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सियासत

उप चुनावों के परिणाम से आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है!

के पी सिंह-

राजनीतिक संभावनाओं में खारिज की जा चुकी आम आदमी पार्टी को हाल में पांच विधानसभा उप चुनावों में से दो में जीत हासिल कर पुनर्जीवन मिल गया है। दूसरी ओर सर्वे बताते हैं कि राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ रही है लेकिन उप चुनावों के इंडीकेटर से देखा जाये तो कांग्रेस के लिए बहुत निराशा जनक तस्वीर उभरती है। राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकृति वोटों में तब्दील न हो पाना एक पहेली है जिस पर कांग्रेस पार्टी को चिंतन करने की जरूरत महसूस करनी चाहिए।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में न केवल आम आदमी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई बल्कि अरविन्द केजरीवाल भी खुद चुनाव हार गये। हालांकि मतदाता सूची से लेकर ईवीएम तक में कई ऐसी गड़बड़ियां सामने आयीं जिससे दिल्ली के चुनाव परिणाम संदेह के घेरे में आ गये थे लेकिन इन तथ्यों से भी अरविन्द केजरीवाल के मनोबल को कोई सहारा न मिला। अपने साथ-साथ दिल्ली की माडल स्कूलिंग के प्रणेता मनीष सिसौदिया सहित उनके कई नामबर मंत्रियों को भी चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। इस सदमे से अरविन्द केजरीवाल पूरी तरह शिथिल पड़ गये थे। पंजाब से उन्होंने कोई गुंजाइश निकलने की उम्मीद पाली भी होगी तो भगवंत सिंह मान के बगावत कर जाने का खतरा पैदा हो गया। राजनैतिक कैरियर के नाम पर अपने लिए चारों तरफ अंधेरा नजर आने से अरविन्द केजरीवाल इस कदर टूटे कि मोदी के खिलाफ अपनी सारी आक्रामकता भुला बैठे। मीडिया की दुनिया में लगभग वे अदृश्य हो गये थे और उबरने के नाम पर निकट भविष्य में उनके साथ कोई चमत्कार हो सकेगा किसी को यह भरोसा नहीं रह गया था।

केजरीवाल को निपटाने के मामले में जैसे भाजपा और कांग्रेस दोनों के बीच अघोषित सहमति बनी हुई थी। केजरीवाल ने अन्ना के आंदोलन में कांग्रेस को बदनाम करके जनता की निगाह में गिराने में कोई कसर नहींे छोड़ी थी। इसके बाद सक्रिय राजनीति में अवतार लेकर जब तक वे शीर्ष पर चढ़े तब तक भाजपा का सर्वसत्तावादी नेतृत्व देश में अपना वर्चस्व स्थापित कर चुका था। इसके बावजूद अरविन्द केजरीवाल अपने व्यवहारिक अंजाम में भाजपा का कुछ बिगाड़ने की बजाय कांग्रेस के स्पेस को हथियाने को ही प्रमुखता देते रहे। इंडिया गठबंधन बन जाने के बाद में भी उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ घात लगाने की रणनीति में परिवर्तन नहीं किया। गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की भारी भरकम हार और कांग्रेस के सूपड़ा साफ के मुख्य सूत्रधार केजरीवाल ही समझे गये।

पंजाब, दिल्ली के बाद दूसरा राज्य था जिसमें आम आदमी पार्टी को सत्ता में पहुंचने की कामयाबी मिली थी और यह राज्य भी कांग्रेस के खाते का था जबकि भाजपा को वे कहीं नहीं हिला पा रहे थे। इसलिए कांग्रेस अरविन्द केजरीवाल से इतनी चिढ़ गई कि भाजपा से पहले उनकी पार्टी का मटियामेट करना उसने अपना मुख्य ध्येय बना लिया। पहले इंडिया गठबंधन के दबाव में उसने आम आदमी पार्टी का सहयोग आत्मसम्मान ताक पर रखकर कर दिया था लेकिन राहुल गांधी ने इसके बाद साफ कर दिया कि साथी दल कुछ भी कहें पर केजरीवाल के मामले में वे कोई रियायत नहीं बरतेंगे ताकि अधिकांश राज्यों में उसकी और भाजपा की सीधी जंग की स्थिति बन सके।

