भड़ास संपादक यशवंत के बड़े पिता जी श्रीकृष्ण सिंह का निधन

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के बड़े पिताजी श्रीकृष्ण सिंह का कल उनके जिले गाजीपुर स्थित पैतृक गांव में देहांत हो गया. उनकी उम्र 85 साल से ज्यादा थी. उन्हें कोई रोग / शोक नहीं था. उनका निधन हार्ट अटैक के कारण हुआ. वे अपने पीछे चार बेटे, बहुओं और नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. यशवंत कई रोज से अपने गांव में ही थे. सो, उन्होंने बड़े पिता जी के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार में शिरकत किया. यशवंत ने फेसबुक पर अपने बड़े पिताजी को लेकर एक संस्मरणात्मक राइटअप लिखा है, जिसे नीचे दिया जा रहा है….

Yashwant Singh : बड़े पिता जी यानि श्रीकृष्ण सिंह की उम्र 85 साल से ज्यादा थी. वे खानदान में सबसे अलग थे. बेहद डेमोक्रेटिक. सबके प्रति साफ्ट रहे. कभी कड़क स्वभाव में उन्हें देखा नहीं. बच्चा हो या बुजुर्ग, हर कोई उनसे हर तरह की बात कर लेता और वह सबकी मजे में सुनते.

गांव में कोई उनका विरोधी नहीं था और वे खुद किसी के विरोधी नहीं बने. बेहद पाजिटिव व्यक्तित्व. किसी से कोई आकांक्षा नहीं रखे कभी, अपने बेटों से भी नहीं. जो कुछ कर दे तो ठीक, न करे तो ठीक. उनकी अपनी दुनिया थी. वे बाकी परिजनों / सवर्णों की तरह फ्यूडल कतई नहीं थे.

लंबी उम्र हो जाने के कारण सेहत को लेकर सतर्क रहा करते. अपना काम काज खुद करते और टहलने में कोताही न बरतते. उनके जीते जी उनसे उमर में छोटे कई सारे लोग गुजर गए. वे तब यही कह करते- अरे वह तो मुझसे छोटे थे, बड़ी जल्दी चले गए.

चार रोज पहले वह बुढ़ापे के हालात का वर्णन अनायास करने लगे. वह बताने लगे- ”चाहे जो कहो, बुढ़ापे में तकलीफ तो है. खड़े होने पर तकलीफ, बैठो तो तकलीफ. न उठो बैठो तो तकलीफ.” वे आगे हंसते हुए बोले- ”ऐसी तकलीफों के कारण ही लोग मर जाना ज्यादा पसंद करते हैं.”

यह बात उनने मुस्कराते हुए कही और मैं बिना गहराई में गए उनका साथ देते हुए हंस-मुस्करा पड़ा. मुझे लगा वो ये बात बस बतियाने के लिए कुछ कहने सुनने हेतु कह बता रहे हैं. मैंने इसका कोई दूसरा या सांकेतिक मतलब नहीं निकाला. पर मैं गलत था. वह शायद अपने तन के जर्जर होते जाने को लेकर यह बात ज्यादा संवेदनशील मन:स्थिति में कह रहे थे. यानि वे मौत के लिए तैयार थे, शायद मौत को आमंत्रित कर रहे थे.

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बड़े पिताजी से हम लोग कुछ भी कह / मांग लेते थे. वे जानते हैं कि मैं कभी-कभार सुर्ती यानि तंबाकू खा लेता हूं. इसलिए वह मुझे देखते तो सुर्ती में चूना मिलाकर हथेली में रगड़ने लगते. चार रोज पहले वह सुर्ती बना रहे थे, तभी उनके पीछे एक बिल्ली ने म्याऊं कहा. मैंने कैमरा आन कर बिल्ली पर फोकस किया और बिल्ली-सी आवाज निकालने की कोशिश करने लगा.

बिल्ली जाल में फंसने लगी. उसे मेरी बिल्ली-सी आवाज परिचित सी जान पड़ने लगी. उसने दोनों कान खड़े कर लिए और आंख फाड़कर देखना शुरू किया. बिल्ली बड़े पिताजी के पीछे थी. बड़े पिता जी समझ ही नहीं पाये कि आखिर मैं कर क्या रहा हूं, क्यों बिल्ली की आवाज निकाल रहा हूं. उन्हें धीरे से बताया कि पीछे बिल्ली है, उसको रिकार्ड कर रहा हूं.

मैंने कैमरे के पीछे मुंह छिपा रखा था और बिल्ली अपनी आवाज की नकल करने वाले की शकल देखना चाह रही थी, आवाज का केंद्र तलाश रही थी. वह चौकन्नी होकर हौले से करीब आई. इसी दरम्यान बड़े पिताजी ने तंबाकू रगड़ कर मेरी हथेली पर रख दिया.

यह अंतिम वीडियो है जिसमें बड़े पिताजी दिख रहे हैं, शुरुआत में सशरीर, बाद में उठकर आते हुए और मुझे तंबाकू देते हुए. मैं लीन था बिल्ली से संवाद करने की कोशिश में.

संबंधित वीडियो का लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=53nqm9hgNL8

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बड़े पिता जी का दो बार पहले भी हार्ट अटैक हो चुका था. तीसरी बार यह अटैक जानलेवा साबित हुआ. उनकी मृत्यु के बाद गांव-घर के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह अच्छी मौत है, बिना किसी से कुछ सेवा टहल कराए, चलते-फिरते चले गए. थोड़ी ही देर में देखा कि बैंड बाजा मंगा लिया गया. लोहार भाई बांस छील काट कर अंतिम यात्रा के लिए तैयारी करने लगे. गांव के कई बड़े बुजुर्ग उनके इर्दगिर्द खड़े हो गए. हंसी मजाक का दौर चलने लगा.

