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आज के अखबार : चुनावी रैली के भाषण से हेडलाइन मैनेजमेंट की कोशिश और सफलता की कहानी

संजय कुमार सिंह

होर्मुज जल क्षेत्र में भारत से जुड़े जहाज को निशाना बनाया जाना भारत के लिए बड़ी खबर है। खबर कल की है, मुझे कल से ही मालूम है, मित्रों के साथ यूट्यूब वीडियो के लिए चर्चा कर चुका हूं। पारिवारिक कार्यों में व्यस्तता की वजह से आज अखबार देर से देख पाया और यही तय कर रखा था कि कुछ खास नहीं हुआ तो आज नहीं लिखूंगा। पर खबरों के लिहाज से आज का दिन ही सबसे खास है। युद्ध, जहाज पर हमले के अलावा आज की तीसरी बड़ी खबर भी युद्ध से संबंधित है। यह है रसोई गैस की आपूर्ति और अपने घर के सिलेंडर का हाल। जाहिर है, ऐसे ही समय में याद आता है कि सरकार किसकी है और फिर राम मंदिर की याद आना स्वाभाविक है। राम मंदिर वालों के बारे में गलत राय बनी तो वोट का नुकसान हो सकता है और मंदिर बनाने के लिए सत्ता पाने वाले इसका ख्याल रखते हैं। कारण सत्ता नहीं छोड़ने की मजबूरी है लेकिन वह अलग मुद्दा है। पंकज चतुर्वेदी की खबर यह भी है कि, अयोध्या में धंधा मंदा होता देख विश्व हिंदू परिषद ने बलात्कारी आशाराम का सहारा ले लिया। सज़ायाफ़्ता बलात्कारी आसाराम उर्फ असुमल हरपलानी को गिरते स्वास्थ्य के कारण हाईकोर्ट से छह माह की अंतरिम जमानत मिली थी, लेकिन वह ठप्पे के साथ अयोध्या घूम रहा है।  मंगलवार को वह अयोध्या पहुंचा था और बुधवार सुबह उसने “वीवीआईपी” के रूप में रामलला के दर्शन किए। जिस आदि शंकराचार्य गेट से सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे वीआईपी जाते हैं, उसी से आसाराम के तीन गाड़ियों के काफिले को राम मंदिर में प्रवेश दिया गया। उसने 10 मिनट दर्शन किए और मंदिर में आधा घंटा बिताया। करीब छह लोग उसके साथ थे। सबसे खास है उसकी चंपत राय से गुप्त बातचीत। जाहिर है इससे आशाराम के कस्टमर अब तेजी से अयोध्या आएंगे। भीड़ होगी तो जानते हैं माल कौन कमाएगा? इस तरह खबरें बनती और बनाई जाती हैं।

आइए, आज आपको ऐसी खबरें बताता हूं। सबसे पहले सिलेंडर – जाहिर है इसका मतलब है और इसीलिए देशबन्धु में खबर का शीर्षक है, गैस की किल्लत से बढ़ी परेशानी। इसके साथ सिंगल कॉलम की खबर है, सरकार ने कहा घबराहट में बुक न करें सिलेंडर। मुझे लगता है कि सिलेंडर के मामले में यह अपील जितनी जल्दी आई और छपी है उतनी जल्दी लिंचिंग के मामले में आती ही नहीं है तो इतनी प्रमुखता से छपे भी कैसे। वैसे यह अलग मुद्दा है। नवोदय टाइम्स ने गैस सिलेंडर की कमी की खबर को अपने शीर्षक से हल्का कर दिया है। इसे पत्रकारीय खेल कहिये या सेवा – समान्य व्यवहार भी हो सकता है। देशबन्धु का शीर्षक है, घबराएं नहीं, रसोई गैस आपूर्ति बरकरार। पांच कॉलम की इस खबर का उपशीर्षक है, पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा – 60 घंटे में मिलती रहेगी गैस। एलएनजी के दो जहाज आ रहे हैं भारत की ओर। यहां सिलेंडर गैस का उपयोग करने वाला कोई भी जानता है कि गैस खत्म हो जाए तो घंटे भर काम चलाना मुश्किल होता है। अमूमन भारतीय रसोइयों में कोई विकल्प नहीं है और चाय भी बनानी मुश्किल हो जाए। यह अलग बात है कि महंगे होटलों के कमरे में चाय बनाने की व्यवस्था रहती है और पानी गर्म हो जाए तो चाय बन ही जाएगी। कुल मिलाकर, आम आदमी की मजबूरी है कि दूसरा सिलेंडर भरा रखे ताकि जब खत्म हो जाए तो दिक्कत नहीं हो। इसीलिए एलपीजी कंपनियां दो सिलेंडर देती हैं। सरकार अपील कर रही है घबराहट में बुक न करें, 21 दिन की जगह 25 दिन पर बुक करने का नियम बन गया है लेकिन आपसे कहा जा रहा है कि घबराए नहीं। अखबार इसी में लगे हैं। वे सच नहीं बताएंगे वे कोशिश में हैं कि आप घबराएं नहीं क्योंकि सरकार ऐसा ही चाहती है।