राहुल गांधी की इसी सोच के कारण मोदी सरकार केजरीवाल के खिलाफ जो चक्रव्यूह कस रही थी उसका विरोध करने की बजाय कांग्रेस उसमें मौन सहयोग दे रही थी। केजरीवाल की दुर्दशा देखकर लोग उन्हें दया का पात्र समझने लगे थे और उनके बुरे से बुरे हश्र की कल्पनायें उनके मन मस्तिष्क में आने लगी थीं। पर गुजरात और पंजाब में विधानसभा के एक-एक उप चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार फतेहयाब क्या हुए चर्चा होने लगी है कि केजरीवाल माडल अभी भी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को आकर्षित करने में सफल है।

गुजरात में विसाबदर विधानसभा क्षेत्र में आम चुनाव के समय केजरीवाल की पार्टी से भूपेन्द्र भवानी चुनाव जीते थे लेकिन राज्य की विधानसभा में भाजपा का महा समुद्र जैसा बहुमत विपक्ष को जैसे सन्नाटे भरे बियावान में खड़े होने का एहसास कराने वाला था जिसे न झेल पाने से भूपेन्द्र भवानी ने आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देकर छुटकारा ले लिया और भाजपा में शामिल हो गये। नतीजतन उनकी सदस्यता समाप्त हो गई और बिसावदर में उप चुनाव का नगाड़ा बज गया। अनुमान यह था कि भाजपा की राज्य में इतने प्रचंड बहुमत की सरकार को देखते हुए बिसावदर के मतदाता अलग थलग होने का जोखिम लेकर अब आम आदमी पार्टी की तरफ मुंह क्यों करेंगे। पर यह अंदाजा गलत साबित हुआ और लोगों ने अरविन्द केजरीवाल के जादू को नकारने से मना कर दिया।

आम आदमी पार्टी के गोपाल इटालिया गोपाल ने भाजपा के किरीट पटेल को 17 हजार 555 वोटों के बड़े मार्जिन से मात दे दी। भाजपा की अपने गढ़ में यह हार उसके लिए बहुत बड़ी झटका बन गई है। गुजरात में दो उप चुनाव हुए जिनमें कुछ कर गुजरने के लिए राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से बहुत जोर लगाया था पर बिसावदर में उनका उम्मीदवार बुरी तरह हार गया उसकी जमानत तक जब्त हो गई। मेसाड़ा अनु सूचित जाति सुरक्षित क्षेत्र में कांग्रेस दूसरी नम्बर पर जरूर रही लेकिन अंतर लगभग 40 हजार वोटों का रहा। साफ जाहिर है कि गुजरात में मतदाता कांग्रेस को कोई जगह देने को तैयार नहीं हो रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह स्थिति अत्यंत शोचनीय है। हार के गम से टूटे कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष शक्ति गोहिल ने खुद पर नैतिक जिम्मेदारी लेकर पद से इस्तीफा दे दिया है। यह बात दूसरी है कि लोग पूंछ रहे हैं कि उन्होंने हार की जिम्मेदारी ली है या पार्टी के शर्मनाक प्रदर्शन की नैतिक जबावदेही से राहुल गांधी को बचाने के लिए उनका इस्तीफा कराया गया है।

पंजाब में मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान का इतना विद्रूप चित्रण किया जा चुका है कि उनके नेतृत्व के रहते आम आदमी पार्टी के लिए बेहतरी की उम्मीद की बजाय लोग गडढ़े में गिरने की आशंकायें संजोय बैठे थे। पर लुधियाना पश्चिम सीट के उप चुनाव में जीत का परचम दुबारा लहराकर पंजाब के मतदाताओं में अपने ऊपर आम आदमी पार्टी की बरकरार पकड़ की पुष्टि कर दी। यहां भाजपा और अकाली दल तो क्रमशः तीसरे और चैथे स्थान पर रहकर निपटे जबकि कांग्रेस भी गुल नहीं खिला पायी। उसके उम्मीदवार को आम आदमी पार्टी ने साढ़े दस हजार से अधिक वोटों के अंतर से पीछे धकेल दिया। आम आदमी पार्टी में इन उप चुनावों की सफलता से जबरदस्त जोश पैदा हो गया है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के मंसूबे बांधने शुरू कर दिये हैं। इसके लिए संजय सिंह पूरे दमखम से हर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी को खड़ा करने के संकल्प के साथ जुट पड़े हैं।

