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सियासत

कांग्रेस अपने इस नेता को क्यों शक की नजर से देखती है!

अजय कुमार-

क्या कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर अपनी पार्टी से नाराज चल रहे हैं? यह सवाल इस लिये उठ रहा है क्योंकि थरूर कई बार पार्टी की लाइन से हटकर बयान दे रहे हैं। कांग्रेस में जब अध्यक्ष पद के लिये चुनाव हुआ थो तो भी शशि थरूर ने गांधी परिवार की नाराजगी की चिंता किये बिना कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ चुनाव मैदान में ताल ठोकी थी, यह बात गांधी परिवार को काफी बुरी थी लगी थी, इसी लिये कांग्रेस में थरूर को अब शक की नजर से देखा जाता है।

खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके रिश्ते कुछ ज्यादा ही मिठास भरे नजर आ रहे हैं। जब भी दोनों नेता कहीं मिलते हैं या लोकसभा में आमना-सामना होता है भी अक्सर प्रधानमंत्री मोदी इस दिग्गज कांग्रेस नेता को सम्बोधित करते नजर आते हैं। ऐसा ही कुछ केरल के विझिंजम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह के उद्घाटन के दौरान देखने को मिला जब जब सांसद शशि थरूर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ही मंच पर दिखाई दिए। दोनों ने एक-दूसरे गरम जोशी से स्वागत किया। इस दृश्य ने न केवल स्थानीय राजनीति को बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की नींदें उड़ा दीं। एक ओर प्रधानमंत्री मोदी का व्यंग्यात्मक अंदाज़, दूसरी ओर थरूर की सहज आत्मीयता, इस पूरे प्रसंग को सामान्य शिष्टाचार से कहीं ज़्यादा बड़ा राजनीतिक संकेत बना गई।

गौरतलब हो शशि थरूर कोई साधारण सांसद नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुभव, संयुक्त राष्ट्र में लंबी सेवा, शानदार वक्तृत्व कला और साहित्यिक पृष्ठभूमि उन्हें एक ऐसा राजनेता बनाती है जो भीड़ में अलग दिखते हैं। लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर उनका व्यक्तित्व अक्सर असहजता पैदा करता रहा है। उनके स्पष्ट विचार, खुले मंचों पर सरकार की तारीफ और खुद को पार्टी लाइन से ऊपर रखने की प्रवृत्ति उन्हें अक्सर ‘अपनों’ के बीच ही अजनबी बना देती है। विझिंजम पोर्ट कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी तो एक सांसद की भूमिका के तहत थी, लेकिन जिस तरह उन्होंने प्रधानमंत्री से गर्मजोशी से हाथ मिलाया, तस्वीरें साझा कीं और फिर सोशल मीडिया पर गर्व के साथ लिखा कि उन्हें इस परियोजना से शुरू से जुड़ने का सौभाग्य मिला है यह सब कुछ कांग्रेस को चुभने के लिए काफी था।

राजनीति में जो चीजें नज़र आती हैं, वे उतनी महत्वपूर्ण नहीं होतीं, जितनी कि उनके पीछे छिपे संदेश। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कला के उस्ताद हैं। मंच से उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा कि यह आयोजन कई लोगों की नींद हराम कर देगा। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके संकेत स्पष्ट थे। राहुल गांधी, जो अक्सर प्रधानमंत्री की विदेश नीति और नेतृत्व शैली की कटु आलोचना करते हैं, वहीं उनके ही पार्टी सहयोगी थरूर मंच पर खड़े होकर इस ऐतिहासिक क्षण में प्रधानमंत्री का समर्थन करते दिखे। यह विरोधाभास कांग्रेस के लिए एक सियासी संकट बनता जा रहा है।

शशि थरूर की प्रधानमंत्री मोदी के साथ बढ़ती श्सार्वजनिक नजदीकियोंश् की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी वे रूस-यूक्रेन युद्ध के मसले पर भारत की नीति की सराहना कर चुके हैं। थरूर ने स्वीकार किया था कि उन्होंने पहले इस नीति की आलोचना की थी लेकिन बाद में यह मानना पड़ा कि मोदी सरकार ने कूटनीतिक संतुलन बेहतरीन तरीके से साधा। उन्होंने यहां तक कहा कि जब प्रधानमंत्री ने दो सप्ताह के भीतर रूस और यूक्रेन दोनों के राष्ट्रपतियों से मुलाकात की और दोनों ने भारत को सम्मान दिया, तो वह क्षण गर्व का था। यह बयान कांग्रेस की आधिकारिक विदेश नीति आलोचना के बिल्कुल विपरीत था।

