महाराष्ट्र में डांस बारों पर कड़े नियमों में ढील दी सुप्रीम कोर्ट ने

समाज पर स्वयं के विचारों की नैतिकता नहीं थोप सकता राज्य

एक प्रथा, जो सामाजिक मानकों पर अनैतिक नहीं हो सकती है, को समाज पर राज्य द्वारा स्वयं के विचारों की नैतिकता के आधार पर अनैतिक बताकर रोकी नहीं जा सकती है और इस तरह सामाजिक नियंत्रण नहीं किया जा सकता है।महाराष्ट्र सरकार द्वारा डांस बारों के लिए लाइसेंस प्राप्त करने के लिए लगाए गए कड़े नियमों को शिथिल करते हुए, उच्चत्तम न्यायालय ने कहा कि राज्य समाज पर स्वयं के विचारों की नैतिकता नहीं थोप सकता । उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि महाराष्ट्र में डांस बार पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। पीठ ने विभिन्न बार मालिकों और भारतीय बारगर्ल्स यूनियन द्वारा दायर याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया है। इन याचिकाओं में महाराष्ट्र प्रोहिबिशन ऑफ़ ऑब्सीन डांस इन होटल एंड बार रूम्स एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ डिग्निटी ऑफ़ वीमेन एक्ट 2016 को चुनौती दी गई थी।

जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की खंडपीठ ने महाराष्ट्र स्टेट काउंसिल के सीनियर एडवोकेट शेखर नफाड़े द्वारा नैतिकता पर दी गयी दलील पर विचार किया कि राज्य अपने नागरिकों पर नैतिकता’ थोपने के लिए किस हद तक जा सकता है ?राज्य ने लगाई गई कड़ी शर्तों का बचाव किया और कहा कि सरकार द्वारा लगाए गए शर्तों की वैधता पर निर्णय करते समय नैतिकता के पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

पीठ ने इस संबंध में पहले के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यह ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि कुछ गतिविधियाँ हो सकती हैं, जिन्हें समाज अनैतिक मानता है। इसमें जुआ भी शामिल हो सकता है (हालाँकि अब यह एक बहस का मुद्दा भी बन सकता है) ), वेश्यावृत्ति आदि।पीठ ने कहा कि यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि किसी भी समाज में नैतिकता के मानक समय बीतने के साथ बदलते रहते हैं। एक विशेष गतिविधि, जिसे कुछ दशक पहले अनैतिक माना जाता था, अब हो सकता हिया ऐसा न हो । सामाजिक आदर्श बदलते रहते हैं। सामाजिक परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं: निरंतर या विकासवादी और विरल या क्रांतिकारी। परिवर्तन का सबसे आम रूप निरंतर है। सामाजिक विश्लेषण में यह दिन-प्रतिदिन का वृद्धिशील परिवर्तन एक सूक्ष्म, लेकिन गतिशील, कारक है।

पीठ ने कहा कि एक ओर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि गरिमापूर्ण रूपों में, नृत्य प्रदर्शन, सामाजिक रूप से स्वीकार्य हैं और किसी को इस पर आपत्ति भी नहीं होती है। दूसरी ओर अश्लीलता को अनैतिक माना जाता है। इसलिए अश्लील नृत्य प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं हो सकता है और राज्य अश्लील नृत्य पर रोक लगाने वाला कानून पारित कर सकता है।हालांकि एक प्रथा जो सामाजिक मानकों द्वारा अनैतिक नहीं हो सकती, समाज पर राज्य द्वारा अनैतिकता के नाम पर रोकी नहीं जा सकती ।

