ भी कार्रवाई नहीं हुई। कार्रवाई तो तब होती जब पक्का होता कि पैसा किसका था। न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि उनका नहीं था और घर के बाहरी हिस्से में कोई भी आ-जा सकता था। इस तरह यह मामला भी स्पष्ट नहीं हुआ। यही नहीं, हाल में कहा गया था कि जजों से संबंधित शिकायत का विवरण नहीं रखा जाता है जबकि पूर्व में इसका विवरण दिया जा चुका है। प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने वाले जजों के तबादले का भी उदाहरण है। हाल में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय पर नाराज हो गए थे और उसे हटवा दिया गया। एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का रुख सरकार समर्थन का ही रहा है और पश्चिम बंगाल में लाखों लोग वोट नहीं दे पाएंगे। यह सरकार या भाजपा के फायदे में बताया जा रहा है। इस तरह, अगर यह माना जाए कि खास विचारधारा के लोगों के अनुकूल काम हो रहा है तो गलत साबित करना मुश्किल होगा।  आपत्तिजनक बातें करने वाले जज के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, भी एक खबर है।    

पुरानी खबरों के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट परिसर में आरएसएस से संबद्ध भारत विकास परिषद द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति शेखर यादव ने कहा था, “मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत बहुमत की इच्छा के अनुसार चलेगा।” वे समान नागरिक संहिता पर बोल रहे थे। उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने तीन तलाक जैसी प्रथाओं की आलोचना करते हुए मुसलमानों के लिए अपमानजनक शब्द का प्रयोग किया। सुप्रीम कोर्ट के 13 वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को पत्र लिखकर सीबीआई से न्यायमूर्ति यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस यादव को तलब किया और कथित तौर पर उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा। हालांकि, न्यायाधीश ने कथित तौर पर इनकार कर दिया और फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा कि वे अपने बयान पर कायम हैं। 13 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में विपक्ष के 54 सांसदों ने जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग का नोटिस प्रस्तुत किया था। इसमें उन पर घृणास्पद भाषण देने और सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने का आरोप लगाया गया था। राज्यसभा सचिवालय ने प्रस्तुत प्रस्ताव में शामिल 54 हस्ताक्षरों में से कुछ में विसंगति का हवाला देते हुए सत्यापन प्रक्रिया शुरू की थी। राज्यसभा सचिवालय की ओर से मार्च और मई में भेजे गए ईमेल और फोन कॉल्स के जरिए हस्ताक्षर सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसमें अब तक 44 सांसदों ने अपने हस्ताक्षर की पुष्टि कर दी थी। बाकी बचे 10 सांसदों में से छह ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि उन्होंने भी नोटिस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस लिहाज से कम से कम 50 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने की बात कबूली है। यह महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए न्यूनतम आवश्यक संख्या है। 24 जून 2025 की एक खबर के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ पिछले साल विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के एक कार्यक्रम में दिए गए विवादास्पद बयानों के कारण 54 राज्यसभा सांसदों द्वारा दायर महाभियोग प्रस्ताव अभी भी लंबित है। इसके बाद,  राज्यसभा के सभापति या देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने  21 जुलाई 2025 को अचानक इस्तीफा दे दिया। बाद में जो सब हुआ उससे स्पष्ट हो गया कि इस्तीफा सामान्य नहीं था और चर्चा रही कि प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना और उसपर ‘कार्रवाई’ मुद्दा रही। मुख्यधारा की मीडिया के लिए यह मुद्दा नहीं था और मामला धीर-धीरे अपनी गति को प्राप्त हुआ। अब तो कोई उम्मीद भी नहीं है क्योंकि विचारधारा का मामला बहुत मजबूत हो चुका है। अब अपने लोगों को क्लीन चिट या सर्टिफिकेट दिए जाते हैं विपक्ष के नेताओं को जमानत भी मुश्किल से मिलती है या नहीं भी मिलती है। भाजपा ऐसी व्यवस्था करती जा रही है कि वह भविष्य के चुनाव न हारे। महिला आरक्षण और परिसीमन ऐसे ही प्रयासों के भाग हैं। आज दो ही खबर, दो ही अखबार। मैं तो यही कहूंगा कि आज की बाकी खबरें इन दो मुख्य खबरों से ध्यान हटाने के लिए है। एक ही विचारधारा के कारण एक जज फंसी हुई हैं (उनपर तमाम आरोप सार्वजनिक हैं) और एक जज का बाल भी बांका नहीं हुआ। जिन्हें मुफ्त में बदनाम होना पड़ा या इस्तीफा देना पड़ा उनका मामला ही पता नहीं चला।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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