भाजपा को थरूर के इस बदले रुख में संभावनाएं दिख रही हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने तंज कसा कि प्रधानमंत्री को अब नए आलोचकों की ज़रूरत है क्योंकि पुराने अब उनके प्रशंसक बनते जा रहे हैं। एक और भाजपा नेता बैजयंत जय पांडा ने शशि थरूर के साथ तस्वीर साझा करते हुए लिखा था कि वे और थरूर अब एक ही दिशा में यात्रा कर रहे हैं। शशि थरूर ने इस पर हल्के-फुल्के अंदाज़ में प्रतिक्रिया दी लेकिन यह संकेत कई लोगों के लिए बहुत गंभीर था।

थरूर की यह छवि कांग्रेस के भीतर लगातार चर्चा का विषय रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता भले सार्वजनिक रूप से कुछ न कहें, लेकिन निजी तौर पर यह चिंता जरूर जताई जाती रही है कि थरूर अपनी स्वतंत्र सोच को पार्टी लाइन से ऊपर रख रहे हैं। जब हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के बाद खुफिया तंत्र की आलोचना हो रही थी, तब थरूर ने कहा कि किसी देश की खुफिया एजेंसी सौ फीसदी प्रभावी नहीं हो सकती और उन्होंने इजरायल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी चूक होती है। इस बयान पर कांग्रेस के ही नेता उदित राज ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि थरूर भाजपा सरकार का बचाव कर रहे हैं, जबकि वे विपक्ष में हैं।

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में तिरुवनंतपुरम से थरूर की जीत ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी। उन्होंने केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर को हराया और भाजपा ने हार के बावजूद चंद्रशेखर को केरल का नेतृत्व सौंपा। इससे यह साफ है कि भाजपा थरूर को एक गंभीर प्रतिद्वंद्वी मानती है और उन्हें अपने पक्ष में करने की हर संभावित रणनीति पर काम कर रही है। वहीं थरूर की रणनीति भी अब खुलकर सामने आ रही है वे यह दर्शा रहे हैं कि वे राष्ट्रहित में किसी की भी प्रशंसा करने से पीछे नहीं हटते, चाहे वह प्रधानमंत्री मोदी ही क्यों न हों।

यह घटनाक्रम सिर्फ एक राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संकट का भी संकेत देता है। थरूर जैसे नेता, जो लोकप्रिय हैं, मीडिया में प्रभावी हैं, वैश्विक सोच रखते हैं, वे पार्टी में हाशिए पर क्यों हैं? यह सवाल कांग्रेस को खुद से पूछना होगा। खुद थरूर ने फरवरी 2025 में कहा था कि अगर कांग्रेस को मेरी जरूरत नहीं है तो मेरे पास भी विकल्प हैं। यह बयान हल्का नहीं था, यह एक चेतावनी थी।

भारतीय राजनीति अब तेजी से बदल रही है। विचारधारा से अधिक व्यक्ति का प्रभाव, चेहरे की पहचान और राष्ट्रहित में उठाए गए कदमों की अहमियत बढ़ गई है। ऐसे में थरूर जैसे नेता, जो बौद्धिक और व्यावहारिक राजनीति का मेल हैं, उन्हें लंबे समय तक पार्टी की आंतरिक राजनीति में उलझाकर नहीं रखा जा सकता। अगर कांग्रेस उन्हें अपना नहीं बना पाती, तो अन्य विकल्पों के लिए रास्ते खुले हैं।

विझिंजम पोर्ट पर मंच साझा करना महज शिष्टाचार नहीं था। यह एक राजनीतिक संदेश था थरूर की तरफ से भी और प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से भी। एक तरफ भाजपा केरल में जमीन तलाश रही है, दूसरी ओर थरूर दिल्ली में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि शशि थरूर कांग्रेस के भीतर रहकर ही पार्टी के कायाकल्प की उम्मीद रखते हैं या फिर उन्हें कोई नई राजनीतिक राह बुला रही है।

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