लोहार ने हंसते हुए कहा कि दो चार इकट्ठे बना दे रहा हूं, कई लोग लाइन में लगे दिख रहे हैं, ये कई बुजुर्ग बस आजकल-आजकल हुए पड़े हैं, जाने कब टपक जाएं. लोहार का इशारा लाठी टेककर खड़े एक बुजुर्ग ठाकुर साहब की तरफ था, जो खुद हंसोड़ शख्स हैं. लोग उनकी तरफ देख ठठा कर हंसने लगे तो उनने जवाब में नहले पर दहला मारा, अभी तो गुरु कइयों को श्मशान पहुंचाउंगा, उसके बाद सोचूंगा.

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बड़े पिता जी की शव यात्रा गाजे बाजे के साथ शुरू हुई और नजदीकी गंगा घाट पर जाकर खत्म हुई. उनके शव को गंगा में विसर्जित किया गया. ऐसी मान्यता है कि किसी संत ने कई गांवों के लोगों को शवों को गंगा में विसर्जित करने को कहा था, तबसे यह परंपरा चली आ रही है. मुझे यह इसलिए ठीक लगता है क्योंकि नेचर का फूड चेन मेनटेन रहता है. हम मछली खाते हैं और जल के जीवों को खाने के लिए हम खुद को पेश कर देते हैं. बड़े पिता जी शाकाहारी थे और दूध उनका सर्वप्रिय सदाबहार आहार थे. वे किसिम किसिम के शाकाहारी खाने के शौकीन थे.

बड़े पिताजी के चले जाने के बाद पूरा गांव उनकी किस्मत की सराहना करने में जुटा रहा, मौत हो तो ऐसी, पूरा जीवन जिया और खटिया पर लेटकर भोगने की जगह हंसते खेलते टहलते चले गए. मैंने महसूस किया कि गांव के लोग शहरियों से ज्यादा प्रैक्टिकल होते हैं, जीवन-मृत्यु को लेकर. वह जीवन को जीवंतता से जीने की समझ तो रखते ही हैं और मौत को एक अनिवार्य साथी मानकर उसके प्रति वेलकम भाव भी रखते हैं. गांववालों के रुख / भाव को देखकर मुझे अच्छा लगा. मैंने गहरे उतरकर काफी कुछ महसूस किया.

मेरा कर्मकांड में भरोसा नहीं है इसलिए शव विसर्जन के बाद अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आया. गांव और परिवार के लोग तेरह दिन तक मृत्यु संस्कार में लीन रहेंगे, सुबह नहाने से लेकर सिर के बाल उतरवाने और तेरहवें दिन बड़े पैमाने पर सामूहिक भोज करने कराने में लगे रहेंगे. मेरे खयाल से ये सब पैसे की बर्बादी है. लेकिन गांव वाले शायद इन्हीं कर्मकांडों के जरिए खुद की सामूहिकता को जी पाते हैं और दुखों सुखों को एक दूसरे से शेयर कर पाते हैं, जो कि अच्छा ही है.

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कल पूरा दिन जीवन-मौत, शव, शोक, बैंड-बाजा, अंतिम संस्कार, गंगा विसर्जन आदि से भरा रहा. आज देर सुबह सोकर उठा तो पूरा गांव और खेत-खलिहान कोहरे से ढंके मिले, चंद कदम आगे तक का राह नहीं सूझ रहा. इस रहस्यमय मौसम के संदेश को समझने के वास्ते पूरा एक चक्कर लगाया, गांव के बगीचों और खेतों का, मेड़ दर मेड़ और पेड़ दर पेड़. मुझे हर जगह बिझी मिली ओस की बूंदों में बड़े पिताजी दिखाई दे रहे थे, चमकते-खिलखिलाते.

दरअसल जीवन में दुख, ग़म, खुशी, उत्सव, जीवन, मौत… ऐसा कुछ अलग-थलग, मोनोलिथिक-सा नहीं होता… एक प्रक्रिया है जो संचालित होती रहती है और हम सब अपने-अपने मन मिजाज ज्ञान संस्कार चेतना समझदारी सोच के हिसाब से इसे कनसीव कर अलग अलग नाम दे दिया करते हैं..

नहा खा कर दोपहर बाद जब मैं शहर यानि जिला मुख्यालय के फोर जी वाले इलाके में आया तो मोबाइल का नेट आन किया. देखा सिंगिंग से संबंधित एक मोबाइल एप्प के बारे में एक संदेश ह्वाट्सएप में आया हुआ है. इसे डाउनलोड किया, इंस्टाल किया, और आजमाने में जुट गया, आप भी रिजल्ट देखें और कुछ क्षण गुनगुनाएं.. : https://www.youtube.com/watch?v=Tgf_9fIK5nk

ग़मगीन होना श्रद्धांजलि देना नहीं होता, गुनगुनाना असल में सच्ची श्रद्धांजलि होती है, जिसमें हम जीवन के उदात्ततम स्वरूप के लिए प्रकृति के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करने हेतु थोड़ा म्यूजिकल हो जाते हैं… लव यू आल.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह से संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

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