आम आदमी पार्टी भी कुल मिलाकर यथास्थितिवादी मध्यम वर्ग का दल है। जो न तो हिन्दू राष्ट्र बनाने का दम भरती है और न मुसलमानों के लिए मर मिट जाने का। सामाजिक न्याय के नारों से भी वह दूरी बनाकर चलती है। कई मामलों में तो उसका और भारतीय जनता पार्टी का वर्ग चरित्र एक जैसा माना जाता है। कहने को तो कांग्रेस का भी शुमार यथास्थितिवादी दल में होता था लेकिन आजकल राहुल गांधी अपनी पार्टी को क्रांतिकारी लाइन पर दौड़ाने में जुटे पड़े हैं। उनको प्रतिबद्धता के मामले में खरेपन के लिए सराहा भी जा रहा है। जो लोग उन्हें विदूषक करार देते रहते थे वे अब उनको गंभीरता से सुनने लगे हैं। देश में वंचित वर्ग अभी भी बहुतायत में है इसलिए होना तो यह चाहिए कि राहुल गांधी उसके मसीहा के रूप में स्वीकार्य हो जायें। अगर ऐसा हो जाये तो कांग्रेस को भाजपा के हाथ से सत्ता छीनने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस को कहीं माइलेज नहीं दिला पा रहे। उनकी क्रांतिकारिता प्याली के तूफान से आगे नहीं पहुंच पा रही है।

दूसरी ओर अरविन्द केजरीवाल यथास्थिति को झकझोरने में कोई दिलचस्पी न दिखाते हुए भी विस्तार पाने की ओर फिर से अग्रसर होने लगी है। इसके पीछे उनका वह माडल है कि लोग सामूहिक व्यवस्था को स्वीकारने के पीछे यह चाहते हैं कि जो टेक्स वे सरकार को दे रहे हैं उसके बदले में आवश्यक सेवायें उन्हें रियायती दरों पर मुहैया कराने की गारंटी सरकार करे। यह न हो जाये कि जिसके पास अमीरी है सुविधायें केवल उनको मयस्सर रह पायें। पहले भी यही माडल लागू था जिसमें पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, ट्रेन व बस यात्रा सस्ते में लोगों को मिले इस हेतु सरकार ऐसी सेवाओं और वस्तुओं के लिए अपने खजाने से पर्याप्त अनुदान की व्यवस्था करती थी। लोग समझते थे कि यह उन पर कृपा नहीं उनका अधिकार है। मनमोहन सिंह के समय इसमें बदलाव शुरू हुआ लेकिन बदलाव के नाम पर यह था कि हम अपनी सेवाओं और वस्तुओं को जितना मूल्य है उतने पर लोगों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था करेंगे लेकिन सरकार हर चीज से मुनाफा बटोरने में लग जाये यह रीति नीति नहीं बनने देंगे।

भाजपा के सर्व शासन में यह माडल बदल दिया गया। हर सेवा और वस्तु की वह आम लोगों के लिए कितनी भी आवश्यक क्यों न हो भरपूर मुनाफा देह कीमत वसूली जायेगी। हाल ही में पता चला है कि सरकार ने एनएच के कई टोल जिनसे लागत की तीन चार गुना तक वसूली हो चुकी थी तीस साल तक और बरकरार रखने की मंजूरी दे दी है। किसी विकसित राष्ट्र में सरकारें ऐसी दुकानदारी को बढ़ावा नहीं दे रहीं हैं। अमेरिका में रह रहे अपने एक मित्र से मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि यहां नेशनल हाइवे पर कहीं कोई टोल वसूली नहीं होती। कुछ शहरों में टोल हैं लेकिन उनमें केवल प्रतीकात्मक शुल्क लिया जाता है। बैंकों में रकम रखने पर जितना ब्याज नहीं मिलता उतने शुल्क ग्राहक को कटवाने पड़ते हैं। रेलवे में कोरोना के समय भीड़ कम करने के लिए किराया दुगना कर दिया गया था लेकिन कोरोना नहीं रह गया फिर भी किराया घटा नहीं बल्कि बढ़ा दिया गया है। लगभग हर कस्बे को विकास प्राधिकरण में तब्दील कर दिया गया है। जिनमें मानचित्र स्वीकृत करने के शुल्क की दरें आसमान को छूने वाली नियत की जा रही हैं। आटा और माचिस तक पर जीएसटी आम ग्राहक को देनी पड़ती है।

