मध्य प्रदेश के इंदौर संस्करण में प्रकाशित एक विज्ञापन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दैनिक भास्कर के 43 वर्ष पूर्ण होने पर पुलिस विभाग की ओर से बधाई संदेश प्रकाशित कराया गया है। विज्ञापन में थाना प्रभारी स्तर के अधिकारी की ओर से पूरे पुलिस परिवार की तरफ से शुभकामनाएं दी गई हैं।
विज्ञापन में अखबार की निष्पक्षता, जनहितकारी पत्रकारिता और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में भूमिका की सराहना की गई है। साथ ही भविष्य में भी सकारात्मक और जिम्मेदार पत्रकारिता की अपेक्षा जताई गई है। यह विज्ञापन अखबार के नियमित पृष्ठ पर प्रमुखता से प्रकाशित हुआ।
हालांकि इस विज्ञापन के प्रकाशन के बाद सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर कई सवाल उठने लगे हैं। प्रमुख सवाल यह है कि इस विज्ञापन का खर्च किस स्रोत से वहन किया गया? क्या संबंधित अधिकारी ने यह राशि निजी तौर पर दी है या फिर यह खर्च सरकारी/विभागीय मद से किया गया है?
आलोचकों का कहना है कि यदि यह भुगतान सरकारी धन से किया गया है, तो इसकी वैधता और औचित्य पर सवाल खड़े होते हैं। वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि यदि यह व्यक्तिगत स्तर पर शुभकामना संदेश है और निजी संसाधनों से प्रकाशित कराया गया है, तो इसे सामान्य सामाजिक शिष्टाचार माना जा सकता है।
फिलहाल पुलिस विभाग की ओर से इस विज्ञापन के खर्च को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा जरूर है कि सरकारी पद पर रहते हुए किसी निजी मीडिया संस्थान को बधाई विज्ञापन देने की प्रक्रिया और वित्तीय स्रोत स्पष्ट होने चाहिए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
मामले ने सरकारी संसाधनों के उपयोग और मीडिया–प्रशासन संबंधों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इस पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है।

अखबारों में तो पुलिस के दलाल और मुखबिर होते आए हैं, लेकिन अब यह का खुद अखबार मालिक करने लगे हैं। इसे कहते हैं ‘खुला खेल फर्रुखाबादी’। किसी तरह की पर्देदारी नहीं। सवाल है कि पुलिस थानों ने इन एक-डेढ़ लाख रुपये के विज्ञापनों बिलों का भुगतान किस मद से किया होगा? -अनिल जैन, वरिष्ठ पत्रकार


