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आज के अखबार : ‘क्लिन चिट’ वालों की सरकार, जज के तबादले की खबर नहीं जबकि यह पहला मामला नहीं है!

संजय कुमार सिंह

आज संभल में जज के तबादले से संबंधित खबर महत्वपूर्ण है। देशबन्धु में टॉप की खबर है, दो कॉलम में। यह टाइम्स ऑफ इंडिया में भी सिंगल कॉलम में लेकिन टॉप पर है। अमर उजाला में आज पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं है फिर भी संभल की यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स की लीड तो ट्रम्प की खबर है लेकिन संभल की खबर यहां भी पहले पन्ने पर नहीं है। संभल की यह खबर जज के तबादले की है। मोदी राज में अदालतों के फैसलों पर दबाव के संकेत नजर आते रहे हैं, जजों के तबादले की भी खबर है और सरकार को फायदे वाले फैसले देने वाले जजों को ईनाम के उदाहरण हैं। राम मंदिर से संबंधित विवाद पर फैसला देने वाले जज के खिलाफ पहले शिकायत और उनके फैसले के बाद ईनाम सर्वविदित है। यह सब चार जजों की मशहूर अनूठी प्रेस कांफ्रेंस के बाद हुआ। सीबीआई के एक जज की संदिग्ध मौत की जांच नहीं होने और आरोपी को क्लिन चिट मिलने के बाद हुआ है। दिलचस्प यह है कि अदालतों के क्लिन चिट दिखाए जाते रहे हैं, जमानत पर होने के लिए बदनाम किया जाता रहा है, जमानत देने और न देने के तर्क-कुतर्क सार्वजनिक हैं, शिकायतकर्ताओं के खिलाफ ‘कार्रवाई’ तथा इसके विकल्प होने से उन्हें डराने वाले आदेश भी हुए हैं। हाल में अमित शाह ने कहा था कि क्लिन चिट मिलने के बाद उन्होंने पद स्वीकार किया। पहले वकीलों को राज्यसभा की सदस्यता दी जाती थी अब जजों को पद दिए जा रहे हैं और फिर भी संभल में जज का तबादला हुआ तो खबर महत्वपूर्ण है लेकिन ऐसी खबरों को अब प्रमुखता नहीं मिलती है। भ्रष्टाचारियों के जमाने में जजों के तबादले की खबर नहीं होती थी। मंत्रियों के इस्तीफे हो जाते थे, मुकदमे चले जेल हुई, सजा भी हुई। अब सिर्फ वाशिंग मशीन है। पर वह अलग मुद्दा है।

लोकसभा में विपक्षी सांसदों ने अमित शाह की नैतिकता पर सवाल उठाए तो अमित शाह ने संसद में कहा था कि जब उन पर आरोप लगे थे, तब उन्होंने पहले ही गृह मंत्री का पद छोड़ दिया था और जब तक अदालत ने उन्हें पूरी तरह अपराध रहित / क्लीन चिट नहीं कहा, तब तक उन्होंने कोई संवैधानिक पद स्वीकार नहीं किया। जहां तक मुझे याद है 2014 से पहले बंगारू लक्ष्मण के स्टिंग और तलहका में राणा अयूब की रिपोर्ट के बाद तहलका के संपादक पर आरोप लगे,गिरफ्तार हुए, राणा अयूब की रिपोर्ट तहलका में नहीं छपी, जो गुजरात फाइल्स के रूप में सामने आई, राणा अयूब को परेशान करने के अनगिनत किस्से हैं और उस समय के गृहमंत्री पी चिदंबरम भी बाद में गिरफ्तार हुए थे। भ्रष्टाचार के आरोप में यूपीए के जो मंत्री गिरफ्तार हुए और बाद में दोषी नहीं पाए गए उनके लिए कोई अफसोस नहीं, कोई सजा नहीं, किसी को शर्म नहीं।

देशबन्धु में आज एक और खबर है जो बताती है कि राहुल गांधी ने कहा है कि सत्ता व बड़े कॉरपोरेट घरानों की सांठगांठ से लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। इस खबर का शीर्षक है, जनता को सत्ता से जवाबदेही मांगनी होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि सत्ता से सवाल अखबारों के जरिए ही पूछे जाते हैं और अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ता। लेकिन जो स्थितियां हैं उसमें राहुल गांधी को मुकदमों से परेशान किया जा रहा है तथा अदालती आदेश को भी झटका और राहत कहा जाता है। अमर उजाला में दिल्ली के प्रदूषण और सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश की खबर है। इसके अनुसार, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि दिल्ली एनसीआर में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण वाहन उत्सर्जन है। इस संबंध में अदालत ने केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। नवोदय टाइम्स में एक शीर्षक है, भारत में ही खेलना होगा बांग्लादेश को। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, विश्व कप मैच को (भारत से) स्थानांतरित करने की मांग को आईसीसी ने खारिज किया। इस खबर में बताया गया है कि अंतिम निर्णय लेने से पहले बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड खिलाड़ियों से सलाह करेगा। खबर यह भी कहती है कि आईसीसी की राय में टीम को कोई खतरा नहीं है और उसने बांग्लादेश क्रिकेट टीम को पुनर्विचार करने के लिए 24 घंटे दिए हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आईसीसी ने बांग्लादेश को चेतावनी दी है कि भारत में खेले या उसकी जगह स्कॉटलैंड की टीम लेगी।

हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर है, गणतंत्र दिवस की परेड में संस्कृति मंत्रालय की झांकी में वंदे मातरम का पूरा गीत रहेगा। मंत्रालय इसके जरिए गीत के 150 साल पूरे होने पर इसे याद करेगा। इस तरह, भले ही आज ट्रम्प की खबर लीड हो, दूसरी कई खबरें हैं जिन्हें लीड बनाया जा सकता था। कुछेक की चर्चा मैंने ऊपर की है और अब द हिन्दू की लीड पर आता हूं जो एसआईआर से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग के विशेषाधिकार अनियंत्रित शक्ति नहीं हैं। अखबार ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत के हवाले से लिखा है, विशेष सघन पुनरीक्षण के गंभीर नतीजे हो सकते हैं, खासकर ऐसे व्यक्ति के नागरिक अधिकारों पर जो पहले से ही वोटर है। तो हम आप (चुनाव आयोग) से यह उम्मीद क्यों न करें कि आपकी प्रक्रिया पारदर्शी हो। इसके साथ छपी खबर में कहा गया है, ‘बंगाल की वोटर लिस्ट में ऐसी गड़बड़ियां हैं जो विज्ञान को चुनौती देती हैं’। खबर के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा है कि पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में कई “तार्किक विसंगतियां” मिली हैं। उदाहरण के लिए दो वोटर्स के 200 से ज़्यादा बच्चे पाए गए। ये विज्ञान को चुनौती देते हैं। ठीक है कि यह एसआईआर की सार्थकता या जरूरत बताने के लिए मजबूत उदाहरण हो सकता है।

तथ्य यह है कि ऐसा सरकारी मतदाता सूची में है और सामान्य समझ के बावजूद है। गलती मतदाता की ही हो तो भी कोई तो जिम्मेदार होगा इस मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए और उसने क्यों नहीं देखा या रोका। यह नहीं बताया गया है कि कबसे है लेकिन क्यों है यह कौन बताएगा। एक जोड़े के 200 बच्चे हो ही नहीं सकते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चों के अस्तित्व को नकार दिया जाए या ऐसे बच्चे वोटर नहीं हो सकते हैं। इसी आधार पर बांग्लादेशी भी नहीं करार दिए जा सकते हैं और ना मतदाता सूची से अलग किया जाना ठीक है। देखना यह चाहिए कि ऐसा है क्यों और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। जाहिर है ये बांग्लादेशी भी हों तो इनके माता पिता का नाम अलग लिखा-लिखवाया जा सकता था, उन्हें भी वोटर बनाया जा सकता था या उन्हें दिवंगत या किसी अन्य शहर का वोटर बनाया जा सकता था। पहले सब संभव था। फिर भी ऐसा है तो इसलिए कि यह भी संभव है। अब पता चला, ठीक करना है तो कीजिए लेकिन ऐसे तर्कों से मनमाने एसआईआर की अनुमति मत मांगिए या मिलनी नहीं चाहिए। मामला अदालत को तय करना है जो होगा सो पता चले तो उसपर फिर चर्चा करेंगे। अभी तो यही कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एसआईआर के लिए चुनाव आयोग को असीमित या अनियंत्रित अधिकार नहीं दिए जा सकते हैं।

बेशक एसआईआर से संबंधित अभी तक की खबरों में यह अलग और महत्वपूर्ण है। फिर भी यह सिर्फ द हिन्दू में ही लीड है। आज यह खबर द हिन्दू के अलावा, इंडियन एक्सप्रेस में दो कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है। इसके अलावा यह मेरे किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं हैं। द टेलीग्राफ में सिंगल कॉलम की खबर है जिसका शीर्षक है – चुनाव आयोग ने अदालत से कहा, बंगाल में एसआईआर (कर्मियों के लिए) गंभीर खतरे हैं। दि एशियन एज में चुनाव आयोग का पक्ष है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त की तस्वीर भी है। शीर्षक है, “एसआईआर से संबंधित विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा ‘शुद्ध’ मतदाता सूची लोकतंत्र के लिए अहम है”।  उपशीर्षक है, बिहार के दो चरणों में एक पुनर्मतदान के आदेश नहीं हुए। यहां दोनों बातें शत प्रतिशत सही हैं लेकिन शुद्ध मतदाता सूची का मतलब उसमें एक नाम दो बार होना नहीं हो सकता है, एक फोटो कई जगह नहीं हो सकती है, किसी विदेशी की फोटो होने का भी मतलब नहीं है। एक पते पर परिवार से ज्यादा लोगों के नाम हों तो बताया जाना चाहिए (या स्पष्ट होना चाहिए) कि इसके कमरे या फ्लैट या सुइट अलग-अलग परिवारों के लिए हैं।  ऐसी तमाम दूसरी शर्तें पूरी होने के बाद ही मतदाता सूची शुद्ध होगी और शुद्धता के फेर में मतदाता अगर छूट गए या नागरिक होने के बावजूद किन्हीं कारणों से उन्हें मतदाता सूची में शामिल नहीं किया गया तो शुद्ध मतदाता सूची चुने हुए मतदाताओं की होगी, प्रतिनिधि चुनने वाली नहीं होगी या हुई भी तो उसी को चुनेगी जो उन्हें चुनेंगें। इसी तरह ईवीएम के बाद अब पहले की तरह बूथ लूटने और पुनर्मतदान की जरूरत ही नहीं है। मतपत्रों से भी मतदान हो तो बूथ लूटने वाले सीसीटीवी में कैद हो जाएंगे और अब अगर पांच बजे के बाद लूटे जाते हों तो उसका वीडियो नहीं दिया जा रहा है। यही नहीं, महाराष्ट्र के एक गांव में लोगों ने खुद मतदान करवाकर चुनाव आयोग के नतीजे को जांचना चाहा तो मतदान नहीं कराने दिया गया। नतीजे के बाद पुनर्मतदान की जरूरत तो थी नहीं कराने देने का क्या मतलब है? 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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