अनुमान लगाया जा सकता है कि लोगों की जेब से कितना ज्यादा पैसा सरकारी खजाने के लिए निकाला जा रहा है। अगर सरकार की सोच के केन्द्र में जनता हो तो इतना टैक्स हासिल करने के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सुरक्षा जैसी व्यवस्थायें निशुल्क हो जानी चाहिए पर सरकार का खजाना विकास के नाम पर मुनाफा खोरों का मुनाफा और उनकी तड़क भड़क भरी जीवन शैली को स्थापित करने पर लुटाया जा रहा है। साथ ही विकास का यह फंडा जनता से उगाहे गए अपार टैक्स को नेताओं और अधिकारियों की जेब में भरने का जरिया है जो 70 प्रतिशत तक हड़पे जा रहे कमीशन का खेल है। एक्सप्रेसवे जो अब गांव-गांव में बनाने का जुनून दिखाया जा रहा है उसकी डिमांड जनता की ओर से कब हुई थी। यह तो व्यवसायिक जगत के विस्तार के लिए बनाये जा रहे हैं जिनसे ज्यादा से ज्यादा माल, कम समय में और सुदूर तक पहुंचाया जा सके।

रेलवे स्टेशनों का सुन्दरीकरण सरकारी खर्च पर किया जा रहा है ताकि बाद में उन्हें निजी हाथों में सौंपा जा सके जो 100 रुपये तक का प्रवेश शुल्क लगायेंगे। ऐसे तमाम उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिससे सीमित आमदनी वाली आम जनता के लिए गुजर बसर करना असंभव हो जाने वाला है। इलाज वह करा पायेगा जो महंगे अस्पतालों का लाख रुपये रोज का खर्चा उठा सके। उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा हर मेधावी छात्र को मिलने की बजाय केवल उच्च परिवार के बच्चों के लिए बनकर रह जायेगी क्योंकि उनकी फीस बाजार दर पर निर्धारित की जा रही है। डार्विन के सिद्धांत पर चल रही वर्तमान सरकारों को लोग कब तक झेल पायेंगे।

यह सवाल तो होगा ही कि जब हर सुविधा भरपूर कीमत पर मिलनी है तो इसे अफोर्ड न कर पाने वाले आम आदमी से टैक्स वसूली का आपको क्या अधिकार है। जनता को मथ रहे इन सवालों को घाघ केजरीवाल ने ठीक से सुन पाया है और यही वजह है कि जब उन्होंने मुफ्त में इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था सुधारी, निशुल्क शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल गुणवत्तापूर्ण बनाये, जीवनोपयोगी सुविधाओं की गांरटी के लिए बिजली पानी की रियायती दरें निर्धारित की तो लोगों को आम आदमी पार्टी में न्यायपूर्ण व्यवस्था का चेहरा नजर आया।

इसलिए केजरीवाल का माडल मोदी सरकार की नीतियों के बरक्स तमाम लोगों को उपयुक्त विकल्प के रूप में मान्य करने की जरूरत महसूस हो रही है। जबकि कांग्रेस के मुद्दे प्राथमिकताओं में गिनना लोगों को हजम नहीं हो पा रहा। उस पर तुर्रा यह है कि राहुल गांधी उस मशीनरी के साथ क्रांति करने निकले हैं जो पूरी तरह परंपरावादी है। राहुल गांधी इस बात को जानते भी हैं लेकिन संगठनात्मक कौशल के अभाव में वे निरूपाय हैं। दूसरी ओर केजरीवाल हैं जिन्होंने अपरिचित चेहरों को खड़ा करके सत्ता बदलने का पराक्रम दिखाया है इसलिए लोगों का उन्हें प्रमाणिक मानना लाजिमी है। बहरहाल उप चुनावों के परिणामों से आम आदमी पार्टी के नये सिरे से उभरते कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।

उसके विकल्प के रूप में स्वीकार्य न बन पाने के कारण ही केजरीवाल, ममता बनर्जी, स्टालिन, अखिलेश यादव, मायावती आदि एन्टी इनकमबेंसी का फायदा उठाकर पोषित, पल्लवित होते जाने में सफल हैं यानी भाजपा के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में भानुमती का कुनबा जुड़ने की स्थितियों से राजनीतिक परिदृश्य दो चार हैं।

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