अमर उजाला में शीर्षक है, गैस की किल्लत नहीं, बुकिंग के ढाई दिन बाद ही मिल रहा है सिलेंडर। यही नहीं, सरकार ने यह दावा भी किया है कि सरकारी उपायों के कारण एलपीजी उत्पाद 25 फीसदी बढ़ गया है। जनसत्ता में गैस सिलेंडर की कमी (या कमी न होने) की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां प्रधानमंत्री का प्रचार सेकेंड लीड है, मोदी ने कहा – पश्चिम एशिया संकट ने आत्मनिर्भरता के महत्व को फिर से साबित किया। यह दिलचस्प है कि इस समूह के अंग्रेजी अखबार, इंडियन एक्सप्रेस की लीड यही खबर है और हिन्दी में शीर्षक लगभग एक ही होगा। इंडियन एक्सप्रेस में यह थिरुवनंतपुरम डेटलाइन से बाईलाइन के साथ है। ऐसे में यह खबर अनुवाद भी हो सकती है पर वह अलग मुद्दा है। वैसे भी, जनसत्ता में यह नई दिल्ली डेटलाइन से ब्यूरो की खबर है। जो भी हो, देश के लिए आत्मनिर्भरता के महत्व या जरूरत को जानते हुए प्रधानमंत्री व्यापार करार की झड़ी लगाए हुए थे। इसके लिए अपना सम्मान करवा रहे थे और आत्मनिर्भरता की दिशा में क्या किया यह नहीं बता रहे हैं। दूसरी ओर, ट्रम्प ने रिलायंस के साथ 300 बिलियन डॉलर के करार की घोषणा की है।  अब यह स्पष्ट हो चला है कि अमेरिका ने ईरान को जैसा समझा था उससे वह ज्यादा मजबूत निकला है। आज खबर भी है, ईरान ने वाणिज्यिक जहाजों और तेल सुविधाओं को बनाया निशाना। संभव है, इसीलिए प्रधानमंत्री को आत्म निर्भरता की याद आई हो।

ऊपर बता चुका हूं कि यह खबर थिरुवनंतपुरम डेटलाइन से है और दि एशियन एज़ की लीड का शीर्षक है, मोदी : केरल एलडीएफ, यूडीएफ से आगे बढ़कर बीजेपी को अपनाने के लिए तैयार है। मुझे प्रधानमंत्री के कहने या इस दावे से दिक्कत नहीं है और जब थी तो किसी ने क्या बिगाड़ लिया। मुद्दा रिपोर्टिंग का है और संवाददताओं को यह बताना चाहिए कि प्रधानमंत्री यह दावा किस आधार पर कर रहे हैं। कायदे से तो उन्हीं से पूछा जाना चाहिए, वे नहीं बात करते हैं तो बताया जाना चाहिए (हर बार) और उनकी पार्टी के किसी और पदाधिकारी से पूछकर बताना रिपोर्टर का काम है। यह जानकारी खबर का हिस्सा है वरना मौके पर जाकर रिपोर्ट करने की क्या जरूरत है। दिल्ली में बैठकर अनुवाद करने या टेलीविजन अथवा यू ट्यूब पर सुनकर लिखने में क्या दिक्कत है। कहने की जरूरत नहीं है कि रिपोर्टर जब प्रधानमंत्री से उनके दावे का आधार पूछेंगे या खबर के साथ ही बता देंगे कि हिन्दी पट्टी के अपेक्षाकृत कम शिक्षित गौ भक्तों के क्षेत्र में चुनाव जीतने वाली बीजेपी सबसे साक्षर केरल में भी जीतने की उम्मीद कर रही है। अगर ऐसी खबर होगी तो प्रधानमंत्री के दावे का अच्छा असर होगा और दावा झूठा हुआ तो नुकसान भी पूरा होगा। वोट देकर पांच साल अफसोस करने वाली स्थिति नहीं बनेगी। लेकिन मीडिया अपने कारणों से गांधी के तीन या चार बंदर बना हुआ है।

