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जलवायु संकट से भटकती दुनिया क्या ‘धीमी मौत’ की ओर बढ़ रही है?

राकेश कायस्थ-

क्या दुनिया खत्म हो रही है?

आधुनिक विश्व के सबसे बड़े संकट क्लाइमेट चेंज या जलवायु परिवर्तन के बारे में आखिरी बार आपने कब सुना था? स्वीडन की एक युवा पर्यावरण कार्यकर्ता हुआ करती थीं—नाम था ग्रेटा थनबर्ग। धरती को बचाने के लिए चलाई जा रही उनकी छोटी-छोटी, ही सही, लेकिन कारगर मुहिमों की मीडिया में एक समय भरपूर चर्चा थी। ग्रेटा थनबर्ग कहाँ गायब हो गईं? मौजूदा विश्व की सबसे बड़ी प्राथमिकता केवल युद्ध है।

मूर्खता का सशक्तीकरण भारतीय नहीं, बल्कि एक वैश्विक सच्चाई है। दुनिया के हर कोने में नज़र घुमाकर देख लीजिए, ज़्यादातर जगहों पर सत्ता के शीर्ष पर परम मूर्ख, क्रूर, हिंसक और देवता होने के अहंकार तक आत्ममुग्ध शासक बैठे हैं। जब उनकी चिंता वर्तमान को सुधारने तक की नहीं है, तो फिर पचास या सौ साल आगे वे कहाँ से देख पाएँगे? मौजूदा राजनीति सब कुछ निगल रही है और धरती की जिस धीमी मौत की चेतावनी वैज्ञानिक दे रहे थे, हम फास्ट-फॉरवर्ड मोड में आगे बढ़ रहे हैं।

ऐसा माना जा रहा था कि धरती का तापमान वर्ष 1900 में जितना था, साल 2100 तक उसमें 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। यह एक चरम अवस्था होगी और उसका मतलब है—ग्लेशियरों का पिघलना, कई बड़े तटीय इलाकों का स्थायी रूप से जलमग्न होना, अभूतपूर्व खाद्यान्न और पेयजल संकट का पैदा होना और कुल मिलाकर प्रलय जैसी स्थिति का निर्माण।

संकट मानव सभ्यता पर है और इसकी आहट ही नहीं, बल्कि बहुत तेज़ पदचाप सुनाई दे रही है। क्लाइमेट चेंज को आप अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में महसूस कर सकते हैं। मुझे मुंबई में रहते एक दशक से ज़्यादा वक्त हो गया है। समुद्र का पानी गेटवे ऑफ इंडिया तक पहले कभी नहीं आया था, लेकिन यह मैंने अपनी आँखों से देख लिया।

नवंबर में मैंने हिमालय की हफ्ता-भर की यात्रा की थी। स्थानीय लोगों से मैंने जो सुना, उससे यही लगा कि हम सब टाइम बम पर बैठे हैं, जिसका फटना सुनिश्चित है। उत्तराखंड की पिंडर घाटी में रहने वाले कई लोगों ने बताया कि दस-पंद्रह साल पहले तक बर्फबारी के मौसम में सड़क पर तीन फुट तक बर्फ जमी होती थी, लेकिन उन्होंने बरसों से यहाँ बर्फ देखी ही नहीं। बर्फ सिर्फ पहाड़ की चोटियों पर होती है और पहाड़ भी तेज़ी से गंजे होते जा रहे हैं।

नेहरू भारत को जो साइंटिफिक टेंपरामेंट देना चाहते थे, उसकी ज़रूरत पूरी दुनिया को है, लेकिन वैज्ञानिक चेतना कहाँ है? विज्ञान सिर्फ प्रोडक्ट बनाने और बेचने भर का उपकरण बनकर रह गया है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका ने जब सिरफिरे बिल्डर डोनाल्ड ट्रंप को पहले टर्म के लिए राष्ट्रपति चुना, तो उसने सत्ता संभालते ही पर्यावरण की चिंताओं को सिरे से खारिज कर दिया। पृथ्वी को बचाने के लिए हुए पेरिस समझौते से अमेरिका ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही बाहर हो गया।

अब यही ट्रंप दुनिया भर में आग लगा रहा है। ईरान के पेट्रोलियम भंडारों पर जो आग लगी है, मुमकिन है उसका असर इस मौसम में भारत पर भी पड़े और पश्चिमी इलाकों में जहरीली बरसात देखने को मिले। ट्रंप जैसे सिरफिरे आदमी का चार साल के अंतराल के बाद गाजे-बाजे के साथ अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाना यह बताता है कि आर्थिक समृद्धि किसी समाज में न्यूनतम विवेक पैदा नहीं कर सकती।

समकालीन इतिहास के सबसे बददिमाग, क्रूर और घटिया आदमी के हाथ में आणविक हथियारों के सबसे बड़े जखीरे का रिमोट कंट्रोल है। जिस तरह उसे ग्रीनलैंड लेने और पड़ोसी देशों के शासकों को उठवा लेने का मन हुआ, उसी तरह अगर उसका मन कुछ बटन दबाकर पूरी धरती को मिटा देने का हो गया, तो क्या होगा?

स्वयं को विश्वगुरु बताने वाले महामानव का मानना है कि क्लाइमेट चेंज नहीं है, बल्कि हम चेंज हो गए हैं। नाली गैस और प्लास्टिक सर्जरी से हाथी का सिर इंसान में जोड़ देने की कथित पौराणिक युक्ति पर गर्व करते हुए समाज के वैज्ञानिक विकास का हाल यह है कि हम नए आविष्कार भले न कर पाए, लेकिन नकली दूध और नकली अंडा बनाने लगे हैं। खाने की कोई ऐसी चीज़ नहीं जो ज़हरीली न हो, सड़कें इतनी असुरक्षित हैं कि यकीन कर पाना कठिन है कि सुबह का निकला व्यक्ति शाम को घर लौटेगा या नहीं। लेकिन हमारी चिंताएँ क्या हैं? हम बाबागीरी के असंख्य स्टार्टअप को बड़ा होता देख रहे हैं और इज़रायल में अपना नया बाप ढूँढ़ रहे हैं।

हथियार-रहित विश्व की कल्पना करने और इस विचार को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू की लिंचिंग सुबह-शाम जारी है और हम विश्वगुरु बनने की दिशा में उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, जिस रफ्तार से दुनिया खत्म होने की तरफ बढ़ रही है।

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