इस शर्त को खारिज करते हुए कि शराब ऐसी जगहों पर नहीं परोसी जा सकती है, जहां नृत्यों का मंचन किया जाता है, पीठ ने कहा कि इस तरह की शर्तें पूरी तरह से अनुचित, अनुचित और मनमानी हैं।फैसले में कहा गया है कि ऐसा लगता है कि राज्य नैतिक अतिवादों से प्रभावित होकर यह गलत अनुमान लगाकर चल रहा है कि शराब का सेवन करने वाले लोग नर्तकियों के साथ दुर्व्यवहार करेंगे। यदि ऐसा है, तो ऐसा अनुमान समान रूप से उन शराबखानों पर लागू होगा जहां महिला वेट्रेस द्वारा शराब परोसी जाती है। । हालांकि, ऐसी स्थितियों को न्यायालयों द्वारा अनुचित माना जाता रहा है। इस तरह की छिटपुट घटनाएं न केवल उन स्थानों पर हो सकती हैं जहां नृत्य प्रदर्शन का आयोजन होता है, बल्कि अन्य स्थानों, बार रूम और यहां तक कि मुख्य रेस्तरां में भी हो सकता है । इस तरह की गडबडियों के लिए अन्य उपायों को अपनाया जाना चाहिए। शराब को परोसने पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं हो सकता है।

फैसले में पीठ ने डांस बार के भीतर सीसीटीवी कैमरे लगाने की अनिवार्य शर्त निजता के उल्लंघन की वजह से खत्म कर दी गई है। जिस क्षेत्र में शराब परोसी जाती है उस क्षेत्र को डांस क्षेत्र को अलग करने का नियम रद्द हो गया है। केवल अच्छे चरित्र वाले व्यक्तियों को ही लाइसेंस देने की शर्त को भी समाप्त कर दिया गया है। पीठ ने कहा कि अच्छा चरित्र बहुत अस्पष्ट है।

पीठ ने इस शर्त को भी रद्द कर दिया है कि शिक्षण संस्थानों और धार्मिक स्थानों से एक किलोमीटर के दायरे में डांस बार खोलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। डांस बार में शराब परोसने पर लगा प्रतिबंध अब हटा दिया गया है। बारबालाओं को टिप दी जा सकती है, लेकिन बार बालाओं पर पैसे या सिक्के नही उड़ाए/उछाले जाएंगे। शाम 6 बजे से रात 11.30 बजे के बीच के समय, डांस बार चल सकेंगे।

पीठ ने महाराष्ट्र सरकार के तत्सम्बन्धी अधिनियम को वैध ठहराया है और कहा है कि राज्य की चिंताए भी वाजिब हैं। पीठ ने अश्लीलता को लेकर राज्य सरकार की सजा के प्रावधान को भी बरकरार रखा है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि वर्ष 2016 का यह कानून मनमाना है। इसके साथ ही यह दलील भी दी गयी थी कि यह कानून, वैध तरीकों से आजीविका अर्जित करने के उनके अधिकार का उल्लंघन करता है।

गौरतलब है कि 30 अगस्त 2018 को मुंबई डांस बार मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इस दौरान महाराष्ट्र सरकार ने कहा था कि नया कानून संवैधानिक दायरे में आता है और यह गैर कानूनी गतिविधियों और महिलाओं का शोषण भी रोकता है। जीविका कमाने का अधिकार सभी को है पर राज्य की यह भी जिम्मेदारी है कि सभी के अधिकारों व हितों का ख्याल रखे। राज्य सरकार ने यह भी कहा था कि नया कानून मॉरल पुलिसिंग नही है।

कानून की कड़ी शर्तें

2016 में महाराष्ट्र सरकार ने “प्रोहिबिशन ऑफ ऑब्सीन डांस एंड प्रोटेक्शन ऑफ डिगनिटी ऑफ वुमेन” कानून बनाया। इस कानून में अश्लीलता रोकने के नाम पर काफी कड़े नियम बना दिये गए।नए कानून में डांस बार का लाइसेंस मांगने वालों से कई शर्तों का पालन करने को कहा गया। जैसे ,डांस फ्लोर को चारों तरफ से हल्की ऊंची दीवार से घेरना,डांस वाले हॉल में शराब न परोसना,डांस वाले हॉल में सीसीटीवी कैमरा लगाना और उसकी लाइव फीड स्थानीय थाने को देना, स्कूल और धार्मिक स्थानों से एक किलोमीटर दूर डांस बार खोलना, रात साढ़े 11 तक ही बार खोलना,डांसर को मासिक वेतन पर नौकरी देना तथा डांसरों पर पैसे लुटाने या टिप देने पर रोक।

लेखक जेपी सिंह से संपर्क singhjp19@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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