मुझे नहीं लगता कि केरल से संबंधित प्रधानमंत्री का यह दावा दिल्ली में पहले पन्ने की लीड होने लायक है। फिर भी दि एशियन एज में है। देशबन्धु की खबर के अनुसार, ईरान ने दावा किया है कि युद्ध में उसके 1300 नागरिक मारे गए हैं और 9669 नागरिक ठिकाने नष्ट हुए हैं। युद्ध के समय यह बड़ी खबर है लेकिन प्रधानमंत्री के इजराइल दौरे के बाद युद्ध शुरू होने और कंप्रोमाइज्ड होने के आरोप तथा इजराइल से संबंधित एप्सटीन फाइल के खुलासों के बावजूद इजराइल जाने और उसके बारे में नहीं बताने के कारण प्रधानमंत्री भारत में युद्ध के प्रभाव की गंभीरता को समझते हैं और भाजपाई रणनीति के अनुसार मुद्दे को घुमाने के लिए हेडलाइन मैनेजमेंट के उपाय करते हैं। ऐसे में उनके दावे सही हों तो भले कम ध्यान खींचेंगे, गलत होंगे तो ज्यादा चर्चा होगी। इसका लाभ होगा कि मूल मुद्दे रह जाएंगे जैसे आज एलपीजी संकट को पहले पेज से लगभग विस्थापित किया जा सका है। युद्ध से संबंधित एक और खबर है कि युद्ध के कारण शेयर बाजार में गिरावट से निवेशकों के तीन लाख करोड़ रुपए डूब गए हैं। आप समझ सकते हैं कि भारत और भारत के लोगों पर युद्ध का कैसा और कितना असर हो रहा है। किसी एक अखबार से सारी बातें मालूम नहीं होंगी। जैसे आज युद्ध से संबंधित जो खबरें हैं उनके आलोक में (संयोग हो या प्रयोग अथवा रणनीति) अगर नरेन्द्र मोदी ने आत्म निर्भरता की जरूरत बताई है तो तथ्य है कि ईरान ने कुछ दिन पहले कहा था कि वह एक लीटर तेल भी अमेरिका नहीं पहुंचने देगा। ठीक है कि इसके बाद आज भारत से जुड़े जहाज को नुकसान पहुंचाने की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज ही लीड का शीर्षक है, “रिलायंस अमेरिकी तेल रिफाइनरी के लिए धन लगाएगा; ट्रम्प ने इसे ‘300 बिलियन डॉलर का ऐतिहासिक करार’ कहा”।

इस तरह, यह परस्पर विरोधी है कि प्रधानमंत्री आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं और भारतीय कंपनी रिफाइनरी लगाने के लिए अमेरिका के साथ 300 बिलियन का करार कर रही है। दोनों की जरूरत मूल रूप से तेल के मामले में आत्म निर्भर होने की है। भारत सिर्फ सलाह दे रहा है, याद दिला रहा है या जरूरत दोहरा रहा है, दूसरी ओर ट्रम्प भारतीय कंपनी के साथ 300 अरब डॉलर के ऐतिहासिक करार की घोषणा कर रहे हैं और वह भी तेल रिफाइनरी के क्षेत्र में। द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक लगभग एक जैसा है। दि हिन्दू ने लिखा है, “ईरान ने व्यावसायिक जहाज को निशाना बनाया; वैश्विक ऊर्जा की चिन्ता बढ़ी”। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, ईरान ने और भी सौदागरों के जहाज को निशाना बनाया, तेल की कीमत 200 डॉलर (प्रति बैरल) होने, विस्तारित युद्ध की चेतावनी दी। अमर उजाला की खबर के अनुसार भारत के 28 पोत फंसे हैं। द टेलीग्राफ की लीड युद्ध के कारण भारत को होने वाले नुकसान के मद्देनजर भारत की प्रतिक्रिया को फ्लैग शीर्षक बनाया है। यह इस प्रकार है, दिल्ली (भारत) ने व्यासायिक जहाज को निशाना बनाने की निंदा की, क्योंकि प्रोजेक्टाइल और ईरान की माइन से अहम क्रूड चैनल को खतरा है। होरमुज में भारत से जुड़े जहाज को निशाना बनाया गया। प्रधानमंत्री के भाषण के विषय, शीर्षक और उसकी प्रस्तुति के साथ हेडलाइन मैनेजमेंट अगर चुनाव जीतने के लिहाज से है तो कुछ गलत नहीं है। इसकी प्रशंसा भी की जा सकती है लेकिन 12 साल सत्ता में रहकर अपने किए काम पर वोट नहीं मांगने वाले लोग अगर चुनाव जीतना ही जानें और सरकार चलाने में पप्पू हों तो उसे कैसे सही माना जाए। वैसे भी यह सब सरकारी पैसे से सत्ता के दुरुपयोग से हो रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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